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शनिवार, 25 दिसंबर 2010

दो अदालती फ़ैसले : महिला अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में




पिछले दिनों अचानक दो फ़ैसलों ने अपनी ओर ध्यान खींचा । इसमे आश्चर्य और सुखद बात ये है कि एक फ़ैसला दिल्ली की अधीनस्थ अदालत का है तो दूसरा सर्वोच्च अदालत का किंतु दोनों ही मुकदमों में महिला अधिकारों पर जिस तरह से फ़ैसले के निहितार्थ को रखा और देखा गया वह बहुत मामलों में महत्वपूर्ण रहा ।

मोटर दुर्घटना दावा पंचाट दिल्ली ने एक रूटीन मुकदमे का फ़ैसला सुनाया जो अपने आप में एक एतिहासिक फ़ैसला साबित हुआ । इस पंचाट ने फ़ैसला सुनाते हुए प्रतिवादी को लगभग अठारह लाख बतौर मुआवजा मृतक छात्रा के माता पिता को दिया । यहां तक तो ये आम फ़ैसले की तरह ही लगा और था । मुकदमा ये था कि , एक छात्रा जो दिल्ली विश्व विद्यालय में स्नातक की छात्रा थी की एक सडक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी , उसका मुआवजे के लिए ये याचिका उसके माता पिता ने डाली थी । हालांकि मृतक छात्रा थी और उसकी आय कुछ भी नहीं होने के कारण , प्रतिवादियों ने उसे मुआवजे की कम रकम का हकदार बताया था , किंतु पंचाट ने ...............................

जैसा कि आपको विदित है कि मैं ब्लॉगर से डोमेन की तरफ़ अग्रसर हूं ..आगे पढने के लिए यहां आएं

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

न्यायिक प्रक्रिया में परिवर्तन की दरकार...



पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से न्यायिक क्षेत्र में पनप रहे कदाचार व अन्य अनियमितताओं की खबरें आती रही हैं उसने एक बार फ़िर से इस चर्चा को गर्म कर दिया है कि क्या अब समय आ गया है जब पूरी न्याय प्रणाली में परिवर्तन किया जाए । कभी कभी तो बहुत सी एक जैसी घटनाओम और अपराधों के मामले में खुद न्यायपालिका अपने आदेशों और फ़ैसलों में इतना भिन्न नज़रिया दिखा दे रही हैं कि आम लोग ये समझ ही नहीं पाते हैं कि आखिर न्याय कौन सी दिशा में हुआ है । इतना ही नहीं बहुत बार तो न्यायिक आदेश की व्याख्या करते करते आम जनता को अपने साथ सरासर अन्याय होता हुआ सा महसूस हो जाता है । भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की एक सबसे बडी कमी है उसके फ़ैसलों उसके दृष्टिकोण और उसके क्रियाकलाप पर आम आदमी द्वारा किसी भी तरह की असुरक्षित प्रतिक्रिया देने का नितांत अभाव ।

आज स्थिति इतनी बदतर है कि , आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने इस बात की अर्जी लगाई कि , कुछ दिनों पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार में लिप्तता विषयक जो तल्ख टिप्पणी की थी उसे वापस लिया जाए । इस अर्जी पर उच्च न्यायालय की अरजी को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो कडी फ़टकार लगाई , उसे लगाते हुए वो जरूर अभी हाल ही में हुई उस घटना को नज़रअंदाज़ कर गई जब एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने बाकायदा गिनती करते हुए बताया था कि उन माननीय पर भी ऐसी ही टिप्पणी लागू की जा सकती थी । इससे इतर केंद्र सरकार की एक स्थाई संसदीय समिति ने भी अब पूरी तरह से इस मामले में अपनी कमर कस ली है । भविष्य में भ्रष्ठ न्यायाधीशों से निपटने के लिए सरकार कडे नियम कानून लाने का विचार कर रही है । उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बासठ वर्ष से पैंसठ वर्ष किए जाने की सिफ़ारिश भी की गई है ।

पिछले एक दशक से न्यायपालिका की भूमिका में जिस तरह का बदलाव आया और एक स्वनिहित शक्ति का संचार उसमें आया स्वाभाविक रूप से उसमें समाज में व्याप्त वो सभी दुर्गुण आ गए तो अन्य सार्वजनिक संस्थाओं में आ जाती हैं । किंतु इस बात की गंभीरता को भलीभांतिं परखते हुए इसके उपचार में कई प्रयास भी शुरू हो गए थे ।जजेज़ जवाबदेही विधेयक का मसौदा , अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आदि का मसौदा इन्हीं प्रयासों का हिस्सा था । ये सरकारों की अकर्मठता है या आलस्य या फ़िर कि कोई छुपी हुई मंशा कि अब तक इस दिशा में कोई भी कार्य नहीं हो पाया है । न्यायिक प्रक्रिया की खामी की जहां तक बात है तो सबसे पहले और सबसे अधिक जो बात उठती है वो न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया जिसमें भाई भतीजावाद का आरोप लगता रहता है । एक ही स्थान पर नियुक्त रहने के कारण इस अंदेशे को बल भी मिल जाता है । इन्हीं सबके कारण न्यायिक क्षेत्र में परिवर्तन वो भी आमूल चूल परिवर्तन किए जाने के स्वर उठने लगे हैं ।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

कैसे कैसे मुकदमें ....कचहरीनामा ..एक कर्मचारी की नज़र से ..jha ji in court






आजकल मेरी नियुक्ति ..मोटर वाहन दुर्घटना पंचाट में है ..और रोज सैकडों मुकदमों से आमना सामना होता है ..अक्सर जब हर दुर्घटना में एक तरफ़ खडे पीडित या दुर्घटना में मृतक के आश्रितों को देखता हूं और दूसरी तरफ़ चालक , वाहन के मालिक और बीमा कंपनी को देखता हूं तो जाने कितनी ही बातें एक साथ दिमाग में घूमने लगती हैं । और् कई बार तो ऐसे ऐसे मुकदमें सामने आ जाते हैं जो स्तब्ध कर देते हैं । सोचा आज आपसे कुछ उन मुकदमों को बांटा जाए ..


एक मुकदमें में मृतक बालक जिसकी उम्र ग्यारह वर्ष की थी ..उसके पिता माता ने मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम के तहत मुआवजे की मांग की थी । जब मुकदमें पर सरसरी तौर पर नज़र डाली तो देखा कि ...उस बालक की मौत का जो कारण था वो ये था कि ..खुद उसके पिता ने एक दिन सुबह ऑफ़िस जाने की जल्दी में गाडी को रिवर्स करते समय ..पीछे खडे उस बालक पर गाडी चढा दी ..फ़लस्वरूप उसकी मौत हो गई ....,मैं स्तब्ध था ....समझ ही नहीं पा रहा था कि आखिर उस पिता के दिल पर क्या बीत रही होगी ???


अब एक दूसरा मुकदमा देखिए ........एक तरफ़ थी मृतक बालक की मां ...घर में और कोई भी नहीं , न आगे न पीछे ....ओह इस संसार में अब वो निहायत ही अकेली ..असहाय और निराश सी दिखी ...और दूसरी तरफ़ वो बालक जिसने तेज गति से बाईक चलाते हुए ..उस बालक की जान ले ली थी और साथ खडी उसकी विधवा मां ..जिसने रोते हुए यही कहा कि वो प्रति माह किसी तरह से नौकरी करके पांच हजार कमा कर घर चला रही है ..और एक महीने की तनख्वाह दे सकती है मुआवजे के रूप में ..चूंकि दुर्घटना में लिप्त मोटर सायकल का बीमा नहीं था इसलिए वो मुआवजे की रकम उन्हें ही अदा करनी थी ...


एक और ..थोडा अलग और थोडा हटके ...पीडित ने आते ही हाथ जोड कर कहा ...जज साहब मुझे कुछ नहीं चाहिए इनसे ..दुर्घट्ना के समय से लेकर अब तक इन्होंने जो कुछ मेरे लिए किया है वो तो मेरा परिवार भी नहीं कर सकता था ....दिन रात न सिर्फ़ मेरा ख्याल रखा बल्कि , मेरे पीछे से मेरे परिवार का सुख दुख भी बांटते रहे ...इनसे अब मुझे कोई शिकायत नहीं है ...और दूसरा पक्ष जिसमें महिला चालक थीं और उनके पति वाहन मालिक के रूप में उपस्थित थे ..पीछे खडे थे दो युवा बच्चे जो मां बाप का साथ देने की गर्ज़ से खडे थे ..पूरी अदालत के लिए दोनों ही पक्षों के मन में आदर भाव स्वत: उत्पन्न हो गए थे ...

चलिए आज इतने ही दृश्य ...बांकी के फ़िर कभी ...

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

रविवार को दिल्ली की अदालतें निपटाएंगी तीस हज़ार मुकदमे



पिछले कुछ समय से अदालतें अपना बोझ कम करने के लिए कई महात्वाकांक्षी योजनाओं पर काम कर रही हैं । एक बडी योजना के क्रियान्वयन के तहत पूरे देश भर की अदालतों में मेगा लोक अदालत के नाम से लगाई जाने वाली अदालतों का आयोजन किया जा रहा है । उसी योजना के तहत दिल्ली की अधीनस्थ न्यायालयों में इस रविवार यानि चौबीस अक्तूबर को मेगा लोक अदालत का आयोजन किया जा रहा है , जिसमें अब तक की जानकारी के अनुसार लगभग दो सौ न्यायाधीश .....कुल तीस हज़ार से अधिक मुकदमों का निपटारा करेंगे । इनमें , मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम , १३८ के चैक बाऊंसिग के मुकदमे, पारिवारिक मुकदमे , चालान , दीवानी अपील आदि जैसे मुकदमों की सुनवाई होगी ।

पिछले एक माह से इस मेगा लोक अदालत को सफ़ल बनाने के लिए , न सिर्फ़ पूरी न्यायिक मशीनरी , न्यायिक अधिकारीगण , सभी कर्मचारीगण , पुलिस , प्रशासन , सभी संबंधित निकाय युद्ध स्तर पर लगे हुए हैं । यहां तक की बीच में पडने वाले अवकाशों को भी अनाधिकारिक रूप से रद्द करके मेगा लोक अदालत के कार्य के लिए प्रयास किए जा रहे हैं । सूचना के अनुसार दिसंबर मध्य में ऐसी ही मेगा लोक अदालत छत्तीसगढ में लगाए जाने की योजना है और राजस्थान में भी । धीरे धीरे सभी राज्य अपने यहां इस तरह की अदालतों को लगाने का निर्देश दिया गया । यदि योजना मनोनुकूल रूप से चलती रही तो आगामी मार्च तक देश भर की अदालतों से कम से कम दस बारह लाख मुकदमों के समाप्त होने की संभावना दिखाई दे रही है । फ़िलहाल तो इसे एक प्रयोग की तरह आजमाया जा रहा है , और यदि ये सफ़ल रहता है तो फ़िर ऐसे प्रयासों को नियमित किया जाएगा । अदालत द्वारा की जा रही ऐसी पहल का नि:संदेह स्वागत किया जाना चाहिए ।

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर .....मृत्युदंड बनाम आजीवन कारावास ......प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड फ़ैसले के परिप्रेक्ष्य में .... अजय कुमार झा


अभी हाल ही में दो बडे अदालती फ़ैसलों ने आम लोगों का ध्यान फ़िर से अपनी ओर आकृष्ट किया ...या कहा जाए कि उन्हें इस कदर उद्वेलित किया कि वे खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं ..। जैसा कि स्वाभाविक है कि दोनों में ही अदालती फ़ैसले को अलग अलग मापदंडों , मानवीय भावनाओं , न्यायालीय संवेदनाओं और जाने कैसी कैसी कसौटी पर कसा जा रहा है । अयोध्या विवाद के फ़ैसले के अपने इतर तर्क हैं और इतर प्रभाव भी ....और सबसे बडी बात तो ये है कि अभी सर्वोच्च अपील का अधिकार भी बचा हुआ है दोनों की पक्षों के पास ...और फ़िर चूंकि मामला धर्म और आस्था से जुडा हुआ है इसलिए उस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया भी उसी अनुरूप आ रही हैं । हां जहां तक दूसर बडे फ़ैसले की बात है तो ...यदि सीधे सीधे सपाट तौर पर देखा जाए तो आम जन को जितना अधिक गुस्सा इस बात पर है कि अदालत ने प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड के मुजरिम ..संतोष सिंह की ..फ़ांसी देकर मौत देने की सजा को कम करके ..उम्र कैद में बदल दिया ..उससे अधिक गुस्सा इस बात को लेकर है कि आखिर किन वजहों से अदालत ने इस मुकदमे को .."..दुर्लभतम में से दुर्लभ " की श्रेणी में क्यों नहीं रखा ???आम आदमी आज यही सवाल उठा रहा है कि ...जब कुछ वर्ष पहले ..सभवत: २००४ में ऐसे ही एक लिफ़्ट चलाने वाले ..अपराधी को बलात्कार के बाद हत्या के दोष में फ़ांसी की सजा दी गई थी ..तो इस मुकदमें में क्या संतोष सिंह को सिर्फ़ इस वजह से ..लाभ मिला है क्योंकि वो एक रसूखदार व्यक्ति (अब दिवंगत )का पुत्र है ...आखिर वो कौन से मापदंड हैं जिन्हें अपना कर अदालतें ये तय करती हैं कि अमुक मुकदमा ..दुर्लभतम में से दुर्लभ की श्रेणी में आता ..या नहीं आता है ।

कोई भी विमर्श करने से पहले दो बातें स्पष्ट कर देनी चाहिए .....। इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए ..बहुत से व्यक्तियों ने एक ही बात बार बार उठाई कि ..आजीवन कारावास का मतलब तो ये हुआ कि ..चौदह वर्षों की कारावास ....और उसके बाद ..या ऐसे ही कुछ वर्षों के बाद ..जेल से रिहाई ....तो यहां ये स्पष्ट कर दिया जाए कि ..अभी पिछले ही वर्ष दिए गए अपने एक फ़ैसले में माननीय सर्वोच्च अदालत ने ..एक अपील की सुनवाई करते हुए .पूरी तरह से आजीवन कारावास को परिभाषित किया और बताया कि आजीवन कारावास का मतलब ..आजीवन कारावास ही होता है ....आजीवन यानि जीवन पर्यंत ..यानि कि जब तक मुजरिम जीवित है तब तक ....। दूसरी बात ये कि सर्वोच्च अदालत जब भी मौत की सजा वाली अपील पर सुनवाई करती है तो स्वाभाविक नियमानुसार ..इससे पहले ऐसे मामलों की सुनवाई और उनमें सुनाए गए फ़ैसलों मे स्थापित किए गए आदर्शों और मापदंडों को सामने रख कर जरूर परखती है ...और उसके अनुसार ही ..फ़ांसी की सजा देने के लिए .."दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " माने गए मुकदमे को साबित करना होता है । हालांकि इसके लिए भारतीय कानून में कहीं कोई निश्चित नियम या उपबंध नहीं है और अदालत इसे स्वयं बहुत से आधारों पर परखती है ।एक अघोषित नियम ये होता है कि जब अदालत को ये महसूस कि मुजरिम को फ़ांसी या मौत से कम कोई भी सजा सुनाने से नाइंसाफ़ी की झलक दिखाई दे तो और सिर्फ़ तभी मौत की सजा सुनाई जानी चाहिए । आईये देखते हैं कि इस बिंदु पर अदालतें क्या कैसे सोचती हैं ..

अभी हाल ही १६.०९. २०१० को सुंदर सिंह बनाम उत्तरांचल सरकार मुकदमें में ऐसे ही एक फ़ांसी की अपील पर सुनवाई करते हुए न सिर्फ़ अदालत ने बहुत सी बातों पर रोशनी डाली बल्कि इसी के साथ ही मुजरिम की फ़ांसी की सजा को भी बरकरार रखा । अभियोजन पक्ष के अनुसार इस मुकदमे में , सुंदर सिंह नामक व्यक्ति ने पांच लोगों को एक घर में पेट्रोल छिडक कर आग लगा दी और बाहर से घर का दरवाजा बंद करके उन्हें जिंदा भून डाला इतना ही नहीं जब उनमें से एक व्यक्ति ने बाहर निकलने की कोशिश की तो उसने उसे दरवाजे के बाहर आते ही अपनी कुल्हाडी से काट कर मार डाला । अदालत ने इस मुकदमे के फ़ैसले पर पहुंचने से पहले इन बातों को सामने रखा । अदालत ने इसे क्रूरतम हत्या मानते हुए इसे" दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " मानते हुए सुंदर सिंह की फ़ांसी की सजा को बहाल रखा ।अदालत ने "दुर्लभतम में से भी दुर्लभ "मुकदमों का उदाहरण देते हुए कहा कि , सर्वप्रथम ये मौत की सजा के लिए किसी मापदंड तय करने की बात ..मच्छी सिंह बनाम पंजाब सरकार , वाले मुकदमें में हुई थी । इस मुकदमे का फ़ैसला करते हुए अदालत ने कुछ बिंदु तय किए थे , जिन्हें अधिकतम सजा (मौत ) दिए जाने से पहले न्यायाधीश को परखना चाहिए । जब हत्या निहायत ही क्रूरतम तरीके से , छिप कर , बदला लेने के लिए ,और सिर्फ़ इस वजह से की गई हो कि समाज में उससे घृणा और द्वेष फ़ैल जाए तो वो अपराधी मौत की सजा का हकदार है । जब कोई हत्या नृशंस तरीके से , नीच और शैतानी उद्देश्य के लिए की गई हो । जब किसी निम्न जाति के किसी व्यक्ति की हत्या आपसी रंजिश के लिए न करके सिर्फ़ इस उद्देश्य से की गई हो कि उससे समाज में अशांति और द्वेष फ़ैल जाए तो ,जब अपराध बहुत ही वृहत हो बहुत ही भयानक हो ।अदालत ने कुछ इसी तरह के मापदंड , सुशील मुर्मू बनाम झारखंड राज्य , मामले में भी तय किए थे ।

इस उपरोक्त मुकदमे का फ़ैसला करते समय अदालत ने , धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल सरकार, [1994 (2) SCC 220] और राजीव उर्फ़ रामचंद्र बनाम राजस्थान सरकार [1996 (2) SCC 175] का उदाहरण लेते हुए कहा कि , ये दोनों ही मामले दुर्लभतम में से भी दुर्लभ की श्रेणी में आते हैं । पहले में उस युवक ने , पहले तो १४ वर्ष की बच्ची को मार कर घायल कर दिया और फ़िर जब वो दम तोड रही थी तो उसके साथ बलात्कार किया ।दूसरे में मुजरिम ने , अपने तीन मासूम बच्चों और अपनी पत्नी जो कि कुछ ही समय के बाद मां बनने वाली थी की क्रूर हत्या कर दी थी । एक दिलचस्प मुकदमे का उदाहरण उत्तर प्रदेश सरकार बनाम धर्मेंद्र सिंह . [1999 (8) SCC 325], , जिसमें फ़ैसला दिया गया था कि , मुजरिम को फ़ांसी की सजा मिलने में हुई तीन वर्ष की देरी के कारण उसकी मौत की सजा को कम नहीं किया जा सकता और भविष्य में भी ये सजा कम करने के लिए कोई आधार नहीं हो सकता है , त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात सरकार ,[1988 (4) SCC 574], ।

अब पहले बात ये कि आम लोग जैसा कि समझ समझा रहे हैं कि आखिर धनंजय चटर्जी और इस मुकदमें में आखिर वो कौन सा फ़र्क था जो कि अदालत ने संतोष सिंह की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया । अदालत ने अपराध की क्रूरता पर कहीं भी ऊंगली नहीं उठाई है न ही इस बात की तुलना की गई है कहीं भी कि , धनजंय चटर्जी वाले मुकदमे की तुलना में प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड कम क्रूर था जबकि हकीकत यही है कि वो अधिक क्रूर थी । हां अदालत ने संतोष सिंह की ,सजा को कम करने के पीछे जो तर्क रखे वे कुछ इस तरह से हैं । जब निचली अदालत ने उसे बरी किया था तब वो पच्चीस वर्ष का युबक था , और उसके रिहा होने के बाद , उसने विवाह किया और आज वो एक होने वाले बच्चे का पिता बनने जा रहा है , तब से लेकर अब तक स्थितियां बहुत भिन्न हो चुकी हैं । अदालत ने उदाहरण स्वरूप राजीव गांधी हत्याकांड की मुख्य अभियुक्त और फ़ांसी की सजा मिल चुकी नलिनी की सजा को उम्र कैद में बदले जाने को भी उदाहरण में लेते हुए बताया कि , उस मुकदमे में , भी ये साबित हुआ है कि शिवरासन और ग्रुप ने एक औरत का फ़ायदा उठाते हुए पति द्वारा पत्नी पर बनाए गए दबाव को आधार बना कर नलिनी को इसके लिए फ़ंसा दिया था और अब जबकि उसकी कोख में एक नन्हीं सी जान पल रही है तो ऐसे में उसे मौत की सजा दे देना कहीं से भी ठीक नहीं होगा ।

उपरोक्त बहस का तात्पर्य यदि ये निकाला जाए कि , किसी भी मुकदमे को " दुर्लभतम में भी दुर्लभ " की श्रेणी में देखना और दिखाना ..हर मुकदमे के साथ और अदालत को उसे देखने पर ही निर्भर करता है ,...तो गलत नहीं होगा । किंतु ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अदालतें अपने हर मुकदमे को कानून की कसौटी पर ही घिस कर उसके धार को परखती है । अभी भविष्य में ऐसे बहुत से मौके आएंगे जहां न सिर्फ़ अदालतों को फ़ैसले पर पहुंचने के बहुत ही मशक्क्त करनी होगी बल्कि उससे अधिक इस बात का ख्याल भी रखना होगा कि उसके फ़ैसले , उसके तर्क और सबसे बढ कर उसके नज़रिए से ...आम जनता भी इत्तेफ़ाक रखे । हालांकि ..बलात्कार जैसे घृणित अपराध के लिए तो ,...मौत से भी बदतर यदि कोई सजा हो तो वो ही मुकर्रर्र की जानी चाहिए ।



रविवार, 12 सितंबर 2010

दिल्ली का कचहरी का बदलता चेहरा .......

जैसा कि मैंने अपनी पूर्व में लिखी पोस्टों में बताया था कि दिल्ली की अदालतों, उनमें चल रही कार्यवाही प्रणालियों, कर्मचारियों के लुक, सभी तकनीकों को आधुनिक करने , उन्हें परिवर्तित करने पर बहुत सी योजनाएं एक साथ चलाई जा रही हैं आज मैं दिखाता हूं नई और पुरानी अदालत का स्वरूप :-


ये हुआ करती थीं ,पुरानी अदालतें



और ये नीचे हैं, अत्याधुनिक तकनीक , लेजर कैमरों , सीसीटीवी , वीडियोकांफ़्रेंसिंग, डौकेट सिस्टम , की स्टेटस सिस्टम और पूर्णतयावातुनुकुलित नई अदालत का चेहरा


ऐसा कई कारणों से किया जा रहा है । अदालत की छवि बदलने के लिए, वहां आने जाने वालों की सहूलियत , तथा बेहतर वातावरण से मुकदमों के निस्तारण के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना । अब ये तो वक्त ही बताएगा ,कि ..........अदालत के ये बदलते चेहरे .......आम आदमी के चेहरे पर कितना सुकून और मुस्कुराहट ला पाएंगे ....अन्यथा ये खूबसूरती भी बदसूरत ही साबित होगी ॥

शनिवार, 15 मई 2010

टांय टांय फ़िस्स हुई अदालती कर्मचारियों को वर्दी पहनाने की योजना


अपने एक आलेख में आपको बताया था कि न्यायपालिका ने दिल्ली की अधीनस्थ न्यायालय में भ्रष्टाचार को हटाने और बदलाव के मद्देनज़र बहुत से परिवर्तनों के साथ साथ सभी कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड की व्यवस्था का विचार रखा था । पहले इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रयोग के तौर पर लागू किया गया । आनन फ़ानन में न सिर्फ़ सभी कर्मचारियों की वर्दी का नाप लिया गया बल्कि उनकी नाम पट्टिका, आदि भी तैयार करा दी गई । आज सभी कर्मचारी वर्दी में दिखते हैं । इसे सख्ती से लागू करने के लिए ये आदेश भी जारी किया गया कि जो भी वर्दी पहन के नहीं आएगा उसकी उस दिन की तन्ख्वाह , उसके वेतन में से काट ली जाएगी । इसके बाद इस प्रयोग को दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों में भी लागू करने का निर्णय लिया गया ।

अधीनस्थ न्यायालय में जब इसकी शुरूआत हुई तो सामने शीतकालीन सत्र शुरू होने वाले थे । इसलिए सबसे पहले फ़ैसला ये लिया गया कि शीतकालीन वर्दी के रूप में पुरूष कर्मचारियों के कोट और पैंट का नाप ले लिया गया और चूंकि महिला कर्मियों को साडी /सूट के ऊपर ही उसे पहनना था लिहाज़ा उनके कोट का नाप लिया गया । ये टुकडों टुकडों में सभी अधीनस्थ अदालतों में हुआ । इसका परिणाम ये हुआ कि बहुत से कर्मचारियों की वर्दी तैयार हो कर आ गई तो बहुतों का नाप भी नहीं लिया जा सका । इसके बाद कुछ दिनों बाद ही ग्रीष्मकालीन वर्दी का नाप भी लिया गया । ये पुरूष और महिला कर्मियों दोनों का ही लिया गया । गफ़लत का आलम ये था कि सर्दियों की वर्दी का नाप पहले लिए जाने के बावजूद ग्रीष्म कालीन वर्दियां पहले तैयार होकर आ गईं ।

और यहीं से सारी गडबड शुरू हुई । उस वर्दी के मिलते ही कपडे की क्वालिटि और उसकी बेढंगी सिलाई का मामला इतना उछला कि वो अखबारों की सुर्खियां बन गयी । जब अधिकारियों को ये पता चला तो उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए आदेश जारी किया कि सप्ताह के अलग अलग दिन अदालत में ही दर्ज़ी बैठेंगे जो कर्मचारियों की वर्दी की नाप संबंधी कमियां दूर करेंगे । बहुत से कर्मचारियों ने वर्दी के कपडे से एलर्जी और त्वचा संबंधी शिकायत करते हुए उसे वापस ही कर दिया । उधर महिला कर्मियों की ग्रीष्म कालीन वर्दी का नाप लेकर जाने के बाद से उस दिशा में कभी कोई सुगबुगाहट भी सुनाई नहीं दी । ऐसा सुना गया कि पुरूष कर्मचारियों की वर्दी सिलने वाली कंपंनी के अनुभवों को देखते हुए उसने भागना ही मुनासिब समझा ।


इसके कुछ माह बाद अचानक ही आदेश आया कि जिन भी कर्मचारियों को वर्दी दी गई है , इस आदेश के तहत उनके लिए ये वर्दी पहनना अनिवार्य किया जाता है । इस आदेश का असर भी दिखा और अगले ही कुछ दिनों में अधिकांश पुरूष कर्मचारी वर्दी में दिखने लगे । मगर एक बार फ़िर इस कदम को बडा झटका लगा जब पता चला कि दिल्ली की राज्य सरकार ने न्यायालय के कर्मचारियों की वर्दी के लिए निर्धारित धुलाई एवं वर्दी रखरखाव भत्ता देने में असमर्थता जता दी है । इस निर्णय के बाद सभी अदालती कर्मचारियों ने अपनी अपनी वर्दी को तिलांजलि दे दी है । अभी तो इसे पूरी तरह अमल में लाना ही कठिन साबित हुआ , इसके परिणामों का आकलन तो दूर की बात थी । इस योजना ने न सिर्फ़ सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं बल्कि ये भी जता दिया है कि अदालती सुधारों के प्रति वो कितनी संवेदनशील है ।

रविवार, 2 मई 2010

साठ दिनों के अंदर मोटर दुर्घटना का मुआवजा दिलवाने की कवायद




राजधानी दिल्ली में मोटर वाहन दुर्घटनाओं की बढती संख्या और उसमें प्रभावित लोगों , चोटिल व्यक्तियों तथा मृतकों के आश्रितों को मुआवजा दिलाने के लिए दायर किए जाने वाले वादों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि , सरकार , प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका के लिए भी चिंता का सबब बन गए थे । इसी के मद्देनज़र एक अपील की सुनवाई करते हुए हाल में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस दिशा में एक एतिहासिक पहल करते हुए कई बडे निर्देश जारी किए और न सिर्फ़ निर्देश जारी किए बल्कि उनके त्वरित क्रियान्वयन के लिए निचली अदालतों , पुलिस विभाग , बीमा कंपंनियों को कई निर्देश दिए गए हैं ।

२ अप्रैल से शुरू की गई इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लेते हुए एक महीने के बाद इससे स्थिति में आए अंतर को बताने के लिए सभी को इसकी क्रियान्वयन रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने को कहा गया है ।इन निर्देशों के तहत ये निम्नलिखित आदेश जारी किए गए हैं

पुलिस विभाग के लिए :- दिल्ली पुलिस को ये आदेश दिया गया है कि दिल्ली में बढती वाहन दुर्घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए पीडित को तवरित न्याय दिलवाने के लिए विशेष व्यवस्था और प्रबंध किए जाएं । ज्वाईंट कमिशनर औफ़ पुलिस की अध्यक्षता में गठित एक विशेष कार्यदल इस दिशा में काम करेगा । इसके लिए सभी जिलों में विशेष एम ए सी टी ( मोटर ऐक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ) सैल को स्थापित करने का आदेश दिया गया है । इस सैल में विशेष तौर से प्रशिक्षण प्राप्त पुलिसकर्मी , २ अप्रैल के बाद से घटित किसी भी दुर्घटना में एक विशेष विस्तृत दुर्घटना रिपोर्ट दायर करेंगे । इससे पहले ये महज ए आई आर ( एक्सीडेंट इंफ़ोर्मेशन रिपोर्ट ) के रूप में अदालत में प्रस्तुत की जाती थी जिसमें प्राथमिक जानकारी भर होती थी । मगर अब ये डी ए आर ( डिलेट्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट ) के रूप में प्रस्तुत की जानी होगी । इस डी ए आर में , एक चैक लिस्ट के साथ जिसमें कुल अट्ठाईस कालम में , दुर्घटना की पूरी जानकारी , पीडित की , उसके परिवार की , पीडित की आय , उसका खर्च , दुर्घटना में शामिल वाहन के विषय में पूरी जानकारी , वाहन के चालक , उसके रजिस्टर्ड मालिक , बीमा कंपंनी आदि की पूरी जानकारी के साथ साथ ये भी कि बीमा कंपंनी पीडित व्यक्ति को कितने मुआवजे की पेशकश कर रही है । इतना ही नहीं माननीय उच्च न्यायालय ने जब देखा कि बहुत बडी संख्या में नकली लाईसेंस धारी और नाबालिग चालक ऐसी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार हैं ,उन्हें बख्शा न जाए और उनके खिलाफ़ आपराधिक मुकदमा दर्ज़ किया जाए

बीमा कंपंनियों के लिए :- माननीय उच्च न्यायालय ने पाया कि बीमा कंपंनियां , जो ऐसे दुर्घटना क्लेम वादों में बहुत ही निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं , मगर उनके उदासीन रहने के कारण ऐसा नहीं हो पाता है । इसलिए इन निर्देशों में बीमा कंपंनियों को भी सीधा सीधा कई निर्देश दिए गए । सभी बीमा कंपंनियों से कहा गया कि , वे सब एक एक नामित विशेष बीमा अधिकारी को प्रत्येक ट्रिब्यूनल में खास तौर पर सिर्फ़ इसलिए नियुक्त करें वे पीडित की उपस्थिति होते ही बीमे की रकम का भुगतान हेतु समझौते की प्रक्रिया के तहत उसे त्वरित न्याय दिलवानें में सहायता करें । इतना ही नहीं , उन्हें कहा गया है कि वे खुद ही सभी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए अपनी तरफ़ से एक निश्चित राशि का प्रस्ताव रखें , और कोशिश करें कि पीडित को उसी दिन मुआवजा मिल सके । सभी बीमा कंपंनियों के ये निर्देश दिए गए हैं कि वे सभी दुर्घटना दावों के लिए एक अलग से डाटा बेस तैयार करवाएं , ऐसे सभी वादों में जिनमें नकली लाईसेंस की बात सामने आती है उनमें अपनी पहल पर उन चालकों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ करवाएं ।जो मुकदमें अदालती कार्यवाही और फ़ैसले द्वा खत्म हो रहे हैं , उनमें उनके मुआवजे की राशि तीस दिन के अंदर अंदर अदालत में जमा करवा दी जाए ।

निचली अदालतों के लिए :- निचली अदालतों को ये निर्देश दिए गए हैं कि उक्त आदेशों का क्रियान्वयन पूरी गंभीरता से करवाएं । इस बात की तस्दीक के लिए उन्हें ये आदेश दिया गया है कि निश्चित समयावधि पर नियमित रूप से इन सभी मुकदमों की प्रगति रिपोर्ट वे उच्च न्यायालय को प्रेषित करें , जिनका आकलन और विश्लेषण करने के बाद आगे के निर्देश दिए जाएंगे । बसों द्वारा , खास कर ब्लू लाईन बसों द्वारा की जा रही दुर्घटनाओं की बहुत बडी संख्या को उच्च न्यायालय ने बहुत ही गंभीरता से लिया और आदेश पारित कर दिया कि ब्लू लाईन बसों द्वारा की गई किसी भी दुर्घटना वाले मामले में पुलिस बस को ज़ब्त कर ले और तब तक उन्हें न छोडे जब तक कि वे , यदि पीडित व्यक्ति मृत है तो एक लाख और यदि गंभीर रूप से घायल है तो पचास हज़ार रुपए की राशि निचली अदालत में जमा न करवा दे । ये राशि अविलंब और अंतरिम सहायता के रूप में पीडित को दी जानी चाहिए । उन सभी मामलों में , जिनमें कि दुर्घटना में लिप्त वाहन का बीमा नहीं है , उनके लिए आदेश जारी किया गया कि उन वाहनों तो तब तक न छोडा जाए जब तक कि वाहन मालिक बतौर मुआवजा सुरक्षा राशि ,एक निश्चित रकम अदालत में न जमा करवा दे ।


वे मुकदमें जिनमें बीमा कंपनी प्रतिवादी के रूप में नहीं है , उन्हें आवश्यक रूप से मध्यस्थता से सुलझाने का प्रयास किया जाए । इसके लिए मध्यस्थता केंद्रों के साथ साथ मोटर वाहन दुर्घटना स्थाई लोक अदालतों का गठन किया जाए ।
मोटर वाहन दुर्घटना वादों के निपटारे में तेज़ी लाने के उद्देश्य से किए गए इन नए बदलावों का एक सकारात्मक परिणाम दिखने भी लगा है । हालांकि अभी भी पुलिस और बीमा कंपंनियां न तो अपेक्षित श्रम ही कर रही हैं इस दिशा में , न ही इन मुकदमें के प्रति उतनी संवेदी दिख रही हैं जितनी कि अदालतें हैं , किंतु फ़िर भी इसके शुरूआती परिणाम निश्चित रूप से उत्साह वर्धन करने वाले हैं । उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे उपायों से बडे परिवर्तन लाए जा सकेंगे ।

बुधवार, 24 मार्च 2010

अदालती फ़ैसलों के निहितार्थ : लिव इन रिलेशनशिप , बलात्कार आदि के परिप्रेक्ष्य में



मैंने बहुत बार अनुभव किया है कि जब समाचार पत्रों में किसी अदालती फ़ैसले का समाचार छपता है तो आम जन में उसको लेकर बहुत तरह के विमर्श , तर्क वितर्क और बहस होती हैं जो कि स्वस्थ समाज के लिए अनिवार्य भी है और अपेक्षित भी । मगर इन सबके बीच एक बात जो बार बार कौंधती है वो ये कि अक्सर इन अदालती फ़ैसलों के जो निहातार्थ निकाले जाते हैं , जो कि जाहिर है समाचार के ऊपर ही आधारित होते हैं क्या सचमुच ही वो ऐसे होते हैं जैसे कि अदालत का मतंव्य होता है । शायद बहुत बार ऐसा नहीं होता है ।

                      कुछ अदालती फ़ैसलों को देखते हैं जो पिछले दिनों सुनाए गए । एक चौदह पंद्रह वर्ष की बालिका के विवाह को न्यायालय ने वैध ठहराया , अभी पिछले दिनों अदालत ने कहा कि बलात्कार के बहुत से मामलों में पीडिता को बलात्कारी से विवाह की इजाजत देनी चाहिए ,बलात्कार पीडिता का बयान ही मुकदमें को साबित करने के लिए पर्याप्त है , समलैंगिकता , लिव इन रिलेशनशिप आदि और भी आए अनेक फ़ैसलों के बाद आम लोगों ने उसका जो निष्कर्ष निकाल कर जिस  बहस की शुरूआत की वो बहुत ही अधूरा सा था । सबसे पहले तो तो दो बातें इस बारे में स्पष्ट करना जरूरी है । कोई भी अदालती फ़ैसला , विशेषकर माननीय उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले , जो सभी निचली अदालतों के नज़ीर के रूप में लिए जाते हैं , वे सभी फ़ैसले उस विशेष मुकदमें के लिए होते हैं और उन्हें नज़ीर के रूप में भी सिर्फ़ उन्हीं मुकदमों में लिया जा सकता है जिनमें घटनाक्रम बिल्कुल समान हो । हालांकि इसके बावजूद भी निचली अदालतें अपने सीमित कार्यक्षेत्र और अधिकारिता के कारण उन्हें तुरत फ़ुरत में अमल में  नहीं लाती हैं ।

उदाहरण के लिए जैसा कि एक मुकदमे के फ़ैसले में अदालत ने एक नाबालिग बालिका के विवाह को भी वैध ठहराया था । उस पर प्रतिक्रिया आई कि , इस तरह से तो समाज में गलत संदेश जाएगा । मगर दरअसल मामला ये था कि अदालत ने उस विशेष मुकदमें में माना था कि एक बालिका जिसका रहन सहन उच्च स्तर का है , जो आधुनिक सोच ख्याल वाले संस्कार के साथ पली बढी है , आधुनिक कौन्वेंट स्कूल में पढी है , शारीरिक मानसिक रूप से , ग्रामीण क्षेत्र की किसी भी हमउम्र बालिका से तुलना नहीं कर सकते । अब चलते हैं के अन्य फ़ैसले की ओर , बलात्कार पीडिता का विवाह बलात्कार के आरोपी के साथ कर देना चाहिए । यदि अपराध के दृष्टिकोण से देखें तो इसकी गुंजाईश रत्ती भर भी नहीं है । होना तो ये चाहिए कि बलात्कारियों को मौत और उससे भी कोई कठोर सजा दी जानी चाहिए ।

    अब हकीकत की बात करते हैं , अपने अदालती अनुभव के दौरान मैंने खुद पाया कि बलात्कार के  मुकदमें जो चल रहे थे उनमें से बहुत से मुकदमें वो थे जो कि पीडिता के पिता ने दर्ज़ कराए थे । लडका लडकी प्रेम में पडकर घर से निकल भागे , चुपके से विवाह कर लिया, बाद में पुलिस के पकडे जाने पर , माता पिता और घरवालों के दवाब पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज़ करवा दिया जाता है । मुकदमें के दौरान ही पीडिता फ़रियाद लगाती है कि उसके होने वाले या शायद हो चुके बच्चे का पिता उसका वही प्रेमी, अब कटघरे में खडा आरोपी , और उसका पति ही है ..तो क्या फ़ैसला किया जाए । यदि कानूनी भाषा में किया जाए तो सज़ा है सिर्फ़ और सज़ा । मगर यदि मानवीय पक्षों की ओर ध्यान दिया जाए तो फ़िर ऐसे ही फ़ैसले सामने आएंगे जैसे आए ।

  ठीक इसी तरह जब फ़ैसला आया कि बलात्कार पीडिता का बयान ही काफ़ी है अपराध को साबित करने के लिए तो सबने बहस में हिस्सा लेते हुए कहना शुरू कर दिया कि तो फ़िर अन्य सबूतों की जरूरत नहीं है शायद । जबकि ऐसा कतई नहीं है । दरअसल उस खास मुकदमें में पीडिता के पास सिवाय अपने बयान के और किसी भी साक्ष्य , किसी भी गवाह को पेश न कर सकने की स्थिति थी ऐसे में अदालत ने इस आधार पर कि भारतीय समाज में अपनी इज्जत मर्यादा मान सम्मान को दांव पर लगा कर कोई भी महिला सिर्फ़ इसलिए किसी पर भी बलात्कार जैसे संगीन अपराध का आरोप नहीं लगा सकती कि उसका कोई इतर उद्देश्य है । और इसी आधार पर वो फ़ैसला दिया गया था ।

अब इस हालिया फ़ैसले को लेते हैं । अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारतीय कानून के अनुसार भी यदि दो वयस्क पुरुष महिला अपनी सहमति से बिना विवाह किए भी एक साथ एक छत के नीचे रहते हैं तो वो किसी भी लिहाज़ से गैरकानूनी नहीं होगा । अब इसका तात्पर्य ये निकाला जा रहा है कि फ़िर तो समाज में गलत संदेश जाएगा । नहीं कदापि नहीं अदालत ने कहीं भी ये नहीं कहा है भारतीय समाज में जो वैवाहिक संस्था अभी स्थापित है उसको खत्म कर दिया जाए , या कि उससे ये बेहतर है , और ये भी नहीं कि कल को यदि उनमें से कोई भी इस लिव इन रिलेशनशिप के कारण किसी विवाद में अदालत का सहारा लेता है तो वो सिर्फ़ इसलिए ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि अदालत ने इसे वैधानिक माना हुआ है । अब ये तो खुद समाज को तय करना है कि भविष्य में लिव इन रिलेशनशिप ..वाली परंपरा हावी होने जा रही है कि समाज युगों से स्थापित अपनी उन्हीं परंपराओं को मानता रहेगा । सीधी सी बात है कि जिसका पलडा भारी होगा ...वही संचालक परंपरा संस्कृति बनेगी ।

    जब कोई फ़ैसला समाचार पत्र में , या कि समाचार चैनलों में दिखाया या पढाया जाता है वो तो एक खबर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो कि उनकी मजबूरी है । और यही सबसे बडा कारण बन जाता है आम लोगों द्वारा किसी अदालती फ़ैसले में छिपे न्यायिक निहितार्थ को एक आम आदमी द्वारा समझने में। इसके फ़लस्वरूप जो बहस शुरू होती है वो फ़िर ऐसी ही बनती है जैसी दिख रही है आजकल । समाचार माध्यमों को अदालती कार्यवाहियों, मुकदमों के दौरान कहे गए कथनों , और विशेषकर अदालती फ़ैसलों को आम जनता के सामने रखने में विशेष संवेदनशीलता और जागरूकता दिखाई जानी अपेक्षित है ।

रविवार, 21 मार्च 2010

खाली कुर्सियां फ़ैसले नहीं किया करतीं .....


पिछली पोस्ट में बताया ही था कि कैसे और क्यों एक आम भारतीय को न्याय पाने के लिए सिर्फ़ 320 साल ही प्रतीक्षा करनी है । आज इन आंकडों पर नज़र डालिए , ये आंकडे फ़िर साबित कर रहे हैं कि हमारी सरकार न्याय व्यवस्था को चुस्त दुरूस्त करने के लिए सचमुच ही कितनी गंभीर है ।उससे पहले ये बताता चलूं कि सभी इस बात को लगभग मान चुके हैं कि न्याय में विलंब का सबसे बडा कारण है देश में अदालतों की कमी और रिक्त पडे पदों पर न्यायाधीशों की नियुक्ति न होना ।

राजधानी दिल्ली से शुरू करें तो यहां पर सिविल जजों के 125 पद तथा जिला जजों के 21 पद खाली हैं । बिहार में ये तो मात्र 289 पद ही खाली पडे हुए हैं ,पंजाब की निचली अदालतों में 206 पद , हरियाणा की अदालतों में भी 206 पद , छत्तीसगढ की निचली अदालतों में 170 पद, राजस्तान में 172, मध्यप्रदेश में 108, जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र 256 . पद ही खाली पडे हैं । बस बाकी पूरे बचे भारत के अन्य राज्यों का अंदाज़ा आप खुद ही लगा सकते हैं । रुकिए जरा ..चलते चलते जरा एक और तथ्य तथा आंकडे पर नज़र डालते जाईये . । अभी हाल ही में एक सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने कहा कि " किसी भी अदालत या न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए हर छोटे बडे फ़ैसले के खिलाफ़ अगर इसी तरह यहां पर विशेष अनुमति याचिका स्वीकार की जाती रही तो एक दिन इनके बोझ से ढह कर खुद सर्वोच्च न्यायालय ही ढह जाएगी । "

आंकडों के अनुसार पिछले वर्ष ही सर्वोच्च न्यायालय में कुल 70,000 विशेष अनुमति याचिकाएं दाखिल की गईं । जबकि अमेरिका की सर्वोच्च न्यायालय एक साल में सिर्फ़ 100 से 120 मुकदमों और कनाडा की अदालत तो सिर्फ़ 60 मुकदमों की सुनवाई करती है ।



तो देश की आम जनता को अब ये खुल कर पता होना चाहिए कि यदि वो अदालत पहुंच कर फ़टाफ़ट किसी न्याय की उम्मीद कर रहे हैं तो कतई ये उम्मीद न पालें क्योंकि खाली कुर्सियां फ़ैसले नहीं किया करतीं ।


नोट :- सभी आंकडे आज दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण में छपी खबर से साभार लिए गए हैं ॥


शनिवार, 13 मार्च 2010

सिर्फ़ 320 साल तक प्रतीक्षा करें ..न्याय सबको मिलेगा



अरे भाई ये मैं नहीं कह रहा हूं , ये तो कुछ दिनों पहले "न्यायपालिका में ई गवर्नेंस " के विषय पर एक व्याख्यान देते हुए ये बात आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री वी वी राव ने कहा कि देश की अदालतों में अभी लंबित कुल सवा तीन करोड मुकदमों को यदि आज से निपटाना शुरू किया जाए तो वर्तमान में न्याय प्रक्रिया की , न्यायाधीशों की उपलब्धता की और ऐसी ही सभी आधारों पर उन्हें निपटाने में कम से कम तीस सौ बीस साल लगेंगे जी हां बस इतना सा ही समय लगेगा तो तब तक धैर्य रखना चाहिए ।

     दरअसल इसके लिए  किसी एक व्यवस्था या नीति को सीधे सीधे जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता है । मोटे मोटे आंकडों के अनुसार आज देश के प्रत्येक न्यायाधीश पर लगभग ढाई हज़ार मामलों का बोझ है । भारत में अभी लंबित पडे मुकदमों के लिए , अभी 18 हज़ार पदों की व्यवस्था है मगर उनमें से भी चार हज़ार पद तो अभी भी रिक्त पडे हुए हैं ।खुद उच्चतम न्यायालय ने एक बार माना था कि भारत में कुल 10 लाख की आबादी पर कम से कम 50 न्यायाधीशों की आवश्यकता है जबकि अभी वो संख्या सिर्फ़ 10 न्यायाधीश की है । ऐसी स्थितियों में ये अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है सरकार और प्रशासन सच में आम लोगों को त्वरित और सुलभ न्याय दिलवाने के लिए कितनी गंभीर और संवेदनशील हैं ? हालांकि इस दिशा में अब थोडी बहुत शुरूआत तो हो चुकी है कई राज्यों में प्रति वर्ष नियुक्तियां भी की जा रही हैं , मगर जिस अनुपात में मुकदमे बढ रहे हैं उस अनुपात में ये प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है ।

   आज जरूरत इस बात की है कि आम आदमी को सुलभ , सस्ता और त्वरित न्याय के लिए एक साथ बहुत से क्षेत्रों पर काम किया जाए । सबसे पहली कोशिश तो ये होनी चाहिए कि जल्द से जल्द न सिर्फ़ सभी खाली पदों को भरा जाए बल्कि , अधिक से अधिक अदालतों का गठन किया जाए । अदालत पहुंचने से पहले , छोटे विवाद, घरेलू विवाद, वैवाहिक मामले, आदि गैर आपराधिक मामलों को मध्यस्थता बीचबचाव की प्राचीन व्यवस्था से निपटाने के प्रयासों में बढावा दिया जाना चाहिए । प्ली बारगेनिंग, लोक अदालतों आदि जैसी व्यवस्थाएं जिन्हें पश्चिमी देशों में सफ़लतापूर्वक प्रयोग में लाया गया है उन्हें भी भारतीय न्याय व्यवस्था में अपनाने पर बल दिया जाए । इसके अलावा अधिवक्ताओं में भी व्यावसायिक प्रतिबद्धता, अदालती कर्मचारियों में फ़ैले भ्रष्टाचार पर अंकुश , अदालत के कार्य दिवसों में वृद्धि आदि पर भी ध्यान देना आवश्यक है ॥ किंतु फ़िलहाल तो स्थिति बहुत ही शोचनीय और चिंताजनक है ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं पारिवारिक अदालतें


हाल ही में दिल्ली की कुछ अधीनस्थ न्यायालयों में पारिवारिक अदालतों की स्थापना की गई है जो अपने तरह की इस तरह की पहली अदालतें हैं । हालांकि राजधानी की प्रत्येक जिला अदालतों में पहले से ही गुजारा भत्ता, तलाक और गार्जियनशिप अदालतों का गठन किया जा चुका है जो सफ़लतापूर्वक अपना काम कर भी रही हैं । किंतु इन नई तरह की अदालतों का गठन मध्यस्थता के आधार पर और तोडो नहीं जोडो की नीति का पालन करने के लिए किया गया है ।

ज्ञात हो महानगरीय जीवन में पारिवारिक रिश्तों में आ रही खटास और शादी जैसी संस्थाओं के लगातार टूटते जाने का दर किस कदर बढ रहा है इस बात का अंदाज़ा सिर्फ़ इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में पारिवारिक मुकदमों से निपटने वाली सिर्फ़ एक अदालत में ही प्रति माह सौ से अधिक तलाक के मुकदमे निपटाए जा रहे हैं । ये आंकडा ही साबित कर रहा है कि शहरी जीवन में परिवार , विवाह जैसी संस्थाओं पर से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है जिसके बहुत से वाजिब और गैर वाजिब कारण हैं ।

पिछले कुछ वर्षों में अदालतों में बढते दबाव को कम करने के लिए , वर्षों से चली आ रही और हमारी ग्राम्य न्याय व्यवस्था की एक प्रमुख प्रणाली मध्यस्थता को भी अपनाने की शुरूआत की गई । सभी जिला अदालतों एवं उच्च न्यायालयों में पहले अस्थाई और फ़िर स्थाई मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना की गई । यहां उन मुकदमों को भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई जिनमें समझौते की गुंजाईश थी । इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि दोनों पक्षों को अदालती माहौल से अलग वातावरण लगे इसके विशेष प्रशिक्षण प्राप्त न्यायिक अधिकारियों , अधिवक्ताओं , कानूनविदों की इन मध्यस्थता केंद्रों में नियुक्ति की गई । इसका परिणाम अपेक्षा से कहीं बेहतर निकला । विशेषकर पारिवारिक वादों में तो इसकी सफ़लता देखने लायक थी ।

इन्हीं सफ़लताओं को देखते हुए दिल्ली में नई पारिवारिक अदालतों की स्थापना की गई है । इन अदालतों में विशेष रूप से बैठने के लिए आरामदायक कक्षों के अलावा , मनोरंजन के लिए टीवी कंप्यूटर युक्त एक मनोरंजन कक्ष , मनोचिकित्सकों की टीम से लैस एक काऊंसिलिग कक्ष तथा और भी कई सुविधाओं से इन्हें सज्जित किया गया है । इन पारिवारिक अदालतों में . जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि ,पारिवारिक मुकदमें, तलाक अर्जियां, गुजारे भत्ते के लिए डाले गए दावे , बच्चों की अधिकारिता (गार्जियनशिप ) के मुकदमे आदि को निपटाया जाएगा । ये पारिवारिक अदालतें इस लिए भी शुरू की गई हैं ताकि उन मामलों को विशेषज्ञों की देखरेख और सलाह से निपटाया जाए जिन्हें अदालती कार्यवाहियों में नहीं निपटाया जा पाता है या फ़िर कि सालों साल लग जाते हैं , कोशिश ये की जानी है कि परिवार टूटने की जगह दोबारा एक हो जाएं । निसंदेह ये अदालतें आने वाल समय में क्रांतिकारी साबित होंगी ॥

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

न्यायिक क्षेत्र में आई टी का उपयोग


कल परसों ही हमारे कोर्ट को पहले कोर्ट ( जिला न्यायालयों में ) शुरू करने की उपलब्धि हासिल हुई इससेपहले ऐसी ही उपलब्धि दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी अर्जित की थी पिछले एक दशक में जिस तरह से सूचनाविज्ञान का उपयोग न्यायिक क्षेत्र में बढा है वो अपने आप में एक बहुत बडी बात है अदालतों में पूर्णत: कंप्यूटरीकरण की प्रक्रिया, सभी अदालती कार्यवाहियों को प्रतिदिन इंटरनेट पर उपलब्ध कराना , इतना ही नहीं सभी अदालती आदेशों और फ़ैसलों को नियमित रूप से , बल्कि अब तो पिछले पचास वर्षों में हुए सभी फ़ैसलों कोभी उपलब्ध करने जैसे सभी काम बखूबी हो चुके हैं इनके अलावा वीडियो कांन्फ़्रेंसिग से मुकदमों की सुनवाई , और अब ये कोर्ट कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि आधुनिक युग में उपलब्ध सभी सूचना तंत्रों काउपयोग और सहायता न्यायिक स्तंभ को लैस करने के लिए किया जा रहा है
अपने कार्यकाल में मैंने ये बदलाव होते हुए देखे हैं और सच कहूं तो बखूबी इसका फ़र्क भी महसूस किया है , मगरजब पाले के दूसरी तरफ़ जाके एक आम आदमी की तरह देखता हूं तो सोचता हूं ,ये विश्लेषण करता हूं कि क्यावाकई सूचना तकनीक ने आम आदमी को उसके न्याय पाने में थोडी बहुत सहायती की है मुझे लगता है कि कुछया बहुत सीमित फ़ायदा वो भी अप्रत्यक्ष रूप से हो पाया है अन्यथा ...इन तकनीकों का मुकदमों के तीव्रनिष्पादन से कोई प्रत्यक्ष संबंध मुझे तो नहीं दिखा

जब मैंने अपनी नौकरी शुरू की थी तो अदालतों में सारा कामकाज टाईपराईटर द्वारा ही किया जाता था , औरजाहिर सी बात है कि कंप्यूटर के मुकाबले उसकी क्षमता और परिणाम बहुत ही कम था मगर कंप्यूटर आने से बेशक अदालती कर्मचारियों मतलब , रिकार्ड रखने वाले कर्मचारियों तथा अदालती कार्यवाहियों को दर्ज़ करने वालेआशुलिपिकों की रफ़्तार और गुणवत्ता में बहुत ही क्रांतिकारी परिवर्तन आया मगर एक आम आदमी जो न्यायकी तलाश में सालों साल अदालत के चक्कर काटता है उसे इन परिवर्तनों का कितना फ़ायदा पहुंचा ...इसमें खुदमुझे ही संदेह होता है हां उच्च एवम उच्चतम न्यायालयों के आदेशों की उपलब्धता ने न्यायाधीशों को मुकदमों केनिष्पादन और सामयिक न्याय करने में जरूर ही सहायता पहुंचाई होगी हालांकि अभी तो ये न्यायिक क्षेत्र कोतकनीक सबल करने की प्रक्रिया चल रही है इसलिए अभी ही इसकी सफ़लता विफ़लता का आकलन करना शायदथोडी जल्दबाजी होगी और इसे अभी समय देने की जरूरत है , लेकिन इसके बावजूद मुझे लगता है कि इन उपायोंऔर प्रयासों से बेहतर है कि नई अदालतों के गठन पर ....और उनकी बहुतायत पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाए तोज्यादा सार्थक परिणाम आएंगे इसके अलावा ...प्ली बारगेनिंग , मध्यस्थता केंद्रों , लोक अदालतों , और कानूनी जागरूकता शिविरों जैसे प्रयासों को भी बढावा दिया जाए तो बेहतर होगा

अगली कडियों में देखेंगे कि ...कुछ तकनीक जो जाने किन कारणों से विफ़ल हो रही हैं और कुछ तकनीक जिनकाउपयोग क्रांति ला सकता है
...

शनिवार, 9 जनवरी 2010

जीरो पेन्डेन्सी योजना से कम होगा अदालतों पर बोझ



देश की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या कम करने के इरादे से समूची न्याय व्यवस्था को एक नया कलेवर देने की तैयारियां शुरू हो गई हैं । ताजी जानकारी के अनुसार न्याय व्यवस्था को सुदृढ बनाने के प्रयासों के तहत एक महात्वाकांक्षी योजना जिसे ज़ीरो पेन्डेन्सी योजना कहा जा रहा है पर विचार किया जा रहा है । इस योजना के तहत सेवानिवृत न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को अस्थाई न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने के साथ ही लंबित मुकदमों क राष्ट्रीय ग्रिड बनाने का काम किया जा रहा है ॥ इसके लिए देश के सभी उच्च न्यायालयों से लंबित मुकदमों का पूरा विवरण इस ग्रिड को उपलब्ध कराने को कहा गया है ॥

गौरतलब है कि अदालतों मे सरकारी मुकदमों की अत्यधिक संख्या होने के संदर्भ में इस प्रस्ताव में कहा गय है कि केन्द्र सरकार इस साल के अंत तक अपनी राष्ट्रीय मुकदमा नीति तैयार करेगी । राज्य सरकारें भी ऐसी ही नीति अपनाएं तो परिणाम सकारात्मक निकलेंगे इसकी उम्मीद की जा रही है । प्रस्तावित योजना के तहत न्यायपालिका में रिक्त स्थानों पर नियुक्ति के लिए पहले से ही योग्य व्यक्तियों का चयन सुनिश्चित करने के इरादे से जजों की संख्या में काल्पनिक स्तर पर पच्चीस फ़ीसदी वृद्धि के प्रधान न्यायाधीश के सुझाव को ध्यान में रखने की बात कही गई है । अधीनस्थ न्यायालयों के लिए एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन पर विचार की सिफ़ारिश की गई है ॥ सेवानिवृत जजों के बारे में जानकारी एकत्र करके न्यायिक अधिकारियों का एक राष्ट्रीय पूल बनाने की सिफ़ारिश भी की गई है तकि विभिन्न उच्च न्यायालय मे न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति के लिए इसमें से चयन किया ज सके । तीन साल से कम की सजा से जुडे अपराधों के सभी लंबित मामलों के निपटारे का दायित्व विशेष जजों को देने की सिफ़ारिश की गई है ॥

इन योजनाओं पर काम शुरू हो चुका है , इनका कैसा परिणाम निकलेगा ये तो भविष्य की बात है मगर इन प्रयासों को देख कर ये उम्मीद तो की ही जा सकती है कि आने वाले समय में यदि न्यायिक व्यवस्था पर बोझ न भी कम हो पाए तो , इसे कम किया जाना है ये बात तो इनके जेहन में जरूर ही रहेगी ॥

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