मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

नहीं कम होगी मुकदमों के निस्तारण की रफ़्तार




देश के अन्य सरकारी संस्थानों की तरह ही देश की सारी विधिक संस्थाएं ,अदालत , अधिकरण आदि भी इस वक्त थम सी गई हैं।  हालाँकि सभी अदालतों में अत्यंत जरूरी मामलों की सुनवाई के लिए बहुत से वैकल्पिक उपाय किये गए और वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये उनमें सुनवाई करके आदेश जारी भी किये जा रहे हैं।  ऐसे ही बहुत सारे आदेश कोरोना टेस्ट किट और उनके मूल्य के निर्धारण आदि मामलों में दिए भी गए हैं।  

किन्तु आम जन और विशेषकर अदालतों में अपने लंबित मुकदमों मामलों के सभी पक्षकार इस बात से जरूर चिंतित और जिज्ञासु होंगे कि ऐसे में जब पूरे लगभग दो माह का समय ऐसा निकल गया है जब उनके मामलों की सुनवाई नहीं हुई तो इससे उनके मामलों पर क्या और कितना असर पडेगा।  

पहले बात करते हैं उन मामलों की जो अदालतों में लंबित थे और जिन पर सुनवाई जारी थी तो सभी अदालतों ने तदर्थ और अंतरिम व्यवस्था देते हुए सभी लंबित मामलों को एक चरणबद्ध  व नियोजित तरीके से इस प्रकार स्थगन दिया है कि सभी मुकदमों को सिर्फ और सिर्फ एक तारीख के लिए टाला गया है ठीक उस स्थिति जैसे जब अदालत के पीठासीन अधिकारी अवकाश पर होते हैं या फिर अदालतों में मुक़दमे का स्थानांतरण होने में जो समय लगता है।  

अदालत के खुलते ही पहले से लंबित मुकदमों के साथ साथ इन सभी स्थगित मुकदमों की सुनवाई भी तीव्र गति से की जाएगी।  अभी से ही न्याय प्रशासन ने न सिर्फ वर्ष 2020 के लिए निर्धारित ग्रीष्म व शीत ऋतु के अवकाशों को रद्द करने का इशारा दे दिया है बल्कि सांध्य कालीन अदालत लोक अदालत और विशेष अदालतों की विशेष व्यवस्था से जल्दी से जल्दी सबकुछ पटरी पर लाने की तैयारी कर ली है।  

इन सबके अतिरिक्त विशेष महत्व के बहुत जरूरी मुकदमों और मामलों को सम्बंधित पक्षकारों द्वारा दिए गए प्रार्थनापत्र के आधार पर सुनवाई में प्राथमिकता देने की भी व्यवस्था रहेगी ही।  

ध्यान रहे कि देशबन्दी से रोजाना घटित हो रहे लाखों अपराध अपने आप ही रुक से गए हैं , या कहें कि अपराधियों को अपराध कारित करने का अवसर ही नहीं मिल पा रहा रहे और ये इस लिहाज़ से भी ठीक है कि जो पुलिस अभी कोरोना काल में देशबन्दी को सफल बनाने में अपना जी जान समर्पित किये हुए है उसे कम से कम इस मोर्चे पर अपना ध्यान देने की जरूरत नहीं पड़ रही है।  हालांकि छिटपुट घटनाओं के कारण पुलिस को अपराधों की तरफ से पूरी तरह मुक्ति तो नहीं ही मिली है।  

जैसी  कि समाचार मिल रहे हैं इस समय में घरेलु हिंसा के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है जो कि इसलिए भी स्वाभाविक सी लगती है कि शराब ,सिगरेट ,गुटखे आदि के व्यसन से बुरी तरह लिप्त समाज इस समय आने वाले भविष्य में अपने रोजगार व्यापार के प्रति नकारात्कमक अंदेशे के कारण अधिक हताश व क्रोधित भी होगा।  लेकिन ये मामले किसी भी तरह से अदालत के मुकदमे निस्तारण की रफ़्तार को धीमा नहीं करेंगे।  

जहां तक मेरा आकलन है देशबन्दी खुलने के एक माह के भीतर ही देश की सभी अदालतें अपनी पुरानी व्यवस्था और पुराने रफ़्तार में ही आ जाएंगी।  अभी तो यही आशा की जा सकती है।  

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

न्यायपालिका पर उठते सवाल


पिछले कुछ समय से न्यायपालिका से जिस तरह की खबरें निकल कर सामने आ रही हैं वो कम से कम ये तो निश्चित रूप से ईशारा कर रही हैं कि , न्यायपालिका की प्रतिबद्धता और जनता के बीच बना हुआ उनके प्रति विश्वास अब पहले जैसा नहीं रह पायेगा | रहे भी कैसे एक के बाद एक नई नई घटनाएं ,आरोप ,व जैसी जानकारियां निकल कर आम लोगों के बीच पहुँच रही हैं वो न तो न्यायपालिका के लिए स्वस्थ परम्परा साबित होगी न ही देश की व्यवस्था के लिए |

पिछले वर्ष न्यायिक इतिहास में पहली बार देश की सबसे बड़ी अदालत के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों (जिनमे से एक आज प्रधान न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं )ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर मनमाने ढंग से काम करने और यहां तक कि महत्वपूर्ण मुकदमों को वरिष्ठ न्यायाधीशों को न सौंप कर कनिष्ठ न्यायाधीश को आवंटित किये जाने और ऐसी ही बहुत सारी असहमतियों को लेकर सभी न्यायमूर्तियों ने प्रेस कांफ्रेस की | यह अपनी तरह का पहला मामला था जब शीर्ष न्यायपालिका अपने अंदरूनी प्रशासनिक कलह को इस तरह से सार्वजनिक रूप से सबके सामने ले आई थी | हालांकि इससे पहले भी समय समय पर शीर्ष न्यायालय के कुछ वरिष्ठ न्यायाधीश बहुत से अलग मामलों पर असहमति जता चुके हैं | 


अभी कुछ दिनों पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति पर अपनी ही एक कर्मचारी के शोषण का मामला (जिस तरह से आनन फानन में बिना किसी ठोस न्यायिक प्रक्रिया के इस मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया वो भी खुद न्यायपालिका द्वारा ही वो न्यायपलिका के ऊपर सवाल उठाने के लिए काफी है ) ठंढा भी नहीं हुआ था कि अब फिर हाल ही में पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश कुमार ने न्याय प्रशासन और उच्च न्यायपालिका में चल रही विसंगतियों की ओर खुले आम आरोप लगाए  हैं | 

जैसा कि पहले भी होता रहा है न्यायपालिका खुद अपनी साख स्वतंत्रता पर इसे किसी तरह का आघात मानते हुए तुरंत प्रभाव से पहले मामला उठाने वाले विद्वान न्यायाधीशों को ही किनारे लगा देती रही है (जस्टिस कर्णन व इस तरह के और भी बहुत सारे मामले देखे जा सकते हैं ) , तो इस मामले में भी सबसे पहला जो काम किया गया वो ये कि न्यायाधीश महोदय के काम काज का अधिकार ही उनसे वापस ले लिया गया | 

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि , ऐसे तमाम मामलों में प्रश्न उठाने वाले या आरोप लगाने वाले न्यायाधीशों पर तो कार्यवाही हो जाती है मगर इन आरोपों पर , इन विसंगतियों पर कभी भी न्यायपालिका खुद कोई ज़हमत उठाने की कोशिश नहीं करती | आज आम जनमानस में न्यायपालिका को लेकर जिस तरह का अविश्वास पैदा हुआ और बढ़ रहा है उसके लिए बहुत हद तक खुद न्यायपालिका जिम्मेदार  है | 








आखिर वो कौन से कारण हैं कि आज़ादी के बाद से अब तक लगातार मुकदमों में भी इज़ाफ़ा हो रहा है और उसी अनुपात में अपराधों में भी ??

इन मुकदमों को समाप्त किए  जाने व भविष्य में इनकी संख्या को नियंत्रित किए जाने को लेकर न्याय प्रशासन ने अब तक क्या और कितना ठोस काम किया है ये खुद न्यायपालिका को बताना चाहिए

देश में खुद को ईमानदारी ,कर्तव्यपरायणता , प्रतिबद्धता का पर्याय कहने बताने वाली न्यायपालिका देश में एक भी ऐसी अदालत नहीं बना पाई जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो

न्यायपालिका में भी भाई -भतीजावाद ,भ्रष्टाचार , लालच ,कदाचार देश की किसी भी संस्था से रत्ती भर भी कम नहीं है और ये दिनों दिन बढ़ रहा है

अदालतें अब किसी तरह फैसला तो सूना रही हैं मगर न्याय करने व न्याय होने से वे कोसों दूर होती जा रही हैं

ऐसे बहुत सारे सवाल और मसले हैं जो सालों से न्यायपालिका के सामने उत्तर की बाट जोह रहे हैं

शनिवार, 31 अगस्त 2019

अब घर बैठे प्राप्त करें अपने मुकदमे की जानकारी




अगर आपका कोई भी मुकदमा/वाद अदालत में लंबित है तो आप अब उसकी जानकारी घर बैठे ही अपने कंप्यूटर या मोबाईल से प्राप्त कर सकते हैं | तकनीक के साथ हाथ मिलाते हुए न्यायालय प्रशासन ने इसके लिए बहुत सारे उपाय किए हैं | बहुत सारे नए एप्स व मोबाईल सेवा का उपयोग करके न सिर्फ मुक़दमे बल्कि अदालतों की ,न्ययाधीशों की ,वाद सूची ,फैसले आदेश आदि की पूरी जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं | संक्षेप में इस चित्र के माध्यम से बताया गया है | विस्तार से जानने व पढ़ने के लिए जुड़े रहें और किसी भी शंका सलाह सुझाव के लिए प्रश्न करते रहें 


रविवार, 6 जनवरी 2019

आखिर क्यूँ कम नहीं हो रहे लंबित साढ़े तीन करोड़ मुक़दमे -



आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि जब भी न्यायिक जगत के किसी कार्यक्रम में माननीय न्यायमूर्तियों को अपना संबोधन रखने का अवसर दिया जाता है , फिर चाहे वो अवसर कोई भी क्यूँ न हो वे एक बात का उल्लेख परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जरूर कर जाते हैं और वो होता है कि , न्यायपालिका में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मुकदमे ऐसे हैं जो निस्तारण की बाट जोह रहे हैं | और सबसे हैरानी और हास्यास्पद बात भी ये है कि ऐसा कम से कम पिछले एक दशक से अधिक से कहा जा रहा है | और ये भी कि , लगातार कहा जा रहा है |

ये स्थिति तब है जब देश भर में लगने वाली और  अब तो नियमित रूप से प्रतिमाह आयोजित की जाने वाली लोक अदालतों में हज़ारों और यहाँ तक कि लाखों मुकदमों के निस्तारण , मध्यस्थता केन्द्रों के माध्यम से भी हज़ारों मुकदमों के सुलह समाप्ति के आंकड़े भी लगभग साथ साथ ही आते रहे हैं तो फिर आखिर ये समस्या ज्यों की त्यों क्यों और कैसे बनी हुई है ?????

पिछले दो दशकों से अधिक से राजधानी की जिला अदालत में कार्य करते हुए , एक विधिक शिक्षार्थी के नाते और लगातार इस विषय पर सब कुछ पढ़ते देखते हुए जब मैंने इस विषय पर नज़र बनाई तो जो कुछ कारण स्पष्टतया मेरे सामने थे उन्हें सीधे सीधे ऐसे देखा जा सकता है

सबसे पहला और सबसे प्रमुख कारण : मुकदमों की आवक मुकदमों के निस्तारण से कई कई गुणा अधिक होना |

और इस बात को इस तरह से सरलता से समझा जा सकता है कि ये ठीक उस तरह से है जैसे जब तक एक थाली भोजन ख़त्म करने की कवायद होती है उतनी देर में वैसी दस बीस पचास थालियाँ अपने ख़त्म होने के लिए कतारबद्ध हो चुकी होती हैं | या फिर ये कहें जब तक एक बेरोजगार के लिए नौकरी की तलाश की जाती है उतने समय में पचास सौ बेरोजागार पंक्तिबद्ध हो चुके होते हैं |
हालाँकि इसके भी कई कारण हैं , और सबसे बड़ी हैरानी की बात ये है कि मुकदमों की आवक को कम कैसे किया जा सकता है ये विषय लंबित मुकदमों के निस्तारण हेतु किये जा रहे उपायों की फेहरिश्त में कहीं है ही नहीं |

अगले बहुत सारे कारणों में
प्रतिवर्ष बन और लागू किये जा रहे नए नए क़ानून
समाचार और सोशल मीडिया के माध्यम से अब इन कानूनों की जानकारी अवाम को होना
अदालत पहुँचने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की संस्कृति का पनपना
अधिवक्ताओं की बढ़ती   संख्या
नशे ,बेरोजगारी आदि के कारण बढ़ते अपराध
बदलती हुआ सामाजिक परिवेश व टूटते सामाजिक बंधन
न्यायालयों , न्यायाधीशों की कम संख्या
बहुस्तरीय न्याय प्रणाली के कारण होने वाला दीर्घकालीन विलम्ब
वाद विवाद से इतर दिशा निर्देश और मार्गदर्शन पाने के लिए दायर किये जा रहे मुक़दमे
इनके अलावा और भी बहुत से ऐसे कारण हैं जिन पर बारीकी से सोचा और कार्य किया जाना बहुत जरूरी है ......अगली पोस्टों में इन पर विस्तार से चर्चा करेंगे 

रविवार, 13 अगस्त 2017

ट्रैफिक चालान को हलके में लेना पड सकता है भारी


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मित्र राजेश सरोहा की एक रिपोर्ट नवभारत टाईम्स दिल्ल्ली 


हाल ही  में खबरनवीस मित्र राजेश सरोहा ने नवभारत टाईम्स दिल्ली संस्करण में ये खबर प्रमुखता से प्रकाशित की | आंकड़े बता रहे हैं कि ट्रैफिक , लगातार होती सड़क दुर्घटनाओं और इनमें हो रहे इजाफे के बावजूद लोग बाग़ न तो ट्रैफिक नियमों को ही गंभीरता से ले रहे हैं और न ही इनके दुष्परिणामों से खुद को बचा रहे हैं या बचाने को लेकर गंभीर हैं | सरकार ,पुलिस प्रशासन व अदालत तक इन ट्रैफिक नियमों की अवहेलना और उल्लंघन की बढ़ती प्रवृत्ति से परेशान होने के बावजूद कुछ भी कारगर नहीं कर सकने को लेकर विवश सी जान पड रही हैं |

 इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है ये प्रकाशित खबर जो ये बता और दर्शा रही है कि नियमों का उल्लंघन जहां आम जन ने अपनी आदत बना ली है वहीं दण्डित और नियमित करने वाली संस्थाओं ने सिर्फ जुर्माने से भारी भरकम राशि जमा करना अपनी इतिश्री | 



लेकिन बात अब उतनी भी आसान नहीं रही है और आम लोगों की आदत को सुधारने और कम से कम इन चालानों को बहुत हलके में लेने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए अब अदालतों ने नई प्रणालियों और नए दंड पर काम करना शुरू कर दिया है |


अमूमन तौर पर ट्रैफिक चालानों को निष्पादित या आम तौर पर जिसे भुगतना कहते हैं , करने का एक तरीका यह है कि चालान पर्ची पर दिए गए नियत समय तारीख व अदालत के समक्ष , सभी कागजातों के साथ उपस्थित होकर , अदालत द्वारा सुनाये गए जुर्माने की रकम को भर कर दोषमुक्त हुआ जाता है | यदि किसी को लगता है कि उसका चालान गलत या गलती से काटा गया है तो उसे ये अदालत में साबित करना होता है , अपने पक्ष को रखने के लिए अपने द्वारा प्रस्तुत सबूतों गवाहों को अदालत के सामने पेश करके , पूरी वाद वाली कारवाई अपनाई जाती है | 

अब बदलाव के बाद , सबसे पहली बात , वाहन चालाक चालान कटते ही आया आरोपी की श्रेणी में और वाहन मालिक सह आरोपी | यानि सरकार  द्वारा निर्धारित  कानूनों  को  तोड़ने के दोषी पाया  जाने वाला व्यक्ति | 

अगली बात यदि ट्रैफिक नियमों में से किसी की अवहेलना की गयी है या उसे तोड़ा गया है , जैसे रेड लाईट जम्पिंग , नशे की हालत में ड्राईविंग , एम्बुलेंस को रास्ता न देना तो इन अपराधों के लिए तो आपको आरोपी बनाया ही जाएगा साथ ही साथ , गाडी से सम्बंधित सभी कागज़ात वो भी बिलकुल दुरुस्त न होने की स्थति में मौके पर गाडी को जब्त करने के अलावा अदालत उन सभी के लिए आपको दंड और जुर्माना कर सकती नहीं , अब अदालतें     दंड भी दे रही हैं और जुर्माना भी कर रही हैं | 

अदालत में भी अब एक तारीख पर आरोपी को मुक्त नहीं किया जाता है | अपनी गलती मानने की स्थिति में आरोपी को एक प्रार्थना पत्र दाखिल करना होगा | अदालत उसे विचारार्थ संज्ञान में लेकर अगली तारीख से पहले परिवहन विभाग , पुलिस व अन्य सभी    सम्बंधित  एजेंसियों  से  पूर्व में  दोषी या  कहिये  कि   कोई लंबित  चालान  आदि  की पूरी रिपोर्ट  तलब  की जाती है |  नियत दिन व्  समय पर जांच अधिकारी  खुद    उपस्थित होकर इस  बात की जानकारी  अदालत को देती   हैं  | 

अब दंड और जुर्माने की बात  ..अब  अधिकतम जुर्माना ...या न्यूनतम जुर्माने राशि की  आधी रकम ..जुर्माने के रूप  में  चुकाने  के अलावा अदालतें ..पंद्रह दिनों की कैद , पंद्रह दिनों तक अस्पताल या सुधार गृहों में सेवा , ट्रैफिक पुलिस का सहयोग  व व्यावसायिक  वाहनों  के  केस  में  उन्हें  पंद्रह  दिनों का प्रशिक्षण  जैसी दंड व्यवस्था को अपना रही हैं  | इनके अलावा कुछ नए प्रयोगों के तौर  पर ..एक निश्चित धन राशि प्रधानमंत्री राहत  कोष या    आरोपी की माता बहन  व बेटी के नाम से बैंक  में  जमा कराने का निर्देश  देकर आरोपियों को अपनी गलती का एहसास व जिम्मेदारियों को समझने का अवसर दे रही हैं  | 

यानि लब्बो लुआब ये कि , यदि आप ट्रैफिक नियमों को  गंभीरता से न लेकर  महज़ खानापूर्ति करने की आदत पाले बैठे हैं तो फिर यकीनन ही अपना धन , समय , प्रतिष्ठा व उर्जा को दांव पर लगाने की भूल कर रहे हैं जो देर सवेर खुद पलट कर आपके  लिए अधिक  नुकसानदायक साबित होगी 

शुक्रवार, 2 जून 2017

छलावा साबित हो रही हैं त्वरित न्यायालय की परिकल्पना





कुछ दिनों पूर्व छपी एक खबर के अनुसार , हाल ही में नई राष्ट्रीय महिला नीति के प्रस्तावित मसौदे   में महिलाओं को त्वरित न्याय दिलवाने के उद्देश्य से विशेष अदालतें (जिन्हें "नारी अदालत "कहा  जाएगा )कि गठन का  सुझाव  दिया गया है | सकारात्मक दृष्टिकोण से इस  खबर  के  दो अच्छे  पहलू  हैं |पहला ये कि सरकार व् प्रशासन समाज में महिलाओं की बदलती हुई  स्थिति  व् परिदृश्य के कारण महिलाओं के लिए एक नई राष्ट्रीय नीति लाने को तत्पर हुई  |और दूसरा ये कि अपने इस प्रयास में  गंभीरता दिखाते हुए महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाने के उद्देश्य से उनके लिए विशेष अदालतों के गठन की कवायद | किन्तु ,

एक नागरिक , और विशेषकर सरकारी मुलाजिम , इत्तेफाकन अदालत ही मेरा कार्यक्षेत्र होने के कारण भी , मेरी पहली और आख़िरी प्रतिक्रया यही होगी , कि , नहीं इससे कहीं कुछ भी नहीं बदलेगा , कुछ भी नहीं | कम से कम ये वो उपाय नहीं हैं जो अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल हो पायेंगे , विशेषकर तब जब आप सालों से उन्हें आजमा रहे हैं और दुखद स्थिति ये है कि दिनोंदिन महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध में क्रूरता का स्तर अब पहले से कहीं अधिक है और ये लगातार हर क्षण बढ़ रहा है | यूं किसी भी नए प्रयास या ऐसी किसी कोशिश का नकारात्मक आकलन उचित नहीं माना जाना चाहिए | मगर अफ़सोस यही है कि , प्रायोगिक रूप से ये परिणामदायक उपाय नहीं साबित होंगे |

नीतियाँ नियम क़ानून , पहले इनकी ही  बात करते हैं | इस देश में लिखित क़ानून का प्रावधान ब्रिटिश राज़ से शुरू हुआ था बहुत सी नई परिकल्पनाओं की तरह  |और  ये  सिलसिला  जो  शुरू  हुआ  तो  फिर  हास्यास्पद रूप से  हम बहुत  कम उन  देशों  में शामिल  हैं  जो  लगातार कानून पे क़ानून ,रोज़ बनाए  जाते  नियम  कायदे  और  बिना किसी ठोस कार्यप्रणाली और ब्लूप्रिंट के घोषित की जाने वाली नीतियाँ | सबसे बड़े हैरत की बात ये है कि पूर्व में बने लागू किये कानूनों का आकलन विश्लेषण उनका प्रभाव और परिणाम ऐसी बातों को गौण विषय ही समझा गया है और शायद यही एक वजह ये भी है कि आम लोगों में भी क़ानून और अदालत जाने पहुँचने की आदत शुमार हो चली है , ये किसी भी दृष्टिकोण से अच्छी स्थति नहीं है


जिस देश में जितने अधिक क़ानून होते हैं इसका मतलब उस देश का समाज उतना उदंड और कानून का द्रोही होता है .किसी विधिवेत्ता ने इसी बात को बखूबी ऐसे लिखा था | अब बात त्वरित अदालतों की संकल्पना की जो बहुत से कारणों की वजह से वैसा  ही अपेक्षित  परिणाम  नहीं  दे  पाया  जैसा विशेष अदालतों के मामले में हुआ है | और इसकी कुछ वजहें भी हैं | आसान भाषा में समझा  जाए तो  महिला अदालत , परिवार न्यायालय , हरित ट्रिब्यूनल , बाल न्यायालय ...जैसी परिकल्पनाओं के पीछे एक जैसे विधिक विचार बिन्दुओं वाले वादों को एक विशेष न्यायालय में सुनवाई का अवसर देना , निस्तारण , सम्बंधित मशीनरी का बेहतर उपयोग और अन्य कई कारण , होता है | सरकार द्वारा संसद में इसका प्रावधान करते समय , प्रशासन की मंशा रहती है कि , विशिष्ट अदालतों और त्वरित अदालतों का गठन या स्थापना  विशेष रूप से किया जाना चाहिए | किन्तु एक नई अदालत के लिए एक न्यायिक अधिकारी के साथ कम से कम दस कर्मचारी के पूरे सेट अप की अनिवार्य आवश्यकता का फौरी हल न होने के कारण , मौजूदा न्यायाधीशों व् कार्यरत कर्मचारियों में से ही एक तदर्थ व्यवस्था की जाती है | इसका परिणाम ये निकलता है कि इस नई विशेष अदालत की व्यवस्था स्थाई और सुचारू होने तक वो भी अन्य अदालतों के समान ही , अपनी पूरी शक्ति से कार्य करने के बावजूद भी , मुकदमों के बोझ से जूझती सी लगती हैं |

देश की वो तबका जो न्याय व्यवस्था  के होते हुए  भी  लगातार  शोषित  होता रहा  है  उनमें दुनिया  की  आधी  आबादी  भी  है  , विडंबना है कि मेरे गृह जिले में १२ वर्ष की एक किशोरी को पारिवारिक दुश्मनी के शिकार के रूप में व्याभिचार के बाद हत्या और उसके शव को जला तक दिए जाने का नृशंश अपराध जब आंदोलित किये हुए है तो ये एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह देश की क़ानून व्यवस्था और खासकर अपराधियों के कभी भी कम न हो पाए मनोबल के लिए समाज याची से ज्यादा याचक बना दिखता है | यह नैसर्गिक न्याय के नियम के विरूद्ध है |


......देश की अदालतों में मुकदमों का बढ़ते  बोझ के लिए व्यवस्था को अब बिलकुल अगल और नए सिरे से सोचना होगा



रविवार, 18 सितंबर 2016

घर की चिंता नहीं पड़ोसी के लिए मियां हलकान





.. ऐसा सुनने में आया है कि अभी कुछ दिनों पूर्व माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (या बल्कि यह कहा जाए कि अपने लगातार निर्भय बयानों के कारण चर्चा में रहने वाले मुख्य न्यायाधीश ) श्री तीरथ सिंह ठाकुर की मुलाकात प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से हुई थी और उन दोनों के बीच लगभग एक  घंटे तक औपचारिक अनौपचारिक बातचीत हुई ||चलिए अच्छा है कम से कम इस बहाने सार्वजनिक पदों पर बैठे दो शीर्ष व्यक्तियों को आपस में विचार व समस्याएं साझा करने का सुअवसर मिला होगा ।।

जैसा कि सबको विदित है कि वर्तमान मुख्य न्यायाधीश श्री टीएस ठाकुर अपने शुरुआती दिनों से ही बड़ी मुखरता से न्यायपालिका की एक प्रमुख समस्या ,जो की लंबित मुकदमों का बढ़ता ढेर व् उसका निस्तारण है, को रेखांकित करते रहे हैं || इतना ही नहीं समय समय पर अपने सार्वजनिक संबोधन में वे  सरकार व उनके नीति निर्धारकों को ,इस बात के लिए, निशाने पर लेते रहे हैं कि न्यायपालिका पर लंबित मुकदमों के बोझ के लिए कहीं ना कहीं किसी हद तक पर्याप्त संख्या में अदालतों व न्यायाधीशों का नहीं होना ही है||

वह बार-बार इस बात को कहते रहे हैं कि पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय न्यायिक परिक्षेत्र में प्रति व्यक्ति न्यायाधीशों का जो पैमाना होना चाहिए ,अनुपात उससे कहीं ज्यादा ही कम है || अभी इस बात कोकहते हुए वे अपनी नाराजगी और व्यथा को सार्वजनिक रूप  से जाहिर भी कर चुके  हैं कि लाल किले से अपने सार्वजनिक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस समस्या को प्रमुखता से नहीं उठाया ना ही इसकी कहीं चर्चा की||
किंतु इस परिप्रेक्ष में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि आज वर्तमान में कार्यरत न्यायालय वह न्यायाधीश कार्यप्रणाली भ्रष्टाचार व अनेक तरह की अनियमितताओं के भंवर चक्र में इस तरह से फंसे देखते हैं कि न्याय प्रशासन पूरी तरह से चरमरा ऐसा दिखता है कभी देश के अग्र संचालक वर्ग में अपना स्थान बनाने वाले अधिवक्ता गण भी आज वाद विवाद हिंसक होकर बहुत बार अनावश्यक वह अति उग्र प्रदर्शन करते हैं यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है

प्रशासनिक व्यवस्थाओं प्रशासनिक कार्य क्रियाकलापों में सालों से वही ढिलाई सालों से वही ढीले ढाले रवैया पर का किया जा रहा है कहीं किसी सुधार की कोई बात या गुंजाइश नहीं दीख  पड़ती है || पिछले दिनों अंतरजाल व उस पर लोगों की पहुंच ने जरूर इसमें थोड़ा सा अंतर कम किया है किंतु फिर भी यह भारत जैसे देश जहां पर बहुत सारी आबादी निरक्षर निर्धन व निर्मल है तथा अंतरजाल तो दूर इंटरनेट तो दूर वह रोटी कपड़ा वह दवाई शिक्षा के लिए मोहताज है उन तक न्याय को सुलभ सस्ता बनाने के लिए बहुत बड़े वह दिल प्रयास किए जाने जरूरी है ||

न्यायपालिका पर एक आरोप यह भी लगता रहा है कि वह अति सक्रियता दिखाते हुए अनावश्यक हस्तक्षेप करती है कभी विधायिका में तो कभी कार्यपालिका में जबकि न्यायपालिका का स्पष्टीकरण इस पर यह है कि उसे मजबूरी में अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाध्य होना ही पड़ता है क्योंकि यह दोनों निकाय अपने दायित्व निर्वहन में  या विफल हो जाते हैं||


ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू जब सर्वोच्च न्यायालय में पदस्थापित न्यायाधीशों के लिए कहते हैं कि उनकी समझ योग्यता के अनुरूप नहीं और जो सभी उन न्यायमूर्तियों के स्थान पर बैठे वाला प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ इसलिए नहीं वहां बैठा क्योंकि योग्य बल्कि वरिष्ठता या किन्ही और कारणों से हैं | और जब कोई इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति ऐसा कह रहा है निसंदेह और अविलम्ब इसके पीछे के कारणों पर स्वयं न्यायपालिका और उससे सम्बद्ध सभी को मंथन व् विश्लेषण करना होगा | देश समाज की चिंता से पहले आतंरिक व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जाना चाहिए वो ज्यादा जूररी है