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रविवार, 25 दिसंबर 2011

वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं : बेहतर शुरूआत







देश के सामने भविष्य में जो कुछ चुनौतियां विकराल रूप में आने वाली हैं , उन्हीं में से एक निश्चित रूप से मुकदमों की बोझ से जूझती न्यायपालिका भी होगी । देश की मौजूदा न्यायिक व्यवस्था के आकलन के लिए सिर्फ़ एक ही तथ्य काफ़ी है , वो ये कि वर्तमान में देश की अदालतों में लगभग साढे तीन करोड मुकदमे लंबित पडे हैं । भविष्य में स्थिति के बिल्कुल नारकीय होने की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है और इसके लिए पुख्ता कारण भी हैं । प्रति वर्ष बनने बनाए जाने वाले नए ने कानून , उनके उपयोग से ज्यादा दुरूपयोग किए जाने की आशंका और कम पडते न्यायिक संसाधन , यानि देश में अदालतों ,न्यायाधीशोंण आदि की कमी , देश की न्याय व्यवस्था को बेहद धीमा कर देंगे ।


पिछले एक दशक में समाज में अपराध की दर में तीव्र वृद्धि , जीवन व विकास के लिए बढती महात्वाकांक्षा के कारण पैदा हुई गला काट प्रतिस्पर्धा , कानून के उपयोग-दुरूपयोग से अदालतों में मुकदमों की संख्या लगातार द्विगुणित हो रही है । सरकार व प्रशासन तो मौजूदा लंबित मुकदमों के निस्तारण व्यवस्था में ही खुद को पस्त मान चुकी है । हालांकि पिछले एक दशक में भारतीय न्यायिक व्यवस्था ,पश्चिमी देशों की न्यायिक प्रक्रियाओं या जिन्हें वास्तविक अर्थों में वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं कहा जाए तो बेहतर होगा , को प्रयोग में लाकर बहुत महत्वपूर्ण उपाय तलाशा है ।

भारत की पुरातन प्रणाली से लेकर आज की आधुनिक प्रणाली तक न्याय व्यवस्था बहुस्तरीय रही है और ऐसा इसलिए है ताकि न्याय की पूर्ण स्थापना हो सके । राज्य का अपने नागरिकों के प्रति जो अहम कर्तव्य होता है उसमें से एक प्रमुख होता है आम नागरिकों सस्ता व सुलभ तथा त्वरि न्याय उपलबध कराए , किंतु अभी भी प्रति व्यक्ति न्यायाधीश या अदालतों की उपलब्धता वैश्विक न्याय व्यवस्ता के मापदंडों से बहुत पीछे है । हालांकि सरकार अपनी ओर से अदालतों पर बढ रहे मुकदमों को कम करने के लिए कई नई योजनाओं पर कार्य कर रही है जिसके तहत अभी हाल ही में मिशन मोड परियोजना को भी शुरू किया गया है ।


इसके अलावा पिछले कुछ सालों में परंपरागत व्यवस्था के अतिरिक्त मध्यस्थता केंद्र , लोक अदालत , सांध्यकालीन अदालत , ई कोर्ट ,प्ली बारगेनिंग , गरीबों के लिए मुफ़्त कानूनी सहायता दिलाने हेतु विधिक सेवा प्राधिकरण की स्थापना , कारागारों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण ,न सिर्फ़ कानूनी अधिकारों का बल्कि जीविकोपार्जन के उद्देश्य से भी , समय समय पर चलाए जाने वाले कानूनी साक्षतरा अभियान आदि जैसे कई वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाओं से भविष्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारी हो रही है । इनके अलावा कागज़रहित अदालतें , ग्राम अदालतों की स्थापना आदि पर भी तेज़ी से कार्य चल रहा है ।


भारतीय ग्राम्य समाज के न्यायिक इतिहास में किसी भी विवाद के निपटारे में एक प्रधान भूमिका आपसी समझौते या मध्यस्थता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहती आई है । ग्राम पंचायतों द्वारा पूरे समाज के गंभीर से गंभीर विवादों व अपराधों तक की सुनवाई का चलन रहा है । शहरी समाज में बढते दांपत्य विवाद ,पैसे के लेन देन, ऋण कर्ज़ विवाद तथा दुर्घटना मुआवजा वाद एवं श्रमिक प्रबंधन विवाद जैसे कानूनी निर्णय वाले विवादों के निपटारे के लिए आधुनिक न्यायिक व्यवस्था में भी वैकल्पिक ,न्यायिक प्रकिया के रूप में स्थापित हुआ -मध्यस्थता केंद्र । आज देश की बहुत सारी अदालतों में मध्यस्थता केंद्रों द्वारा न्यायाधीशों व परामर्श एवं विधिक प्रक्रियाओं के ज्ञाता अधिवक्ताओं की दक्ष व प्रशिक्षित टीम की सहायता से अदालती बोझ को कम करने की कोशिश एक बेहतर रंग ला रही है । महानगरीय जीवन के बढते वैवाहिक पारिवारिक विवादों के लिए ये चमत्कारिक साबित होती है हैं । सरकार व प्रशासन इनकी सफ़लता से इतना उत्साहित हुई कि अदालती वादों केल इए मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना के अतिरिक्त सभी क्षेत्रों के विशेष कार्यकारी दंडाधिकारी के कार्यालयों के पास भी मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना की गई है । इन केंद्रों में अदालत पूर्व विवादों समस्याओं को सुना व निपटाया जा रहा है ।


सुलह समझौते की प्रक्रिया को तरज़ीह देती दूसरी शुरूआत रही लोक अदालतों की स्थापना । प्रारंभे में विशेष संस्थाओं ,नगर निगम , ट्रैफ़िक , टेलिफ़ोन , बिजली , पानी आदि के संबंधित वादों को लिया गया । इसके पश्चात इन लोक अदालतों ने देश की अदालतों में तेजी से बढे १३८ निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के तहत लाखों में दायर किए गए मुकदमों को निपटाने में बढी भूमिका निभाई । इन लोक अदालतों को व्यापक व प्रभावी बनवाने के लिए विशेष मेगा लोग अदालतों का अयोजन तथा स्थाई लोक अदालतों की स्थापना की गई । इसका परिणाम ये रहा कि मुकदमों के निस्तारण के रफ़्तार में एक गति महसूस की गई । दिल्ली ,कोलकाता , मुंबई आदि नगरों महानगरों में इनकी उपलब्धि व महत्व उल्लेखनीय रही हैं ।


 अदालतों में कामकाज के घंटों में कमी को महसूस करते हुए विशेष रूप से सांध्यकालीन अदालतों की संकल्पना की गई । आज अहमदाबाद एवं दिल्ली में विशेष सांध्यकालीन अदालतों का परिचालन सफ़लतापूर्वख किया जा रहा है । आज ई-तकनीक का युग है ऐसे में बहुत आवश्यक था कि विधि व तकनीक के सामंअज्स्य को न्याय क्षेत्र के लिए सकारात्मक दिशा देते हुए उसे न सिर्फ़ अपनाया जाए बल्कि प्रोत्साहित किया जाए । देश की सभी अदालतों को कंप्यूटरीकृत करने का कार्य चल रहा है । पिछले कुछ वर्षों में देश में बहुत सी कागज़ रहित ई अदालतों की स्थापना ने इस ओर के महत्वपूर्ण परिवर्तन के संकेत दे दिए हैं ।


न्यायिक प्रक्रियाओं में प्ली बारगेनिंग व्यवस्था की शुरूआत ने कहीं न कहीं चली आ रही दंडीय विधान व्यवस्था को नया विकल्प दे दिया । पीडितों को न्याय के मानवीय पहलू से परिचय कराते हुए दंड राशि को मुआवजे के रूप में दिए जाने की पहल की गई । बेशक इन शुरूआती चरणों में ये तमाम वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं नाकाफ़ी और बहुत छोटी लग रही हों , किंतु आने वाले समय में ये प्रयास नि: संदेह क्रांतिकारी परिणाम देने वाले साबित होंगे ।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

मिशन मोड योजना शुरू : अदालती द्स्तावेज़ होंगे डिज़िटलाइज़्ड








इन दिनों , न्यायपालिका पर बढते बोझ और भविष्य में उनके आगे आने वाली बडी चुनौतियों से निपटने के लिए , सरकार , प्रशासन और खुद न्यायपालिका के द्वारा बहुत सी महात्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं । पिछले कुछ वर्षों में प्रयोग के तौर पर , लोक अदालत , सांध्य कालीन अदालत, प्ली बारगेनिंग , मध्यस्थता केंद्र जैसे प्रयोगों को न सिर्फ़ शुरू किया गया बल्कि सफ़लतापूर्वक उनका संचालन किया जा रहा है । सबसे सुखद बात ये है कि सभी योजनाओं में सफ़लता का दर अपेक्षा से कहीं अधिक निकला । यही कारण है कि इस उपलब्धि से प्रोत्साहित होकर मिशन मोड जैसी भगीरथी योजना क्प शुरू किया गया है । 

इसके पहले चरण में सभी अदालती दस्तावेज़ों को डिज़िटलाईज़्ड करने की कवायद शुरू की जा चुकी है । अभी हाल ही में दिल्ली की समस्त अदालतों से इस बाबत सूचना मांगी गई , कि वे प्रतिदिन आदेश के लिए ,अंतिम निर्णय के लिए , अन्य कार्यवाहियों के लिए औसतन कितना कागज़ खपत करती है । इन सूचनाओं के आधार पर ही अदालत  के सभी दस्तावेज़ों को ई दुनिया में सहेज़ दिया जाएगा । ज्ञात हो कि देश की बहुत सी अदालतों पहले ही कागज़ रहित ई अदालतों की शुरूआत हो चुकी है , जहां पूरी तरह से अदालती कार्यवाही को कंप्यूटरों द्वारा ही किया जा रहा है और कदियों की पेशी तथा सुनवाई वीडियो कांफ़्रेंसिंग के ज़रिए की जा रही है । 



माना जा रहा है कि अदालतों के सभी कागज़ातों व दस्तावेज़ों के डिजिटलाइजेशन की , प्रक्रिया एक एतिहासिक पहल साबित होगी । अदालतों को ई दस्तावेज़ के रूप में सहेजे जाने से बहुत सारी बातों में सहायता मिल सकेगी । वर्तमान में अदालती दस्तावेज़ो को सुरक्षित रख पाना वो भी लंबे अरसों तक , यही एक बडी समस्या है । दीवानी , फ़ौज़दारी व अन्य वादों के मुकदमे से संबंधित द्स्तावेज़ों को अदालती अभिलेखागार में सहेज़े जाने की मियाद भी अलग अलग है । कई दस्तावेज़ों को बहुत लंबे समय तक तो कईयों को हमेशा के लिए सुरक्षित रखना होता है । भारत में न्यायव्यवस्था के बहुस्तरीय होने के कारण , अपील और अपील के निस्तारण में लगने वाला लंबा समय , आदि के कारण मुकदमों से जुडे दस्तावेज़ों को सहेजा जाना जरूरी होता है । 

एक बार स्कैन करके अंतर्ज़ाल पर उन दस्तावेज़ों को डाल देने से ,न सिर्फ़ पारदर्शिता , न्यायिक प्रकिया व कार्यवाहियों तक आम जन की सीधे व त्वरित पहुंच हो सकेगी । सूचनाओं का ये भंडार न सिर्फ़ न्यायिक प्रक्रिया को गतिमान करने में सहायक होगा बल्कि  भविष्य में ई सुलभता के कारण लोगों को सुलभ भी हो सकेगा । देखना ये है कि भविष्य में अदालतों को तकनीक से लैस करने का उनकी लक्ष्य प्राप्ति में कितना कारगर साबित होता है । 

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

दिल्ली की जिला अदालतों में बायोमेट्रिक प्रणाली लागू










पूर्वी एवं उत्तर पूर्वी जिला अदालत ,कडकडडूमा न्यायालय ,दिल्ली





राजधानी दिल्ली की जिला अदालतों के प्रशासनिक सुधारों की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के तहत एक और उपलब्धि जुडने जा रही है । दिल्ली की सभी जिला अदालतों में कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज़ करने के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को लागू किया जा रहा है । 

ज्ञात हो कि , दिल्ली उच्च न्यायालय में ये व्यवस्था पहले से ही लागू है और पिछले दिनों दिल्ली नगर निगम के दफ़्तर में भी , काफ़ी वाद विवाद के बाद इसे लागू कर दिया  गया । राजधानी की सभी जिला अदालतों के कर्मचारियों को पिछले दिनों माईक्रो चिप लगे हुए नए पहचान पर ज़ारी किए गए हैं । इस माईक्रो चिप लगे पहचान पत्र को बायोमेट्रिक उपस्थिति पत्र के पास ले जाने पर कर्मचारी/अधिकारी का नाम स्वत: ही स्क्रीन पर दिखाई देता । इसके पश्चात कर्मचारी /अधिकारी जैसे ही अपनी फ़िंगर प्रिंट मैच कराएंगे ,उनकी हाज़िरी समय के साथ दर्ज़ हो जाएगी । अदालतों में वर्दी लागू करने का कार्य पहले से ही लागू किया जा चुका है ।


न्यायव्यवस्था में ई प्रणाली के उपयोग को अपनाते हुए अदालतें पहले ही वीडियो कांफ़्रेंसिग ,ई कोर्ट जैसी परिकल्पनाओं पर सफ़लतापूर्वक काम कर रही हैं । अदालतों के सभी रिकार्डों को तेज़ी से अंतरजाल पर सहेजने का कार्य चल रहा है । उम्मीद की जा रही है कि अदालतों पर तेज़ गति से बढते मुकदमों के बोझ से निपटने के लिए अदालत हर स्तर पर खुद को तैयार कर रही हैं 

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

सत्यमेव जयते









अभी हाल ही में जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय द्वारा जारी परिपत्र में दिल्ली की सभी जिला अदालतों को ये निर्देश दिया गया है कि अब भविष्य में ये सुनिश्चित किया जाए कि जहां जहां भी राष्ट्रीय चिन्ह का उपयोग किया जाएगा उन सभी स्थानों पर स्पष्ट रूप से उस राष्ट्रीय चिन्ह के नीचे , देवनागिरी लिपि में " सत्यमेव जयते " अंकित होना चाहिए ।


परिपत्र में उल्लेख किया गया है कि , उन तमाम स्थानों , जैसे , कोर्ट फ़र्निचर , मोहरें , स्टेशनरी , स्टिकर्स , पत्र एवं लेटर हैड , परिचय पत्र एवं विजिटिंग कार्ड आदि , सभी पर जहां भी राष्ट्र चिन्ह का अंकन हो रहा है अथवा किया जाना है , उन सबके नीचे "सत्यमेव जयते " लिखा होना अनिवार्य है । ये पाया गया था कि पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय चिन्ह के नीचे सत्यमेव जयते भूलवश छूट रहा था ।ज्ञात हो कि राष्ट्रीय चिन्ह के उपयोग करते समय ये ध्यान रखना आवश्यक होता है कि स्तंभ के तीनों शेर ( मूल रूप से चार शेर हैं ) ,नीचे अश्व और वृष की आकृति बीच में अशोक चक्र और सबसे नीचे देवनागिरी सत्यमेव जयते का उल्लेख किया गया है ।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

राजधानी की अदालतों में लंबित मुकदमों के निस्तारण के लिए क्रांतिकारी मिशन मोड योजना शुरू



आज न्यायपालिका से सामने सबसे बडी चुनौती , लंबित मुकदमों के जल्द से जल्द निस्तारण का ही है । आंकडों के मुताबिक इस समय देश की अदालतों में कम से कम साढे तीन करोड मुकदमें लंबित हैं । सरकार अपनी तरफ़ से जाने कितनी ही योजनाएं चला रही है और जाने कितनी अभी लूप में हैं । मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना , लोक अदालतों का गठन , सांध्यकालीन अदालतों का परिचालन ,विशेष अदालतों का गठन , फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स , मुफ़्त विधिक सेवा , प्ली बारगेनिंग जैसे तमाम उपायों पर एक साथ काम किया जा रहा है । ऐसा नहीं है कि लंबित मुकदमों का सारा दोष सिर्फ़ अदालतों और धीमी अदालती प्रक्रिया का है । आज समाज में अपराध , हादसों , लडाई झगडे , विवाद इतनी तीव्र गति से बढ रहा है कि अदालतें जो पहले से ही कम थीं और कम महसूस होने लगती है । अदालती सुधारों और मुकदमों के तीव्र निष्पादन हेतु एक और नई योजना शुरू की गई है । फ़िलहाल राजधानी की जिला अदालतों को निर्देश जारी किए गए हैं । 


मिशन मोड योजना के नाम से शुरू की इस योजना के लिए राजधानी की सभी अदालतों को इस योजना के विस्तृत निर्देश दिए गए हैं । विधि एवं न्याय मंत्री वीरअप्पा मोइली द्वारा , माननीय मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय को एक पत्र लिख के इस योजना के शुभारंभ और पूरी विस्तृत जानकारी दी । एक जुलाई २०११ से कोलकाता के एक जिले से इस योजना का शुभारंभ किया गया है । इसके तहत दिल्ली की प्रत्येक अदालत में , एक निर्देश जारी किया गया है कि वे अपने यहां लंबित मुकदमों में से सबसे पुराने मुकदमों को चुन कर उन्हें , बुजुर्गों, महिलाओं , बच्चों से संबंधित मुकदमे के वर्गीकरण के अनुसार वरीयता पर लेते हुए अगले छह महीनों के अंदर निस्तारण का प्रयास करने को कहा गया है । इसके लिए बाकायदा के निर्धारित प्रपत्र दिया गया है , जिसे स्वयं न्यायाधीशों को अपने लिए एक टार्गेट तय करने को कहा गया है और फ़िर उसे अगले छह महीनों में पाने का प्रयास करने को कहा गया है ।


पूरी योजना की गंभीरता का अंदाज़ा सिर्फ़ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि , इसके लिए न सिर्फ़ विशेष रूप से कोर्ट मैनेजर जैसे पदों का गठन करके उन्हें भरा गया है बल्कि , अगले वर्ष की पहली तारीख को ,इस निर्धारित टार्गेट और वास्तविक निष्पादन पर आधारित एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके उच्च न्यायालय में भेजने का निर्देश दिया गया है । ज्ञात हो कि , अभी कुछ समय पहले भी , सबसे पुराने मुकदमों को , वृद्धों से संबंधित , बच्चों एवं महिलाओं से संबंधित मुकदमों को वरीयता देते हुए निपटाने के लिए बहुत से उपाय अपनाने और उन्हें जल्द से जल्द निस्तारित करने की एक योजना पहले से ही चल रही है । आने वाले समय में इस तरह से प्रतिबद्धता निभाते हुए यदि एक बडी कोशिश की जाए तो यकीनन इसका कुछ सकारात्मक प्रभाव पडेगा ऐसा कानूनविद मान रहे हैं ।

रविवार, 26 जून 2011

दिल्ली की अदालतों में नियुक्त किए गए पारदर्शिता अधिकारी : कोर्ट कचहरी










पिछले कुछ वर्षों में आम लोगों का अपने अधिकारों के प्रति सजगता का ही परिणाम है कि एक के बाद एक बहुत से कानून और बहुत सारे अधिकार बनाए लाए जा रहे हैं । लागू होने के बाद से ही अब तक के बहुत कम समय में ही सूचना के अधिकार ने और आम लोगों द्वारा किए जा रहे उसके उपयोग ने बहुत सारी क्रांतिकारी परिवर्तनों की बुनियाद डाल दी है । अब लोग सूचना का अधिकार के तहत राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक के एक एक पाई का हिसाब न सिर्फ़ पूछ रहे हैं बल्कि आम जनता को भी सारा कच्चा चिट्ठा दिखाया जा रहा है । यही वजह है कि बंद कमरों के सारे राज़फ़ाश हो जाने और वो भी इतने सस्ते में ही खुल जाने के डर और आशंका से त्रस्त खुद सरकार तक इसमें बदलाव के लिए कम से कम तीन कोशिश तो कर ही चुकी है , लेकिन इसमें वो नाकाम रही है । इसी कडी को आगे बढाते हुए अब सरकारी महकमों में पूर्ण पारदर्शिता के लक्ष्य को उद्देश्य में रखते हुए ,पूर्ण पारदर्शिता की नीति और योजना को शुरू किया जा रहा है ।

इसीके तहत राजधानी दिल्ली की सभी जिला अदालतों में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के स्तर के न्यायिक अधिकारी की देखरेख में एक पारदर्शिता समिति का गठन किया गया है जिसका अध्यक्ष भी यही अधिकारी होगा । इस पारदर्शिता अधिकारी के जिम्मे न सिर्फ़ ये काम होगा कि अदालत से जुडे सभी कानूनी और प्रशासनिक कार्यों और कार्यप्रणालियों में पूर्ण पारदर्शिता के नियम का पालन हो बल्कि और भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां इन्हें सौंपी गई हैं ।


पारदर्शिता अधिकारी के अधीन काम कर रही समिति , इस कार्य के लिए विशेष तौर से प्रशिक्षित और नियुक्त कर्मचारियों द्वारा एक ऐसा सूचना एवं सहायता डेस्क तैयार करेंगे जिसमें उस संस्थान से जुडे , उसके सभी क्रियाकलापों , नियम कायदों , कार्यप्रणालियों , सूचनाओं को एक साथ डाटा के रूप में सहेज कर रखा जाएगा । इसका उद्देश्य ये होगा कि , सबको इस सूचना और सहायता डेस्क की मदद से अधिक अधिक और लगभग सारी सूचनाएं मुहैय्या कराई जाएं ,ताकि आम आदमी को सूचना के अधिकार जैसे किसी दूसरे अधिकार के उपयोग की जरूरत ही न पडे ।
पारदर्शिता अधिकारी की भूमिका , सूचना के अधिकार के तहत पूछी गई जानकारी में भी बहुत अहम होगी । सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से असंतुष्ट रहने पर जब प्रार्थी प्रथम अपीलीय अधिकरण में पहुंचेगा तो उससे पहले पारदर्शिता अधिकारी पूरे मामले को देख कर ये तय करेगा कि कहीं उत्तर देने में जानबूझ कर कोई ऐसा उपाय तो नहीं ढूंढा गया है जो प्रार्थी को उसके संतोषजनक उत्तर पाने में अवरोध उत्पन्न कर रहा है ।यानि वो प्रथम अपीलीय अधिकरण में जाने से पहले ही प्रार्थी को एक बार और सुन सकेगा ।
सके अलावा संस्थान , उसकी कार्यप्रणाली , संस्था के अधिकारियों /कर्मचारियों , आदि से जुडी सलाह , सुझाव और शिकायत का भी निपटारा करने करने के लिए पारदर्शिता अधिकारी की सहायता ली जाएगी ।

सरकारी कामकाज में विशेषकर , न्यायालय , लाइसेंसिग ऑथौरिटि, पासपोर्ट दफ़्तर आदि जैसे तकनीकी विभागों में सरकार द्वारा इस तरह के प्रयोगों की शुरूआत को एक सकारात्मक लक्षण के रूप में लिया जाना चाहिए । किंतु इससे भी जरूरी है कि आम जनता को इन नियमों के बारे में न सिर्फ़ बताया समझाया जाए बल्कि इनके ज्यादा से ज्यादा उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाए ।

मंगलवार, 7 जून 2011

रामलीला मैदान कांड के विरोध में कल कडकडडूमा अदालत (दिल्ली) में वकील हडताल पर




अब विरोध की आवाज़ फ़ैलने लगी है और न सिर्फ़ आम आदमी बल्कि अभिनेता , विद्यार्थी, और प्रबुद्ध वर्ग भी सरकार की गलत नीतियों और आचरण के खिलाफ़ लामबंद हो रहा है । आज अदालत में वितरित किए गए एक सूचना पत्र में कडकडडूमा बार एसोसिएशन ने अदालत प्रशासन को इस बाबत बताया है ।

पत्र के अनुसार , कडकडडूमा बार एसोसिएशन के कल यानि आठ जून को , रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस एवं दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के ईशारे पर की गई बर्बरतापूर्ण कृत्य के विरोध में एक दिन न्यायालय की कार्यवाहियों में भाग नहीं लेने के फ़ैसला किया है । विशेष परिस्थितियों और जरूरी जमानत याचिकाओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने के अलावा सभी अधिवक्ता हडताल पर रहेंगे । ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही इस घटना पर आए समाचारों पर स्वत: संज्ञान ले कर सरकार से दो सप्ताह के भीतर इसका जवाब मांगा है ।


कल यानि आठ जून को ही , अन्ना हज़ारे ने भी एक दिन के अनशन की घोषणा कर रखी है और बावजूद इसके कि जंतर मंतर पर सरकार ने इसके लिए रोक लगा दी है , ऐसे में अधिवक्ताओं का उसी दिन हडताल का फ़ैसला सरकार के लिए बहुत बडी मुसीबत खडी करने वाला है । अब आने वाला समय ही बताएगा कि ये माहौल सरकार को किस ओर ले जाता है । 

रविवार, 5 जून 2011

कैदी भी करेंगे अब हैलो हैलो





राजधानी दिल्ली का केंद्रीय कारागार , यानि तिहाड कारागार , अपने प्रयोगों और सुधारों के कारण हमेशा ही चर्चा का केंद्र रहा है । मैंने आपको इस पोस्ट में बताया था कि कैसे जिला अदालत में , तिहाड के सजायाफ़्ता मुजरिमों द्वारा बनाए गई वस्तुओं की बिक्री के लिए राजधानी की एक जिला अदालत , कडकडूमा कोर्ट में बाकायदा एक आऊट्लेट भी खोला गया है । अब तिहाड से एक नया समाचार ये मिला है कि तिहाड प्रशासन ने तिहाड में बंद कैदियों को फ़ोन की सुविधा देने के लिए विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए हैं । 


महानिदेशक कारागार (दिल्ली ) के कार्यालय द्वारा जारी एक आदेश में इस पूरी योजना को विस्तार देते हुए कैदियों को फ़ोन सुविधा देने की पूरी व्यवस्था को सिलसिलेवार बताया गया है । इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं 


टेलीफ़ोन की सुविधा सिर्फ़ भारतीय कैदियों को , सप्ताह में दो दिन , और वो भी पांच मिनट की अवधि के लिए दी जाएगी । ये सुविधा सिर्फ़ उन कैदियों को दी जाएगी जिनका चाल चलन और व्यवहार जेल में अच्छा होगा । इस सुविधा को उस स्थिति में तात्कालिक या स्थाई रूप से वापस भी लिया जा सकता है , विशेषकर उस परिस्थिति में जब कोई कैदी जेल के अंदर या बाहर जेल कानून को तोडने का प्रयास करेगा । साथी कैदियों के साथ मारपीट, उनपर हमला आदि करने वाले कैदियों को ये सुविधा नहीं दी जाएगी । अलबत्ता जेल अधीक्षक को ये अधिकार होगा वो हर मामले में अलग से अपना निर्णय ले सके । 


जब भी कोई नया कैदी तिहाड जेल में लाया जाएगा , उसके फ़िंगर प्रिंट को स्कैन करके रिकॉर्ड में रख लिया जाएगा । कैदियों को  दो टेलिफ़ोन नंबर , जिन पर वह बात करने का इच्छुक होगा , देने को कहा जाएगा । जब भी किसी कैदी को फ़ोन करना होगा वह ,फ़ोन बूथ के पास आकर अपने उंगलियों को बायोमेट्रिक मशीन पर रख कर अपनी पहचान देगा । इसके उपरांत टच स्क्रीन सिस्टम से जुडी हुई मशीन , उस कैदी की पहचान करके , उसके द्वारा दिए गए दोनों नंबर वहीं स्क्रीन पर दिखाएगी , कैदी उसे छूकर टेलिफ़ोन नंबर डायल करके बात कर सकेंगे । सिस्टम में कॉल को रिडायल करने व बीच में ही काटने की भी व्यवस्था रखी गई है । जेल प्रशासन , टेलिफ़ोन बातचीत का पूरा रिकॉर्ड अपने पास रखेगा । कंप्यूटर सिस्टम , कैदी की बातचीत की समय सीमा को भी पूरी तरह ध्यान में रखते हुए पांच मिनट की समय सीमा के खत्म होने से पहले उसे आगाह करेगा और फ़िर निर्धारित समय के बाद अपने आप ही फ़ोन कट जाएगा । 


इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए कैदियों को समान रूप से १००/- रुपया  प्रति माह स्थानीय कॉल्स के लिए और २००/- रुपया प्रतिमाह एसटीडी कॉल के लिए जमा कराना होगा । वे कैदी जिन पर राष्ट्रद्रोह , आतंकी गतिविधियों में लिप्तता , मकोका , नेशनल सिक्युरिटी एक्ट के साथ ही संगीन जुर्म जैसे डकैती , लूटमार , अपहरण , फ़िरौती  आदि जैसे  अपराधों में शामिल होने का आरोप होगा सामन्यतया उन्हें इस सुविधा से बाहर रखा गया है । किंतु उनके पास ये सुविधा होगी कि वे एक लिखित प्रार्थनापत्र जेल अधीक्षक के सामने प्रस्तुत करें और हरेक कैदी की प्रार्थना पर उसके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए , उसे सिर्फ़ अपने परिवार या रिश्तेदार से बातचीत करने की अनुमति दी जाएगी न कि अपने किसी साथी से । जेल अधीक्षक इस पूरी बातचीत को सुन कर सुनिश्चित करेंगे कि जिससे बात की जा रही है वो वही व्यक्ति है जिसे कॉल की गई है । जब भी कोई कैदी , किसी विदेशी भाषा में बात करेगा (अंग्रेजी को छोडकर ) तो उसे अनुवादित कर लिया जाएगा । 


देखना है कि , अपनों से बातचीत करवाने की जेल प्रशासन की ये नई पहल कैदियों को समाज की मुख्य धारा में लौटने के लिए कितना प्रेरित कर पाती है । 



शुक्रवार, 3 जून 2011

बिना बीमे के चलती सरकारी गाडियां ..क्यों न इसे गुनाह माना जाए




गूगल एवं मूल साईट grahamriley.co.uk से साभार




आजकल मोटर वाहन दुर्घटना पंचाट में नियुक्ति है इसलिए जब उन मुकदमों की सुनवाई के समय कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं जिन्हें देख कर एक आम आदमी के मन की भावनाएं उबलने लगती हैं । महानगरों में बढती सडक दुर्घटनाओं की रफ़्तार अब किसी से छुपी नहीं और ये इसके बावजूद लगातार बढती जा रही है कि यातायात व्यवस्था और परिवहन साधनों के स्तर और परिचालन में लगातार सुधार हो रहा है । किंतु शराब पीकर गाडी चलाना , जानबूझ कर लापरवाही और गलत ढंग से गाडी चलाना आदि जैसे कारणों की वजह से दुर्घटनाओं की दर में कमी नहीं आ पा रही है  । सरकार पीडितों को मुआवजा दिलाने के लिए भरपूर कोशिश सी करती जताती है खुद को , लेकिन कुछ घटनाएं इसे जरूर संदेह के घेरे में डालती हैं । पहले आप खुद इन तथ्यों को देखिए ..

राज्य सरकार अपने अधीन चल रहे किसी भी वाहन का बीमा नहीं करवाती है ।

यहां तक कि दिल्ली पुलिस के अधीन चल रही पी सी आर गाडियां भी बीमामुक्त होती हैं ।

इतना ही नहीं , दिल्ली नगर निगम , दिल्ली जल बोर्ड , आदि जैसे निकायों में उपयोग में लाई जाने वाली गाडियों तक बीमा नहीं करवाया जाता है ।

न सिर्फ़ दिल्ली राज्य सरकार बल्कि ऐसी ही चतुराई हर सरकार करती है । जी हां , ये चतुराई ही कही जाएगी । दरअसल इसके पीछे दलील ये दी जाती है कि इन तमाम वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए राज्य सरकार पीडितों और मृतकों के आश्रितों को मुआवजे की रकम खुद दे देगी । असलियत में होता क्या है इससे पहले दो बातें और । एक आम आदमी द्वारा बिना बीमा करवाए हुए वाहन को सडक पर चलाना कानूनन जुर्म है किंतु सरकार खुद अपने इस जुर्म को कानूनी जामा पहना कर सही साबित करती है । यदि मोटर वाहन बनाने वाली कंपनियां जैसे टाटा , हिंदुस्तान मोटर्स आदि भी कल को यही दलील दें कि वो अपनी किसी भी गाडी का बीमा नहीं करवाएंगे और उनसे होने वाली दुर्घटनाओं का मुआवजा खुद देंगी तो क्या सरकार उसकी अनुमति दे देगी । कदापि नहीं , असल में बीमा का बाज़ार इतना बडा और इतने अधिक मुनाफ़े वाला है कि , आज भारत में कम से कम चालीस कंपनियां इस क्षेत्र में हैं ।


अब बात इन सारे संदर्भों के पीछे छिपे घिनौने सच की । सरकार जिस जिम्मेदारी का दंभ भरते हुए बिना बीमा कराए जिस बेशर्मी से अपने वाहनों को सडकों पर दौडाती है वो मुआवजे के वादों में उतनी ही ज्यादा गैरजिम्मेदार और असंवेदनशील रवैय्या अख्तियार करती है । हालात तो ये हैं कि दिल्ली में दुर्घटना में लिप्त उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसों के खिलाफ़ मुआवजे के आदेश के पालन के लिए अदालतों को उनकी संपत्ति कुर्क करके मुआवजे की रकम जमा करवाने तक का आदेश तक देना पडता है । दिल्ली सरकार के , दिल्ली पुलिस के तमाम मोटर वाहन दुर्घटना के वादों में उनका रवैय्या अक्सर मुकदमे को लटकाए रखने का होता है । हालात इतने बदतर हैं कि पिछले दिनों एक मुकदमे के दौरान एक प्रतिवादी ने , जिसने कि शायद पीसीआर वाहन में टक्कर मार दी थी , वो समझौते से मुआवजे वाद को समाप्त करना चाहता था किंतु इसलिए फ़ैसला नहीं हो पा रहा है क्योंकि दिल्ली पुलिस को ये ही नहीं पता कि उनका कौन सा अधिकारी इस अधिकार से प्रदत्त है कि वो वादी की तरफ़ से समझौता कर सके और इसके लिए दिल्ली पुलिस ने राज्य सरकार से पूछा है ।



यानि कुल मिलाकर ये स्थिति न सिर्फ़ अफ़सोसजनक है बल्कि एक तरह से सरकार द्वारा किया जा गुनाह है । एक आम पीडित जब देखता है कि सरकारी संस्थाएं खुद ही इस गुनाह में लिप्त हैं तो उसकी निराशा उसके क्रोध में बदल जाती है । समय आ गया है जब सरकार पर ये दबाव डाला जाना चाहिए कि वो अपनी जिम्मेदारियों से बचने के रास्तों पर चलना छोड दे ।


शनिवार, 21 मई 2011

राजधानी दिल्ली में बनी हरित अदालत



पर्यावरण संरक्षण हेतु किए जा रहे प्रयासों में न्यायपालिका ने भी अपनी सहभागिता देने की योजना बनाई है । हाल ही में राजधानी दिल्ली में , पूर्वी और उत्तर पूर्वी जिलों की अधीनस्थ अदालत , कडकडडूमा कोर्ट की पर्यावरण समिति के नोडल ऑफ़िसर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री गुरदीप सिंह ने  कडकडूमा कोर्ट को "हरित न्यायालय " घोषित करते हुए,
एक परिपत्र जारी करते हुए निर्देश दिया है कि न्यायालय परिसर में अनावश्यक रूप से जलाई जा रही लाइटें पंखे इत्यादि को बंद रखा जाए , विशेष रूप से वहां जहां पर्याप्त धूप व रोशनी पहुंचती हो । 


इसके साथ ही निर्देश जारी किया गया है कि जब न्यायाधीश न्यायालय में बैठे हों तो उनके चैंबरों की लाईटें , पंखें व एसी को बंद रखा जाए । अनावश्यक खर हो रही बिजली को बचा कर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने को कहा गया है । ज्ञात हो कि अभी हाल ही में कडकडडूमा न्यायालय परिसर में स्थित सरकारी आवास परिसर में भी पौधा रोपण की एक बडी योजना का शुभारंभ किया गया है । कडकडडूमा न्यायालय परिसर में भी बडे वृक्षों , और पौधों की भरमार के कारण भी इसे "हरित अदालत " का दर्ज़ा दिया गया है । दिल्ली पी डब्ल्यू डी की एक नर्सरी अदालत परिसर के भीतर ही इस हरित अदालत के स्वपन को बखूबी साकार कर रही है । ये कदम न सिर्फ़ मानवीय बल्कि पर्यावरण सचेतता के पक्ष में एक मील का पत्थर साबित होगा ।  




कोर्ट परिसर में फ़ैली हुई हरियाली .....




















बुधवार, 18 मई 2011

मध्यस्थता .........यानि चुटकियों में मुकदमों का निपटारा



मध्यस्थता : एक बेहतर उपाय 





इन दिनों भारतीय न्यायप्रणाली बहुत से नए प्रयोगों और प्रकियाओ के दौर से गुजर रही है । न्यायालयों पर बढते बोझ के कारण खुद अदालतें इनसे निपटने के लिए पश्चिमी देशों और अन्य विकसित देशों द्वारा प्रचलन में लाई जा रही न्यायिक प्रणालियों को प्रयोग के तौर पर अपना रही है और सुख्द बत ये है कि इनका परिणाम भी अब दिखने लगा है । लोक अदालते , मध्यस्थता केंद्र तथा प्ली बार्गेंनिंग जैसी नई व्यवस्थाएं इसी का उदाहरण हैं । आज जानते हैं कि मध्यस्थता केंद्र क्या होता है , ये कैसे कार्य करता है , और आम लोगों के लिए ये कैसे फ़ायदेमंद साबित हो सकता है , या कहें कि हो रहा है ।


मध्यस्थता क्या है ?

मध्यस्था विवादों को निपटाने की सरल एवम निष्पक्ष आधुनिक प्रक्रिया है । इसके द्वारा मध्यस्थ अधिकारी दवाबरहित वातावरण में विभिन्न पक्षों के विवादों का निपटारा करते है । सभी पक्ष अपनी इच्छा से सद्भावपूर्ण वातावरण में विवाद का समाधान निकालते हैं तथा उसे स्वेच्छा से अपनाते है । मध्यस्थता के द्वारा विभिन्न पक्ष अपने विवाद को सभी दृष्टिकोण से मापते हैं और वह समझौता जो सभी पक्षों को मान्य होता है , उसे अपनाते हैं । इस पद्धति के द्वारा विवादों का जल्द से जल्द निपटारा होता है जो खर्चरहित है । यह मुकदमों के झंझटों से मुक्त है । साथ ही साथ न्यायलयों पर बढते मुकदमों का बोझ भी कम होता है ।

मध्यस्थता में क्या होता है ?


मध्यस्थ अधिकारी निष्पक्ष मध्यस्थता के लिए पूर्णत: प्रशिक्षित होता है ।

सभी पक्षों को उनके विवादों का हल निकालने में मदम करता है । मध्यस्थता ढांचागर प्रक्रिया है इसकी कार्यप्रणाली निम्न चरणों में काम करती है ।

१. परिचय : मध्यस्थ अधिकारी , मध्यस्थता की प्रक्रिया से सभी पक्षों को अवगत करवाता है । उन्हें प्रकिया के नियमों एवं गोपनीयता के बारे में भी बताया जाता है ।

२. संयुक्त सत्र :- मध्यस्थ अधिकारी , पक्षों से उनके विवाद के प्रति जानकारी प्राप्त करता है तथा विवाद के निपटारे के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है ।

३. पृथक सत्र :- संयुक्त के अलावा यदि जरूरत हो तो मध्यस्थ अधिकारी हर पक्ष से अलग अलग बात करते हैं । इस सत्र मे सभी पक्ष अपने हर मुद्दे को मध्यस्थ अधिकारी के समक्ष रख सकते हैं जिसे गोपनीय रखा जाता है । इस सत्र में मध्यस्थ विवाद की जड तक पहुंचता है ।

४. समझौता : - विवाद के निवारण के उपरांत मध्यस्थ अधिकारी सभी पक्षों से समझौते की पुष्टि करवाता है । इस समझौते को लिखित रूप में अंकित किया जाता है । जिस पर सभी पक्ष हस्ताक्षर करते हैं ।

अब देखते हैं कि एक मध्यस्थ अधिकारी की भूमिका क्या होती है और उसके कार्य क्या होते हैं :-


मध्यस्थता अधिकारी विवादित पक्षों के बीच समझौते की आधारभूमि तैयार करता है ।

पक्षों के बीच आपसी बातचीत और विचारों का माध्यम बनता है ।

समझौते के दौरान आने वाली बाधाओं का पता लगाता है ।

बातचीत से उत्पन्न विभिन्न समीकरणों को पक्षों के समक्ष रखता है ।

सभी पक्षों के हितों की पहचान करवाता है ।

समझौते की शर्तें स्पष्ट करवाता है तथा ऐसी व्यवस्था करता है कि सभी पक्ष स्वेच्छा से समझौते को अपना सकें ।
अब जानते हैं कि मध्यस्थता प्रक्रिया के क्या लाभ होते हैं


विवाद का अविलम्ब व शीघ्र समापन

समय तथा खर्चे की किफ़ायत

न्यायालयों में चक्कर लगाने से राहत

अत्यधिक सरल व सुविधाजनक

विवाद का हमेशा के लिए प्रभावी एवं सर्वमान्य समाधान

समाधान में पक्षों की सहमति को महत्व

अनौपचारिक , निजी तथा पूर्णत: गोपनीय प्रक्रिया

सामाजिक सदभाव कायम करने में सहायक

मध्यस्थता में विवाद निपटाने पर , वादी ( Court Fees Act -1870 )कोर्ट फ़ीस एक्ट -1870 की धारा 16  तहत पूरा न्यायालय शुल्क वापिस लेने का हकदार होता है ।



अब कुछ और जरूरी बातें । इन मध्यस्थता केंद्रों में सभी फ़ौजदारी विवादों और आपराधिक विवादों का निपटारा नहीं किया जाता है । इनमें मुख्य रूप से पारिवारिक वाद , मोटर वाहन दुर्घटना वाद , और चेक बाऊंसिंग तह्त अन्य आर्थिक वादों को निपटाया जाता है । उम्मीद है कि ये नया प्रयोग भविष्य में क्रांतिकारी कदम साबित होगा । 

मंगलवार, 17 मई 2011

मोटर वाहन दुर्घटना में फ़ंस जाएं तो








जिस तरह तेज़ी से शहरों में वाहनों की संख्या बढती जा रही है अफ़सोस और दुख की बात है कि उसी तेज़ी से मोटर वाहन दुर्घटनाएं बढ रही हैं । महानगरों में तो स्थिति नारकीय सी बन गई है और इसके कई कारणों में एक सबसे बडा कारण है खुद लोगों की लापरवाही । आज आपको बताते हैं कि एक मोटर वाहन दुर्घटना की चपेट में यदि आप कभी आ जाते हैं ( यहां दोनों पक्षों की तरफ़ की बात की जा रही है , यानि कि चाहे पीडित हों या आरोपी ) तो आपको किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि आप खुद की , समाज की और कानून की भी सहायता कर सकें ।

पहले जानते हैं उन बातों को , जिनका ध्यान रखने से मोटर वाहन दुर्घटना की चपेट में आने से खुद को बचाया जा सकता है

१.     वाहन को तभी लेकर मुख्य सडक पर आएं जब आप उसे पूरी तरह चलाना सीख चुके हों । इससे पहले दक्षता के लिए चाहे आपको कुछ दिन ज्यादा प्रतीक्षा करनी पडे , किंतु     मुख्य  सडकों पर पहुंचकर दुर्घटनाग्रस्त होने /करने से तो ये बेहतर ही है ।अगर सीख रहे हैं तो साथ में किसी ऐसे व्यक्ति का होना जरूरी है जिसके पास वैध ड्राइविंग लाईसेंस हो

२.    अपना लाइसेंस हमेशा साथ रखें और हमेशा उसी वाहन को चलाएं जिसके लिए आप लाइसेंस धारक हैं ।

३.    वाहन के सभी कागजात , बिल्कुल वैध , एवं दुरूस्त रखें । बीमा , प्रदूषण प्रमाण पत्र , पंजीकरण प्रमाण पत्र आदि सब कुछ गाडी में ही रखें । यदि आप शहर में ही हैं और शहर     से बाहर नहीं जा रहे हैं तो आप अपने मूल प्रमाण पत्रों के स्थान पर उनकी छायाप्रति ( जो कि किसी राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित हो ) भी रख सकते हैं , लेकिन शहर से बाहर जाने की स्थिति में सभी मूल कागजात साथ रखना बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए ।

४.    दुर्घटना हो जाने की स्थिति में यदि पीडित पक्ष की ओर हैं तो जहां तक हो सके धीरज बनाए रखें , और सबसे पहले खुद की या चोटिल की सुरक्षा का ध्यान रखें । अगर दुर्घटना     आपसे हो गई है तो किसी भी स्थिति में वहां से भागने का प्रयास न करें । सिर्फ़ एक मिनट भर को ये याद करें कि , चोटिल व्यक्ति की जगह पर कोई आपका अपना हो या आप कभी खुद हों तो , इसलिए कोशिश यही करनी चाहिए कि चोटिल की सहायता सबसे पहले की जानी चाहिए । स्मरण रहे कि , भारत में दुर्घटना में चोटिल व्यक्तियों में से     साठ प्रतिशत की मृत्यु समय पर चिकित्सकीय सहायता न मिलने के कारण ही हो जाती है ।

५.    कभी भी विपरीत परिस्थितियों में , यानि कि , किसी भी तरह का नशे का सेवन करने के बाद , बेहद खराब मौसम में , या फ़िर जल्दी पहुंचने के लिए जबरन बने बनाए रास्तों     को चुनने , आदि जैसे हमेशा ही दुर्घटनाओं को आमंत्रित करने जैसा होता है । इसलिए प्रयास ये करना चाहिए कि यथा संभव ऐसी स्थितियों से बचा जा सके ।

६.    आजकल एक प्रवृत्ति , महानगरो और शहरों में बहुत तेज़ी से पनपती दिख रही है , वो है , अपने नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति देना । ये कितना घातक कदम     साबित हो रहा है आज इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन नाबालिग चालकों ने पिछले कुछ वर्षों मे मोटर वाहन दुर्घटना की दर में उन्नीस प्रतिशत तक की     वृद्धि कर दी है और इससे भी बढकर इन दुर्घटनाओं में चोटिल व्यक्तियों के मरने का प्रतिशत चौहत्तर प्रतिशत तक है ।विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी बच्चों को वाहन     चलाने के अनुमति नहीं दी जानी चाहिए । किंतु यदि फ़िर भी ऐसी स्थिति आ ही जाती है तो उसके पीछे किसी न किसी वयस्क को जरूर बैठा होना चाहिए ।

इन सब स्थितियों के बावजूद भी अगर , आप मोटर वाहन दुर्घटना में फ़ंस जाते हैं तो आपको ये निम्न बातें ध्यान में रखनी चाहिए

१.     पीडित पक्ष को चोटिल व्यक्ति की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता देने के साथ साथ अन्य वैधानिक बातों का ध्यान भी रखना चाहिए । ये ठीक है कि दुर्घटना पीडित पक्ष के लिए     उस समय कुछ भी सोचने का वक्त नहीं होता है , किंतु फ़िर भी दुर्घटना में लिप्त गाडी का नंबर , उसका मेक , आदि कम से कम उस समय अवश्य ही जेहन में रहना चाहिए जब     वो पुलिस को बयान दे रहे हों । चाहे इसके लिए पीडित कितना ही समय ले ले । यदि दुर्घटना आपसे हुई है तो आपको अपना लाइसेंस , वाहन से संबंधित सभी कागजात , आदि     सब कुछ जांच कर रहे पुलिस अधिकारी को सौंपनी चाहिए , ताकि पुलिस सभी कागजातों की वैधता की जांच करके बीमा कंपनियों को मुआवजे की राशि देने के लिए सौंप सके ।

२.     अगर आप चोटिल पक्ष की तरफ़ हैं तो एक बात का विशेष ध्यान रखें कि आजकल मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम ,के वाद दायर करने करवाने के लिए अस्पतालों के आसपास दलाल     और कई बार तो खुद पुलिस वाले भी अस्पताल में ही किसी वकील आदि कर लेने की सलाह देते हैं जो कि सर्वथा गलत प्रवृत्ति है । अस्पताल से छुट्टी लेने के बाद आराम से     सोच विचार कर मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम याचिका तैयार करने के लिए अधिवक्ता किया जाना चाहिए ।ईलाज के दौरान के सभी कागजात , दवाईयों के बिल , डॉक्टर के     प्रेसक्रिप्शन आदि को सहेज़ कर रखें । यहां तक कि उस दौरान ईलाज़ के लिए घर से अस्पताल तक आने जाने के किए गए खर्च की पर्ची , विशेष पौष्टिक आहार लेने की पर्ची ,     यदि कोई निजि सहायक रखा गया है तो उसके वेतन आदि के बाबत सब कुछ संभाल के रखा जाना चाहिए ।

३.     पीडित अथवा चोटिल व्यक्ति ( दुर्घटना में मृत्यु हो जाने की स्थिति में मृतक के विधिक उत्तराधिकारी ) को मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम के लिए अपनी आय का ( दुर्घटना में मृत्यु     हो जाने की स्थिति में मृतक की ), और व्यय का ब्यौरा , वेतन , व्यवसाय आदि का प्रमाण , भी जरूर पेश किया जाना चाहिए । अन्यथा अदालत न्यूनतम वेतन राशि को     आधार मानकर ही बीमा कंपनियों को मुआवजा देने का फ़ैसला सुनाती हैं ।

४.     पीडित  अगर वाहन दुर्घटना के समय वाहन का नंबर नोट नहीं कर पाया हो और पुलिस भी किसी तरह से उस वाहन को तलाश न पाई हो तो फ़िर उस स्थिति में स्थानीय     एसडीएम कार्यालय में आवेदन करके दुर्घटना में राज्य सरकार की तरफ़ से मिलने वाले राज्य सरकार के मुआवजे के प्रयास करना चाहिए ।

५.    दुर्घटना के आरोपी को ,सबसे पहले तो वाहन से संबंधित सभी कागजात पुलिस को अदालत को सौंप देने चाहिए ताकि बीमा कंपनी मुआवजे के लिए तैयार हो सके । अगर किसी     भी तरह से कागज़ों में कोई कमी है तो अविलंब ही पीडित पक्ष के साथ समझौते का प्रयास करना चाहिए । कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि दोनों पक्ष समझौता चाहते हुए     भी खुलकर आपस में बात नहीं कर पाते , कई बार अधिवक्ताओं की तरफ़ से मनाही होती है , किंतु जहां पर कागज़ ठीक नहीं है यानि बीमा कंपनी ने अपने ऊपर से जिम्मेदारी     बचा ली है तो उस स्थिति में तो समझौता करना ही श्रेयस्कर होता है , ऐसी स्थिति में अदालतों में स्थापित मध्यस्थता केंद्रों में बैठ कर बातचीत की जानी चाहिए । ऐसा इसलिए     क्योंकि यदि अदालत बाद में मुआवजे की राशि का आदेश भी सुनाती है तो वाहन चालक /मालिक द्वारा उस राशि को देने से बचने के लिए घरबार तक छोड के निकल भागने की     संभावना ज्यादा होती है ।

‍६.    यदि आरोपी को लगता है कि कहीं न कहीं चोटिल व्यक्ति की भी गलती थी ,दुर्घटना के लिए वो भी कहीं न कहीं जिम्मेदार था तो वो अदालत से पीडित की आंशिक असावधानी     को भी ध्यान में रखने का आग्रह कर सकता है । ऐसा अक्सर उन मुकदमों में किया जाता है जहां , चोटिल व्यक्ति के चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान अल्कोहल यानि शराब के     सेवन किए हुए की बात सामने आती है ।


यदि इन बातों को ध्यान में रखा जाए तो कम से कम मोटर वाहन दुर्घटना में पीडितों के दर्द को कुछ हद तक अवश्य ही कम किया जा सकता है ।

शुक्रवार, 6 मई 2011

न्यायपालिका में भाई भतीजावाद :एक गंभीर प्रवृत्ति





यूं तो जब भी न्यायपालिका में छिपे भ्रष्टाचार की बहस छिडती है तो बात घूमफ़िर कर इस मुद्दे पर जरूर आकर अटक जाती है कि न्यायपालिका में भाई भतीजावाद की प्रवृत्ति जम कर चलन में है । न सिर्फ़ न्यायिक नियुक्तियों में ही इस भाई भतीजावाद के चलन ने स्थिति को नारकीय बनाया हुआ है बल्कि एक ही न्यायालय में न्यायाधीशों के रिश्तेदारों , भाई , भतीजों द्वारा वकालत किए जाने के कारण भी इस बात की आशंका हमेशा बनी रहती है कि वे अपने संबंधों का लाभ अपने मुकदमों में जरूर उठाते हैं । 

सबसे हैरानी की बात ये है कि बार बार विभिन्न बार एसोसिएशनों द्वारा इस बात को उठाए जाने के बावजूद भी न तो सरकार द्वारा न ही खुद न्यायपालिका द्वारा इस संबंध में कोई ठोस कदम उठाया जाता है । उलटे ऐसी बातों को अपने प्रभाव से दबाने की कोशिश की जाती है । पिछले वर्षों में कई प्रदेश के न्यायालयों में ये बात सूचना के अधिकार के सहारे सामने लाई गई है जिसके बाद अपेक्षित रूप से खूब विवाद हुआ । किंतु उसे भी येन केन प्रकारेण दबा दिया गया । अब एक बार फ़िर से ये मामला सुर्खियों में है । 

सरकार को भी इस समस्या का पूरा भान है और शायद इसीलिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन करने की तैयारी की जा रही है । इससे जहां न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी वहीं केंद्रीय लोक सेवा आयोग की तरह काडर प्रणाली तथा स्थानांतरण की व्यवस्था से काफ़ी हद तक इस भ्रष्टाचार से निपटा जा सकेगा । सरकार को और खुद न्यायपालिका को भी चाहिए कि लोकतंत्र के एकमात्र बचे हुए थोडे से मजबूत स्तंभ को संबल देने के लिए इस व्यवस्था को जल्द से जल्द अमल में लाने का प्रयास किया जाए ।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

मोटर वाहन दुर्घटना पंचाट की कुछ दुविधाएं








आजकल मेरी नियुक्ति मोटर वाहन दुर्घटना न्यायाधिकरण में ही और पिछले एक वर्ष से इसकी सभी कार्यवाहियों, नए प्रावधानों , पुलिस , बीमा कंपनियों के क्रियाकलाप और उनके रवैये को बहुत ही बारीकी से देख भी रहा हूं और परख भी रहा हूं । एक अधिकारी के रूप में मैंने अब तक कुछ खास बातें समझी परखी हैं जो आम लोगों के सामने आनी चाहिए । राजधानी दिल्ली जैसे महानगरों में बहुत सारी चुस्त व्यवस्थाओं और ट्रैफ़िक नियमों के बावजूद तेज़ी से मोटर दुर्घटनाएं बढती जा रही हैं । विशेषकर दिल्ली में ब्लू लाईन जैसी निजि बस सेवाओं पर पाबंदी , पुराने हो चुके वाहनों के परिचालन पर पाबंदी और मेट्रो सेवा जैसी अत्याधुनिक यातायात व्यवस्था के बावजूद अगर हालात दिनों दिन बदतर होते जा रहे हैं तो नि:संदेह कहीं न कहीं अभी भी सब कुछ दुरूस्त नहीं है । आईसे सबसे पहले देखते हैं कि वो कौन सी चुनौतियां या समस्याएं हैं जो आज एक मोटर वाहन न्यायाधिकरण के सामने आ रही हैं ।



स्कूटी बनी नई मुसीबत :- हल्के दुपहिया वाहन और उनके चालक , मोटर वाहन दुर्घटना की चपेट सबसे ज्यादा आते हैं और आंकडों के अनुसार घायल एवं मृत लोगों में इनकी ही गिनती सबसे ज्यादा होती है । इसमें हैरान कर देने वाली बात ये है कि भारी दुपहिया बाईक से लेकर हल्के स्कूटर तक सब इसका शिकार होते रहे हैं , लेकिन अब एक नई मुसीबत के रूप में आई है स्कूटी । जी हां पिछले कुछ समय में ही बाज़ार में आई और तेजी से युवाओं और विशेषकर युवतियों में लोकप्रिय हुई स्कूटियों ने स्थिति को और भी नारकीय बना दिया है । बैटरी से चालित इन स्कूटियों का न तो कोई पंजीकरण होता है , न ही इसके लिए लाईसेंस की जरूरत होती है और न ही हेलमेट की अनिवार्यता , क्योंकि इन्हें सीमित यातायात के लिए और आसपास आने जाने की उद्देश्य से बनाया गया है । लेकिन जिस तेजी से इनसे होने और करने वाली दुर्घटनाओं के मामले सामने आ रहे हैं उससे साफ़ पता चल रहा है कि न सिर्फ़ युवा युवतियां , बल्कि स्कूली बच्चे तक आसपास की गलियों से लेकर मुख्य सडको तक पर इन्हें तेज़ गति से न सिर्फ़ दौडा रहे हैं बल्कि सामने पड रहे बच्चे , बुजुर्ग और अन्य राहगीरों को तक को अपनी चपेट में ले रहे हैं । मोटर वाहन अधिनियम के किसी भी दायरे में न आने के कारण मुआवजा कंपनियां इन दुर्घटनाओं में मुआवजा नहीं देती हैं मजबूरन आपसी समझौते में पीडित जो कि पहले ही मानसिक और शारीरिक कष्ट झेल रहा होता है उसे आर्थिक नुकसान भी उठाना पडता है ।





सरकारी वाहनों को अनिवार्य बीमे की शर्त से मिली छूट : - ये बहुत ही हैरत की बात है कि एक आम आदमी द्वारा किसी भी वाहन को बिना बीमा कराए सडक पर चलाना अपराध घोषित करने वाली सरकार और प्रशासन ने अपने लिए और अपनी तमाम संस्थाओं निकायों द्वारा चालित तमाम सरकारी वाहनों और यहां तक राज्य सरकार की परिवहन व्यवस्था के अधीन चलने वाली बसों तक को बीमाकरण से छूट दे कर रखा गया है । अब इसके पीछे का तर्क भी सुन लीजीए । सरकार का कहना है कि दुर्घटना से उत्पन्न सभी मुआवजों को वो भुगतान राजकोष से कर देंगे । और इस कारण से वे प्रति वर्ष बीमा न करवाकर लाखों करोडों रुपए बचा लेती हैं । लेकिन सिर्फ़ रिकॉर्ड ही इस बात को आसानी से साबित कर देते है कि असलियत में जब मुआवजा देने की बारी आती है तो वे न सिर्फ़ आनाकानी करते हैं बल्कि मुआवजे की राशि का भुगतान करने में भी सालों लगाते हैं । एक और दिलचस्प बात ये कि चूंकि इनका खुद का बीमा नहीं होता इसलिए जब किसी अन्य वाहन से इनकी गाडी दुर्घटनाग्रस्त होती है तो सारा भार दूसरे पक्ष के ऊपर ही आता है । दिल्ली में पीसीआर की गाडियों से टकराने वाले स्कूटर सवारों तक को मुआवजे की राशि का भुगतान करने के लिए अपना घर बार तक बेचना पड जाता है ।





बीमा कंपनियों का बेहद असंवेदनशील रवैया : - पिछले दिनों अदालती दखल के बाद बीमा कंपनियों के प्रति सख्त रुख अपनाने के कारण जरूर बीमा कंपनियों पर थोडा शिकंजा कसा गया है लेकिन इसके बावजूद भी दुर्घटना मुआवजा देने के प्रति बीमा कंपनियों का रवैया बेहद असंवेदनशील और गैर जिम्मेदाराना रहता है । आज भी अदालत के सख्त निर्देशों के बावजूद ( हाल ही में एक याचिका का निपटारा करते हुए माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने बीस बीमा कंपनियों को ये आदेश दिए थे कि उनके एक प्रतिनिधि नोडल ऑफ़िसर हर न्यायाधिकरण में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहें ) अब भी उनका टालमटोल वाला रवैया ही रहता है । विशेष कर बडी बीमा कंपनियां जैसे , ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी , न्यू इंडिया एश्योरेंस , युनाईटेड इंश्योरेंस , नेशनल इंश्योरेंस आदि का रवैया सबसे ज्यादा खराब रहता है ।





अगले भाग में जानेंगे कि एक आम आदमी , चाहे वो पीडित पक्ष से हो या प्रतिवादी पक्ष से उसे दुर्घटना मुआवजे के वाद में क्या करना चाहिए ???

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