फ़ैसला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फ़ैसला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 31 अगस्त 2013

फ़ैसले के बाद भी माकूल सज़ा के विकल्प ( संदर्भ दिल्ली बलात्कार कांड फ़ैसला)







आखिरकार उस अपराध का पहला फ़ैसला आ ही गया जिसने भारत के इतिहास में पहली बार आम लोगों को इतना झकझोर दिया था कि वे सीधा रायसीना की पहाडियों की छाती रौंद कर देश के कानून निर्माताओं को ललकारने पर उतारू हो गया थे । दिल्ली के कुख्यात बलात्कार कांड में एक मासूम युवती का बेहरहमी से बलात्कार करके उसके शरीर को इतना प्रताडित किया कि लाख कोशिशों के बावजूद उसकी जान तक नहीं बचाई जा सकी । इस कांड में पकडे गए आरोपियों को जब कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालती कार्रवाई के लिए प्रस्तुत किया गया तो जैसा कि किसी भी आरोपी को गिरफ़्तार करते समय पुलिस निर्धारित नियमों का पालन करती है , जिसमें से एक होता है आरोपी की उम्र जिसके अनुसार ही उसपर मुकदमा चलाया जाता है । 

आरोपी की उम्र का निर्धारण या उल्लेख पुलिस को उसे चार्ज़शीट करते हुए इसलिए करना होता है क्योंकि यदि अभी की निर्धारित उम्र , जो कि अठारह वर्ष है , से कम पाए जाने पर वह मुकदमा , जुवेनाइल जस्टिस एक्ट , 1986  के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड यानि किशोर अपराध समिति की अधिकारिता में आता है । यहां ये बताना ठीक होगा कि ऐसा बोर्ड , जिसके प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट एक प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी होते हैं उनके साथ ही बोर्ड में अन्य विविध क्षेत्रों के अन्य सदस्य भी मामले को सुनते हैं । इस कानून के तहत , किसी भी किशोर अपराधी को दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन वर्ष की सज़ा सुनाई जाती है तथा उसे ये सज़ा किसी कारागार में न बिताकर सुधार गृह में बितानी होती है । इसके पीछे विधिक और सामाजिक विद्वजनों का तर्क ये था कि चूंकि कम उम्र में किए गए अपराध के लिए भविष्य में उसे सुधरने और समाज की मुख्य धारा में लाए जाने का अवसर दिया जाना चाहिए , इसलिए यही उसका उचित उपाय है । 

इस बलात्कार कांड में जब एक आरोपी के नाबालिग होने का दावा आरोपी ने किया तो उसकी निर्धारित तय सज़ा , जो कि आज उसे सुनाई गई , यानि अधिकतम तीन वर्ष , के मद्देनज़र इसका तीव्रतम विरोध इसलिए हुआ क्योंकि इसी नाबालिग आरोपी ने पीडिता युवती के साथ सबसे बर्बर व्यवहार , इतना कि ईलाज़ कर रहे डाक्टरों की टीम को खुद कहना पडा कि ऐसा नृशंस व्यवहार उन्होंने पहले नहीं देखा , किया था । इसी समय कुछ संगठनों एवं लोगों ने बरसों पुराने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में निर्धारित उम्र सीमा को घटाने की मांग उठाई क्योंकि खुद पुलिस का मानना था कि अपराध में किशोरों की बढती संलिप्तता के कारण ऐसा किया जाना जरूरी है । 

इसी समय सरकार की तरफ़ से दो कार्य किए गए । पहला था देश भर के पुलिस अधिकारियों की बैठक जिन्होंने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत तय उम्र सीमा को कम किए जाने की सिफ़ारिश की । दूसरा था बलात्कार को लेकर सरकार द्वारा बनाए और बदले जा रहे कानून के संदर्भ और सुझाव के लिए गठित जस्टिस वर्मा समिति जिसे भी इस मुद्दे पर राय देनी थी । लेकिन जस्टिस वर्मा समिति ने पुलिस और लोगों की उठती मांग के विपरीत इसी उम्र को सही ठहराया । फ़लस्वरूप सरकार यौन शोषण के लिए परिवर्तित किए गए कानून में इसे कम नहीं कर सकी । विधिज्ञ बताते हैं कि सरकार चाहती तो जस्टिस वर्मा समिति की सिफ़ारिश के विपरीत जाकर इस उम्र को कम कर सकती थी किंतु इस स्थिति में उसे वैश्विक न्याय प्रचलनों और मानवाधिकार नियमों के खिलाफ़ जाने का खतरा उठाना पडता । 



इसका परिणाम ये हुआ कि दिल्ली बलात्कार कांड के इस सबसे ज्यादा खतरनाक आरोपी जिसने खुद के नाबालिग होने का दावा किया उसे किसी सख्त सज़ा मिलने की संभावनाओं पर पानी फ़िरता दिखा । चूंकि आरोपी ने अपने दावे के पक्ष में विद्यालय का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जिसे उस विद्यालय के प्रधानाचार्य ने सत्यापित किया , और इस स्थिति में पुलिस के मात्र एक मात्र विकल्प बचा था आरोपी के इस दावे को झुठलाने के लिए उसका ossification test ( एक ऐसी चिकित्सकीय वैज्ञानिक जांच जिसे आम तौर पर हड्डी जांच से उम्र तय करने वाली जांच कहा जाता है ) कराया जाए , किंतु कानूनन ऐसा तब हो सकता था जब आरोपी द्वारा अपने नाबालिग होने के लिए प्रस्तुत साक्ष्य अदालत को संदेहास्पद लगे , किंतु बदकिस्मती से इस मुकदमें में ऐसा नहीं हुआ । 



जैसे जैसे मुकदमा आगे बढता गया इसके संभावित फ़ैसले को भांपते हुए इसे रोकने और आरोपी को सख्मुत सज़ा दिलाने के उद्देश्य के लिए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को इस मुकदमे का फ़ैसला सुनाने के लिए अपील की याचिका दायर की गई जिसे स्वाभाविक रूप से उच्च अदालत ने खारिज़ कर दिया । मुकदमा  चला और पुलिस द्वारा चार्ज़शीट कुल बारह धाराओं में से ग्यारह में उसे दोषी ठहराते हुए आज तीन वर्ष की अधिकतम सज़ा सुना दी । 


अब सवाल ये है कि अब जबकि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अपना फ़ैसला वो भी निर्धारित अधिकतम सज़ा सुना ही दी है तो अपील के लिए क्या गुंजाईश बचती है ?? किंतु भारतीय कानून इतना विस्तृत और बहुस्तरीय  है कि विकल्प निकल ही आता है । सर्वोच्च न्यायालय ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को इस मुकदमे का फ़ैसला सुनाने से रोकने की याचिका तो को तो खारिज़ कर दिया किंतु इसके साथ ही इस कानून के तहत  "नाबालिग" की परिभाषा तय करने संबंधी प्रार्थना स्वीकार कर ली जिस पर निर्णय आना अभी बांकी है । कानून के ज्ञाता भलीभांति जानते हैं कि यदि सर्वोच्च न्यायालय ने नाबालिग की परिभाषा को तय करने में विशेषकर मुकदमे के संदर्भ में कोई नया फ़ैसला सुना दिया जैसा कि सर्वोच्च अदालत पहले भी कर चुकी है तो ये न सिर्फ़ इस मुकदमे के इस आरोपी को उसके अंज़ाम ,जो उस बदली हुई परिस्थिति में मौत भी हो सकती है को , तक पहुंचा देगा बल्कि अदालतों को इस मौजूदा कानून के तहत ही इतनी शक्ति दे देगा कि वो मुकदमे के हालात को देखकर फ़ैसला सुना सकेंगी ।


ज्ञात हो कि सर्वोच्च अदालत ने कुछ वर्षों पहले एक मुकदमें  जिसमें दो नाबालिगों ने घर से भागकर आपस में विवाह कर लिया था को न सिर्फ़ पूरी तरह वैध ठहराया बल्कि अपने तर्कों और विश्लेषण से ये भी साबित किया कि चूंकि उनकी शरीरिक और मानसिक क्षमता व परिपक्वता ऐसी है इसलिए ,उन्हें अठारह वर्ष से कम उम्र होने के बावजूद भी नाबालिग नहीं माना जा सकता । इसलिए अभी ये कहना कि न्याय के लिए लडी गई लडाई व्यर्थ हो गई , या इस फ़ैसले से अपराधियों के ,विशेषकर किशोर अपराधियों के , खासकर आतंकियों के हौसले बुलंद हो सकते हैं , थोडी सी जल्दबाज़ी होगी । ध्यान रहे कि अभी इस मामले से जुडे अन्य आरोपियों पर न्यायालय का फ़ैसला आना बांकी है जिसके बाद इस नाबालिग आरोपी ,जिसका अपराध बांकी अन्य आरोपियों से ज्यादा गंभीर माना जा रहा है , की कम सज़ा पर नि:संदेह न्यायविदों की भी पूरी नज़र होगी । एक अच्छी बात ये है कि अभी इस आरोपी को कम से कम ढाई वर्ष तक सुधार गृह में ही रहना होगा और इस बीच न्यायपालिका इस मुद्दे पर किसी ठोस नतीज़े पर पहुंच जाएगी  , ये उम्मीद की जानी चाहिए । 


शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर .....मृत्युदंड बनाम आजीवन कारावास ......प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड फ़ैसले के परिप्रेक्ष्य में .... अजय कुमार झा


अभी हाल ही में दो बडे अदालती फ़ैसलों ने आम लोगों का ध्यान फ़िर से अपनी ओर आकृष्ट किया ...या कहा जाए कि उन्हें इस कदर उद्वेलित किया कि वे खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं ..। जैसा कि स्वाभाविक है कि दोनों में ही अदालती फ़ैसले को अलग अलग मापदंडों , मानवीय भावनाओं , न्यायालीय संवेदनाओं और जाने कैसी कैसी कसौटी पर कसा जा रहा है । अयोध्या विवाद के फ़ैसले के अपने इतर तर्क हैं और इतर प्रभाव भी ....और सबसे बडी बात तो ये है कि अभी सर्वोच्च अपील का अधिकार भी बचा हुआ है दोनों की पक्षों के पास ...और फ़िर चूंकि मामला धर्म और आस्था से जुडा हुआ है इसलिए उस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया भी उसी अनुरूप आ रही हैं । हां जहां तक दूसर बडे फ़ैसले की बात है तो ...यदि सीधे सीधे सपाट तौर पर देखा जाए तो आम जन को जितना अधिक गुस्सा इस बात पर है कि अदालत ने प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड के मुजरिम ..संतोष सिंह की ..फ़ांसी देकर मौत देने की सजा को कम करके ..उम्र कैद में बदल दिया ..उससे अधिक गुस्सा इस बात को लेकर है कि आखिर किन वजहों से अदालत ने इस मुकदमे को .."..दुर्लभतम में से दुर्लभ " की श्रेणी में क्यों नहीं रखा ???आम आदमी आज यही सवाल उठा रहा है कि ...जब कुछ वर्ष पहले ..सभवत: २००४ में ऐसे ही एक लिफ़्ट चलाने वाले ..अपराधी को बलात्कार के बाद हत्या के दोष में फ़ांसी की सजा दी गई थी ..तो इस मुकदमें में क्या संतोष सिंह को सिर्फ़ इस वजह से ..लाभ मिला है क्योंकि वो एक रसूखदार व्यक्ति (अब दिवंगत )का पुत्र है ...आखिर वो कौन से मापदंड हैं जिन्हें अपना कर अदालतें ये तय करती हैं कि अमुक मुकदमा ..दुर्लभतम में से दुर्लभ की श्रेणी में आता ..या नहीं आता है ।

कोई भी विमर्श करने से पहले दो बातें स्पष्ट कर देनी चाहिए .....। इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए ..बहुत से व्यक्तियों ने एक ही बात बार बार उठाई कि ..आजीवन कारावास का मतलब तो ये हुआ कि ..चौदह वर्षों की कारावास ....और उसके बाद ..या ऐसे ही कुछ वर्षों के बाद ..जेल से रिहाई ....तो यहां ये स्पष्ट कर दिया जाए कि ..अभी पिछले ही वर्ष दिए गए अपने एक फ़ैसले में माननीय सर्वोच्च अदालत ने ..एक अपील की सुनवाई करते हुए .पूरी तरह से आजीवन कारावास को परिभाषित किया और बताया कि आजीवन कारावास का मतलब ..आजीवन कारावास ही होता है ....आजीवन यानि जीवन पर्यंत ..यानि कि जब तक मुजरिम जीवित है तब तक ....। दूसरी बात ये कि सर्वोच्च अदालत जब भी मौत की सजा वाली अपील पर सुनवाई करती है तो स्वाभाविक नियमानुसार ..इससे पहले ऐसे मामलों की सुनवाई और उनमें सुनाए गए फ़ैसलों मे स्थापित किए गए आदर्शों और मापदंडों को सामने रख कर जरूर परखती है ...और उसके अनुसार ही ..फ़ांसी की सजा देने के लिए .."दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " माने गए मुकदमे को साबित करना होता है । हालांकि इसके लिए भारतीय कानून में कहीं कोई निश्चित नियम या उपबंध नहीं है और अदालत इसे स्वयं बहुत से आधारों पर परखती है ।एक अघोषित नियम ये होता है कि जब अदालत को ये महसूस कि मुजरिम को फ़ांसी या मौत से कम कोई भी सजा सुनाने से नाइंसाफ़ी की झलक दिखाई दे तो और सिर्फ़ तभी मौत की सजा सुनाई जानी चाहिए । आईये देखते हैं कि इस बिंदु पर अदालतें क्या कैसे सोचती हैं ..

अभी हाल ही १६.०९. २०१० को सुंदर सिंह बनाम उत्तरांचल सरकार मुकदमें में ऐसे ही एक फ़ांसी की अपील पर सुनवाई करते हुए न सिर्फ़ अदालत ने बहुत सी बातों पर रोशनी डाली बल्कि इसी के साथ ही मुजरिम की फ़ांसी की सजा को भी बरकरार रखा । अभियोजन पक्ष के अनुसार इस मुकदमे में , सुंदर सिंह नामक व्यक्ति ने पांच लोगों को एक घर में पेट्रोल छिडक कर आग लगा दी और बाहर से घर का दरवाजा बंद करके उन्हें जिंदा भून डाला इतना ही नहीं जब उनमें से एक व्यक्ति ने बाहर निकलने की कोशिश की तो उसने उसे दरवाजे के बाहर आते ही अपनी कुल्हाडी से काट कर मार डाला । अदालत ने इस मुकदमे के फ़ैसले पर पहुंचने से पहले इन बातों को सामने रखा । अदालत ने इसे क्रूरतम हत्या मानते हुए इसे" दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " मानते हुए सुंदर सिंह की फ़ांसी की सजा को बहाल रखा ।अदालत ने "दुर्लभतम में से भी दुर्लभ "मुकदमों का उदाहरण देते हुए कहा कि , सर्वप्रथम ये मौत की सजा के लिए किसी मापदंड तय करने की बात ..मच्छी सिंह बनाम पंजाब सरकार , वाले मुकदमें में हुई थी । इस मुकदमे का फ़ैसला करते हुए अदालत ने कुछ बिंदु तय किए थे , जिन्हें अधिकतम सजा (मौत ) दिए जाने से पहले न्यायाधीश को परखना चाहिए । जब हत्या निहायत ही क्रूरतम तरीके से , छिप कर , बदला लेने के लिए ,और सिर्फ़ इस वजह से की गई हो कि समाज में उससे घृणा और द्वेष फ़ैल जाए तो वो अपराधी मौत की सजा का हकदार है । जब कोई हत्या नृशंस तरीके से , नीच और शैतानी उद्देश्य के लिए की गई हो । जब किसी निम्न जाति के किसी व्यक्ति की हत्या आपसी रंजिश के लिए न करके सिर्फ़ इस उद्देश्य से की गई हो कि उससे समाज में अशांति और द्वेष फ़ैल जाए तो ,जब अपराध बहुत ही वृहत हो बहुत ही भयानक हो ।अदालत ने कुछ इसी तरह के मापदंड , सुशील मुर्मू बनाम झारखंड राज्य , मामले में भी तय किए थे ।

इस उपरोक्त मुकदमे का फ़ैसला करते समय अदालत ने , धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल सरकार, [1994 (2) SCC 220] और राजीव उर्फ़ रामचंद्र बनाम राजस्थान सरकार [1996 (2) SCC 175] का उदाहरण लेते हुए कहा कि , ये दोनों ही मामले दुर्लभतम में से भी दुर्लभ की श्रेणी में आते हैं । पहले में उस युवक ने , पहले तो १४ वर्ष की बच्ची को मार कर घायल कर दिया और फ़िर जब वो दम तोड रही थी तो उसके साथ बलात्कार किया ।दूसरे में मुजरिम ने , अपने तीन मासूम बच्चों और अपनी पत्नी जो कि कुछ ही समय के बाद मां बनने वाली थी की क्रूर हत्या कर दी थी । एक दिलचस्प मुकदमे का उदाहरण उत्तर प्रदेश सरकार बनाम धर्मेंद्र सिंह . [1999 (8) SCC 325], , जिसमें फ़ैसला दिया गया था कि , मुजरिम को फ़ांसी की सजा मिलने में हुई तीन वर्ष की देरी के कारण उसकी मौत की सजा को कम नहीं किया जा सकता और भविष्य में भी ये सजा कम करने के लिए कोई आधार नहीं हो सकता है , त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात सरकार ,[1988 (4) SCC 574], ।

अब पहले बात ये कि आम लोग जैसा कि समझ समझा रहे हैं कि आखिर धनंजय चटर्जी और इस मुकदमें में आखिर वो कौन सा फ़र्क था जो कि अदालत ने संतोष सिंह की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया । अदालत ने अपराध की क्रूरता पर कहीं भी ऊंगली नहीं उठाई है न ही इस बात की तुलना की गई है कहीं भी कि , धनजंय चटर्जी वाले मुकदमे की तुलना में प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड कम क्रूर था जबकि हकीकत यही है कि वो अधिक क्रूर थी । हां अदालत ने संतोष सिंह की ,सजा को कम करने के पीछे जो तर्क रखे वे कुछ इस तरह से हैं । जब निचली अदालत ने उसे बरी किया था तब वो पच्चीस वर्ष का युबक था , और उसके रिहा होने के बाद , उसने विवाह किया और आज वो एक होने वाले बच्चे का पिता बनने जा रहा है , तब से लेकर अब तक स्थितियां बहुत भिन्न हो चुकी हैं । अदालत ने उदाहरण स्वरूप राजीव गांधी हत्याकांड की मुख्य अभियुक्त और फ़ांसी की सजा मिल चुकी नलिनी की सजा को उम्र कैद में बदले जाने को भी उदाहरण में लेते हुए बताया कि , उस मुकदमे में , भी ये साबित हुआ है कि शिवरासन और ग्रुप ने एक औरत का फ़ायदा उठाते हुए पति द्वारा पत्नी पर बनाए गए दबाव को आधार बना कर नलिनी को इसके लिए फ़ंसा दिया था और अब जबकि उसकी कोख में एक नन्हीं सी जान पल रही है तो ऐसे में उसे मौत की सजा दे देना कहीं से भी ठीक नहीं होगा ।

उपरोक्त बहस का तात्पर्य यदि ये निकाला जाए कि , किसी भी मुकदमे को " दुर्लभतम में भी दुर्लभ " की श्रेणी में देखना और दिखाना ..हर मुकदमे के साथ और अदालत को उसे देखने पर ही निर्भर करता है ,...तो गलत नहीं होगा । किंतु ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अदालतें अपने हर मुकदमे को कानून की कसौटी पर ही घिस कर उसके धार को परखती है । अभी भविष्य में ऐसे बहुत से मौके आएंगे जहां न सिर्फ़ अदालतों को फ़ैसले पर पहुंचने के बहुत ही मशक्क्त करनी होगी बल्कि उससे अधिक इस बात का ख्याल भी रखना होगा कि उसके फ़ैसले , उसके तर्क और सबसे बढ कर उसके नज़रिए से ...आम जनता भी इत्तेफ़ाक रखे । हालांकि ..बलात्कार जैसे घृणित अपराध के लिए तो ,...मौत से भी बदतर यदि कोई सजा हो तो वो ही मुकर्रर्र की जानी चाहिए ।