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शनिवार, 15 मई 2010

टांय टांय फ़िस्स हुई अदालती कर्मचारियों को वर्दी पहनाने की योजना


अपने एक आलेख में आपको बताया था कि न्यायपालिका ने दिल्ली की अधीनस्थ न्यायालय में भ्रष्टाचार को हटाने और बदलाव के मद्देनज़र बहुत से परिवर्तनों के साथ साथ सभी कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड की व्यवस्था का विचार रखा था । पहले इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रयोग के तौर पर लागू किया गया । आनन फ़ानन में न सिर्फ़ सभी कर्मचारियों की वर्दी का नाप लिया गया बल्कि उनकी नाम पट्टिका, आदि भी तैयार करा दी गई । आज सभी कर्मचारी वर्दी में दिखते हैं । इसे सख्ती से लागू करने के लिए ये आदेश भी जारी किया गया कि जो भी वर्दी पहन के नहीं आएगा उसकी उस दिन की तन्ख्वाह , उसके वेतन में से काट ली जाएगी । इसके बाद इस प्रयोग को दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों में भी लागू करने का निर्णय लिया गया ।

अधीनस्थ न्यायालय में जब इसकी शुरूआत हुई तो सामने शीतकालीन सत्र शुरू होने वाले थे । इसलिए सबसे पहले फ़ैसला ये लिया गया कि शीतकालीन वर्दी के रूप में पुरूष कर्मचारियों के कोट और पैंट का नाप ले लिया गया और चूंकि महिला कर्मियों को साडी /सूट के ऊपर ही उसे पहनना था लिहाज़ा उनके कोट का नाप लिया गया । ये टुकडों टुकडों में सभी अधीनस्थ अदालतों में हुआ । इसका परिणाम ये हुआ कि बहुत से कर्मचारियों की वर्दी तैयार हो कर आ गई तो बहुतों का नाप भी नहीं लिया जा सका । इसके बाद कुछ दिनों बाद ही ग्रीष्मकालीन वर्दी का नाप भी लिया गया । ये पुरूष और महिला कर्मियों दोनों का ही लिया गया । गफ़लत का आलम ये था कि सर्दियों की वर्दी का नाप पहले लिए जाने के बावजूद ग्रीष्म कालीन वर्दियां पहले तैयार होकर आ गईं ।

और यहीं से सारी गडबड शुरू हुई । उस वर्दी के मिलते ही कपडे की क्वालिटि और उसकी बेढंगी सिलाई का मामला इतना उछला कि वो अखबारों की सुर्खियां बन गयी । जब अधिकारियों को ये पता चला तो उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए आदेश जारी किया कि सप्ताह के अलग अलग दिन अदालत में ही दर्ज़ी बैठेंगे जो कर्मचारियों की वर्दी की नाप संबंधी कमियां दूर करेंगे । बहुत से कर्मचारियों ने वर्दी के कपडे से एलर्जी और त्वचा संबंधी शिकायत करते हुए उसे वापस ही कर दिया । उधर महिला कर्मियों की ग्रीष्म कालीन वर्दी का नाप लेकर जाने के बाद से उस दिशा में कभी कोई सुगबुगाहट भी सुनाई नहीं दी । ऐसा सुना गया कि पुरूष कर्मचारियों की वर्दी सिलने वाली कंपंनी के अनुभवों को देखते हुए उसने भागना ही मुनासिब समझा ।


इसके कुछ माह बाद अचानक ही आदेश आया कि जिन भी कर्मचारियों को वर्दी दी गई है , इस आदेश के तहत उनके लिए ये वर्दी पहनना अनिवार्य किया जाता है । इस आदेश का असर भी दिखा और अगले ही कुछ दिनों में अधिकांश पुरूष कर्मचारी वर्दी में दिखने लगे । मगर एक बार फ़िर इस कदम को बडा झटका लगा जब पता चला कि दिल्ली की राज्य सरकार ने न्यायालय के कर्मचारियों की वर्दी के लिए निर्धारित धुलाई एवं वर्दी रखरखाव भत्ता देने में असमर्थता जता दी है । इस निर्णय के बाद सभी अदालती कर्मचारियों ने अपनी अपनी वर्दी को तिलांजलि दे दी है । अभी तो इसे पूरी तरह अमल में लाना ही कठिन साबित हुआ , इसके परिणामों का आकलन तो दूर की बात थी । इस योजना ने न सिर्फ़ सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं बल्कि ये भी जता दिया है कि अदालती सुधारों के प्रति वो कितनी संवेदनशील है ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. सर इसे भ्रष्टाचार के तोड के रूप में नहीं बस ये था कि उनकी स्पष्ट पहचान से शायद उनका भ्रष्टाचार में लिप्त होना थोडा तो कठिन होगा ही , ये सोच कर शुरू किया गया था ।

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  2. ये तो वैसे भी ज्यादा जरूरी योजना नहीं थी ,लेकिन यहाँ तो पूरी की पूरी सरकार ही टाय-टाय -फुस्स है / आपके इस तथ्यों पे आधारित पोस्ट के लिए आपका धन्यवाद /

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  3. jha ji main aapki post se milti hui khabar ko chaap chuka hu.

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  4. भारत की पुलिस भी तो वर्दी ही पहनती है जनाब, लेकिन अब सिलाई मै हेरा फ़ेरी कपडे की उच्चता मै भी हेरा फ़ेरी.... वाह री हेरा फ़ेरी किस किस रुप मे है तू

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  5. इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि दिल्ली सरकार के रवैये के कारण एक अच्छी शुरूआत की दुर्गति हो गयी। माननीय द्विवेदी जी का यह कहना कि "वर्दी भ्रष्टाचार का तोड नहीं है।" तकनीकी रूप से सही है, लेकिन लोकतन्त्र में जब हर समस्या के समधान के केवल दिखावटी उपाय ही ढूंढे जा रहे हैं, तो यह उपाय भी कोई बुरा या निरर्थक तो नहीं ही कहा जाना चाहिये। माननीय श्री महफूज अली की टिप्पणी "वैरी गुड" समझ से परे है। आप किस बात को वैरी गुड कह रहे हैं।

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  6. इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि दिल्ली सरकार के रवैये के कारण एक अच्छी शुरूआत की दुर्गति हो गयी। माननीय द्विवेदी जी का यह कहना कि "वर्दी भ्रष्टाचार का तोड नहीं है।" तकनीकी रूप से सही है, लेकिन लोकतन्त्र में जब हर समस्या के समधान के केवल दिखावटी उपाय ही ढूंढे जा रहे हैं, तो यह उपाय भी कोई बुरा या निरर्थक तो नहीं ही कहा जाना चाहिये। माननीय श्री महफूज अली की टिप्पणी "वैरी गुड" समझ से परे है। आप किस बात को वैरी गुड कह रहे हैं।

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  7. यह बतलाता है की कितना अनुशासन है हमारे न्याय के मंदिरों में . हर बात के लिए सरकार से गुहार ?

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