यूं तो जब भी न्यायपालिका में छिपे भ्रष्टाचार की बहस छिडती है तो बात घूमफ़िर कर इस मुद्दे पर जरूर आकर अटक जाती है कि न्यायपालिका में भाई भतीजावाद की प्रवृत्ति जम कर चलन में है । न सिर्फ़ न्यायिक नियुक्तियों में ही इस भाई भतीजावाद के चलन ने स्थिति को नारकीय बनाया हुआ है बल्कि एक ही न्यायालय में न्यायाधीशों के रिश्तेदारों , भाई , भतीजों द्वारा वकालत किए जाने के कारण भी इस बात की आशंका हमेशा बनी रहती है कि वे अपने संबंधों का लाभ अपने मुकदमों में जरूर उठाते हैं ।
सबसे हैरानी की बात ये है कि बार बार विभिन्न बार एसोसिएशनों द्वारा इस बात को उठाए जाने के बावजूद भी न तो सरकार द्वारा न ही खुद न्यायपालिका द्वारा इस संबंध में कोई ठोस कदम उठाया जाता है । उलटे ऐसी बातों को अपने प्रभाव से दबाने की कोशिश की जाती है । पिछले वर्षों में कई प्रदेश के न्यायालयों में ये बात सूचना के अधिकार के सहारे सामने लाई गई है जिसके बाद अपेक्षित रूप से खूब विवाद हुआ । किंतु उसे भी येन केन प्रकारेण दबा दिया गया । अब एक बार फ़िर से ये मामला सुर्खियों में है ।
सरकार को भी इस समस्या का पूरा भान है और शायद इसीलिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन करने की तैयारी की जा रही है । इससे जहां न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी वहीं केंद्रीय लोक सेवा आयोग की तरह काडर प्रणाली तथा स्थानांतरण की व्यवस्था से काफ़ी हद तक इस भ्रष्टाचार से निपटा जा सकेगा । सरकार को और खुद न्यायपालिका को भी चाहिए कि लोकतंत्र के एकमात्र बचे हुए थोडे से मजबूत स्तंभ को संबल देने के लिए इस व्यवस्था को जल्द से जल्द अमल में लाने का प्रयास किया जाए ।
