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बुधवार, 18 मई 2011

मध्यस्थता .........यानि चुटकियों में मुकदमों का निपटारा



मध्यस्थता : एक बेहतर उपाय 





इन दिनों भारतीय न्यायप्रणाली बहुत से नए प्रयोगों और प्रकियाओ के दौर से गुजर रही है । न्यायालयों पर बढते बोझ के कारण खुद अदालतें इनसे निपटने के लिए पश्चिमी देशों और अन्य विकसित देशों द्वारा प्रचलन में लाई जा रही न्यायिक प्रणालियों को प्रयोग के तौर पर अपना रही है और सुख्द बत ये है कि इनका परिणाम भी अब दिखने लगा है । लोक अदालते , मध्यस्थता केंद्र तथा प्ली बार्गेंनिंग जैसी नई व्यवस्थाएं इसी का उदाहरण हैं । आज जानते हैं कि मध्यस्थता केंद्र क्या होता है , ये कैसे कार्य करता है , और आम लोगों के लिए ये कैसे फ़ायदेमंद साबित हो सकता है , या कहें कि हो रहा है ।


मध्यस्थता क्या है ?

मध्यस्था विवादों को निपटाने की सरल एवम निष्पक्ष आधुनिक प्रक्रिया है । इसके द्वारा मध्यस्थ अधिकारी दवाबरहित वातावरण में विभिन्न पक्षों के विवादों का निपटारा करते है । सभी पक्ष अपनी इच्छा से सद्भावपूर्ण वातावरण में विवाद का समाधान निकालते हैं तथा उसे स्वेच्छा से अपनाते है । मध्यस्थता के द्वारा विभिन्न पक्ष अपने विवाद को सभी दृष्टिकोण से मापते हैं और वह समझौता जो सभी पक्षों को मान्य होता है , उसे अपनाते हैं । इस पद्धति के द्वारा विवादों का जल्द से जल्द निपटारा होता है जो खर्चरहित है । यह मुकदमों के झंझटों से मुक्त है । साथ ही साथ न्यायलयों पर बढते मुकदमों का बोझ भी कम होता है ।

मध्यस्थता में क्या होता है ?


मध्यस्थ अधिकारी निष्पक्ष मध्यस्थता के लिए पूर्णत: प्रशिक्षित होता है ।

सभी पक्षों को उनके विवादों का हल निकालने में मदम करता है । मध्यस्थता ढांचागर प्रक्रिया है इसकी कार्यप्रणाली निम्न चरणों में काम करती है ।

१. परिचय : मध्यस्थ अधिकारी , मध्यस्थता की प्रक्रिया से सभी पक्षों को अवगत करवाता है । उन्हें प्रकिया के नियमों एवं गोपनीयता के बारे में भी बताया जाता है ।

२. संयुक्त सत्र :- मध्यस्थ अधिकारी , पक्षों से उनके विवाद के प्रति जानकारी प्राप्त करता है तथा विवाद के निपटारे के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है ।

३. पृथक सत्र :- संयुक्त के अलावा यदि जरूरत हो तो मध्यस्थ अधिकारी हर पक्ष से अलग अलग बात करते हैं । इस सत्र मे सभी पक्ष अपने हर मुद्दे को मध्यस्थ अधिकारी के समक्ष रख सकते हैं जिसे गोपनीय रखा जाता है । इस सत्र में मध्यस्थ विवाद की जड तक पहुंचता है ।

४. समझौता : - विवाद के निवारण के उपरांत मध्यस्थ अधिकारी सभी पक्षों से समझौते की पुष्टि करवाता है । इस समझौते को लिखित रूप में अंकित किया जाता है । जिस पर सभी पक्ष हस्ताक्षर करते हैं ।

अब देखते हैं कि एक मध्यस्थ अधिकारी की भूमिका क्या होती है और उसके कार्य क्या होते हैं :-


मध्यस्थता अधिकारी विवादित पक्षों के बीच समझौते की आधारभूमि तैयार करता है ।

पक्षों के बीच आपसी बातचीत और विचारों का माध्यम बनता है ।

समझौते के दौरान आने वाली बाधाओं का पता लगाता है ।

बातचीत से उत्पन्न विभिन्न समीकरणों को पक्षों के समक्ष रखता है ।

सभी पक्षों के हितों की पहचान करवाता है ।

समझौते की शर्तें स्पष्ट करवाता है तथा ऐसी व्यवस्था करता है कि सभी पक्ष स्वेच्छा से समझौते को अपना सकें ।
अब जानते हैं कि मध्यस्थता प्रक्रिया के क्या लाभ होते हैं


विवाद का अविलम्ब व शीघ्र समापन

समय तथा खर्चे की किफ़ायत

न्यायालयों में चक्कर लगाने से राहत

अत्यधिक सरल व सुविधाजनक

विवाद का हमेशा के लिए प्रभावी एवं सर्वमान्य समाधान

समाधान में पक्षों की सहमति को महत्व

अनौपचारिक , निजी तथा पूर्णत: गोपनीय प्रक्रिया

सामाजिक सदभाव कायम करने में सहायक

मध्यस्थता में विवाद निपटाने पर , वादी ( Court Fees Act -1870 )कोर्ट फ़ीस एक्ट -1870 की धारा 16  तहत पूरा न्यायालय शुल्क वापिस लेने का हकदार होता है ।



अब कुछ और जरूरी बातें । इन मध्यस्थता केंद्रों में सभी फ़ौजदारी विवादों और आपराधिक विवादों का निपटारा नहीं किया जाता है । इनमें मुख्य रूप से पारिवारिक वाद , मोटर वाहन दुर्घटना वाद , और चेक बाऊंसिंग तह्त अन्य आर्थिक वादों को निपटाया जाता है । उम्मीद है कि ये नया प्रयोग भविष्य में क्रांतिकारी कदम साबित होगा । 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल मुकदमेबाजी फैसले पाने के लिए कम उलझाने के लिए ज़्यादा होती है.ऐसे में मुक़दमे से जल्द निपटारा आसान नहीं होता.इसके समाधान हेतु मध्यस्थता का रास्ता बेहद उपयोगी है.इससे सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी देने की फीस यही है कि एकठो बढ़िया-सी टीप (टिप नहीं)चिपका दी जाए !

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