शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

अजब गजब किस्से कचहरी के








यूं तो कचहरी  में रोज़ ही एक नहीं बल्कि अनेक , किस्से कहानियां और दास्तानें ऐसी देखने सुनने को मिल जाती हैं कि उन्हें दर्ज करने लगूं तो पोस्ट निरंतर ही लिखने की जरूरत पड़ेगी और सोचता हूँ कि ऐसा हो भी जाए तो पिछले दिनों लगभग छूट चुकी ब्लौंगिंग  में भी एक नियमितता आ जायेगी | खैर आज कानूनी मसलों , समस्याओं और गंभीर समाचारों से इतर कुछ मनोरंजक और दिलचस्प दो घटनाओं का ज़िक्र करने का मन है |

मेरी नियुक्ति इन दिनों , दिल्ली जिला न्यायालय के पूर्वी , उत्तर पूर्वी और शाहदरा जिला अदालतों के संयुक्त परिसर कडकड़डूमा न्यायालय के  अभिलेखागार (दीवानी ) में बतौर अभिलेखपाल है | यहाँ तीनों जिलों की अदालतों  द्वारा वर्ष २००३ से लेकर अब तक निष्पादित निस्तारित निर्णीत लगभग सत्तर हज़ार से अधिक वाद अभिलेख का देख रेख, परिचालन आदि का कार्य हम लोग करते हैं | इसी दौरान एक बेहद दिलचस्प बात सामने आयी |

अदालतों से निर्णित वाद जब अभिलेखागार में संरक्षित होने के लिए आते हैं तो उन्हें उनके सभी ब्यौरे समेत पंजिका यानि रजिस्टर में दर्ज करने के बाद हम उसे एक विशिष्ट अभिलेख संख्या देते हैं जिन्हें उर्दू में "गोशवारा संख्या " कहा जाता है | ये गोशवारा संख्या समझिये कि अभिलेखागार में संरक्षित हर वाद का पता है जिसके अनुसार ही सत्तर हज़ार अभिलेखों या उससे भी अधिक निर्णीत वादों में से उसे आसानी से महज़ चंद सेकेंडों में निकाला जा सकता है |

पिछले दिनों एक अधिवक्ता महोदय ऐसी ही एक निर्णीत वाद अभिलेख के निरीक्षण के लिए पधारे | उन्होंने जो गोशवारा संख्या बताई हमने जब उसके अनुसार फाईल को तलाशा तो हमें वह वहां नहीं मिली | हम परेशान हैरान कि आखिर ऐसा कैसे हुआ | हम अपने रजिस्टरों को खंगाल ही रहे थे कि इतने में अभिलेखागार में हमारे साथ नियुक्त सबसे पुराने सहकर्मी साथी  आ पहुंचे | हमने उन्हें सारा माज़रा समझाया | सारा किस्सा सुनते ही उनके होठों पर एक मुस्कान तैर गयी | उन्होंने जो बताया आप भी सुनिए .........................

उस वर्ष अभिलेखागार में दो बाबुओं नरेंद्र और मोहन की नियुक्ति थी | जाने जानकारी के अभाव में , या किसी और वजह से दोनों बाबुओं ने उस वर्ष एक ही जैसे गोशवारा नंबर बहुत सारी फाईलों को दे दिए | जब तक गलती समझ में आती बहुत देर हो चुकी थी सो उसका तोड़ निकाला गया ये कर के , जो गोशवारा नंबर नरेन्द्र बाबू ने दिए थे उन सबके साथ लग गया "N  " और जो गोशवारा नंबर मोहन बाबू ने दिए थे उन पर लगा "M "  तो आज तक भी वही एम् और एन चला आ रहा है और अब भी हम कभी कभी एन और एम् के चक्कर में फंस जाते हैं और फिर हर बार उसी किस्से को याद करके मुस्कुरा उठते हैं |

दूसरा किस्सा ये रहा कि एक दिन एक अधिवक्ता एक फाईल का निरीक्षण करने पहुंचे | निरीक्षण के दौरान उस वाद में वादी/प्रतिवादी द्वारा संलग्न एक फोटो पर आ कर रुक गए | असल में दीवानी वाद जिनमें संपत्ति के आधिपत्य को लेकर प्रमाणस्वरूप उस दिन का अखबार हाथ में लेकर फोटो खिंचवा कर उसे वाद के साथ संलग्न कर देते हैं | तो उसी फोटो पर आकर वकील साहब रुक गए और फिर शुरू हुई कोशिशें उस अखबार पर दर्ज तारीख को पढने की | वाद फाईल को पढने पर भी छोटा सुराग तो मिल रहा था किन्तु ये पुख्ता तौर पर नहीं पता चल पा रहा था कि वो किस तारीख का अखबार था | वकील साहब समेत हम सब , पहले अपने चश्मों से , फिर मोबाईल से फोटो खींच कर उसे ज़ूम करके , मोबाइल में लैंस एप्प से , स्टेशनरी की दुकान  से लेंस मंगवा के कुल मिला कर दर्ज़न भर कोशिशों के बाद सबने हथियार डाल दिए | बाद में तय हुआ कि वकील साहब उस फाईल में दर्ज आस पास की तिथियों के अखबार को सीधे अखबार के दफ्तर में जाकर पता करने की कोशिश करेंगे |

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

हां ! अब बदलने का समय आ गया है ..............







इन दिनों एक अजीब ही माहौल बना हुआ देश का , कहा जाए कि पूरा देश ही परिवर्तम मोड में है , मुझे लगता है कि यही वो समय है जब समाज के हर तबके , हर वर्ग , हर क्षेत्र से उन चुनिंदा लोगों को अब साहस के साथ सामने आना चाहिए जिनके मन और उद्देश्य में कहीं न कहीं कुछ बहुत ही प्रयोगधर्मी पनप रहा है । हम सब इस समाज की एक कडी हैं इसलिए ये बहुत जरूरी हो गया है कि हम अपना कल कैसा देखना चाहते हैं उसके लिए हमने आज से क्या और कितने प्रयास किए , विशेषकर गलतियों से सीखते हुए निरंतर उसमें सुधार की कोशिश । यहां मैं कभी कभी सोचता हूं कि पिछले सत्रह वर्षों में मैंने अदालतों की रफ़्तार को तो बढते देखा है मगर जाने क्यों मुकदमों के दबाव को पछाड नहीं पाता । 
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एक अदालत कर्मी के रूप में , कानून के एक विद्यार्थी के रूप में और निरंतर बदलती हुई न्यायिक व्यवस्थाओं के प्रत्यक्ष साक्षी होने के नाते हम और हमारे सहकर्मियों का अब ये एक दायित्व बन जाता है कि अब इस संस्थान को हम अपने अनुभव के आधार पर वो चुस्त व्यवस्था और प्रक्रियाएं सौंप के जाएं कि कल होकर आज से बीस या तीस साल बाद जब हम कार्यरत न हों तो लगे कि काश ये व्यवस्था उस समय ठीक होन शुरू की गई होती तो यकीनन ही आज हालात कुछ और होते । 

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न्यायालयों पर मुकदमों के बढते दबाव को हम अदालतकर्मी ही न सिर्फ़ बखूबी अपने कंधों पर महसूस करते हैं बल्कि अत्याधुनिक तकनीकों के साथ गजब का सामंजस्य बनाते हुए जरा भी बैकफ़ुट पर नहीं जाते । हैरानी इस बात को लेकर होती है कि जब हम अपने दफ़्तर के दबाव और कार्यबोझ को एकदम संवेदनशीलता के साथ उठा पा रहे हैं तो फ़िर आखिर हमारी ये कर्मठता उस समय क्यों और कहां चली जाती है जब बात खुद हम पर आती है । कहीं कोई संगठनात्मक ईकाई नहीं ,कोई प्रतिनिधित्व नहीं , कल्याणकारी योजनाएं तो दूर , सहकर्मी गण आपसे में भी शायद ही कभी एकत्र होकर आज तक बुनियादे समस्याओं से लेकर सुधारों की संभावनाओं पर विमर्श कर पाए हों । 
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काम बहुत विस्तृत और समयबद्ध होकर किए जाने की अपेक्षा रखता है । हम और हमारे जैसे अन्य सभी सहकर्मी अपने अनुभवों को साझा करते हुए विभिन्न स्तरों पर इन सभी अलग अलग तरह की समस्याओं , प्रक्रियात्मक कठिनाइयों , प्रशासनिक कार्यवाहियों , कल्याणकारी योजनाओं और प्रतिस्पर्धी वातावरण को तैयार किए जाने जैसे अनेक क्षेत्रों के लिए कार्य कर सकते हैं । 
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मैं अपने पिछले कार्यालयीय अनुभव के आधार पर न्याय प्रशासन की प्रक्रियात्मक कार्यवाहियों को जितनी बारीकी से परख रहा हूं उतनी ही बारेकी से उन्हें समुचित रूप से दक्ष किए जा सकने के प्रयासों और प्रयोगों पर भी कार्य कर रहा हूं । छोटे छोटे कई भागों में बंटी हुई ये रिपोर्ट एक मेगा प्रोजेक्ट रिपोर्ट के रूप में सर्वोच्च स्तर तक विमर्श और आकलन हेतु प्रस्तुत की जा सके यही मेरा प्रयास होगा । 
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आगामी पोस्टों में मैं विस्तार से अपनी योजनाओं का खुलासा करूंगा .....और चाहूंगा कि न सिर्फ़ आम पाठक बल्कि सहकर्मी मित्र भी पढ कर न सिर्फ़ मार्गदर्शन करें बल्कि सुझाव व विचार भी दें ...साथ और स्नेह का आकांक्षी ............

सोमवार, 24 नवंबर 2014

मुकदमेबाज़ी बनाम मध्यस्थता(व्यावसायिक वाद संदर्भ) : एक टिप्पणी



मध्यस्थता को स्वीकारने की युक्तियुक्तता 




मध्यस्थता, व्यावसायिक विवादों के निपटान की तीव्र गति से विकसित होती विवाद निस्तारण तकनीक है क्योंकि यह विवाद निपटान प्रक्रिया को गति देता है । यह विवादित पक्षों को विवाद निपटाने के लिए अपने व्यावसायिक सलाहकारों की सहायता लेने को सशक्त सलाहकारों की सहायता लेने को सशक्त करता है ताकि वे स्वेच्छा से परस्पर स्वीकृत निदान या समझौते पर स्वयं पहुंच सकें । 

मध्यस्थता हेतु ल्कोई विवाद उपयुक्त है अथवा नहीं , इस निर्णय पर पहुंचने के लिए निम्नलिखित तत्वों की सहायता ली जा सकती है । अधिकांश मामलों में प्राथमिक कारण यह है कि विवादित पक्ष , त्वरित समाधान द्वारा आपसी हितों को साझा करते हुए एक दूसरे से वाणिज्यिक संबंध कायम रखना चाहते हैं । मुकदमेबाज़ी के व्ययसाध्य , लंबा खिंचने वाला था अनिश्चिति होने के कारण दोनों पक्ष मध्यस्थता को प्राथमिकता/वरीयता देते हैं । और न ही दोनों पक्ष ऐसे किसी विवाद से उत्पन्न मुकदमेबाज़ी से जुडी प्रख्याति में पडना चाहते हैं ।


मध्यस्थता एक मंच प्रदान करता है , पक्षों को प्रोत्साहित कर स्वयं निर्णयन का , उनकी आवश्यकताओं व हितों की पहचान करने का , सभी पक्षों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के  विकल्प उत्पन्न करता है , हितों की पूर्ति को विस्तृत करके , अपने स्वयं के नतीज़ों का निर्माण करने का । मध्यस्थता दोनों पक्षों के संबंधों /रिश्तों को लक्ष्य बनाता है । दोनों पक्षों को , मान्यता व सशक्तता की एक प्रक्रिया द्वारा ,साथ ही उस रूप में , जिसमें ,  वे एक दूसरे से संबंधित हों , स्वीकृति व सहमति की सुविधा प्रदान करता है । दूसरे शब्दों में दोनों पक्षों के बीच संवाद का विकास करना ही उद्देश्य है । 

जो भी हो , मध्यस्थता का चुनाव पक्षों की सोच को बदलने में सहायता करता है । यह दोनों पक्षों के लिए एक दूसरे के साथ आकर विवाद के विषय में एक दूसरे का मत जानने व संभाव्य रूप से उन्हें परस्पर स्वीकार्य निर्णय बिंदु तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करता है ॥

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बदलती न्यायिक व्यवस्थाएं - एक विमर्श



देश की प्रशासनिक संरचना को तय करते समय जिस बात का ध्यान सबसे अधिक रखा गया था वह बात थी शासन व्यवस्था के तीनों अंगों के बीच कार्य व शक्ति का पृथ्क्करण व सबसे ज्यादा इनके बीच समान संतुलन । चाहे अनचाहे, गाहे-बेगाहे ये तीनों ही राज्य के प्रशासनिक ढांगे को स्थाई व दुरूस्त रखने के लिए आमने-सामने आते ही रहते हैं । पिछले कुछ वर्षों में विधायिका द्वारा लिए गए अहितकर निर्णय या कानूनों के निर्माण में व्याप्त खामियां , राजनीति, व राजनीतिज्ञों का गिरता स्तर , अपराध व भ्रष्टाचार में संलिप्तता आदि ने न्यायपालिका को अधिक मुखर या कहें कि अति सक्रियता का अवसर दे दिया ।


इसका एक दुष्परिणाम ये निकला कि न्यायपालिका जिस पर विवादों के निपटान की अहम जिम्मेदारी थी उसने राज्य संचालकों के लिये दिशा निर्देशन की भूमिका भी विवशत: अपने कंधों पर उठा ली । और शायद यही सबसे बडी वजह रही कि पिछले सिर्फ़ एक दशक में न्यायपालिका में शीर्ष स्तर से लेकर निचले स्तर तक समाज में व्याप्त हर कुरीति व बुराई का समावेश देखने को मिल गया ॥

शीर्ष न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार में संलिप्तता से लेकर यौन अपराध किए जाने तक के आरोप लगे । मामला सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि विख्यात व प्रतिष्ठित न्यायविदों की आपसी छींटाकशी ने आम लोगों के सामने बहुत सी अप्रिय बातें ला दीं । न्यायपालिका में बुरी तरह पैठ बना चुका भाई भतीजावाद , लॉबिंग, अवकाश प्राप्ति के पश्चात किसी पद पर पदारुढ होने/किए जाने की संभावना के मद्देनज़र सरकार के प्रति नरम दृष्टिकोण आदि ने यह जता दिया था कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता व निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए वहां भी सुधार की आवश्यकता है , विशेषकर न्यायपालिका के प्रशासन क्षेत्र में ॥


हालांकि ऐसा नहीं था कि विधायिका या सरकार इस ओर कोई कदम नहीं उठा रही थी । पूर्व की सरकारों ने जहां " अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग" तथा "judges accountability bill"  ज़ज़ेस अकाउंटिबिलिटी बिल  पर कार्य व प्रस्ताव किया था । वहीं नवगठित सरकार भी इस दिशा में कई नई संकल्पनाओं व विकल्पों पर कार्य शुरू कर चुकी है । वर्तमान सरकार ने सबसे पहले उन कानूनों की छंटाई का काम अपने जिम्मे लिया जो बरसों पुराने होने के साथ साथ आउटडेटेड यानि औचित्यहीन हो गए थे ॥

ऐसे लगभग छ : सौ से अधिक छोटे बडे कानूनों का अध्ययन करके उन्हें परिवर्तित या समाप्त/निरस्त करने की योजना प्रस्तावित है । यहां यह उल्लेख करना दिलचस्प होगा कि अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई एक याचिका पर न्यायालय ने ऐसे ही पूर्व में निरस्त किए जा चुके एक कानून के प्रयोग पर हैरानी जताते हुए सरकार से स्थिति स्पष्ट करने के को कहा है ॥


सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति व पदोन्नति की प्रचलित कोलेजियम प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन की ओर भी वर्तमान सरकार कदम बढा चुकी है । पिछले कुछ समय से इस कोलेजियम व्यवस्था पर येन केन कारणों से प्रश्नचिन्ह लग रहे थे । कई पूर्व न्यायाधीशों ने भी समय समय पर इस व्यवस्था पर टीका टिप्पणी करके अपना असंतोष व्यक्त किया है । नई व्यवस्था में न्यायाधीशों के एकाधिकार की स्थिति को बदलने का प्रयास किया गया है ।


इसके अलावा नई सरकार ने देश भर में बहुत सारी अदालतों के गठन की योजना, विवाद निपटान की गैर न्यायिक व्यवस्थाओं के विकल्प व संभावनाओं पर कार्य योजना, अदालतों को पूरी तरह डिजिटलाइज़्ड करके पारदर्शी बनाना, गरीबों व निशक्तों को न्याय सुलभ कराने के लिए कई नई व्यवस्थाओं व योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है ॥

विधायिका द्वारा न्यायिक व्यवस्थाओं में ऐसे परिवर्तनों के प्रयास पर न्यायपालिका ने चेताया है कि न्यायपालिका की शक्तियों में किसी भी तरह के अंकुश लगाने या उसमें कमी करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा , किंतु यहां न्यायपालिका को भी खुद ये आत्ममंथन करना होगा कि आखिर क्यों नहीं वो सुधार / विकल्प अपनाए जाएं जो अंतत: न्यायपालिका को ही चुस्त दुरूस्त करेंगे । न्यायपालिका यूं भी अपने न्यायिक कार्यों के बोझ से पहले ही ग्रस्त है ऐसे में यदि न्यायपालिका के प्रशासनिक क्षेत्र में सुधार और कसाव के लिए विधायिका अच्छे उद्देश्य से कोई परिवर्तन करती है तो बिना जांचे परखे उसे नकारना या समय से पहले ही उसकी आलोचना/विश्लेषण करना ठीक नहीं होगा ॥ इन परिवर्तनों का क्या और कितना प्रभाव पडेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा किंतु फ़िलहाल तो सकारात्मक परिणामों की ओर ही आशान्वित रहा जाना चाहिए ॥

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

उम्र और अपराध पर न्यायिक विमर्श



http://thecalibre.in/wp-content/uploads/2013/02/juvenile-justice.jpg



मेरे इस प्रश्न पर         विधिक शास्त्रार्थ की प्रक्रिया माननीय उच्चतम न्यायालय में प्रारंभ हो चुकी है । हालांकि सुनवाई में न्यायालय ने ये तो फ़िलहाल स्पष्ट कर ही दिया है कि इस मामले में वसंत विहार बलात्कार कांड में सज़ा भुगत रहे किशोर की सज़ा और मुकदमे पर विचार नहीं किया जाएगा ।


वास्तव में विधि को विभिन्न आयामों में परिभषित करने का गौरवपूर्ण कार्य सिर्फ़ सर्वोच्च न्यायालय के जिम्मे होता है । समाज के परिवर्तित हो रहे रूप से निकलने वाले बदलावों को सभ्यता के लिए उचित अनुचित की कसौटी पर कसकर उन्हें अपनाए जाने या ठुकराए जाने का विधिक प्रमाणपत्र जारी करता है सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला । अभी हाल ही में ऐसे दो बडे सामाजिक बदलावों की मान्यता के लिए उसे न्यायपालिका की कसौटी पर कसने का प्रयास किया गया था । जहां लिव-इन-रिलेशनशिप को वैधानिक दर्ज़ा मिल गया वहीं समलैंगिकता प्रतिबंधित ही रही । 


कानून के छात्र के रूप में जब भारतीय दंड संहिता , अपराधशास्त्र एवं दंड प्रशासन को पढते हुए "किशोर और अपराध" को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है ।कानून में "किशोर अपराध" को पढते हुए एक सबसे अहम बात ये समझ आई कि जहां उसके किशोर वय को  परिभाषित करने के लिए उसकी आयुमात्र को आधार माना गया है वहीं जब उसके अपराध निर्धारण का निर्णय किया जाता है तो उसमें आधार बनता है किए गए अपराध और उसके फ़लस्वरूप घटने वाले परिणाम के बारे में अपराध करने वाले किशोर की समझ । 

वर्तमान कानूनी स्थिति ऐसी है कि सात वर्ष से कम आयु के शिशु द्वारा किया गया अपराध उस शिशु के लिए दंडनीय नहीं नाना जाता है क्योंकि उस आयु तक शिशु की समझ सामान्यतया अपराध के रूप में अपने कृत्य की समझने , लायक मानसिक परिपक्वता नहीं होती है । सात से बारह वर्ष की आयु के किशोरों द्वारा कारित कृत्य भी अपराध नहीं माना जाएगा । यदि कारित कृत्य के प्रति उस किशोर की समझ मानसिक अपरिपक्वता प्रमाणित हो जाए । 7 से 12 वर्ष के बीच के केवल उन बालकों को संरक्षण के योग्य माना जाना चाहिए जिनका बौद्धिक स्तर अपवाद स्वरूप रूप से अपरिपक्व है । 

वर्ष 2000 के नए व वर्तमान में लागू नवीन किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण ) अधिनियम के पारित हो जाने के परिणाम स्वरूप बालक और बालिकाएं दोनों ही किशोर माने जाने की आयु 18 वर्ष कर दी गई जबकि इसके पूर्व यह आयु बालकों के लिए 16 वर्ष तथा बालिकाओं के लिए 18 वर्ष थी । इसका एक त्वरित परिणाम ये निकला कि वर्ष 2001-2002 में किशोर अपराध के आंकडे में अचानक ही 14 % की वृद्धि दर्ज़ की गई । यानि स्पष्ट था कि उम्र सीमा बढाने अपराध और अपराधियों की संख्या में ईज़ाफ़ा देखने को मिला था ।

जहां तक न्यायपालिका द्वारा इस उम्र और अपराध पर न्यायिक दृष्टिकोण स्पष्ट करने की बात है तो ये कोई पहला अवसर नहीं है जब न्यायपालिका के समक्ष ऐसी परिस्थितियां आई हैं कि जब उसे उम्र और अपराध या उम्र के साथ जुडे किसी सामाजिक प्रश्न को स्थापित और मानक विधिक नियमों कानूनों की कसौटी पर कसना होता है वो भी बिना उसके मानवीय पहलू और न्याय के प्रथम सिद्धांत कि "न्याय सिर्फ़ होना नहीं  चाहिए बल्कि न्याय होते हुए स्पष्टत: महसूस भी होना चाहिए । " की अनदेखी किए बगैर ।

तीन वर्ष पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दिल्ली के एक स्कूली छात्र और छात्रा का ऐसा युगल सामने आया जिन्होंने आपसी सहमति से प्रेम विवाह कर लिया था , जबकि पुत्री के पिता द्वारा पुलिस में अपनी पुत्री के अपहरण आदि का मुकदमा दायर कर दिया था । इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में दिए तर्कों के आधार पर उन दोनों अवयस्क युगल के विवाह को पूरी तरह कानूनी करार दिया । वास्तव में न्यायालय ने किशोरी की उम्र , मानसिक परिपक्वता , शारीरिक विकास और समझ आदि के आधार पर ये माना था कि चूंकि बालिका दिल्ली जैसे महानगर में पल बढ व शिक्षा पा रही है एवं ग्रामीण परिवेश की हम उम्र किसी बालिका से ज्यादा सजग व सचेत दिखाई जान पडती है । इस फ़ैसले पर उस समय कई सामाजिक संगठनों ने  असहमति भी जताई थी ।

अब देखना ये है कि वर्ष 2000 से लागू इस कानून पर न्यायपालिका का क्या रुख रहेगा , हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि दामिनी बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में से एक और बहुत ही अहम , जस्टिस वर्मा कमेटी का गठन , उसकी अनुशंसा और उसमें किशोरों की उम्र सीमा में किसी भी तरह के फ़ेरबदल से इंकार का नज़रिया । बहरहाल जो भी हो , आंकडे बताते हैं कि किशोर अपराध के मामले में पश्चिमी देशों की स्थिति ज्यादा बुरी है ।

रविवार, 29 दिसंबर 2013

नई तकनीकों से लैस होता कडकडडूमा कोर्ट




कडकडडूमा न्यायालय परिसर का प्रवेश द्वार


दिल्ली की सभी पांच जिला अदालत परिसरों में से कडकडडूमा न्यायालय , जिसमें वर्तमान में दिल्ली के तीन जिलों , पूर्वी , उत्तरपूर्वी और शाहदरा जिला , की अधीनस्थ अदालतें काम कर रही हैं , का विकास शुरू से ही एक आदर्श कोर्ट परिसर की तरह किया गया है । बहुत से नए प्रयोगों व शुरूआत के लिए न्यायिक सुधारों के इतिहास में पहले से ही अपनी ख्याति का परचम लहरा रहे इस न्यायालय परिसर में , देश का पहला ई कोर्ट , देश का पहला संवेदनशील गवाह कक्ष एवं परिसर , हरित न्यायालय परिसर आदि के अलावा यहां सांध्यकालीन अदालतें , नियमित लोक अदालतें , मध्यस्थता केंद्र , विधिक सेवा प्राधिकरण , दिल्ली न्यायिक अकादमी , ई कोर्ट शुल्क वितरण केंद्र , सुविधा एवं सूचना केंद्र जैसे अनेक प्रयास लगातार किए जा रहे हैं । अब इनका परिणाम भी दिखने लगा है ।


हाल ही में ऐसे कुछ और प्रयासों की शुरूआत की गई है । अदालत भवन के प्रवेश द्वार प्रांगण में स्थित "सुविधा एवं सूचना केंद्र" में अधिवक्ताओं व आम लोगों के लिए विभिन्न प्रयोजनों हेतु बनाई गई खिडकियां (काउंटर्स) को माइक एवं स्पीकर से जोडा गया है । वास्तव में इन खिडकियों में बाहर की तरह कतारों में खडे लोगों को भीतर बैठे कर्मचारी द्वारा कही गई या बताई गई कोई बात अथवा जानकारी सुनने में काफ़ी परेशानी होती थी । चूंकि इस तरह की बारह खिडकियां बिल्कुल साथ साथ होने के कारण सुनने में काफ़ी असुविधा होती थी । इस समस्या को दूर करने के लिए सभी बारह खिडकियों पर उच्च तकनीक वाले माइक तथा स्पीकर लगा दिए गए हैं जिससे अब आम लोगों व अधिवक्ताओं को आसानी से सुना व कहा जा सकता है । ज्ञात हो कि प्रवेश द्वार के साथ ही बनी हुई खिडकी संख्या दो "पूछताछ एवं सहायता खिडकी" है जहां से न सिर्फ़ अदालत में चल रहे किसी भी वाद , उसके पक्ष , तारीख आदि के बारे में जानकरी दी जाती है बल्कि अन्य सभी जानकारियां भी उपलब्ध कराई जाती हैं ।


इसके अलावा बहुत समय से प्रतीक्षित योजना "केस स्टेटस कंप्यूटर नोटिस बोर्ड" को भी हाल ही में स्थापित किया गया है । अदालत भवन में प्रवेश करते ही एक बडा कंप्यूटर नोटिस बोर्ड आम लोगों को दिखाई देगा ये कुछ इस तरह का जैसा आपने रेलवे स्टेशनों पर गाडियों की आवक जावक की सूचना हेतु लगा  देखा होगा । इस बोर्ड पर सभी अदालतों की कक्ष संख्या , उसके आगे उस समय उस अदालत में चल रही वाद संख्या एवं पक्षों का नाम प्रदर्शित होते हुए देखा जा सकेगा । वास्तव में इस कंप्यूटर बोर्ड को अदालत कक्षों में न्यायाधीश महोदय के साथ बैठे रीडर(पेशकार) के कंप्यूटर के साथ जोड दिया गया है ,किसी वाद की संख्या और पक्ष का नाम वहां टंकित करते ही इस सूचना बोर्ड पर वह प्रदर्शित होने लगेगा । ज्ञात हो कि कडकडडूमा अदालत परिसर में तीन जिला अदालतों के अधीन लगभग सौ अदालतें काम करती हैं जो पांच ब्लॉकों में विभाजित हैं । ऐसी ही एक सूचना पट्टिका अधिवक्ता चैंबर ब्लॉक्स में भी स्थापित कर दी जाएगी । इसका लाभ ये होगा कि अधिवक्ताओं सहित आम लोगों को भी इस बोर्ड पर प्रदर्शित सूचना से पता चल जाएगा कि अमुक अदालत में अभी अमुक संख्या के वाद की सुनवाई हो रही है । ज्ञात हो कि दिल्ली उच्च न्यायालय में ये व्यवस्था पहले से ही है ।


इसके अलावा भविष्य में अदालतों में आने वाली भीड और उसके कारण सुरक्षा व्यवस्था पर बढते हुए दबाव , गवाहों के साथ मारपीट की घटनाओं आदि को ध्यान में रखते हुए , मुख्य प्रवेश द्वार पर ही आम व्यक्तियों के लिए पास की व्यवस्था की शुरूआत की जाने वाली है । इससे यह लाभ होगा कि अनावश्यक ही अदालतों में भीड बढाने वाली संख्या को संतुलित एवं नियंत्रित किया जा सकेगा । उम्मीद है कि नित निरंतर प्रयोगों की इस रफ़्तार के साथ ही लोगों को त्वरित न्याय मिलने की रफ़्तार में भी तेज़ी आएगी


अगली पोस्ट :- फ़ैसलों और अदालत का वर्ष -2013

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

मृत्युदंड : फ़ैसले के बाद क्या ???




दिल्ली बलात्कार कांड के फ़ैसले के आने से पहले यदि किसी से भी पूछा जा रहा था कि वो इस अपराध के आरोपियों को क्या सज़ा पाते हुए देखना चाहते हैं तो दस में आठ व्यक्तियों का कहना था कि , उन्हें मौत की सज़ा मिलनी चाहिए । खुद गृह मंत्री तक भावावेश में एक विवादास्पद बयान दे गए कि मौजूदा कानूनों के तहत तो आरोपियों को सज़ा- ए -मौत का दंड ही दिया जाना चाहिए । जिस क्रूरतम तरीके से ये अपराध किया गया था उसी समय से दोषियों के खिलाफ़ एक और सिर्फ़ एक ही सज़ा , यानि फ़ांसी की पुरज़ोर मांग उठने लगी थी । किंतु कानून न तो जन भावनाओं पर चलता है न ही आवेश में आकर कोई फ़ैसला सुनाता है , हालांकि ऐसे अपराधों के लिए इससे पहले फ़ांसी की सज़ा न दी गई हो  । कुछ वर्षों पहले धनंजय चटर्जी नामक एक व्यक्ति को , बलात्कार और बलात्कार के बाद हत्या के आरोप में मृत्युदंड की सज़ा दी गई थी ।


अब जबकि दिल्ली बलात्कार कांड के छ: अपराधियों में से चार को फ़ांसी की सज़ा सुना दी गई है तो स्वाभाविक रूप से इसके बाद की परिस्थितियों पर भी नज़र डालना जरूरी हो जाता है ।  किसी भी अभियुक्त को जब निचली अदालत फ़ांसी की सज़ा सुनाती है तो एक महीने के अंदर ही केस फ़ाइल और न्यायिक आदेश को संबंधित उच्च न्यायलय की संपुष्टि या अनुमोदन के लिए प्रेषित कर दिया जाता है । यदि अदालत निचली अदालत के आदेश की संपुष्टि कर देती है तो अभियुक्त इस आदेश के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है । अंतिम आदेश के रूप में यदि सर्वोच्च न्यायालय भी इस अधिकतम सज़ा पर मुहर लगा देता है तो इसके बाद अभियुक्त राष्ट्रपति के समक्ष क्षमा याचिका दायर कर सकता है और इतना ही नहीं राष्ट्रपति द्वारा क्षमा याचिका को ठुकराए जाने के आधार को भी चुनौती देते हुए पुन: सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है । इन सभी चरणों के बाद भी यदि मौत की सज़ा ही बरकरार रहती है तो फ़िर न्यायालय एक नियत तारीख तय कर देती है , जिस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद .'warrent of death" अभियुक्त को फ़ांसी पर  उसके प्राण निकलने तक लटका कर उसे मृत्यु दंड दिया जाता है । यानि वर्तमान सज़ा इस लडाई की पहली सीढी या कहें कि पहली सफ़लता मानी जा सकती है ।


जहां तक इस मुकदमे के परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो इस सज़ा का सबसे बडा प्रभाव पडेगा उस बचे हुए नाबालिग आरोपी की सज़ा पर , वो भी उस स्थिति में जब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित याचिका के फ़ैसले में "नाबालिग " की नई परिभाषा , इस आरोपी को भी अपने अंज़ाम तक पहुंचा सकेगी । दूसरा प्रभाव ये कि यदि ऊपरी अदालतों में किसी भी वजह से अधिकतम सज़ा को कम भी किया गया तो ये आजीवन कारावास से कम नहीं होगा , और यहां बताता चलूं कि अब सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1997 में गोपाल विनायक गोडसे बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद में ये बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि आजीवन कारावास का पर्याय है मृत्यु तक कारावास । इस वाद में मौजूदा न्यायिक परिस्थितियों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि बेशक अपील दर अपील ये मुकदमा लंबा समय ले ले किंतु अंतिम परिणति तक पहुंचेगा अवश्य । और यदि समाज और संचार माध्यमों ने इसी तरह त्वरित न्याय पाने के लिए दबाव बनाए रखा तो नि: संदेह इसमें न्याय पाने के लिए धनंजय चटर्जी मामले की तरह लंबा समय नहीं लगेगा । इस फ़ैसले का एक तात्कालिक प्रभाव ये भी पडेगा कि अभी लंबित सभी ऐसे मुकदमों में न्यायाधीश इसी तरह की हिम्मत दिखा सकेंगे जो बेशक बहुत कम प्रतिशत ही सही मगर अपराधियों में एक तात्कालिक भय तो जरूर पैदा करेगा ।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

दंडव्यवस्था पर एक बहस









दिल्ली बलात्कार कांड की अंतिम परिणति या कहा जाए कि भारतीय न्याय व्यवस्था जो कम से कम त्रिस्तरीय तो है ही , उसके पहले चरण का अंतिम फ़ैसला अब आने को है । इस वक्त देश और पूरे समाज की निगाहें इस फ़ैसले की ओर लगी हुई हैं । आरोपियों को सभी धाराओं में दोषी ठहराए जाने के बाद अब जबकि उनको दी जाने वाली सज़ा पर भी बहस हो चुकी है तो अगले कुछ घंटों के भीतर ही माननीय अदालत द्वारा ये भी तय कर दिया जाएगा कि उन्हें अभी मौजूद दो अधिकतम सज़ाओं के विकल्प "उम्रकैद या फ़ांसी" में से कौन सी सज़ा दी जाएगी । चूंकि ये वो अपराध था जिसने पूरे देश को न सिर्फ़ उद्वेलित किया बल्कि महिलाओं के विरूद्द होने वाले अपराध और उनके शोषण को रोकने के लिए  प्रस्तावित और बरसों से लंबित कानून को पारित करने में अहम भूमिका निभाई । सरकार ने आनन फ़ानन में दिवंगत न्यायाधीश जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का भी गठन किया जिसने पूरे देश से इस मामले पर सुझाव और विचार मांग कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की । इसी के मद्देनज़र कानूनों में बदलाव करके न सिर्फ़ दंड व्यवस्था को कठोर किया गया बल्कि बलात्कार जैसे अपराध की परिभाषा को और विस्तृत करके " यौन शोषण " कर दिया गया ।



इस विशेष मुकदमे से इतर इससे पहले भी ऐसे मौके आते रहे हैं जब फ़ांसी और उम्रकैद की सज़ा पर न सिर्फ़ बहस उठ खडी हुई बल्कि पिछले दिनों तो दिल्ली की एक अदालत ने एक सप्ताह में ही पांच मुजरिमों को सीधे फ़ांसी की सज़ा सुनाई है । ज्ञात हो कि बलात्कार के मुजरिमों को फ़ांसी की सज़ा , धनंजय चटर्जी के  मुकदमे और उसे मिली फ़ांसी की सज़ा के समय से शुरू हुई थी , खासकर ये बात कि किसी सज़ा को सुनाए जाने से उसे परिणति तक पहुंचने में यानि उसे फ़ांसी मिलने में 13 वर्षों का लंबा समय लगा था । उस समय के बाद अनेक मुकदमों में जब जब भी किसी को फ़ांसी की सज़ा सुनाई गई हर बार इस अधिकतम सज़ा पर एक बहस उठ खडी होती रही है ।


दंड : विधिशास्त्र के अनुसार यदि निचोड में कहा जाए तो सामाजिक व्यवस्था के लिए जो कानून निर्मित किए जाते हैं उनके उल्लंघन को रोकने के लिए भय के रूप में जो शारीरिक , मानसिक , आर्थिक, या सामाजिक कष्ट पहुंचाया जाता है , वह दंड कहलाता है । दंड के विभिन्न सिद्धान्तों में मुख्यत: चार सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया है , जो प्रतिरोधात्मक , प्रतिशोधात्मक , निरोधात्मक , या सुधारात्मक सिद्धान्त कहलाते हैं । आधुनिक युग में एक नए सिद्धान्त उपचारत्मक सिद्धान्त को भी मान्यता दी गई है । विश्व के सभी देशों ने इन्हीं दंड सिद्धातों में से कोई न कोई सिद्धांत अपनाया व लागू किया हुआ है । किंतु इन सिद्धान्तों के प्रयोग और उनके अनुसार दी गई सज़ाओं से अपराध में कितनी कमी आई या कि सज़ा का अपराधियों में कितना भय बैठा इसका आकलन करने का शायद ही कभी प्रयास किया गया हो ।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो प्राचीन काल में भारत में मुख्यत: चार प्रकार की दंड व्यवस्थाएं प्रचलित थीं

वाकदंड या चेतावनी
प्रायश्चित
अर्थदंड
कारावास, मृत्युदंड , बध-दंड या अंग विच्छेद ।



कालांतर में अमानवीय दंड प्रथाओं के स्थान पर सुधारात्मक दंड व्यवस्था की ओर भारतीय विधि का झुकाव हुआ । किंतु इसके बावजूद भी चूंकि भारतीय विधि एक लिखित और इस कारण सीमित विधि की श्रेणी में आती थी इसलिए तय अपराधों के लिए एक नियत तय सज़ा को देने की  व्यवस्था ही बहाल रखी गई ।   हालांकि पिछले दो दशकों में भारतीय विधिक व्यवस्थाओं में तेज़ी से बदलाव देखने को मिले हैं और प्रयोग के तौर पर ही सही किंतु उन नई दंड प्रणालियों , जैसे सामाजिक संस्थानों में सेवा देना , आरोपियों पर अर्थदंड लगाकर उस राशि से पीडितों को सहायता देने आदि को भी आज़माया जाने लगा है ।

अब इस मुकदमे के संदर्भ में यदि इस क्रूरतम अपराध के लिए भारतीय कानून में उपलब्ध दो अधिकतम विकल्पों - आजीवन कारावास और मृत्युदंड के बीच विमर्श किया जाए तो बेशक एक आम नागरिक और देश के समाज की भावना के अनुरूप मैं सोचूं तो यकीनन मुझे भी यही लगेगा कि फ़ांसी से कम कोई सज़ा इस जघन्य अपराध के लिए नाकाफ़ी साबित होगी । किंतु जब लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं और पहले से ही फ़ांसी की सज़ा पाए अभियुक्तों की लंबी कतार देखता हूं तो मेरा संदेह और भी पुख्ता हो जाता है कि काश भारत भी उन अन्य पश्चिमी और कुछ और देशों की तरह "अपराध आधारित सज़ा " की व्यवस्था को अपना पाता तो ही ऐसे मामलों में न्याय पाने जैसा लग सकता है । ज्ञात हो कि एक उदाहरण से इसे ऐसा समझा जा सकता है कि श्रीलंका में एक व्यक्ति जिसने अपनी 67 वर्षीय मां के साथ बलात्कार किया था उसे अदालत ने 260 वर्षों की सज़ा सुनाई थी , ऐसी ही अकल्पनीय सज़ाएं पश्चिमी देशों में भी सुनाई जाती रही हैं । अभी हाल ही में किसी अभियुक्त की जेल में मौत हुई जिसे नौ सौ वर्षों की सज़ा सुनाई गई थी । इसका मंतव्य सिर्फ़ इतना संदेश देना होता है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसकी सज़ा इतनी अधिक बनती है बेशक अपरधी की उम्र उससे बहुत कम ही क्यों न हो ।

कल इस समय तक इस मुकदमे का फ़ैसला आ चुका होगा , फ़िर इस बहस को आगे बढाएंगे ..जो आजीवन कारावास और  मृत्युदंड ..के बीच आगे बढेगी ..................

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

देश के पहले "संवेदनशील गवाह परिसर " की शुरूआत






इन दिनों मेरी नियुक्ति , दिल्ली की पूर्वी ,उत्तर-पूर्वी व शाहदरा जिले की संयुक्त जिला अदालत परिसर , कडकडडूमा कोर्ट में है । दिल्ली में वर्तमान में कार्यरत पांच जिला अदालत परिसरों , तीस हज़ारी न्यायालय , पटियाला हाऊस न्यायालय , रोहिणी न्यायालय , साकेत न्यायालय एवं कडकडडूमा न्यायालय में , कडकडडूमा न्यायालय परिसर को ये गौरव प्राप्त है कि इसका विकास एक आदर्श न्याय परिसर के रूप में हुआ और किया जा रहा है ।



1993 में जब इस न्याय परिसर की स्थापना हुई थी तब से लेकर अपने आज तक के सफ़र में इस न्यायपरिसर को एक आदर्श न्यायायालय परिसर के रूप में विकसित किए जाने के अथक प्रयास अब भी जारी हैं । देश की दूसरी और राज्य की पहली न्यायिक अकादमी की स्थापना , देश के पहले ई न्यायालय की स्थापना , हरित न्याय परिसर की स्थापना , बाल गवाह न्यायालय की स्थापना , के साथ ही मध्यस्थता केंद्र , सुविधा एवं सूचना केंद्र , विधिक सहायता प्राधिकरण की स्थापना , स्थाई लोक अदालतों की स्थापना , सांध्य कालीन अदालतों की स्थापना जैसे जाने कितने ही नवीन न्यायिक प्रयोंगों को शुरू किए जाने के लिए विख्यात हुए इस न्यायालय परिसर ने इतने ही कम समय में देश की विधिक परिसरों में एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है ।


एक बार फ़िर एक अदभुत और नए प्रयोग के लिए तैयार इस न्यायालय परिसर में , कल यानि ११ सितंबर २०१३ को शाम पांच बजे ,माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महोदय देश के पहले "संवेदनशील गवाह परिसर " की शुरूआत करने जा रहे हैं । यह परिसर न्यायालय भवन के सबसे ऊपरी तल यानि सातवें तल पर स्थापित किया गया है । "संवेदनशील न्याय परिसर "  की संकल्पना , माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चर्चित बेस्ट बेकरी कांड में दी थी और गवाहों की सुरक्षा पर सरकार का ध्यान खींचा था । इसके साथ ही इसके तुरंत बाद , जेसिका लाल हत्याकांड के दो अहम गवाहों ,श्याम मुंशी  और प्रेम सागर मिनोचा के मुकरने और इस पर संज्ञान लेकर उन दोनों गवाहों पर मुकदमा दर्ज़ किए जाने के निर्देश देते समय दिल्ली उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को गवाहों की समुचित सुरक्षा हेतु नई कार्ययोजना पर काम करने का निर्देश जारी किया था ।


माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिल्ली , ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक समिति बनाई जिसने "संवेदनशील गवाह परिसर" की स्थापना में अहम भूमिका निभाई । इस गवाह कक्ष की कुछ विशेषताओं में एक सबसे बडी और खास ये है कि इसमें गवाह कक्ष और न्याय कक्ष के बीच एक लंबी ऐसा पारदर्शी आईने सरीखी दीवार होती है जहां से गवाह तो आरोपी का सामना किए बिना और उससे बिना डर अपनी गवाही दर्ज़ करा सकता है । अवयस्क गवाह , बालिकाओं , युवतियों , , महिलाओं , विशेषकर शोषण के मुकदमों में जहां कि आरोपियों से आमना सामना उनकी मनोस्थिति पर प्रभाव डालता है वहां इस तरह की गवाही प्रक्रिया नि;संदेह बहुत प्रभावी साबित होगी । इसके अलावा वीडियो कांफ़्रेंसिग के जरिए भी गवाही कराने का पूरा इंतज़ाम रखा गया है । ज्ञात हो कि न्यायिक क्षेत्र में नई तकनीकों का उपयोग त्वरित व अचूक न्याय के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किए जाने की शुरूआत पिछले एक दशक में ही हुई और इसके क्रांतिकारी सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं । उम्मीद की जानी चाहिए कि न्यायिक क्षेत्र में ऐसे अभिनव प्रयोग अपने दूरगामी प्रभाव छोडने में सफ़ल होंगे ।  

रविवार, 8 सितंबर 2013

दिल्ली की जिला अदालत ने सुनाया हिंदी भाषा में पहला निर्णय






अब से लगभग चार या पांच वर्ष पहले ,  जिला अदालत में हिंदी के उपयोग , उसके प्रचार और प्रोत्साहन के लिए एक मुख्य केंद्रीय क्रियान्वयन समिति बनाई गई । इसने अपने स्तर से बहुत सारे अनेक कार्य ऐसे किए जो नि:संदेह ही तारीफ़ के काबिल थे , जिनमें से एक थी जिला अदालत की साइट को हिंदी में बनाना । वर्ष में दो तीन बार स्वतंत्रता दिवस , तथा अन्य ऐसे ही मौकों पर कवि सम्मेलन आदि का आयोजन ,  न्यायिक अधिकारियों की मासिक पत्रिका "अभिव्यक्ति" का हिंदी में प्रकाशन आदि अनेक छोटे बडे प्रयास किए गए जिसने धीरे धीरे ही सही मगर दिल्ली की जिला अदालतों में हिंदी की शुरूआत तो कर ही । सभी परिपत्र एवं अन्य पत्राचार में भी हिंदी ने दखल देना प्रारंभ कर दिया । 
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किंतु इस सबके बावजूद और बावजूद इसके कि कभी कभार एक आध याचिका या किसी याचिका का उत्तर हिंदी में दायर हुआ , कभी भी आमजनों के लिए कोई बडा ऐसा काम नहीं हुआ जिसके लिए ये कहा जा सके कि जिला अदालत द्वारा हिंदी में किया गया ये कार्य आम जनता के लिए काफ़ी उपयोगी साबित हुआ है । सभी जिला अदालतों में हिंदी में कार्य के संचालन की देख रेख के लिए एक एक कर्मचारी की नियुक्ति की नीति के तहत मुझे पूर्वी एवं उत्तर पूर्वी अदालत की जिम्मेदारी दी गई , किंतु वो भी एक अतिरिक्त प्रभार के रूप में , ज़ाहिर तौर पर ये किसी खानापूर्ति जैसा था । पिछले दो सालों में न तो मुझे कोई कार्य सौंपा गया न ही मेरे द्वारा दिए गए या भेजे गए सुझावों पर कभी ध्यान दिया गया । और तो और मेरे अथक प्रयासों के बाद भी मुझे अपने कंप्यूटर पर हिंदी स्थापित करने में भी घोर उदासीनता दिखाई दी । मेरी नियुक्ति इन दिनों  " सत्र न्यायालय ज़मानत विभाग " में है जहां फ़ुर्सत के नाम पर कभी एक ग्लास पानी और चाय पीने का समय मिल जाए तो बहुत है , वाली स्थिति है । 
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ऐसे समय में मुझे बुलावा आया जिला अदालत के पारिवारिक अदालत के न्यायाधीश महोदय का , यहां मैं ये एक दिलचस्प बात बता दूं कि न्यायाधीश महोदय , जिनका नाम श्री ए.एस जयचंद्रा है , मूलत: दक्षिण भारतीय हैं , उन्होंने अपने कक्ष में मुझे बुलाकर कहा , आप वही हैं न जो पत्र पत्रिकाओं के लिए आलेख वैगेरह भी लिखते हैं । मैंने हामी भर दी । उन्होंने अपने एक निर्णय की प्रति जो अंग्रेजी में टंकित थी एवं उसका एक कच्चा पक्का सा अनुवाद या ड्राफ़्ट जो हिंदी भाषा में हस्तलिखित था मेरे हाथों में पकडाते हुए कहा । इस पर नज़र डाल कर बताएं कि इसमें क्या और कितना दोष है । मैंने सरसरी तौर पर देख कर बताया कि इसमें सुधार की काफ़ी गुंजाईश है । चूंकि ये पत्र या कोई परिपत्र नहीं था बल्कि एक न्यायिक निर्णय था इसलिए मैंने बिना जल्दबाज़ी के कार्य करते हुए उनसे चौबीस घंटे का समय लिया । न्यायाधीश महोदय ने मुझे ताकीद की , कि मैं इसमें प्रचलित उर्दू शब्दों , जैसे तलाक , सुपुर्द , फ़ैसला , आदि के विकल्प के रूप में हिंदी के शब्द या संस्कृत के शब्द का प्रयोग करूं । और दूसरी बात ये कि , ये अंग्रेजी निर्णय का सीधे सीधे अनुवाद न हो बल्कि ये सरल भाषा में लिखा गया एक न्यायिक निर्णय हो ।  
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मैंने अंग्रेजी भाषा में लिखे ड्राफ़्ट को ध्यानपूर्वक पढा और हिंदी भाषा में लिखे उनके ड्राफ़्ट को भी ।मामला एक हिंदू युगल दंपत्ति के वैवाहिक विच्छेद का था जो अपनी आपसी सहमति से इस निर्णय पर पहुंचे थे । इस युगल दंपत्ति की दो संतान भी थीं । आदेश में दोनों पक्षों के बयान , उपलब्ध तथ्यों के आधार पर , हिंदू विवाह अधिनियम के अनुच्छेद 13 ब (1) के तहत विवाह विच्छेद को विधिक मान्यता दे दी गई ।  घर पहुंचा तो कंप्यूटर महाशय बीमार पड चुके थे । चूंकि मैं उस निर्णय को अगले दिन उन्हें सौपने का आश्वासन दे चुका था और इसी कारण से उस मुकदमे का निर्णय अगले दिन तक के लिए टाल दिया गया था , इसलिए जैसे तैसे करके मैंने उसे टाइप करके उसका प्रिंट लेकर अगले दिन न्यायाधीश महोदय के सामने प्रस्तुत कर दिया ।


उस दिन यानि 07/09/2013, को न्यायाधीश महोदय के हस्ताक्षर होने के बाद , ये दिन और ये निर्णय दिल्ली जिला अदालत के इतिहास का एक नया अध्याय बन गया जब हिंदी ने आधिकारिक रूप से न्यायिक कार्यवाही में दखल दे दी । अब उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में इस पहल को आगे भी एक राह मिलेगी और हिंदी को एक मुकाम । 

शनिवार, 31 अगस्त 2013

फ़ैसले के बाद भी माकूल सज़ा के विकल्प ( संदर्भ दिल्ली बलात्कार कांड फ़ैसला)







आखिरकार उस अपराध का पहला फ़ैसला आ ही गया जिसने भारत के इतिहास में पहली बार आम लोगों को इतना झकझोर दिया था कि वे सीधा रायसीना की पहाडियों की छाती रौंद कर देश के कानून निर्माताओं को ललकारने पर उतारू हो गया थे । दिल्ली के कुख्यात बलात्कार कांड में एक मासूम युवती का बेहरहमी से बलात्कार करके उसके शरीर को इतना प्रताडित किया कि लाख कोशिशों के बावजूद उसकी जान तक नहीं बचाई जा सकी । इस कांड में पकडे गए आरोपियों को जब कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालती कार्रवाई के लिए प्रस्तुत किया गया तो जैसा कि किसी भी आरोपी को गिरफ़्तार करते समय पुलिस निर्धारित नियमों का पालन करती है , जिसमें से एक होता है आरोपी की उम्र जिसके अनुसार ही उसपर मुकदमा चलाया जाता है । 

आरोपी की उम्र का निर्धारण या उल्लेख पुलिस को उसे चार्ज़शीट करते हुए इसलिए करना होता है क्योंकि यदि अभी की निर्धारित उम्र , जो कि अठारह वर्ष है , से कम पाए जाने पर वह मुकदमा , जुवेनाइल जस्टिस एक्ट , 1986  के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड यानि किशोर अपराध समिति की अधिकारिता में आता है । यहां ये बताना ठीक होगा कि ऐसा बोर्ड , जिसके प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट एक प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी होते हैं उनके साथ ही बोर्ड में अन्य विविध क्षेत्रों के अन्य सदस्य भी मामले को सुनते हैं । इस कानून के तहत , किसी भी किशोर अपराधी को दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन वर्ष की सज़ा सुनाई जाती है तथा उसे ये सज़ा किसी कारागार में न बिताकर सुधार गृह में बितानी होती है । इसके पीछे विधिक और सामाजिक विद्वजनों का तर्क ये था कि चूंकि कम उम्र में किए गए अपराध के लिए भविष्य में उसे सुधरने और समाज की मुख्य धारा में लाए जाने का अवसर दिया जाना चाहिए , इसलिए यही उसका उचित उपाय है । 

इस बलात्कार कांड में जब एक आरोपी के नाबालिग होने का दावा आरोपी ने किया तो उसकी निर्धारित तय सज़ा , जो कि आज उसे सुनाई गई , यानि अधिकतम तीन वर्ष , के मद्देनज़र इसका तीव्रतम विरोध इसलिए हुआ क्योंकि इसी नाबालिग आरोपी ने पीडिता युवती के साथ सबसे बर्बर व्यवहार , इतना कि ईलाज़ कर रहे डाक्टरों की टीम को खुद कहना पडा कि ऐसा नृशंस व्यवहार उन्होंने पहले नहीं देखा , किया था । इसी समय कुछ संगठनों एवं लोगों ने बरसों पुराने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में निर्धारित उम्र सीमा को घटाने की मांग उठाई क्योंकि खुद पुलिस का मानना था कि अपराध में किशोरों की बढती संलिप्तता के कारण ऐसा किया जाना जरूरी है । 

इसी समय सरकार की तरफ़ से दो कार्य किए गए । पहला था देश भर के पुलिस अधिकारियों की बैठक जिन्होंने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत तय उम्र सीमा को कम किए जाने की सिफ़ारिश की । दूसरा था बलात्कार को लेकर सरकार द्वारा बनाए और बदले जा रहे कानून के संदर्भ और सुझाव के लिए गठित जस्टिस वर्मा समिति जिसे भी इस मुद्दे पर राय देनी थी । लेकिन जस्टिस वर्मा समिति ने पुलिस और लोगों की उठती मांग के विपरीत इसी उम्र को सही ठहराया । फ़लस्वरूप सरकार यौन शोषण के लिए परिवर्तित किए गए कानून में इसे कम नहीं कर सकी । विधिज्ञ बताते हैं कि सरकार चाहती तो जस्टिस वर्मा समिति की सिफ़ारिश के विपरीत जाकर इस उम्र को कम कर सकती थी किंतु इस स्थिति में उसे वैश्विक न्याय प्रचलनों और मानवाधिकार नियमों के खिलाफ़ जाने का खतरा उठाना पडता । 



इसका परिणाम ये हुआ कि दिल्ली बलात्कार कांड के इस सबसे ज्यादा खतरनाक आरोपी जिसने खुद के नाबालिग होने का दावा किया उसे किसी सख्त सज़ा मिलने की संभावनाओं पर पानी फ़िरता दिखा । चूंकि आरोपी ने अपने दावे के पक्ष में विद्यालय का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जिसे उस विद्यालय के प्रधानाचार्य ने सत्यापित किया , और इस स्थिति में पुलिस के मात्र एक मात्र विकल्प बचा था आरोपी के इस दावे को झुठलाने के लिए उसका ossification test ( एक ऐसी चिकित्सकीय वैज्ञानिक जांच जिसे आम तौर पर हड्डी जांच से उम्र तय करने वाली जांच कहा जाता है ) कराया जाए , किंतु कानूनन ऐसा तब हो सकता था जब आरोपी द्वारा अपने नाबालिग होने के लिए प्रस्तुत साक्ष्य अदालत को संदेहास्पद लगे , किंतु बदकिस्मती से इस मुकदमें में ऐसा नहीं हुआ । 



जैसे जैसे मुकदमा आगे बढता गया इसके संभावित फ़ैसले को भांपते हुए इसे रोकने और आरोपी को सख्मुत सज़ा दिलाने के उद्देश्य के लिए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को इस मुकदमे का फ़ैसला सुनाने के लिए अपील की याचिका दायर की गई जिसे स्वाभाविक रूप से उच्च अदालत ने खारिज़ कर दिया । मुकदमा  चला और पुलिस द्वारा चार्ज़शीट कुल बारह धाराओं में से ग्यारह में उसे दोषी ठहराते हुए आज तीन वर्ष की अधिकतम सज़ा सुना दी । 


अब सवाल ये है कि अब जबकि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अपना फ़ैसला वो भी निर्धारित अधिकतम सज़ा सुना ही दी है तो अपील के लिए क्या गुंजाईश बचती है ?? किंतु भारतीय कानून इतना विस्तृत और बहुस्तरीय  है कि विकल्प निकल ही आता है । सर्वोच्च न्यायालय ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को इस मुकदमे का फ़ैसला सुनाने से रोकने की याचिका तो को तो खारिज़ कर दिया किंतु इसके साथ ही इस कानून के तहत  "नाबालिग" की परिभाषा तय करने संबंधी प्रार्थना स्वीकार कर ली जिस पर निर्णय आना अभी बांकी है । कानून के ज्ञाता भलीभांति जानते हैं कि यदि सर्वोच्च न्यायालय ने नाबालिग की परिभाषा को तय करने में विशेषकर मुकदमे के संदर्भ में कोई नया फ़ैसला सुना दिया जैसा कि सर्वोच्च अदालत पहले भी कर चुकी है तो ये न सिर्फ़ इस मुकदमे के इस आरोपी को उसके अंज़ाम ,जो उस बदली हुई परिस्थिति में मौत भी हो सकती है को , तक पहुंचा देगा बल्कि अदालतों को इस मौजूदा कानून के तहत ही इतनी शक्ति दे देगा कि वो मुकदमे के हालात को देखकर फ़ैसला सुना सकेंगी ।


ज्ञात हो कि सर्वोच्च अदालत ने कुछ वर्षों पहले एक मुकदमें  जिसमें दो नाबालिगों ने घर से भागकर आपस में विवाह कर लिया था को न सिर्फ़ पूरी तरह वैध ठहराया बल्कि अपने तर्कों और विश्लेषण से ये भी साबित किया कि चूंकि उनकी शरीरिक और मानसिक क्षमता व परिपक्वता ऐसी है इसलिए ,उन्हें अठारह वर्ष से कम उम्र होने के बावजूद भी नाबालिग नहीं माना जा सकता । इसलिए अभी ये कहना कि न्याय के लिए लडी गई लडाई व्यर्थ हो गई , या इस फ़ैसले से अपराधियों के ,विशेषकर किशोर अपराधियों के , खासकर आतंकियों के हौसले बुलंद हो सकते हैं , थोडी सी जल्दबाज़ी होगी । ध्यान रहे कि अभी इस मामले से जुडे अन्य आरोपियों पर न्यायालय का फ़ैसला आना बांकी है जिसके बाद इस नाबालिग आरोपी ,जिसका अपराध बांकी अन्य आरोपियों से ज्यादा गंभीर माना जा रहा है , की कम सज़ा पर नि:संदेह न्यायविदों की भी पूरी नज़र होगी । एक अच्छी बात ये है कि अभी इस आरोपी को कम से कम ढाई वर्ष तक सुधार गृह में ही रहना होगा और इस बीच न्यायपालिका इस मुद्दे पर किसी ठोस नतीज़े पर पहुंच जाएगी  , ये उम्मीद की जानी चाहिए । 


गुरुवार, 22 अगस्त 2013

महिलाओं के हक में , मुखर होती अदालतें




अभी हाल ही में न्यायपालिका ने ऐसे दो अहम फ़ैसले सुनाए जो दिनोंदिन महिलाओं के प्रति बढ रही हिंसा और हमलों के मद्देनज़र दूरगामी प्रभाव वाले साबित होंगे । पिछले दिनों विभिन्न फ़ैसलों से अदालतें जिस तरह से महिलाओं की सुरक्षा व संरक्षण में मुखर हुई हैं वह नि:संदेह स्वागतयोग्य कदम है । समाचार सूत्रों के अनुसार सर्वोच्च अदालत भी इस मसले पर बेहद गंभीर और संवेदनशील रुख अपना रही है । हालिया फ़ैसलों में अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि महिलाओं की सुरक्षा के र्पति न सिर्फ़ न्यायपालिका खुद गंभीर है बल्कि उसके रूख से ये भी स्पष्ठ है कि वो सरकार और प्रशासन को भी इस दिशा में विभिन्न योजनाओं व कानूनों का निर्माण्के लिए प्रेरित करने की ओर अग्रसर है ।


पिछले कुछ समय से महिलाओं व युवतियों के चेहरे तथा शरीर पर तेज़ाब से हमले की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है । कहीं एकतरफ़ा प्रेम से उपजी निराशा में तो कहीं किसी मानसिक कुंठा से ग्रस्त होकर महिलाओं के चेहरे पर तेजाब डालने जैसे घृणित अपराध पर चाह कर भी सरकार प्रशासन रोक नहीं लगा पा रहा था । अभी हाल ही में ऐसी ही एक वारादात को मुंबई रेलवे स्टेशन पर अंजाम दिया गया जिसके परिणाम में देश की एक बेटी जो सेना में अपनी सेवा देने पहुंची थी, की मौत हो गई । इससे पहले भी इस तरह की बहुत सारी घटनाएं होती रही हैं जिनमें किसी तरह अपना जीवन बचा सकी युवतियों का भविष्य अंधकार में चला गया । इन घटनाओं के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक वस्तु की खुलेआम बेरोक-टोक बिक्री । इसी दिशा में सरकार द्वारा नियम कानून बनाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने हेतु दायर याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए सरकार ने देश भर में तेज़ाब की बिक्री के मानक तय करने के लिए सरकार को आदेश दिया । इस आदेश के मद्देनज़र कुछ राज्यों ने इस पर अमल करना भी दुकानों पर खुलेआम तेज़ाब की बिक्री पर रोक लगाते हुए अब खरीदने वाले के लिए अपनी पहचान की राज्य सरकार ने भी तेज़ाब की दुकानों व गोदामों पर छापा मारकर अवैध तेज़ाब को ज़ब्त कर लिया ।


इसके अलावा कानून में संशोधन करके तेज़ाब हमले के लिए निर्धारित दंड को और अधिक कठोर बना दिया गया है । यदि इन सब पर सरकार व प्रशासन गंभीरतापूर्वक कार्य करें तो स्थिति में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है । किंतु इसके अलावा एक जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य इस परिप्रेक्ष्य में किया जाना अभी बाकी है वो है तेज़ाबी हमले से पीडित युवतियों/महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षण व उनके भविष्य के लिए उपाय करना ।


महिलाओं के हक में दूसरा जो अहम फ़ैसला आया है वो बलात्कार से पीडित युवतियों/महिलाओं के लिए सामाजिक कल्याण व सुरक्शह के लिए सरकार की आलोचना व सिस दिशा में नई व्यवस्था करने के लिए निर्देश । ज्ञात हो कि पिछले कुछ समय में देश में बलात्कार के बढते मामलों ने सरकार, समाज व अदालतों का ध्यान इस ओर खींचा है । अदालतों ने समय-समय पर अपने फ़ैसलों में इस घृणित अपराध से जुडे सभी पहलुओं पर निर्देश देकर सरकार व प्रशासन को इस दिशा में कार्य काने हेतु बाध्य किया है । इसी परिप्रेक्ष्य में देश भर में बलात्कार के मुकदमों का गठन । इसके साथ ही महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं द्वारा पीडिताओं को अधिक आर्थिक सहायता , स्वावलंबन सुरक्षा व संरक्षण हेतु योजनाओं की भी मांग उठाई जाती रही है ।


ज्ञात हो कि पिछले दिनों ,दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी राज्य सरकार को ऐसा कोष बनाए जाने का आदेश दिया था जिससे पीडिताओं को एक माह के अंदर ही अंतरिम सहायता व मुकदमे के खर्च आदि के लिए आर्थिक सहायता मुहैय्या कराई जा सके । नए फ़ैसलों में अब अदालतें सज़ा सुनाते समय मुजरिमों पर लगाए जा रहे जुर्माने की राशि का एक हिस्सा भी पीडित शिकायतकर्ता को दिए जाने का आदेश दे रही है। किंतु माननीय सरोवोच्च न्यायालय के ताज़ा निर्णय से बलात्कार पीडिताओं के सामाजिक कल्याण व सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार द्वारा उठाए जाने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा ।


भारतीय समाज के तेज़ी से बदल रहे परिवेश, रहन सहन में बढता उपभोक्तावाद, यौनिक स्वछंदता, लिव-इन-रिलेशनशिप , नशे व अपराध का बढता चलन आदि ने समाज को विशेषकर शहरी समाज को महिलाओं के प्रति अधिक क्रूर, गैर जिम्मेदार व संवेदनहीन बना दिया है । पाश्चात्य देशों से आयातित परंपरा के रूप में लिव-इन-रिलेशनशिप जैसी मान्यताओं को अपनाया तो जा रहा है किंतु रिश्तों के टूटने से उपजी परिस्थितियों में बलात्कार और शोषण आदि के मुकदमे तथा ऐसे रिश्तों से उत्पन्न संतानों का भविष्य व जिम्मेदारी उठाने जैसी स्थितियों से निपटने केल इए इन सबको सामाजिक दृष्टिकोण से देखना भी आवश्यक होगा ।


निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि मौजूदा परिस्थितियों में न्यायपालिका ने यदि जनमानस के प्रति अपने विश्वास को बनाए रखा है तो उसकी एक बडी वजह ये भी है कि जिन कानूनों , जिन नीतियों , जिन उपायों , योजनाओं की उपेक्षा वो सरकार , अपने जनप्रतिनिधियों व प्रशासन से लगाए रहती है वो उन्हें न्यायपालिका के फ़ैसलों और उसके रूख में दिखाई दे जाती हैं । इन फ़ैसलों और इसके बाद इनके अमलीकरण से निकली योजनाओं व कानूनों का क्या कितना प्रभाव पडेगा ये तो भविष्य की बात है मगर इतना तो जरूर कहा जा सकता है कि न्यायपालिका के दोनों ही फ़ैसले बहुत ही सही समय पर आए हैं और जल्द से जल्द इनका अनुपालन राष्ट्रीय/राजकीय स्तर पर होना चाहिए ।

शुक्रवार, 29 जून 2012

किसी का बीच सडक जाना , अच्छा नहीं होता





मेरी नियुक्ति पिछले कुछ सालों से मोटर वाहन दुर्घटना न्यायाधिकरण में है । शुरू से आदत रही है कि जहां भी काम करो वहां उस काम को समझ के रोज़ उसे बेहतर करने का प्रयास करना चाहिए , और इस प्रयास में जो भी अच्छा मिलता जा रहा ज्ञान वो आपके लिए बोनस है । इस वर्तमान कानूनी दायरे में आज शहर का इतना बडा समाज प्रभावित है , मुझे देख कर हैरानी  हुई थी पहले पहल । लेकिन फ़िर लगभग रोज़ सुबह शाम अखबारों में सडक दुर्घटनाओं , रोड रेज के समाचार देखने पढने को मिलने लगे और दिल्ली की सडकों पर लोगों में ट्रैफ़िक सैंस के प्रति घोर लापरवाही देखी तो मुझे यकीन हो गया कि स्थिति ठीक ऐसी ही और इससे भी बदतर ही होगी हकीकत में भी ।


राजधानी दिल्ली के हालात ऐसे हो गए हैं कि , रोजाना  सडक दुर्घटनाओं की गिनती में ईज़ाफ़ा होता रहता है , जिसे सीधे  सीधे आटीओ चौराहे पर लगे दुर्घटना हताहत संख्या सूचक पट्टिका पर भी देखा जा सकता है । राजधानी दिल्ली की पुलिस को अलग से मोटवर बाहन दुर्घटना सैल का गठन करना पड गया । न्यायिक प्रक्रियाओं में , विशेषकर मुआवजे का भुगतान निर्धारण व भुगतान तीव्र गति से करने के लिए दुर्घटना सूचना रिपोर्ट ,को  प्राथमिकी के अडतालीस घंटों के अंदर जांच अधिकारी को अदालत में जमा करनी होती है और इसके एक माह के भीतर भीतर दुर्घटना की विस्तृत रिपोर्ट अदालत में जमा करनी होती है । अदालतों को निर्देश दिया जाता रहा है समय समय पर कि वे इन मुकदमों का निपटारा जल्द से जल्द किया करें । आंकडे बताते हैं कि मुकदमों के निस्तारण में तेज़ी आई है , लेकिन दुर्घटना की दर के अनुपात में ये बहुत ही धीमा है ।इसकी वजह एक से अधिक हैं जिन्हें आप इस पोस्ट में देख सकते हैं



चूंकि मुआवजा न्यायाधिकरण/पंचाट सिर्फ़ दुर्घटना में पीडित के मुआवजे का निर्धारण करता है इसलिए दीवानी प्रकृति की न्यायिक प्रकिया चलती है । अपने अनुभव के आधार पर मैंने आपको बताया था कि किसी दुर्घटना होने के समय और उसके बाद किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए , । एक कर्मचारी से अलहदा जब मैं वहां पीडितों और उनके साथ आए घरवालों को या मृतकों के आश्रितों का दर्द देखता हूं , उनकी सूनी आंखें और वेदना देखता हूं , तो मुझे सच में ही भीतर से क्रोध आता ये जानकर कि ये जो दूसरी तरफ़ बडे आराम से वकील के पीछे खडे वाहन चालक और वाहन मालिक खडे हैं इनकी ज़रा सी लापरवाही ने एक पूरे परिवार को एक पूरी नस्ल को बर्बाद कर दिया और उस परिवार की आने वाली नस्ल के विकास के  रास्ते को बंद कर दिया है । विशेषकर उन मामलों में जहां , चालक ने शराब पीकर दुर्घटना की हो , या फ़िर नकली लाइसेंस के सहारे चलाते हुए बडे टैंकर ,टैंपो , और ट्रक बसों तक से बडी दुर्घटनाओं को अंजाम दिया हो ।

हैरानी और दुख की बात तो ये है कि खुद सरकार ने अपने अधीन चलने वाली सरकारी गाडियों के लिए साधरणतया बीमे की छूट ले रखी होती है इस दलील के साथ कि दुर्घटना में मुआवजे आदि का भुगतान खुद सरकार वहन कर लेगी । जब मुकदमों के दौरान उनकी असंवेदनशीलता के कारण उन पर भारी जुर्माना भी लगता रहता है अक्सर । उत्तर प्रदेश , उत्तरांचल आदि राज्यों के परिवहन विभाग तो इतने सुस्त और लापरवाह होते हैं कि मुआवजे के आदेशे के बावजूद पीडित की मुआवजा राशि तब तक नहीं जमा कराई जाती जब तक वसूली आदेश भेजा जाए । अभी छ; महीने पूर्व ही मेरठ की लाइसेंसिंग अथॉरिटी को पूरी तरह से सील कर दिया गया क्योंकि वहां प्रतिदिन लगभग एक हज़ार नकली लाइसेंस बना कर जारी कर दिए जाते थे । पुलिस और जांच एजेंसियां अभी अन्वेषण में लगी हुई हैं ।


बीमा कंपनियों का रवैया भी बहुत टालमटोल वाला रहता है जो अनुचित है । आजकल नकली बीमा पॉलिसियों का मामला भी काफ़ी देखने में आ रहा है । माननीय उच्च न्यायालय दिल्ली के आदेश के बाद से पुलिस हर ऐसे मामले में जांच करके प्राथमिकी दर्ज़ कर रही है जहां उसे नकली लाइसेंस और बीमे का पता चलता है । अब सबसे जरूरी बात , इस स्थिति को कोई बदल सकता है तो वो हैं हम और आप , हमारा पूरा समाज । हमें ट्रैफ़िक नियमों का सम्मान और उनके पालन की आदत डालनी होगी , नावालिगों और अप्रशिक्षित लोगों के हाथों में गाडियों की कमान सौंपने की आदत छोडनी होगी , शराब पीकर चलाने की आदत को बदलना होगा , गाडी के सभी कागज़ातों , विशेषकर बीमा को अनिवार्य करना होगा । इसके साथ ही चूंकि हम इस दुर्घटना के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं और इसके पीडित भी हम ही हैं । इसलिए जो एक काम जरूर कर सकते हैं वो है दुर्घटना यदि हो गई है तो जल्दी जल्दी पीडित को चिकित्सा सहायता और उसके मुआवजे का भुगतान ।

सोचिए कि किसी के घर का चिराग बीस साल की जवानी में , अपनी पत्नी , बच्चे , बूढे मां पिता और छोटे भाइ बहनों को छोडकर असमय चला जाता और फ़िर उस परिवार को अगले कुछ या शायद बहुत सालों तक मुआवजे के लिए अदालत के धक्के खाते रहने पर उस परिवार पर क्या गुज़रती होगी । लगभग पचास साथ प्रतिशत दुर्घटनाओं के लिए शराब पीकर गाडी चलाना , लापरवाही और तेज़ रफ़्तार से चलाना , ट्रैफ़िक नियमों की अनदेखी और खराब सडकें ही जिम्मेदार होती हैं । मुझे तो रोज़ यही लगता है कि ...किसी का बीच सडक जाना अच्छा नहीं होता ..मौत के लिए कम से कम ,किसी को ,चौराहा कोई मयस्सर न हो ॥

बुधवार, 13 जून 2012

न्याय होना ही नहीं , होते हुए महसूस होना चाहिए




कई दिनों से इस ब्लॉग पर पोस्ट नहीं आई थी , और मेरे बहुत चाहने के बावजूद भी मैं इस पर कोई पोस्ट अपडेट नहीं कर पा रहा था बावजूद इसके कि बिना नियमित लिखने के भी इस ब्लॉग पर हमेशा ही पाठकों की संख्या ज्यादा रहती है , मैं कोताही बरत जाता हूं , खैर तो जब  ब्लॉग बुलेटिन पर युवा ब्लॉगर अनुज शेखर सुमन ने से प्रश्न उठाया , और अपनी पोस्ट में भी इसे सामने रखा ,और वहां टिप्पणी  स्वरूप उन्हें जो विधि से जुडे हुए हों से कुछ कहने की अपेक्षा हुई तो मुझे लगा कि अब इस मुद्दे पर अपनी बात रखनी चाहिए । चूंकि बात विस्तार से लिखने वाली थी इसलिए पोस्ट पर ही कही जा सकती थी


ये है वो खबर जिस पर प्रतिक्रियास्वरूप ये बहस उठाई गई है






इस फ़ैसले और उसके निहितार्थ पर बहस करने से पहले कुछ तथ्यों को जान लेना समीचीन होगा शायद ।अभी कुछ समय पहले माननीय उच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मुकदमे का निपटारा करते हुए एक तेरह चौदह वर्षीय बालिका के प्रेम विवाह को उचित ठहराया था । और गौरतलब बात ये है कि उस समय भी उठे ऐसे ही प्रश्नों और शंकाओं  को दरकिनार करने के लिए विस्तारपूर्वक वो कारण बताए थे न्यायिक फ़ैसले ने जिनके द्वारा ये सिद्ध किया गया था कि उक्त वाद में ,शहरी वो भी राजधानी के शहरी समाज की एक उन्नत और आधुनिक परिवार की न सिर्फ़ शिक्षित बल्कि मानसिक रूप से और शारीरिक रूप में भी सक्षम बालिका थी । इसीलिए अदालत ने माना कि सुदूर गांव में रहने वाली और वहां  के परिवेश के अनुरूप ऐसा न हो किंतु राजधानी के परिवेश में पलीबढी एक बालिका इतनी तो सक्षम है ही कि अपना भला बुरा सोच समझ सके और इसीलिए , बस इन्हीं विशेष कारणों से उस विवाह को वैध ठहराया गया था ।


दूसरी और बडी दलील ये थी कि , यदि आरोपी को , इस अपराध की दंडात्मक सजा ही सुनाई जाए तो फ़िर भी पीडिता जो कि अब उसके साथ अपना जीवन बिताने को तैयार है एवं इसके लिए ही खुद ही प्रार्थना कर रही हो तो भारतीय दंड विधान के दंडात्मक चरित्र के अलग जाकर इस तरह के फ़ैसले दिए जाना एक स्वागत योग्य कदम है ।अब कुछ खास बात इस खबर पर , मेरे ख्याल से न्यायालीय आदेशों की रिपोर्टिंग करने वाले खबरनवीसों को ज्यादा समझदार और ज्यादा संवेदनशील होना चाहिए । ऊपर छपी खबर का शीर्षक होना चाहिए था "अदालत ने नाबालिग के विवाह को वैध ठहराया " आशय स्पष्ट कि , एक विवाह जिसमें कोई एक पक्ष नाबालिग था या थी , उसे अदालत ने अपने फ़ैसले से वैध ठहराया है । इस शीर्षक का निहितार्थ ये निकल रहा है मानो अदालत ने मुस्लिम बालिकाओं के लिए पंद्रह वर्ष की वैवाहिक आयु को सही माना है । कितना बडा अंतर आ जाता है प्रस्तुतिकरण और रिपोर्टिंग से इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है । खबर से स्पष्ट है कि पीडित युवती ने ही खुद इस बाबत प्रार्थना की थी और अदालत ने न्याय होने ही नहीं न्याय महसूस होने के सिद्धांत पर चलते हुए ये फ़ैसला सुनाया । 


अभी कुछ समय पूर्व इसी तरह एक फ़ैसले में आए विचारों को लेकर खूब बहस हुई थी और इसमें भी अदालती आदेशों की समाचारीय रिपोर्टिंग ने पाठकों और आम लोगों के सामने ,मामले को कुछ और ही बना कर या बिल्कुल ठीक ठीक नहीं  रखा था ।

सोमवार, 7 मई 2012

कोर्ट में भी -सत्यमेव जयते


भारत का राष्ट्रीय चिह्न

इधर चारों तरफ़ सिने अभिनेता आमिर खान के नए टीवी शो सत्यमेव जयते की चर्चा थी तो इसी बीच दिल्ली की जिला अदालतों में जारी किया गया एक निर्देश का विषय भी यही था - सत्यमेव जयते । जी नहीं इस सत्यमेव जयते का संबंध सीधे सीधे राष्ट्रीय चिह्न के प्रयोग व उपयोग से था ।

अशोक चिह्न

अशोक चिह्न भारत का राजकीय प्रतीक है। इसको सारनाथ में मिली अशोक लाट से लिया गया है। मूल रूप इसमें चार शेर हैं जो चारों दिशाओं की ओर मुंह किए खड़े हैं। इसके नीचे एक गोल आधार है जिस पर एक हाथी के एक दौड़ता घोड़ा, एक सांड़ और एक सिंह बने हैं। ये गोलाकार आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के रूप में है। हर पशु के बीच में एक धर्म चक्र बना हुआ है। राष्‍ट्र के प्रतीक में जिसे २६ जनवरी १९५० में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया था केवल तीन सिंह दिखाई देते हैं और चौथा छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड दाहिनी ओर और घोड़ा बायीं ओर और अन्‍य चक्र की बाहरी रेखा बिल्‍कुल दाहिने और बाई छोर पर। घंटी के आकार का कमल छोड दिया जाता है। प्रतीक के नीचे सत्यमेव जयते देवनागरी लिपि में अंकित है। शब्‍द सत्‍यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है केवल सच्‍चाई की विजय होती है।




दिल्ली प्रशासन ने पिछले दिनों पाया कि , अदालत सहित अन्य बहुत सारे सार्वजनिक व सरकारी संस्थानों में जहां भी राष्ट्रीय चिह्न का उपयोग किया जा रहा है वहां एक भूल आमतौर पर देखने सुनने को मिल रही है । और वो है इस राष्ट्रीय चिह्न के नीचे देवनागिरी में लिखा सत्यमेव जयते , यानि सत्य की जीत होती है । अभी कुछ समय पहले सभी विभागों एवं अदालत प्रशासन को निर्देश जारी किए गए थे कि वे सुनिश्चित करें कि जहां कहीं भी राष्ट्रीय चिह्न का प्रयोग या उपयोग किया जा रहा हो वहां अनिवार्य रूप से सत्यमेव जयते भी लिखा होना चाहिए ।

अब नए निर्देशों के मुताबिक सबसे ये पूछा गया है कि , नए निर्देशों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए कौन कौन से कदम उठाए गए हैं व इस विषय पर वर्तमान स्थिति क्या है । ज्ञात हो कि अदालतों में अदालत कर्मियों को दिए गए नए बायोमैट्रिक पहचान पत्र में अंकित राष्ट्रीय चिह्न में सत्यमेव जयते उपस्थित है । अन्य सभी संभावित स्थानों पर भी इसकी सुनिश्चितता तय की जा रही है । समाज से अदालत तक आज का दिन सत्यमेव जयते के नाम रहा ।

सोमवार, 30 जनवरी 2012

चुस्त होगी जिला अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था





पिछले दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय पर लगातार दो बार हुए आतंकी हमलों के बाद उच्च न्यायायलय के साथ साथ दिल्ली की सभी अधीनस्थ न्यायालयों की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह चाक चौबंद करने की कवायद युद्ध स्तर पर शुरू हो चुकी है ।ज्ञात हो कि पिछले दिनों सुरक्षा एजेंसियों ने दिल्ली की दो अदालतों पर फ़िदायीन हमलों की धमकी की जानकारी भी दी थी । 


इस बाबत दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों के साथ बैठक के बाद सभी अस्थाई व्यवस्थाओं को दरकिनार करते हुए न सिर्फ़ अदालत परिसर ,सभी प्रवेश व निकास द्वारों के साथ साथ अदालत भवन के कॉरिडोर तक को सीसीटीवी कैमरों की ज़द में लाने के लिए युद्धस्तर पर कार्य किया जा रहा है ।दिल्ली की पूर्वी एवं उत्तर पूर्वी जिला की अधीनस्थ अदालत , कडकडडूमा न्यायालय में न सिर्फ़ मुख्य प्रवेश द्वारों पर स्थाई केबिन ,मचान और सुरक्षा जांच के लिए केबिन आदि के निर्माण का कार्य बहुत तेज़ी से चल रहा है । पहले ही बहुस्तरीय पार्किंग ,सुविधा एवं सूचना केंद्र ,ई अदालतों और कागज़रहित अदालतों के निर्माण एवं संचालन का कार्य बखूबी किया जा रहा है ।



यहां ये उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय के दिशा निर्देशों के अनुरूप न सिर्फ़ अदालत में आने जाने वालों की पहचान , उन्हें पास लेकर प्रवेश देने की प्रक्रिया , गवाही देने के लिए आए गवाहों के लिए अदालत कक्ष के बाहर सुरक्षा केबिन आदि जैसी योजनाओं के अलावा ,वीडियो कॉंफ़्रेंसिंग युक्त ई अदालतों का निर्माण जैसी क्रांतिकारी योजनाओं पर भी काम चल रहा है । जो भी हो , आने वाले समय में अत्याधुनिक तकनीक , संसाधनों और व्यवस्थाओं के साथ अदालतें आम नागरिकों को न्याय के लिए कितनी सुलभता और सुविधा मुहैय्या करा पाते हैं ये देखने वाली बात होगी ।



रविवार, 25 दिसंबर 2011

वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं : बेहतर शुरूआत







देश के सामने भविष्य में जो कुछ चुनौतियां विकराल रूप में आने वाली हैं , उन्हीं में से एक निश्चित रूप से मुकदमों की बोझ से जूझती न्यायपालिका भी होगी । देश की मौजूदा न्यायिक व्यवस्था के आकलन के लिए सिर्फ़ एक ही तथ्य काफ़ी है , वो ये कि वर्तमान में देश की अदालतों में लगभग साढे तीन करोड मुकदमे लंबित पडे हैं । भविष्य में स्थिति के बिल्कुल नारकीय होने की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है और इसके लिए पुख्ता कारण भी हैं । प्रति वर्ष बनने बनाए जाने वाले नए ने कानून , उनके उपयोग से ज्यादा दुरूपयोग किए जाने की आशंका और कम पडते न्यायिक संसाधन , यानि देश में अदालतों ,न्यायाधीशोंण आदि की कमी , देश की न्याय व्यवस्था को बेहद धीमा कर देंगे ।


पिछले एक दशक में समाज में अपराध की दर में तीव्र वृद्धि , जीवन व विकास के लिए बढती महात्वाकांक्षा के कारण पैदा हुई गला काट प्रतिस्पर्धा , कानून के उपयोग-दुरूपयोग से अदालतों में मुकदमों की संख्या लगातार द्विगुणित हो रही है । सरकार व प्रशासन तो मौजूदा लंबित मुकदमों के निस्तारण व्यवस्था में ही खुद को पस्त मान चुकी है । हालांकि पिछले एक दशक में भारतीय न्यायिक व्यवस्था ,पश्चिमी देशों की न्यायिक प्रक्रियाओं या जिन्हें वास्तविक अर्थों में वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं कहा जाए तो बेहतर होगा , को प्रयोग में लाकर बहुत महत्वपूर्ण उपाय तलाशा है ।

भारत की पुरातन प्रणाली से लेकर आज की आधुनिक प्रणाली तक न्याय व्यवस्था बहुस्तरीय रही है और ऐसा इसलिए है ताकि न्याय की पूर्ण स्थापना हो सके । राज्य का अपने नागरिकों के प्रति जो अहम कर्तव्य होता है उसमें से एक प्रमुख होता है आम नागरिकों सस्ता व सुलभ तथा त्वरि न्याय उपलबध कराए , किंतु अभी भी प्रति व्यक्ति न्यायाधीश या अदालतों की उपलब्धता वैश्विक न्याय व्यवस्ता के मापदंडों से बहुत पीछे है । हालांकि सरकार अपनी ओर से अदालतों पर बढ रहे मुकदमों को कम करने के लिए कई नई योजनाओं पर कार्य कर रही है जिसके तहत अभी हाल ही में मिशन मोड परियोजना को भी शुरू किया गया है ।


इसके अलावा पिछले कुछ सालों में परंपरागत व्यवस्था के अतिरिक्त मध्यस्थता केंद्र , लोक अदालत , सांध्यकालीन अदालत , ई कोर्ट ,प्ली बारगेनिंग , गरीबों के लिए मुफ़्त कानूनी सहायता दिलाने हेतु विधिक सेवा प्राधिकरण की स्थापना , कारागारों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण ,न सिर्फ़ कानूनी अधिकारों का बल्कि जीविकोपार्जन के उद्देश्य से भी , समय समय पर चलाए जाने वाले कानूनी साक्षतरा अभियान आदि जैसे कई वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाओं से भविष्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारी हो रही है । इनके अलावा कागज़रहित अदालतें , ग्राम अदालतों की स्थापना आदि पर भी तेज़ी से कार्य चल रहा है ।


भारतीय ग्राम्य समाज के न्यायिक इतिहास में किसी भी विवाद के निपटारे में एक प्रधान भूमिका आपसी समझौते या मध्यस्थता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहती आई है । ग्राम पंचायतों द्वारा पूरे समाज के गंभीर से गंभीर विवादों व अपराधों तक की सुनवाई का चलन रहा है । शहरी समाज में बढते दांपत्य विवाद ,पैसे के लेन देन, ऋण कर्ज़ विवाद तथा दुर्घटना मुआवजा वाद एवं श्रमिक प्रबंधन विवाद जैसे कानूनी निर्णय वाले विवादों के निपटारे के लिए आधुनिक न्यायिक व्यवस्था में भी वैकल्पिक ,न्यायिक प्रकिया के रूप में स्थापित हुआ -मध्यस्थता केंद्र । आज देश की बहुत सारी अदालतों में मध्यस्थता केंद्रों द्वारा न्यायाधीशों व परामर्श एवं विधिक प्रक्रियाओं के ज्ञाता अधिवक्ताओं की दक्ष व प्रशिक्षित टीम की सहायता से अदालती बोझ को कम करने की कोशिश एक बेहतर रंग ला रही है । महानगरीय जीवन के बढते वैवाहिक पारिवारिक विवादों के लिए ये चमत्कारिक साबित होती है हैं । सरकार व प्रशासन इनकी सफ़लता से इतना उत्साहित हुई कि अदालती वादों केल इए मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना के अतिरिक्त सभी क्षेत्रों के विशेष कार्यकारी दंडाधिकारी के कार्यालयों के पास भी मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना की गई है । इन केंद्रों में अदालत पूर्व विवादों समस्याओं को सुना व निपटाया जा रहा है ।


सुलह समझौते की प्रक्रिया को तरज़ीह देती दूसरी शुरूआत रही लोक अदालतों की स्थापना । प्रारंभे में विशेष संस्थाओं ,नगर निगम , ट्रैफ़िक , टेलिफ़ोन , बिजली , पानी आदि के संबंधित वादों को लिया गया । इसके पश्चात इन लोक अदालतों ने देश की अदालतों में तेजी से बढे १३८ निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के तहत लाखों में दायर किए गए मुकदमों को निपटाने में बढी भूमिका निभाई । इन लोक अदालतों को व्यापक व प्रभावी बनवाने के लिए विशेष मेगा लोग अदालतों का अयोजन तथा स्थाई लोक अदालतों की स्थापना की गई । इसका परिणाम ये रहा कि मुकदमों के निस्तारण के रफ़्तार में एक गति महसूस की गई । दिल्ली ,कोलकाता , मुंबई आदि नगरों महानगरों में इनकी उपलब्धि व महत्व उल्लेखनीय रही हैं ।


 अदालतों में कामकाज के घंटों में कमी को महसूस करते हुए विशेष रूप से सांध्यकालीन अदालतों की संकल्पना की गई । आज अहमदाबाद एवं दिल्ली में विशेष सांध्यकालीन अदालतों का परिचालन सफ़लतापूर्वख किया जा रहा है । आज ई-तकनीक का युग है ऐसे में बहुत आवश्यक था कि विधि व तकनीक के सामंअज्स्य को न्याय क्षेत्र के लिए सकारात्मक दिशा देते हुए उसे न सिर्फ़ अपनाया जाए बल्कि प्रोत्साहित किया जाए । देश की सभी अदालतों को कंप्यूटरीकृत करने का कार्य चल रहा है । पिछले कुछ वर्षों में देश में बहुत सी कागज़ रहित ई अदालतों की स्थापना ने इस ओर के महत्वपूर्ण परिवर्तन के संकेत दे दिए हैं ।


न्यायिक प्रक्रियाओं में प्ली बारगेनिंग व्यवस्था की शुरूआत ने कहीं न कहीं चली आ रही दंडीय विधान व्यवस्था को नया विकल्प दे दिया । पीडितों को न्याय के मानवीय पहलू से परिचय कराते हुए दंड राशि को मुआवजे के रूप में दिए जाने की पहल की गई । बेशक इन शुरूआती चरणों में ये तमाम वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं नाकाफ़ी और बहुत छोटी लग रही हों , किंतु आने वाले समय में ये प्रयास नि: संदेह क्रांतिकारी परिणाम देने वाले साबित होंगे ।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

मिशन मोड योजना शुरू : अदालती द्स्तावेज़ होंगे डिज़िटलाइज़्ड








इन दिनों , न्यायपालिका पर बढते बोझ और भविष्य में उनके आगे आने वाली बडी चुनौतियों से निपटने के लिए , सरकार , प्रशासन और खुद न्यायपालिका के द्वारा बहुत सी महात्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं । पिछले कुछ वर्षों में प्रयोग के तौर पर , लोक अदालत , सांध्य कालीन अदालत, प्ली बारगेनिंग , मध्यस्थता केंद्र जैसे प्रयोगों को न सिर्फ़ शुरू किया गया बल्कि सफ़लतापूर्वक उनका संचालन किया जा रहा है । सबसे सुखद बात ये है कि सभी योजनाओं में सफ़लता का दर अपेक्षा से कहीं अधिक निकला । यही कारण है कि इस उपलब्धि से प्रोत्साहित होकर मिशन मोड जैसी भगीरथी योजना क्प शुरू किया गया है । 

इसके पहले चरण में सभी अदालती दस्तावेज़ों को डिज़िटलाईज़्ड करने की कवायद शुरू की जा चुकी है । अभी हाल ही में दिल्ली की समस्त अदालतों से इस बाबत सूचना मांगी गई , कि वे प्रतिदिन आदेश के लिए ,अंतिम निर्णय के लिए , अन्य कार्यवाहियों के लिए औसतन कितना कागज़ खपत करती है । इन सूचनाओं के आधार पर ही अदालत  के सभी दस्तावेज़ों को ई दुनिया में सहेज़ दिया जाएगा । ज्ञात हो कि देश की बहुत सी अदालतों पहले ही कागज़ रहित ई अदालतों की शुरूआत हो चुकी है , जहां पूरी तरह से अदालती कार्यवाही को कंप्यूटरों द्वारा ही किया जा रहा है और कदियों की पेशी तथा सुनवाई वीडियो कांफ़्रेंसिंग के ज़रिए की जा रही है । 



माना जा रहा है कि अदालतों के सभी कागज़ातों व दस्तावेज़ों के डिजिटलाइजेशन की , प्रक्रिया एक एतिहासिक पहल साबित होगी । अदालतों को ई दस्तावेज़ के रूप में सहेजे जाने से बहुत सारी बातों में सहायता मिल सकेगी । वर्तमान में अदालती दस्तावेज़ो को सुरक्षित रख पाना वो भी लंबे अरसों तक , यही एक बडी समस्या है । दीवानी , फ़ौज़दारी व अन्य वादों के मुकदमे से संबंधित द्स्तावेज़ों को अदालती अभिलेखागार में सहेज़े जाने की मियाद भी अलग अलग है । कई दस्तावेज़ों को बहुत लंबे समय तक तो कईयों को हमेशा के लिए सुरक्षित रखना होता है । भारत में न्यायव्यवस्था के बहुस्तरीय होने के कारण , अपील और अपील के निस्तारण में लगने वाला लंबा समय , आदि के कारण मुकदमों से जुडे दस्तावेज़ों को सहेजा जाना जरूरी होता है । 

एक बार स्कैन करके अंतर्ज़ाल पर उन दस्तावेज़ों को डाल देने से ,न सिर्फ़ पारदर्शिता , न्यायिक प्रकिया व कार्यवाहियों तक आम जन की सीधे व त्वरित पहुंच हो सकेगी । सूचनाओं का ये भंडार न सिर्फ़ न्यायिक प्रक्रिया को गतिमान करने में सहायक होगा बल्कि  भविष्य में ई सुलभता के कारण लोगों को सुलभ भी हो सकेगा । देखना ये है कि भविष्य में अदालतों को तकनीक से लैस करने का उनकी लक्ष्य प्राप्ति में कितना कारगर साबित होता है । 

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

दिल्ली की जिला अदालतों में बायोमेट्रिक प्रणाली लागू










पूर्वी एवं उत्तर पूर्वी जिला अदालत ,कडकडडूमा न्यायालय ,दिल्ली





राजधानी दिल्ली की जिला अदालतों के प्रशासनिक सुधारों की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के तहत एक और उपलब्धि जुडने जा रही है । दिल्ली की सभी जिला अदालतों में कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज़ करने के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को लागू किया जा रहा है । 

ज्ञात हो कि , दिल्ली उच्च न्यायालय में ये व्यवस्था पहले से ही लागू है और पिछले दिनों दिल्ली नगर निगम के दफ़्तर में भी , काफ़ी वाद विवाद के बाद इसे लागू कर दिया  गया । राजधानी की सभी जिला अदालतों के कर्मचारियों को पिछले दिनों माईक्रो चिप लगे हुए नए पहचान पर ज़ारी किए गए हैं । इस माईक्रो चिप लगे पहचान पत्र को बायोमेट्रिक उपस्थिति पत्र के पास ले जाने पर कर्मचारी/अधिकारी का नाम स्वत: ही स्क्रीन पर दिखाई देता । इसके पश्चात कर्मचारी /अधिकारी जैसे ही अपनी फ़िंगर प्रिंट मैच कराएंगे ,उनकी हाज़िरी समय के साथ दर्ज़ हो जाएगी । अदालतों में वर्दी लागू करने का कार्य पहले से ही लागू किया जा चुका है ।


न्यायव्यवस्था में ई प्रणाली के उपयोग को अपनाते हुए अदालतें पहले ही वीडियो कांफ़्रेंसिग ,ई कोर्ट जैसी परिकल्पनाओं पर सफ़लतापूर्वक काम कर रही हैं । अदालतों के सभी रिकार्डों को तेज़ी से अंतरजाल पर सहेजने का कार्य चल रहा है । उम्मीद की जा रही है कि अदालतों पर तेज़ गति से बढते मुकदमों के बोझ से निपटने के लिए अदालत हर स्तर पर खुद को तैयार कर रही हैं 

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

सत्यमेव जयते









अभी हाल ही में जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय द्वारा जारी परिपत्र में दिल्ली की सभी जिला अदालतों को ये निर्देश दिया गया है कि अब भविष्य में ये सुनिश्चित किया जाए कि जहां जहां भी राष्ट्रीय चिन्ह का उपयोग किया जाएगा उन सभी स्थानों पर स्पष्ट रूप से उस राष्ट्रीय चिन्ह के नीचे , देवनागिरी लिपि में " सत्यमेव जयते " अंकित होना चाहिए ।


परिपत्र में उल्लेख किया गया है कि , उन तमाम स्थानों , जैसे , कोर्ट फ़र्निचर , मोहरें , स्टेशनरी , स्टिकर्स , पत्र एवं लेटर हैड , परिचय पत्र एवं विजिटिंग कार्ड आदि , सभी पर जहां भी राष्ट्र चिन्ह का अंकन हो रहा है अथवा किया जाना है , उन सबके नीचे "सत्यमेव जयते " लिखा होना अनिवार्य है । ये पाया गया था कि पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय चिन्ह के नीचे सत्यमेव जयते भूलवश छूट रहा था ।ज्ञात हो कि राष्ट्रीय चिन्ह के उपयोग करते समय ये ध्यान रखना आवश्यक होता है कि स्तंभ के तीनों शेर ( मूल रूप से चार शेर हैं ) ,नीचे अश्व और वृष की आकृति बीच में अशोक चक्र और सबसे नीचे देवनागिरी सत्यमेव जयते का उल्लेख किया गया है ।