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शनिवार, 31 अगस्त 2019

अब घर बैठे प्राप्त करें अपने मुकदमे की जानकारी




अगर आपका कोई भी मुकदमा/वाद अदालत में लंबित है तो आप अब उसकी जानकारी घर बैठे ही अपने कंप्यूटर या मोबाईल से प्राप्त कर सकते हैं | तकनीक के साथ हाथ मिलाते हुए न्यायालय प्रशासन ने इसके लिए बहुत सारे उपाय किए हैं | बहुत सारे नए एप्स व मोबाईल सेवा का उपयोग करके न सिर्फ मुक़दमे बल्कि अदालतों की ,न्ययाधीशों की ,वाद सूची ,फैसले आदेश आदि की पूरी जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं | संक्षेप में इस चित्र के माध्यम से बताया गया है | विस्तार से जानने व पढ़ने के लिए जुड़े रहें और किसी भी शंका सलाह सुझाव के लिए प्रश्न करते रहें 


रविवार, 6 जनवरी 2019

आखिर क्यूँ कम नहीं हो रहे लंबित साढ़े तीन करोड़ मुक़दमे -



आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि जब भी न्यायिक जगत के किसी कार्यक्रम में माननीय न्यायमूर्तियों को अपना संबोधन रखने का अवसर दिया जाता है , फिर चाहे वो अवसर कोई भी क्यूँ न हो वे एक बात का उल्लेख परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जरूर कर जाते हैं और वो होता है कि , न्यायपालिका में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मुकदमे ऐसे हैं जो निस्तारण की बाट जोह रहे हैं | और सबसे हैरानी और हास्यास्पद बात भी ये है कि ऐसा कम से कम पिछले एक दशक से अधिक से कहा जा रहा है | और ये भी कि , लगातार कहा जा रहा है |

ये स्थिति तब है जब देश भर में लगने वाली और  अब तो नियमित रूप से प्रतिमाह आयोजित की जाने वाली लोक अदालतों में हज़ारों और यहाँ तक कि लाखों मुकदमों के निस्तारण , मध्यस्थता केन्द्रों के माध्यम से भी हज़ारों मुकदमों के सुलह समाप्ति के आंकड़े भी लगभग साथ साथ ही आते रहे हैं तो फिर आखिर ये समस्या ज्यों की त्यों क्यों और कैसे बनी हुई है ?????

पिछले दो दशकों से अधिक से राजधानी की जिला अदालत में कार्य करते हुए , एक विधिक शिक्षार्थी के नाते और लगातार इस विषय पर सब कुछ पढ़ते देखते हुए जब मैंने इस विषय पर नज़र बनाई तो जो कुछ कारण स्पष्टतया मेरे सामने थे उन्हें सीधे सीधे ऐसे देखा जा सकता है

सबसे पहला और सबसे प्रमुख कारण : मुकदमों की आवक मुकदमों के निस्तारण से कई कई गुणा अधिक होना |

और इस बात को इस तरह से सरलता से समझा जा सकता है कि ये ठीक उस तरह से है जैसे जब तक एक थाली भोजन ख़त्म करने की कवायद होती है उतनी देर में वैसी दस बीस पचास थालियाँ अपने ख़त्म होने के लिए कतारबद्ध हो चुकी होती हैं | या फिर ये कहें जब तक एक बेरोजगार के लिए नौकरी की तलाश की जाती है उतने समय में पचास सौ बेरोजागार पंक्तिबद्ध हो चुके होते हैं |
हालाँकि इसके भी कई कारण हैं , और सबसे बड़ी हैरानी की बात ये है कि मुकदमों की आवक को कम कैसे किया जा सकता है ये विषय लंबित मुकदमों के निस्तारण हेतु किये जा रहे उपायों की फेहरिश्त में कहीं है ही नहीं |

अगले बहुत सारे कारणों में
प्रतिवर्ष बन और लागू किये जा रहे नए नए क़ानून
समाचार और सोशल मीडिया के माध्यम से अब इन कानूनों की जानकारी अवाम को होना
अदालत पहुँचने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की संस्कृति का पनपना
अधिवक्ताओं की बढ़ती   संख्या
नशे ,बेरोजगारी आदि के कारण बढ़ते अपराध
बदलती हुआ सामाजिक परिवेश व टूटते सामाजिक बंधन
न्यायालयों , न्यायाधीशों की कम संख्या
बहुस्तरीय न्याय प्रणाली के कारण होने वाला दीर्घकालीन विलम्ब
वाद विवाद से इतर दिशा निर्देश और मार्गदर्शन पाने के लिए दायर किये जा रहे मुक़दमे
इनके अलावा और भी बहुत से ऐसे कारण हैं जिन पर बारीकी से सोचा और कार्य किया जाना बहुत जरूरी है ......अगली पोस्टों में इन पर विस्तार से चर्चा करेंगे 

शुक्रवार, 2 जून 2017

छलावा साबित हो रही हैं त्वरित न्यायालय की परिकल्पना





कुछ दिनों पूर्व छपी एक खबर के अनुसार , हाल ही में नई राष्ट्रीय महिला नीति के प्रस्तावित मसौदे   में महिलाओं को त्वरित न्याय दिलवाने के उद्देश्य से विशेष अदालतें (जिन्हें "नारी अदालत "कहा  जाएगा )कि गठन का  सुझाव  दिया गया है | सकारात्मक दृष्टिकोण से इस  खबर  के  दो अच्छे  पहलू  हैं |पहला ये कि सरकार व् प्रशासन समाज में महिलाओं की बदलती हुई  स्थिति  व् परिदृश्य के कारण महिलाओं के लिए एक नई राष्ट्रीय नीति लाने को तत्पर हुई  |और दूसरा ये कि अपने इस प्रयास में  गंभीरता दिखाते हुए महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाने के उद्देश्य से उनके लिए विशेष अदालतों के गठन की कवायद | किन्तु ,

एक नागरिक , और विशेषकर सरकारी मुलाजिम , इत्तेफाकन अदालत ही मेरा कार्यक्षेत्र होने के कारण भी , मेरी पहली और आख़िरी प्रतिक्रया यही होगी , कि , नहीं इससे कहीं कुछ भी नहीं बदलेगा , कुछ भी नहीं | कम से कम ये वो उपाय नहीं हैं जो अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल हो पायेंगे , विशेषकर तब जब आप सालों से उन्हें आजमा रहे हैं और दुखद स्थिति ये है कि दिनोंदिन महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध में क्रूरता का स्तर अब पहले से कहीं अधिक है और ये लगातार हर क्षण बढ़ रहा है | यूं किसी भी नए प्रयास या ऐसी किसी कोशिश का नकारात्मक आकलन उचित नहीं माना जाना चाहिए | मगर अफ़सोस यही है कि , प्रायोगिक रूप से ये परिणामदायक उपाय नहीं साबित होंगे |

नीतियाँ नियम क़ानून , पहले इनकी ही  बात करते हैं | इस देश में लिखित क़ानून का प्रावधान ब्रिटिश राज़ से शुरू हुआ था बहुत सी नई परिकल्पनाओं की तरह  |और  ये  सिलसिला  जो  शुरू  हुआ  तो  फिर  हास्यास्पद रूप से  हम बहुत  कम उन  देशों  में शामिल  हैं  जो  लगातार कानून पे क़ानून ,रोज़ बनाए  जाते  नियम  कायदे  और  बिना किसी ठोस कार्यप्रणाली और ब्लूप्रिंट के घोषित की जाने वाली नीतियाँ | सबसे बड़े हैरत की बात ये है कि पूर्व में बने लागू किये कानूनों का आकलन विश्लेषण उनका प्रभाव और परिणाम ऐसी बातों को गौण विषय ही समझा गया है और शायद यही एक वजह ये भी है कि आम लोगों में भी क़ानून और अदालत जाने पहुँचने की आदत शुमार हो चली है , ये किसी भी दृष्टिकोण से अच्छी स्थति नहीं है


जिस देश में जितने अधिक क़ानून होते हैं इसका मतलब उस देश का समाज उतना उदंड और कानून का द्रोही होता है .किसी विधिवेत्ता ने इसी बात को बखूबी ऐसे लिखा था | अब बात त्वरित अदालतों की संकल्पना की जो बहुत से कारणों की वजह से वैसा  ही अपेक्षित  परिणाम  नहीं  दे  पाया  जैसा विशेष अदालतों के मामले में हुआ है | और इसकी कुछ वजहें भी हैं | आसान भाषा में समझा  जाए तो  महिला अदालत , परिवार न्यायालय , हरित ट्रिब्यूनल , बाल न्यायालय ...जैसी परिकल्पनाओं के पीछे एक जैसे विधिक विचार बिन्दुओं वाले वादों को एक विशेष न्यायालय में सुनवाई का अवसर देना , निस्तारण , सम्बंधित मशीनरी का बेहतर उपयोग और अन्य कई कारण , होता है | सरकार द्वारा संसद में इसका प्रावधान करते समय , प्रशासन की मंशा रहती है कि , विशिष्ट अदालतों और त्वरित अदालतों का गठन या स्थापना  विशेष रूप से किया जाना चाहिए | किन्तु एक नई अदालत के लिए एक न्यायिक अधिकारी के साथ कम से कम दस कर्मचारी के पूरे सेट अप की अनिवार्य आवश्यकता का फौरी हल न होने के कारण , मौजूदा न्यायाधीशों व् कार्यरत कर्मचारियों में से ही एक तदर्थ व्यवस्था की जाती है | इसका परिणाम ये निकलता है कि इस नई विशेष अदालत की व्यवस्था स्थाई और सुचारू होने तक वो भी अन्य अदालतों के समान ही , अपनी पूरी शक्ति से कार्य करने के बावजूद भी , मुकदमों के बोझ से जूझती सी लगती हैं |

देश की वो तबका जो न्याय व्यवस्था  के होते हुए  भी  लगातार  शोषित  होता रहा  है  उनमें दुनिया  की  आधी  आबादी  भी  है  , विडंबना है कि मेरे गृह जिले में १२ वर्ष की एक किशोरी को पारिवारिक दुश्मनी के शिकार के रूप में व्याभिचार के बाद हत्या और उसके शव को जला तक दिए जाने का नृशंश अपराध जब आंदोलित किये हुए है तो ये एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह देश की क़ानून व्यवस्था और खासकर अपराधियों के कभी भी कम न हो पाए मनोबल के लिए समाज याची से ज्यादा याचक बना दिखता है | यह नैसर्गिक न्याय के नियम के विरूद्ध है |


......देश की अदालतों में मुकदमों का बढ़ते  बोझ के लिए व्यवस्था को अब बिलकुल अगल और नए सिरे से सोचना होगा



रविवार, 18 सितंबर 2016

घर की चिंता नहीं पड़ोसी के लिए मियां हलकान





.. ऐसा सुनने में आया है कि अभी कुछ दिनों पूर्व माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (या बल्कि यह कहा जाए कि अपने लगातार निर्भय बयानों के कारण चर्चा में रहने वाले मुख्य न्यायाधीश ) श्री तीरथ सिंह ठाकुर की मुलाकात प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से हुई थी और उन दोनों के बीच लगभग एक  घंटे तक औपचारिक अनौपचारिक बातचीत हुई ||चलिए अच्छा है कम से कम इस बहाने सार्वजनिक पदों पर बैठे दो शीर्ष व्यक्तियों को आपस में विचार व समस्याएं साझा करने का सुअवसर मिला होगा ।।

जैसा कि सबको विदित है कि वर्तमान मुख्य न्यायाधीश श्री टीएस ठाकुर अपने शुरुआती दिनों से ही बड़ी मुखरता से न्यायपालिका की एक प्रमुख समस्या ,जो की लंबित मुकदमों का बढ़ता ढेर व् उसका निस्तारण है, को रेखांकित करते रहे हैं || इतना ही नहीं समय समय पर अपने सार्वजनिक संबोधन में वे  सरकार व उनके नीति निर्धारकों को ,इस बात के लिए, निशाने पर लेते रहे हैं कि न्यायपालिका पर लंबित मुकदमों के बोझ के लिए कहीं ना कहीं किसी हद तक पर्याप्त संख्या में अदालतों व न्यायाधीशों का नहीं होना ही है||

वह बार-बार इस बात को कहते रहे हैं कि पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय न्यायिक परिक्षेत्र में प्रति व्यक्ति न्यायाधीशों का जो पैमाना होना चाहिए ,अनुपात उससे कहीं ज्यादा ही कम है || अभी इस बात कोकहते हुए वे अपनी नाराजगी और व्यथा को सार्वजनिक रूप  से जाहिर भी कर चुके  हैं कि लाल किले से अपने सार्वजनिक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस समस्या को प्रमुखता से नहीं उठाया ना ही इसकी कहीं चर्चा की||
किंतु इस परिप्रेक्ष में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि आज वर्तमान में कार्यरत न्यायालय वह न्यायाधीश कार्यप्रणाली भ्रष्टाचार व अनेक तरह की अनियमितताओं के भंवर चक्र में इस तरह से फंसे देखते हैं कि न्याय प्रशासन पूरी तरह से चरमरा ऐसा दिखता है कभी देश के अग्र संचालक वर्ग में अपना स्थान बनाने वाले अधिवक्ता गण भी आज वाद विवाद हिंसक होकर बहुत बार अनावश्यक वह अति उग्र प्रदर्शन करते हैं यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है

प्रशासनिक व्यवस्थाओं प्रशासनिक कार्य क्रियाकलापों में सालों से वही ढिलाई सालों से वही ढीले ढाले रवैया पर का किया जा रहा है कहीं किसी सुधार की कोई बात या गुंजाइश नहीं दीख  पड़ती है || पिछले दिनों अंतरजाल व उस पर लोगों की पहुंच ने जरूर इसमें थोड़ा सा अंतर कम किया है किंतु फिर भी यह भारत जैसे देश जहां पर बहुत सारी आबादी निरक्षर निर्धन व निर्मल है तथा अंतरजाल तो दूर इंटरनेट तो दूर वह रोटी कपड़ा वह दवाई शिक्षा के लिए मोहताज है उन तक न्याय को सुलभ सस्ता बनाने के लिए बहुत बड़े वह दिल प्रयास किए जाने जरूरी है ||

न्यायपालिका पर एक आरोप यह भी लगता रहा है कि वह अति सक्रियता दिखाते हुए अनावश्यक हस्तक्षेप करती है कभी विधायिका में तो कभी कार्यपालिका में जबकि न्यायपालिका का स्पष्टीकरण इस पर यह है कि उसे मजबूरी में अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाध्य होना ही पड़ता है क्योंकि यह दोनों निकाय अपने दायित्व निर्वहन में  या विफल हो जाते हैं||


ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू जब सर्वोच्च न्यायालय में पदस्थापित न्यायाधीशों के लिए कहते हैं कि उनकी समझ योग्यता के अनुरूप नहीं और जो सभी उन न्यायमूर्तियों के स्थान पर बैठे वाला प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ इसलिए नहीं वहां बैठा क्योंकि योग्य बल्कि वरिष्ठता या किन्ही और कारणों से हैं | और जब कोई इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति ऐसा कह रहा है निसंदेह और अविलम्ब इसके पीछे के कारणों पर स्वयं न्यायपालिका और उससे सम्बद्ध सभी को मंथन व् विश्लेषण करना होगा | देश समाज की चिंता से पहले आतंरिक व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जाना चाहिए वो ज्यादा जूररी है

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

हां ! अब बदलने का समय आ गया है ..............







इन दिनों एक अजीब ही माहौल बना हुआ देश का , कहा जाए कि पूरा देश ही परिवर्तम मोड में है , मुझे लगता है कि यही वो समय है जब समाज के हर तबके , हर वर्ग , हर क्षेत्र से उन चुनिंदा लोगों को अब साहस के साथ सामने आना चाहिए जिनके मन और उद्देश्य में कहीं न कहीं कुछ बहुत ही प्रयोगधर्मी पनप रहा है । हम सब इस समाज की एक कडी हैं इसलिए ये बहुत जरूरी हो गया है कि हम अपना कल कैसा देखना चाहते हैं उसके लिए हमने आज से क्या और कितने प्रयास किए , विशेषकर गलतियों से सीखते हुए निरंतर उसमें सुधार की कोशिश । यहां मैं कभी कभी सोचता हूं कि पिछले सत्रह वर्षों में मैंने अदालतों की रफ़्तार को तो बढते देखा है मगर जाने क्यों मुकदमों के दबाव को पछाड नहीं पाता । 
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एक अदालत कर्मी के रूप में , कानून के एक विद्यार्थी के रूप में और निरंतर बदलती हुई न्यायिक व्यवस्थाओं के प्रत्यक्ष साक्षी होने के नाते हम और हमारे सहकर्मियों का अब ये एक दायित्व बन जाता है कि अब इस संस्थान को हम अपने अनुभव के आधार पर वो चुस्त व्यवस्था और प्रक्रियाएं सौंप के जाएं कि कल होकर आज से बीस या तीस साल बाद जब हम कार्यरत न हों तो लगे कि काश ये व्यवस्था उस समय ठीक होन शुरू की गई होती तो यकीनन ही आज हालात कुछ और होते । 

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न्यायालयों पर मुकदमों के बढते दबाव को हम अदालतकर्मी ही न सिर्फ़ बखूबी अपने कंधों पर महसूस करते हैं बल्कि अत्याधुनिक तकनीकों के साथ गजब का सामंजस्य बनाते हुए जरा भी बैकफ़ुट पर नहीं जाते । हैरानी इस बात को लेकर होती है कि जब हम अपने दफ़्तर के दबाव और कार्यबोझ को एकदम संवेदनशीलता के साथ उठा पा रहे हैं तो फ़िर आखिर हमारी ये कर्मठता उस समय क्यों और कहां चली जाती है जब बात खुद हम पर आती है । कहीं कोई संगठनात्मक ईकाई नहीं ,कोई प्रतिनिधित्व नहीं , कल्याणकारी योजनाएं तो दूर , सहकर्मी गण आपसे में भी शायद ही कभी एकत्र होकर आज तक बुनियादे समस्याओं से लेकर सुधारों की संभावनाओं पर विमर्श कर पाए हों । 
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काम बहुत विस्तृत और समयबद्ध होकर किए जाने की अपेक्षा रखता है । हम और हमारे जैसे अन्य सभी सहकर्मी अपने अनुभवों को साझा करते हुए विभिन्न स्तरों पर इन सभी अलग अलग तरह की समस्याओं , प्रक्रियात्मक कठिनाइयों , प्रशासनिक कार्यवाहियों , कल्याणकारी योजनाओं और प्रतिस्पर्धी वातावरण को तैयार किए जाने जैसे अनेक क्षेत्रों के लिए कार्य कर सकते हैं । 
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मैं अपने पिछले कार्यालयीय अनुभव के आधार पर न्याय प्रशासन की प्रक्रियात्मक कार्यवाहियों को जितनी बारीकी से परख रहा हूं उतनी ही बारेकी से उन्हें समुचित रूप से दक्ष किए जा सकने के प्रयासों और प्रयोगों पर भी कार्य कर रहा हूं । छोटे छोटे कई भागों में बंटी हुई ये रिपोर्ट एक मेगा प्रोजेक्ट रिपोर्ट के रूप में सर्वोच्च स्तर तक विमर्श और आकलन हेतु प्रस्तुत की जा सके यही मेरा प्रयास होगा । 
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आगामी पोस्टों में मैं विस्तार से अपनी योजनाओं का खुलासा करूंगा .....और चाहूंगा कि न सिर्फ़ आम पाठक बल्कि सहकर्मी मित्र भी पढ कर न सिर्फ़ मार्गदर्शन करें बल्कि सुझाव व विचार भी दें ...साथ और स्नेह का आकांक्षी ............