इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

मंगलवार, 30 जून 2009

जानिए निर्वाह भत्ते से जुड़े कुछ कानून



भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ से १२८ तक उन प्रावधानों का उल्लेख किया गया जिसके आधार पर किसी भी व्यक्ति को ..उसके आश्रितों को निर्वाह खर्चा/गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य किया जा सकता है. दरअसल इस कानून के पीछे अवधारणा ये है की प्र्तात्येक व्यक्ति का ये मौलिक और नैतिक कर्त्तव्य है की वो अपनी पत्नी, बच्चों, माता-पिता, अभिभावकों की देखभाल करे..यदि वे अपनी देखभाल करने में असमर्थ हैं तो....इसके पीछे विचार ये है की कोई भी माता-पिता, पत्नी, और संतान इन हालातों में मजबूर हो कर न रहे की ..विवश होकर वो अपराध ..में ही लिप्त हो जाए..या किसी और का मोहताज बन जाए.

धारा १२५ के अनुसार कोई सक्षम व्यक्ति उनका भरण-पोषण करने में आनाकानी करता है :

१. उसकी पत्नी, जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो...
२. उस व्यक्ति की वैध/अवैध अवयस्क ...विवाहित/अविवाहित संतान ..जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो...
३. उस व्यक्ति की वैध/अवैध संतान (विवाहित पुत्री नहीं ) जो बालिग़ तो हैं ,...किन्तु किसी भी तरह की शारीरिक , मानसिक , अक्षमता से ग्रस्त हो.....
४. उसके माता -पिता, जो अपनी देखभाल करने में अक्षम हों....

तो उस स्थिति में ..प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी उस व्यक्ति को ये आदेश दे सकती है की वो एक निश्चित राशि , प्रति माह, उन्हें गुजारा भत्ते के रूप में अदा करे...

इसके तहत वर्ष २००१ में शंशोधन करके ये कानून भी बना दिया गया की अदालत धारा १२५ की याचिका की सुनवाई करते हुए ..एक निश्चित राशि को अंतरिम खर्चे /राहत के रूप में निर्धारित करके उस व्यक्ति को उसके भुगतान का आदेश दे सकती है..जब तक की उस याचिका का निपटारा नहीं हो जाता.और ये अंतिम खर्चे का निर्धारण मुदालय को याचिका प्राप्त होने के साठ दिनों इके अन्दर अन्दर कर दिया जाना चाहिए....

कल कुछ प्रमुख मुकदमों का हवाला देते हुए देखेंगे की इसमें और क्या क्या प्रावधान हैं......

(चूँकि पहले मैंने वादा किया था की निर्वाह भत्ते के बारे में जानकारी दी जायेगी..इसलिए धारा ४९८ ए यानि दहेज़ प्रतारणा के बारे में उसके बाद..और आलेख को भागों में विभाजित करने के पीछे सिर्फ इतना कारण होता है की पाठक ..बोर न हों...)

10 टिप्‍पणियां:

  1. अजय जी, हिन्दी पाठ में कुछ अशुद्धताएँ आ रही हैं। उन्हें ठीक करने का प्रयत्न करें। जानकारी अच्छी है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. theek hai dinesh jee main prayaas kartaa hoon aur koshish bhee ki aage se aisaa na ho..maargdarshan karte rahein..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी जानकारी.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. उपरोक्त आलेख में वैध/अवैध के स्थान पर जायज़ /नाजायज़ पढने की कृपा करें...

    उत्तर देंहटाएं
  5. और जहां जहां अक्षमता का प्रयोग किया गया है वो असमर्थता के भाव में किया गया है...उम्मीद है अगले भाग में इसे ठीक कर दिया जाएगा..कठिनाई/असुविधा के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. गज़ब कानून...! २

    जारी है, श्री शेखावत, भारत के माजी उपराष्ट्रपती के द्वारा दिए गए भाषण का उर्वरित अंश:
    श्री शेखावतजी ने सभागृह मे प्रश्न उपस्थित किया," ऐसे हालातों मे पुलिसवालों ने क्या करना चाहिए ? कानून तो बदलेगा नही...कमसे कम आजतक तो बदला नही ! ना आशा नज़र आ रही है ! क़ानूनी ज़िम्मेदारियों के तहत, पुलिस, वकील, न्यायव्यवस्था, तथा कारागृह, इनके पृथक, पृथक उत्तरदायित्व हैं।

    "अपनी तफ़तीश पूरी करनेके लिए, पुलिस को अधिकसे अधिक छ: महीनोका कालावधी दिया जाता है। उस कालावाधीमे अपनी सारी कारवाई पूरी करके, उन्हें न्यायालय मे अपनी रिपोर्ट पेश करनेकी ताक़ीद दी जाती है। किंतु, न्यायलय पे केस शुरू या ख़त्म करनेकी कोई समय मर्यादा नही, कोई पाबंदी नही ! "

    शेखावतजीने ऐलानिया कहा," पुलिस तक़रीबन सभी केस इस समय मर्यादा के पूर्व पेश करती है!"( याद रहे, कि ये भारत के उपराष्ट्रपती के उदगार हैं, जो ज़ाहिरन उस वक्त पुलिस मेहेकमेमे नही थे....तो उनका कुछ भी निजी उद्दिष्ट नही था...नाही ऐसा कुछ उनपे आरोप लग सकता है!)
    "अन्यथा, उनपे विभागीय कारवाई ही नही, खुलेआम न्यायलय तथा अखबारों मे फटकार दी जाती है, बेईज्ज़ती की जाती है!! और जनता फिर एकबार पुलिस की नाकामीको लेके चर्चे करती है, पुलिसकोही आरोपी के छूट जानेके लिए ज़िम्मेदार ठहराती है। लेकिन न्यायलय के ऊपर कुछभी छींटा कशी करनेकी, किसीकी हिम्मत नही होती। जनताको न्यायलय के अवमान के तहत कारवाई होनेका ज़बरदस्त डर लगता है ! खौफ रहता है ! "
    तत्कालीन उप राष्ट्रपती महोदयने उम्मीद दर्शायी," शायद आजके चर्चा सत्र के बाद कोई राह मिल जाए !"
    लेकिन उस चर्चा सत्रको तबसे आजतक ७ साल हो गए, कुछभी कानूनी बदलाव नही हुए।

    उस चर्चा सत्र के समापन के समय श्री लालकृष्ण अडवानी जी मौजूद थे। ( केन्द्रीय गृहमंत्री के हैसियतसे पुलिस महेकमा ,गृहमंत्रालय के तहेत आता है , इस बातको सभी जानतें हैं)।
    समारोप के समय, श्री अडवाणीजी से, (जो लोह्पुरुष कहलाते हैं ), भरी सभामे इस मुतल्लक सवाल भी पूछा गया। ना उन्ह्नों ने कोई जवाब दिया ना उनके पास कोई जवाब था।
    बता दूँ, के ये चर्चा सत्र, नेशनल पुलिस commission के तहेत ( 1981 ) , जिसमे डॉ. धरमवीर ,ICS , ने , पुलिस reforms के लिए , अत्यन्त उपयुक्त सुझाव दिए थे, जिन्हें तुंरत लागू करनेका भारत के अत्युच्च न्यायलय का आदेश था, उनपे बेहेस करनेके लिए...उसपे चर्चा करनेके लिए आयोजित किया गया था। आजभी वही घिसेपिटे क़ानून लागू हैं।
    उन सुझावों के बाद और पहलेसे ना जाने कितने अफीम गांजा के तस्कर, ऐसे कानूनों का फायदा उठाते हुए छूट गए...ना जाने कितने आतंकवादी बारूद और हथियार लाते रहे, कानून के हथ्थेसे छूटते गए, कितने बेगुनाह मारे गए, कितनेही पुलिसवाले मारे गए.....और कितने मारे जायेंगे, येभी नही पता।
    ये तो तकरीबन १५० साल पुराने कानूनों मेसे एक उदाहरण हुआ। ऐसे कई कानून हैं, जिनके बारेमे भारत की जनता जानती ही नही।
    मुम्बई मे हुए ,सन २००८, नवम्बर के बम धमाकों के बाद, २/३ पहले एक ख़बर पढी कि अब e-कोर्ट की स्थापना की जा रही है। वरना, हिन्दुस्तान तक चाँद पे पोहोंच गया, लेकिन किसी आतंक वादीके मौजूदगी की ख़बर लखनऊ पुलिस गर पुणे पुलिस को फैक्स द्वारा भेजती, तो न्यायलय उसे ग्राह्य नही मानता ...ISIका एजंट पुणे पुलिसको छोड़ देनेकी ताकीद न्यायलय ने की ! वो तो लखनऊसे हस्त लिखित मेसेज आनेतक, पुणे पुलिस ने उसपे सख्त नज़र रखी और फिर उस एजंट को धर दबोचा।
    सम्पूर्ण
    Posted by Shama at 11:25 PM
    Labels: आतंकवाद, उपराष्ट्रपती., कानून, जिम्मेदारी, पुलिस, लड़ाई
    1 comments:

    दास कबीर, April 23, 2009 12:20 AM

    हमारी न्यायव्यवस्था निरंकुश छुट्टे सांड़ की माफिक हो गई है, कार्यपालिका या विधायिका पर तो अंकुश है पर न्यायपालिका पर नहीं. कार्यपालिका और विधायिका के भ्रष्टाचार पर हम उंगली उठा सकते हैं लेकिन न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर न्यायालय की अवमानना हो जाती है

    मुझे तो आश्चर्य है कि शेखावत एसा कहने की हिम्मत
    कैसे कर पाये? न्यायालय के गलत कामों पर कोई भी कहीं भी बहस नहीं हो सकती

    सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश का बेटा उसी न्यायाधीश के घर से अपनी रीयल एस्टेट कंपनी चलाता है और वह न्यायाधीश बेटे को फायदा पहुंचाने के लिये दिल्ली में सीलिंग का कहर बरपा डालता है, अनेकों प्रभावित लोग आत्महत्या कर लेते हैं, उस न्यायाधीश के बेटे को आर्थिक फायदा होता है लेकिन कोई उस न्यायाधीश के खिलाफ कुछ भी कह नहीं सकता

    मिड डे ने इस पर एक रिपोर्ट छापी थी, जिस पर उसके पत्रकार जेल भेज दिये गये और अभी भी न्यायालय की अवमानना का मामला भुगत रहे हैं,

    डॉ. धरमवीर ICS , ने पुलिस रिफार्म्स के लिए क्या सुझाव दिये थे? क्या आप इस पर एक पोस्ट लिख सकते हैं?

    उत्तर देंहटाएं
  7. गज़ब कानून..१.

    इंडियन एविडेंस एक्ट,(IEA) कलम २५ और २७ के तहेत बने कानून ..इन कानूनों के रहते हमआतंकवाद या अन्य तस्करीसे निजाद पाही नही सकते...
    किसीने आँखों देखा सत्य प्रस्तुत कर रही हूँ.....
    ( Commonwealth Human Rights Initiative), ये संघटना 3rd वर्ल्ड के तहेत आनेवाले देशों मे कार्यरत है।
    इसके अनेक उद्दिष्ट हैं । इनमेसे,निम्लिखित अत्यन्त महत्त्व पूर्ण है :
    अपने कार्यक्षेत्र मे रिफोर्म्स को लेके पर्याप्त जनजागृती की मुहीम.
    ये संघटना इस उद्दिष्ट प्राप्ती के लिए अनेक चर्चा सत्र आयोजित करती रहती है।
    ऐसेही एक चर्चा सत्र का आयोजन, २००२ की अगस्त्मे, नयी देहली मे किया गया था। इस सत्र के अध्यक्षीय स्थानपे उच्चतम न्यायालयके तत्कालीन न्यायाधीश थे। तत्कालीन उप राष्ट्रपती, माननीय श्री भैरव सिंह शेखावत ( जो एक पुलिस constable की हैसियतसे ,राजस्थान मे कार्यरत रह चुके हैं), मुख्य वक्ता की तौरपे मौजूद थे।
    उक्त चर्चासत्र मे देशके हर भागसे अत्यन्त उच्च पदों पे कार्यरत या अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्रों से ताल्लुक रखनेवाली हस्तियाँ मोजूद थीं : आला अखबारों के नुमाइंदे, न्यायाधीश ( अवकाश प्राप्त या कार्यरत) , आला अधिकारी,( पुलिस, आईएस के अफसर, अदि), वकील और अन्य कईं। अपने अपने क्षेत्रों के रथी महारथी। हर सरकारी मेहेकमेकों के अधिकारियों के अलावा अनेक गैर सरकारी संस्थायों के प्रतिनिधी भी वहाँ हाज़िर थे। (ngos)

    जनाब शेखावत ने विषयके मर्मको जिस तरहसे बयान किया, वो दिलो दिमाग़ को झक झोर देने की क़ाबिलियत रखता है।

    श्री शेखावत ने प्रश्न उठाया ," कोईभी मुझे बताये , जहाँ मीलों किसी इंसान या पानीका नामो निशाँ तक न हो , वहाँ, पञ्च कहाँ से उपलब्ध कराये जाएँ ? ? तो लाज़िम है कि , पुलिसवाला तस्करको पकड़ अपनेही ही ऊँट पे बिठा ले। अन्य कोई चारा तो होता ही नही।
    "उस तस्करको पकड़ रख, वो पुलिसकर्मी सबसे निकटतम बस्ती, जो २०/ २५ किलोमीटर भी हो सकती है, ले जाता है। वहाँ लोगोंसे गिडगिडा के दो " इज्ज़तदार व्यक्तियों" से इल्तिजा करता है। उन्हें पञ्च बनाता है।
    " अब कानूनन, पंचों को आँखों देखी हकीकत बयान करनी होती है। लेकिन इसमे, जैसाभी वो पुलिसकर्मी अपनी समझके अनुसार बताता है, वही हकीकत दर्ज होती है। "पञ्च" एक ऐसी दास्तान पे हस्ताक्षर करते हैं, जिसके वो चश्मदीद गवाह नही। लेकिन कानून तो कानून है ! बिना पंचानेमेके केस न्यायालय के आधीन होही नही सकता !!
    " खैर! पंचनामा बन जाता है। और तस्कर या जोभी आरोपी हो, वो पुलिस हिरासतसे जल्द छूट भी जता है। वजह ? उसके बेहद जानकार वकील महोदय उस पुलिस केस को कानून के तहेत गैरक़ानूनी साबित करते हैं!
    " तत्पश्च्यात, वो आरोपी, फिर से अपना धंदा शुरू कर देता है। पुलिस पे ये बंधन होता है की ३ माह के भीतर वो अपनी सारी तहकीकात पूरी कर, न्यायालयको सुपुर्द कर दे!! अधिकतर ऐसाही होता है... ! फिर चाहे वो केस, न्यायलय की सुविधानुसार १० साल बाद सुनवाईके लिए पेश हो या निपटाया जाय....!

    "अब सरकारी वकील और आरोपी का वकील, इनमे एक लम्बी, अंतहीन कानूनी जिरह शुरू हो जाती है...."
    फिर एकबार व्यंग कसते हुए श्री शेखावत जी ने कहा," आदरणीय जज साहब ! एक साधारण व्यक्तीकी कितनी लम्बी याददाश्त हो सकती है ? २ दिन २ माह या २ सालकी ??कितने अरसे पूर्व की बात याद रखना मुमकिन है ??
    ये बेहद मुश्किल है कि कोईभी व्यक्ती, चश्मदीद गवाह होनेके बावजूद, किसीभी घटनाको तंतोतंत याद रखे !जब दो माह याद रखना मुश्किल है तब,१० सालकी क्या बात करें ??" (और कई बार तो गवाह मरभी जाते हैं!)
    " वैसेभी इन २ पंचों ने (!!) असलमे कुछ देखाही नही था! किसीके " कथित" पे अपने हस्ताक्षर किए थे ! उस " कथन" का झूठ साबित करना, किसीभी वकील के बाएँ हाथका खेल है ! और वैसेभी, कानून ने तहेत किसीभी पुलिस कर्मी के मौजूदगी मे दिया गया बयान ,न्यायलय मे सुबूतके तौरपे ग्राह्य नही होता ! वो इक़्बालिये जुर्म कहलाही नही सकता।( चाहे वो ह्त्या का केस हो या अन्य कुछ) ।(IEA ) कलम २५ तथा २७ , के तहेत ये व्यवस्था अंग्रेजों ने १५० साल पूर्व कर रखी थी, अपने खुदके बचाव के लिए,जो आजतक कायम है ! ज़ाहिरन, किसीभी पुलिस करमी पे, या उसकी बातपे विश्वास किया ही नही जा सकता ऐसा कानून कहता है!! फिर ऐसे केसका अंजाम क्या होगा ये तो ज़ाहिर है !"

    उत्तर देंहटाएं
  8. Is aalekh kaa kaafee hissa( pehele bhaag kaa, mujhe edit karna pada, kyonki tippanee swweekkrut nahee ho rahee thee...mool post pe jaake padhen,ye namr guzarish hai..
    shama

    http://lalitlekh.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  9. चलिए सब कानूंविद यहाँ इकठ्ठे हो गये अच्छी बात है ।

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियों से उत्साह ...बढ़ता है...और बेहतर लिखने के लिए प्रेरणा भी..। पोस्ट के बाबत और उससे इतर कानून से जुडे किसी भी प्रश्न , मुद्दे , फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहें तो भी स्वागत है आपका ..बेहिचक कहें , बेझिझक कहें ..

Google+ Followers