इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

अदालतों में लागू होगा डोकेट सिस्टम

मैं अपने पिछले दो आलेखों में बता चुका हूँ की अदालतें, कम से कम दिल्ली की अदालतें तो जरूर ही, बहुत से ऐसे उपाय करने की कोशिस कर रही हैं, जो न सिर्फ़ अदालतों का बोझ कम करने में सहायक होंगी बल्कि यदि पूरी तरह से लागू की गयी तो एक क्रांतिकारी परिवर्तन साबित होंगी। पिछले वर्ष नवम्बर में संपन्न न्यायाधीशों के सम्मलेन में कई नए सुझाव और उपायों पर खुल कर चर्चा हुई । जिसके निष्कर्ष स्वरुप कुल १६९ उपायों पर काम करना तय हुआ। इसी महत्वाकांक्षी परियोजना को अमली जमा पहनाने हेतु राजधानी की सभी जिला अदालतों में एक विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए गए । इस दिशा निर्देश में एक अदने से कर्मचारी से लेकर वरिष्ठ न्यायाधीश तक के लिए कोई न कोई आदेश निर्देश जारी किए गए। सकारात्मक बात ये है की इस बार ये भी तय किया गया कि ये परियोजना सिर्फ़ कागजों पर न रह कर जितनी जल्दी हो सके मूर्त रूप ले सके।

ऐसा ही एक निर्देश था अदालतों में डोकेट सिस्टम लागू करने का। इस सिस्टम को समझने से पहले कुछ बातों के बारे में जानते हैं। आज जो हालत हैं उनमें किसी भी अदालत पर मुकदमों का इतना ज्यादा बोझ रहता है कि न्यायिक अधिकारी चाह कर भी एक एक मुकदमें को ख़ास तवज्जो नहीं दे पते। हालत ऐसी होती है कि आधे घंटे बाद ये नहीं पता होता कि अमुक व्यक्ति का कौन सा मुकदमा था और उमें आज क्या हुआ। ऐसे में सभी की एक आम शिकायत होती है कि उनकी बात नहीं सूनी जा रही है। कई बार इसीलिए अन्तिम समय में आदेश या फैसला तक टल जाता है । ये तो सच है कि मुकदमों का बोझ बहुत ज्यादा होने के कारण ही ऐसा होता है, किंतु पाया ये गया कि कई बार या कहें कि बहुत बार सिर्फ़ मुकदमों के सही तरीके के नियोजन के अभाव के कारण भी ऐसा होता है। किसी दिन किसी अदालत में ढेरों मुकदमें सिर्फ़ गवाही में ही लग जाते हैं। नतीजा वही कि बहुत से गवाहों को वापस जाना पड़ता है। अब इस नए डोकेट सिस्टम के लागू होने के बाद ऐसा नहीं होगा। दरअसल इस सिस्टम से अदालत में लंबित मुकदमों को , वरीयता, उनकी गंभीरता, उनमें गवाहों की कुल संख्या, मुकदमें की उम्र के हिसाब से बेहद संतुलित तरीके से अनुपातित करके उन्हें तारीख दी जायेगी। इस बात की पूरी कोशिश की जायेगी कि कोई भी मुकदमा सिर्फ़ तारीख देने के लिए, या औपचारिकता भर के लिए न रह सके।

दरअसल इस बात की परिकल्पना , कुछ वर्ष पहले न्याय दिवस पर बोलते हुए मुख्या न्यायाधीश ने की थी। उन्होंने तो तो इस कार्य के लिए बाकायदा कोर्ट मैनेजर के पद की अनुशंषा भी की थी , जिस पर फिलहाल कोई भी कार्ययोजना अभी लागू नहीं की गयी है । इस सिस्टम के लिए अभी अदालतों में कार्यरत पेशकार और अहलमद मिल कर पूरी योजना को अमली जामा पहनाएंगे। न्यायिक अधिकारियों को इस बात से मुक्त रखा जायेगा कि अमुक दिन कौन सा मुकदमा किस उद्देश्य के लिए रखा जायेगा, अलबता सब कुछ उनके ही दिशा निर्देश के अनुसार किया जायेगा.यदि ये डोकेट सिस्टम सफल हो गया तो न सिर्फ़ अदालतें बिल्कुल व्यवस्थित होकर कायर करेंगी बल्कि एक आम आदमी को भी ये डर नहीं रहेगा कि कहीं उसका काम आज न हो और उसे सिर्फ़ तारीख मिले। किंतु विश्लेषक ये मान रहे हैं कि उन स्थितियों में जहाँ मुकदमों की संख्या बहुत ज्यादा है वहां ये सिस्टम ज्यादा कारगर नहीं साबित होगा, क्योंकि किसी भी हालत में प्रतिदिन लगने वाले मुकदमों की संख्या को कम नहीं किया जा सकेगा। देखना ये है कि ये सिस्टम कितना सफल या असफल हो पायेगा.

2 टिप्‍पणियां:

आपकी टिप्पणियों से उत्साह ...बढ़ता है...और बेहतर लिखने के लिए प्रेरणा भी..। पोस्ट के बाबत और उससे इतर कानून से जुडे किसी भी प्रश्न , मुद्दे , फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहें तो भी स्वागत है आपका ..बेहिचक कहें , बेझिझक कहें ..

Google+ Followers