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मंगलवार, 8 जुलाई 2008

अदालत में गवाही देने से पहले (भाग -१)


आज का सामाजिक परिवेश, आसपास का माहौल, घटते हादसे, और बढ़ते अपराध ने स्थिति ऐसी कर दी है की किसी न किसी वजह से सबको अदालत के दरवाजे तक पहुंचना ही पड़ता है। कोई किसी की अदावत के कारण ख़ुद पहुंचता है तो कोई मजबूरी में सामने वाले का जवाब देने पहुंचता है। कोई किसी की तरफ़ से गवाही देने जा रहा है तो कोई किस की जमानत देने।

आज के अंक में हम जिक्र कर रहे हैं की किसी को गवाही देते समय किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। संक्षेप में ये बताते चले की गवाह अभियोजन पक्ष या वादी की तरफ़ से आरोपी या परतिवादी के ख़िलाफ़ बयान देने की सहमती देता है वह गवाह होता है और उसकोगवाही ही पूरे मुकदमें का आधार बनती है। दीवानी मुकदमों में दोनों पक्षकारों के अलावा वे जिसका नाम व सूची अदालत में पेश करें वही गवाह के रूप में अदालत में बुलाया जाता है। अब उन बातों को जानें जो गवाह के लिए महत्वपूरण हैं।

किसी भी हादसे , दुर्घता, झगडे, वारदात आदि के समय पुलिस kaaryawaahee की जाती है तो अपनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद पुलिस का पहला काम होता है गवाहों को ढूँढना और धारा १६१ सी आर पी सी के तहत बयान दर्ज करना।घटना, दुर्घटना, के आसपास पुलिस घर के व्यक्ति, पड़ोसी , पास बैठे दूकानदार अथवा सड़क पर चल रहे व्यक्ति को भी गवाह बना सकती है। बशर्ते उसका उस घटना या वारदात से कोई सम्बन्ध हो। यहाँ गवाही देने वाले व्यक्ति को ये ध्यान रखना चाइये की वह पुली को दिए गए बयान की एके प्रति उस अधिकारी से लेकर अपने पास रख ले, ये उसका हक़ है। अदालत में गवाही देते समय ये उसके लिए सहायक साबित होगी। बलात्कार के मुकदमों में पीडिता का बयान यदि दंडाधिकारी के समक्ष हुआ है तो वह इतना महत्त्वपूर्ण है की कालांतर में उस बयान से मुकरने पर सजा तक हो सकती है।


क्रमशः ......

2 टिप्‍पणियां:

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