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बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

सडक दुर्घटनाओं पर गंभीर होती अदालतें...

राजधानी दिल्ली में दिनोंदिन बढती सडक दुर्घटनाओं पर अदालतों ने बहुत ही गंभीर रुख अख्तियार कर लिया है। अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राजधानी में बढ रही दुर्घटनाओं के मद्देनज़र . निचली अदालतों, पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों , न्यायिक प्रक्रियाओं को एक साथ ही बहुत से निर्देश दिये हैं। अब तक चली आ रही व्यवस्था के तहत , दुर्घटना के बाद पुलिस सिर्फ़ एक ही तरह का मुकदमा दर्ज़ करती है ।और प्राथमिकी , चोटिल या म्रत व्यक्ति की चिकित्सकीय रिपोर्ट आदि की प्रति मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम पंचाट में जमा कर दी जाती है। जहां से इच्छित व्यक्ति , जो भी क्लेम करना चाहता है तो उस प्रति को प्राप्त कर मुकदमा दायर करता है।

इस वर्तमान व्यवस्था में दो बहुत ही बडी खामियां थी । पहली तो ये कि जानकारी के अभाव में आम लोगों को पता ही नहीं चल पाता है कि उनके क्लेम के लिये सबसे जरूरी कागजात पंचाट में जमा हैं । दूसरा ये कि यदि किसी तरह से उन्हें पता चल भी जाता है तो उसे प्राप्त करने की जद्दोजहद पीडित के लिये बहुत ही कठिन होता है। न्यायालय ने इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए नयी व्यवस्था शुरू की है। नए निर्देशों मे से जो प्रमुख हैं वे इस प्रकार हैं।

अब किसी भी दुर्घटना के बाद मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम के धारा १५८ (६) के तहत पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि संबंधित कागजातों को जमा करने के बाद , पंचाट न्यायालय उन्हें एक निश्चित तारीख देते हैं जिस तारीख पर उन्हें संबंधित सभी पक्षों,,यानि दावाकार, चोटिल या म्रत व्यक्ति, ..दूसरे पक्ष के चालक, वाहन के मालिक और इंश्योरेंस कंपनी की उपस्थिति सुनिश्चित करे। इसका अर्थ ये हुआ कि अब सारी जिम्मेदारी पुलिस पर डाली गयी है ताकि कोई भी पीडित मुआवजे से वंचित न रहे । इसका दूसरा लाभ ये हो रहा है कि जैसे ही सभी पक्ष उपस्थित हो जाते हैं , पंचाट अपनी पहल करते हुए उन्हीं जांच प्रक्रियाओं को दावा याचिका के रूप में परिवर्तित करके उन्हें मुआवजा दिलवा देती हैं। इससे जहां त्वरित न्याय का उद्देश्य पूरा हो रहा है वहीं , वकील, मुकदमे आदि के खर्च से भी पीडित को छुटकारा मिल जाता है ।

राजधानी में हो रही दुर्घटनाओं मे सबसे अधिक ,दुर्घटनाओं के लिये कुख्यात हो चुकी ्दिल्ली की ब्लू लाईन बसों के परिचालन, से संबंधित कई दिशा निर्देशों और समय समय पर कई कानूनों के बावजूद स्थिति में बहुत ज्यादा फ़र्क नहीं पडता देख..न्यायालय ने नए आदेशों के तहत ये आज्ञा दी कि अब किसी भी ऐसी दुर्घटना में जिसमें कोई गंभीर रूप से कोई घायल होगा उसमें पचास हजार की राशि....और यदि किसी की दुर्घटना में ही मौत हो जाती है तो उसमें एक लाख रुपए की रकम ..संबंधित बस के मालिक को अदालत में जमा करवानी होगी ..इस राशि के जमा किये बगैर ..वाहन को पुलिस के जब्तीकरण से नहीं छोडा जाएगा । सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस राशि को बिना विलंब के ..पीडित को दिये जाने की व्यवस्था की जाएगी।

इसके अलावा सभी दुर्घटना वादों, दावा याचिकाओं, न्यायिक व्यवस्थाओ,प्रक्रियाओं और इससे जुडे तमाम पहलुओं पर उच्च न्यायालय निरंतर निगाह रखे हुए है। सबसे अच्छी बात ये है कि इन नयी व्यवस्थाओं के सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं॥

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

मीडिया ट्रायल पर नकेल कसने की तैयारी

पिछले कुछ समय से , जब से मीडिया में तेज से तेज खबर दिखाने-सुनाने की होड की परंपरा की शुरूआत हुई है तब से मीडिया ,रिपोर्टिंग करने में, समाचारों को प्रस्तुत करने में , और घटना दुर्घटना के कारणों-परिणामों तक पहुंच जाने में ज्यादा ही गैर जिम्मेदार और लापरवाह हो गयी है। अन्य सभी जगहों पर तो फ़िर भी जानबूझ कर की गई इन गल्तियों, भूलों को एक हद तक क्षम्य माना जा सकता है किंतु अदालती मुकदमों में ये बहुत ही निर्णायक और कम से कम दिशा भटकाने वाले तो हो ही जाते हैं । अदालतों के बार बार आगाह किये जाने के बाद और कई बार कठोर चेतावनी दिये जाने के बाद, शायद व्यावसायिक लाभ के लोभ में मीडिया खुद को संयमित और नियंत्रित नहीं कर पा रही है ।किंतु अब ऐसा नहीं होगा।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस तथाकथित मीडिया ट्रायल पर नकेल कसने हेतु पहल कदम बढा दिया है । दरअसल अभी हाल ही में उच्च न्यायालय में विवादित पुलिस एनकाउंटर बटाला हाउस प्रकरण में मीडिया के पास कुछ अपराधियों के बयान की की पूरी सूचना लीक होने की बात पर विरोध जताते हुए न्यायालय से अनुरोध किया गया था कि , मीडिया द्वारा संवेदनशील मामलों में ऐसी लापरवाही दिखाने को प्रतिबंधित किया जाए। इसके साथ ही इस याचिक में पुलिस अधिकारियों द्वारा घटनाओं, अपराधों, के बाद प्रेस कांफ़्रेस बुला कर सभी बातों के खुलासे और विशेषकर अपराध और अपराधी के बारे में निर्णायक बयान जारी किये जाने को लेकर भी आपत्ति उठाई गयी थी। ज्ञात हो कि आरुषी मर्डर केस में ऐसी ही एक प्रेस कांफ़्रेंस में उत्तर प्रदेश पुलिस के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी तक द्वारा इतन बचकाना बयान और कहानी सुनाई गयी कि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने उन अधिकारी को वहां से हटा कर उसकी भरपाई की। और पुलिस के उस तथाकथित जांच का क्या परिणाम निकला , यह किसी से छुपा नहीं है।

माननीय उच्च न्यायालय ने प्रेस कांउसिल औफ़ इंडिया से आग्रह किया है कि ,इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए, अपने पत्रकारों को इस हेतु पर्याप्त प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करे ताकि जो भी लोग न्यायालय से जुडी कार्यवाही की रिपोर्टिंग करते हैं, आपराधिक घटनाओं की सूचना एकत्र करते हैं, उन्हें प्रस्तुत करते हैं। उन तमाम लोगों को इस बात का पूरा इल्म होना चाहिये कि इसका परिणाम क्या हो सकता है। इसके साथ ही पुलिस प्रशाशन को भी ये निर्देश दिये गये हैं कि वे भी अपने अधिकारियों को सिखायें कि .प्रेस को बुलाते समय और उन्हें सूचनी देते समय किन किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिये।कुल मिला कर न्यायालय चाहता है कि मीडिया ऐसी रिपोर्टों को कवर करते समय अपने लिये कुछ हद तय कर ले। अब देखना ये है अदालत के इन नये प्रयासों से देश के निरंतर भटक रहे मीडिया की आंखे कितनी खुल पाती हैं.....?


शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

देश भर की न्यायिक कार्य प्रणालियों का किया जा रहा है अध्य्यन


मैं इस ब्लोग की अपनी पिछली कई पोस्टों से इस बात का ज़िक्र कर हूं.....कि देर से ही सही अब सरकार न्यायिक ढांचे को नये सिरे से चुस्त दुरुस्त करने में संजीदा दिख रही है.....रह रह कर नये उपाय , नयी घोषणा , और बहुत सी योजनयें....सामने आ रही हैं....ये जरूर है कि फ़िलहाल अदालतों पर जो बोझ है उसे कम करने में फ़ौरी तौर पर शायद ये इतनी प्रभावी न लगें....मगर खुद न्यायालय में कार्यरत रहने के कारण अपने अनुभवों से इतना तो यकीन से कह सकता हूं कि ...भविष्य में इसका अच्छा परिणाम निश्चित रूप से सामने आने की पूरी संभावना है.....

जिस तरह से खुद अदालत ने अभी हाल ही में ...सूचना के अधिकार के तहत .....अपनी स्थिति को स्पष्ट किया ...उसने एक बार फ़िर न सिर्फ़ न्याय व्यवस्था ने अपना कद बडा कर लियी बल्कि ....पिछले दिनों जो उस पर एक अविश्वास की परत बैठाने की कोशिश की जा रही थी उस पर भी विराम लग गया.....और अब शायद ये इस प्रकरण का अंत भी था.....
अभी हाल ही में ...केन्द्र सरकार द्वारा एक महत्वाकांक्षी योजना के तहत देश भर की तमाम अदालतों में प्रचलित न्यायिक कार्यप्रणाली का अध्य्यन किया जा रहा है। इस उद्देश्य से सभी अदालतों से जानकारी एवम सुझाव मांगे गये हैं । इनके अध्ययन के बाद सरकार की योजना है कि वे कार्यप्रणालियां जो सबसे अधिक कारगर और प्रायोगिक होंगी उन्हें एक साथ ही पूरे देश की अदालतों मे लागू किया जायेगा। उदाहरण के लिये अभी बहुत से राज्यों मे शरद और ग्रीष्मकाल में अदालतों के काम करने का समय बदल जाता है। इसके अलावा, गवाही, दावों को उनकी वरायता के हिसाब से उनका निपटारे का नियोजन, और भी अन्य सभी पहलुओं पर विचार एकत्र किये जा रहे हैं। इसे अमली जामा पहनाने में कितना वक्त लगेगा , ये तो अभी तय नहीं है, मगर जिस दिन भी ये संभव हो सकेगा उस दिन निसंदेह ये बहुत ही लाभदायक कदम सिद्ध हो सकेगा।


इसी कदम के साथ साथ देश के सभी क्षेत्रों के न्यायिक अधिकारियो/न्यायाधीशों को भी ,राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में एक लंबी चलने वाली कार्यशाला के तहत आपस में मिल बैठ कर विचारों का आदान प्रदान, न्यायिक चुनौतियों पर विमर्श, नये पुराने कानूनों की उपयोगिता एवम सार्थकता पर बहस...आदि के लिये आमंत्रित किया जा रहा है। इसमें वे सब सौ सौ के बैच के अनुसार अलग अलग राज्यों से चुन कर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में पहुंच रहे हैं तथा इस कार्यशाला में भाग ले रहे हैं। इस दीर्घकालीन कार्यशाला का शुभारंभ हो चुका है। इसके परिणाम क्या और कितने प्रभावी होंगे ये तो भविष्य ही बतायेगा। मगर इतना यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि अदालतों के ऊपर तो दायित्व आज है..उसका निर्वहन करने के लिये इस तरह के कार्यक्रम और प्रतिबद्धता तो दिखानी ही होगी..





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