रविवार, 12 सितंबर 2010

दिल्ली का कचहरी का बदलता चेहरा .......

जैसा कि मैंने अपनी पूर्व में लिखी पोस्टों में बताया था कि दिल्ली की अदालतों, उनमें चल रही कार्यवाही प्रणालियों, कर्मचारियों के लुक, सभी तकनीकों को आधुनिक करने , उन्हें परिवर्तित करने पर बहुत सी योजनाएं एक साथ चलाई जा रही हैं आज मैं दिखाता हूं नई और पुरानी अदालत का स्वरूप :-


ये हुआ करती थीं ,पुरानी अदालतें



और ये नीचे हैं, अत्याधुनिक तकनीक , लेजर कैमरों , सीसीटीवी , वीडियोकांफ़्रेंसिंग, डौकेट सिस्टम , की स्टेटस सिस्टम और पूर्णतयावातुनुकुलित नई अदालत का चेहरा


ऐसा कई कारणों से किया जा रहा है । अदालत की छवि बदलने के लिए, वहां आने जाने वालों की सहूलियत , तथा बेहतर वातावरण से मुकदमों के निस्तारण के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना । अब ये तो वक्त ही बताएगा ,कि ..........अदालत के ये बदलते चेहरे .......आम आदमी के चेहरे पर कितना सुकून और मुस्कुराहट ला पाएंगे ....अन्यथा ये खूबसूरती भी बदसूरत ही साबित होगी ॥

शनिवार, 15 मई 2010

टांय टांय फ़िस्स हुई अदालती कर्मचारियों को वर्दी पहनाने की योजना


अपने एक आलेख में आपको बताया था कि न्यायपालिका ने दिल्ली की अधीनस्थ न्यायालय में भ्रष्टाचार को हटाने और बदलाव के मद्देनज़र बहुत से परिवर्तनों के साथ साथ सभी कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड की व्यवस्था का विचार रखा था । पहले इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रयोग के तौर पर लागू किया गया । आनन फ़ानन में न सिर्फ़ सभी कर्मचारियों की वर्दी का नाप लिया गया बल्कि उनकी नाम पट्टिका, आदि भी तैयार करा दी गई । आज सभी कर्मचारी वर्दी में दिखते हैं । इसे सख्ती से लागू करने के लिए ये आदेश भी जारी किया गया कि जो भी वर्दी पहन के नहीं आएगा उसकी उस दिन की तन्ख्वाह , उसके वेतन में से काट ली जाएगी । इसके बाद इस प्रयोग को दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों में भी लागू करने का निर्णय लिया गया ।

अधीनस्थ न्यायालय में जब इसकी शुरूआत हुई तो सामने शीतकालीन सत्र शुरू होने वाले थे । इसलिए सबसे पहले फ़ैसला ये लिया गया कि शीतकालीन वर्दी के रूप में पुरूष कर्मचारियों के कोट और पैंट का नाप ले लिया गया और चूंकि महिला कर्मियों को साडी /सूट के ऊपर ही उसे पहनना था लिहाज़ा उनके कोट का नाप लिया गया । ये टुकडों टुकडों में सभी अधीनस्थ अदालतों में हुआ । इसका परिणाम ये हुआ कि बहुत से कर्मचारियों की वर्दी तैयार हो कर आ गई तो बहुतों का नाप भी नहीं लिया जा सका । इसके बाद कुछ दिनों बाद ही ग्रीष्मकालीन वर्दी का नाप भी लिया गया । ये पुरूष और महिला कर्मियों दोनों का ही लिया गया । गफ़लत का आलम ये था कि सर्दियों की वर्दी का नाप पहले लिए जाने के बावजूद ग्रीष्म कालीन वर्दियां पहले तैयार होकर आ गईं ।

और यहीं से सारी गडबड शुरू हुई । उस वर्दी के मिलते ही कपडे की क्वालिटि और उसकी बेढंगी सिलाई का मामला इतना उछला कि वो अखबारों की सुर्खियां बन गयी । जब अधिकारियों को ये पता चला तो उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए आदेश जारी किया कि सप्ताह के अलग अलग दिन अदालत में ही दर्ज़ी बैठेंगे जो कर्मचारियों की वर्दी की नाप संबंधी कमियां दूर करेंगे । बहुत से कर्मचारियों ने वर्दी के कपडे से एलर्जी और त्वचा संबंधी शिकायत करते हुए उसे वापस ही कर दिया । उधर महिला कर्मियों की ग्रीष्म कालीन वर्दी का नाप लेकर जाने के बाद से उस दिशा में कभी कोई सुगबुगाहट भी सुनाई नहीं दी । ऐसा सुना गया कि पुरूष कर्मचारियों की वर्दी सिलने वाली कंपंनी के अनुभवों को देखते हुए उसने भागना ही मुनासिब समझा ।


इसके कुछ माह बाद अचानक ही आदेश आया कि जिन भी कर्मचारियों को वर्दी दी गई है , इस आदेश के तहत उनके लिए ये वर्दी पहनना अनिवार्य किया जाता है । इस आदेश का असर भी दिखा और अगले ही कुछ दिनों में अधिकांश पुरूष कर्मचारी वर्दी में दिखने लगे । मगर एक बार फ़िर इस कदम को बडा झटका लगा जब पता चला कि दिल्ली की राज्य सरकार ने न्यायालय के कर्मचारियों की वर्दी के लिए निर्धारित धुलाई एवं वर्दी रखरखाव भत्ता देने में असमर्थता जता दी है । इस निर्णय के बाद सभी अदालती कर्मचारियों ने अपनी अपनी वर्दी को तिलांजलि दे दी है । अभी तो इसे पूरी तरह अमल में लाना ही कठिन साबित हुआ , इसके परिणामों का आकलन तो दूर की बात थी । इस योजना ने न सिर्फ़ सरकार की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं बल्कि ये भी जता दिया है कि अदालती सुधारों के प्रति वो कितनी संवेदनशील है ।

रविवार, 2 मई 2010

साठ दिनों के अंदर मोटर दुर्घटना का मुआवजा दिलवाने की कवायद




राजधानी दिल्ली में मोटर वाहन दुर्घटनाओं की बढती संख्या और उसमें प्रभावित लोगों , चोटिल व्यक्तियों तथा मृतकों के आश्रितों को मुआवजा दिलाने के लिए दायर किए जाने वाले वादों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि , सरकार , प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका के लिए भी चिंता का सबब बन गए थे । इसी के मद्देनज़र एक अपील की सुनवाई करते हुए हाल में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस दिशा में एक एतिहासिक पहल करते हुए कई बडे निर्देश जारी किए और न सिर्फ़ निर्देश जारी किए बल्कि उनके त्वरित क्रियान्वयन के लिए निचली अदालतों , पुलिस विभाग , बीमा कंपंनियों को कई निर्देश दिए गए हैं ।

२ अप्रैल से शुरू की गई इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लेते हुए एक महीने के बाद इससे स्थिति में आए अंतर को बताने के लिए सभी को इसकी क्रियान्वयन रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने को कहा गया है ।इन निर्देशों के तहत ये निम्नलिखित आदेश जारी किए गए हैं

पुलिस विभाग के लिए :- दिल्ली पुलिस को ये आदेश दिया गया है कि दिल्ली में बढती वाहन दुर्घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए पीडित को तवरित न्याय दिलवाने के लिए विशेष व्यवस्था और प्रबंध किए जाएं । ज्वाईंट कमिशनर औफ़ पुलिस की अध्यक्षता में गठित एक विशेष कार्यदल इस दिशा में काम करेगा । इसके लिए सभी जिलों में विशेष एम ए सी टी ( मोटर ऐक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ) सैल को स्थापित करने का आदेश दिया गया है । इस सैल में विशेष तौर से प्रशिक्षण प्राप्त पुलिसकर्मी , २ अप्रैल के बाद से घटित किसी भी दुर्घटना में एक विशेष विस्तृत दुर्घटना रिपोर्ट दायर करेंगे । इससे पहले ये महज ए आई आर ( एक्सीडेंट इंफ़ोर्मेशन रिपोर्ट ) के रूप में अदालत में प्रस्तुत की जाती थी जिसमें प्राथमिक जानकारी भर होती थी । मगर अब ये डी ए आर ( डिलेट्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट ) के रूप में प्रस्तुत की जानी होगी । इस डी ए आर में , एक चैक लिस्ट के साथ जिसमें कुल अट्ठाईस कालम में , दुर्घटना की पूरी जानकारी , पीडित की , उसके परिवार की , पीडित की आय , उसका खर्च , दुर्घटना में शामिल वाहन के विषय में पूरी जानकारी , वाहन के चालक , उसके रजिस्टर्ड मालिक , बीमा कंपंनी आदि की पूरी जानकारी के साथ साथ ये भी कि बीमा कंपंनी पीडित व्यक्ति को कितने मुआवजे की पेशकश कर रही है । इतना ही नहीं माननीय उच्च न्यायालय ने जब देखा कि बहुत बडी संख्या में नकली लाईसेंस धारी और नाबालिग चालक ऐसी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार हैं ,उन्हें बख्शा न जाए और उनके खिलाफ़ आपराधिक मुकदमा दर्ज़ किया जाए

बीमा कंपंनियों के लिए :- माननीय उच्च न्यायालय ने पाया कि बीमा कंपंनियां , जो ऐसे दुर्घटना क्लेम वादों में बहुत ही निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं , मगर उनके उदासीन रहने के कारण ऐसा नहीं हो पाता है । इसलिए इन निर्देशों में बीमा कंपंनियों को भी सीधा सीधा कई निर्देश दिए गए । सभी बीमा कंपंनियों से कहा गया कि , वे सब एक एक नामित विशेष बीमा अधिकारी को प्रत्येक ट्रिब्यूनल में खास तौर पर सिर्फ़ इसलिए नियुक्त करें वे पीडित की उपस्थिति होते ही बीमे की रकम का भुगतान हेतु समझौते की प्रक्रिया के तहत उसे त्वरित न्याय दिलवानें में सहायता करें । इतना ही नहीं , उन्हें कहा गया है कि वे खुद ही सभी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए अपनी तरफ़ से एक निश्चित राशि का प्रस्ताव रखें , और कोशिश करें कि पीडित को उसी दिन मुआवजा मिल सके । सभी बीमा कंपंनियों के ये निर्देश दिए गए हैं कि वे सभी दुर्घटना दावों के लिए एक अलग से डाटा बेस तैयार करवाएं , ऐसे सभी वादों में जिनमें नकली लाईसेंस की बात सामने आती है उनमें अपनी पहल पर उन चालकों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज़ करवाएं ।जो मुकदमें अदालती कार्यवाही और फ़ैसले द्वा खत्म हो रहे हैं , उनमें उनके मुआवजे की राशि तीस दिन के अंदर अंदर अदालत में जमा करवा दी जाए ।

निचली अदालतों के लिए :- निचली अदालतों को ये निर्देश दिए गए हैं कि उक्त आदेशों का क्रियान्वयन पूरी गंभीरता से करवाएं । इस बात की तस्दीक के लिए उन्हें ये आदेश दिया गया है कि निश्चित समयावधि पर नियमित रूप से इन सभी मुकदमों की प्रगति रिपोर्ट वे उच्च न्यायालय को प्रेषित करें , जिनका आकलन और विश्लेषण करने के बाद आगे के निर्देश दिए जाएंगे । बसों द्वारा , खास कर ब्लू लाईन बसों द्वारा की जा रही दुर्घटनाओं की बहुत बडी संख्या को उच्च न्यायालय ने बहुत ही गंभीरता से लिया और आदेश पारित कर दिया कि ब्लू लाईन बसों द्वारा की गई किसी भी दुर्घटना वाले मामले में पुलिस बस को ज़ब्त कर ले और तब तक उन्हें न छोडे जब तक कि वे , यदि पीडित व्यक्ति मृत है तो एक लाख और यदि गंभीर रूप से घायल है तो पचास हज़ार रुपए की राशि निचली अदालत में जमा न करवा दे । ये राशि अविलंब और अंतरिम सहायता के रूप में पीडित को दी जानी चाहिए । उन सभी मामलों में , जिनमें कि दुर्घटना में लिप्त वाहन का बीमा नहीं है , उनके लिए आदेश जारी किया गया कि उन वाहनों तो तब तक न छोडा जाए जब तक कि वाहन मालिक बतौर मुआवजा सुरक्षा राशि ,एक निश्चित रकम अदालत में न जमा करवा दे ।


वे मुकदमें जिनमें बीमा कंपनी प्रतिवादी के रूप में नहीं है , उन्हें आवश्यक रूप से मध्यस्थता से सुलझाने का प्रयास किया जाए । इसके लिए मध्यस्थता केंद्रों के साथ साथ मोटर वाहन दुर्घटना स्थाई लोक अदालतों का गठन किया जाए ।
मोटर वाहन दुर्घटना वादों के निपटारे में तेज़ी लाने के उद्देश्य से किए गए इन नए बदलावों का एक सकारात्मक परिणाम दिखने भी लगा है । हालांकि अभी भी पुलिस और बीमा कंपंनियां न तो अपेक्षित श्रम ही कर रही हैं इस दिशा में , न ही इन मुकदमें के प्रति उतनी संवेदी दिख रही हैं जितनी कि अदालतें हैं , किंतु फ़िर भी इसके शुरूआती परिणाम निश्चित रूप से उत्साह वर्धन करने वाले हैं । उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे उपायों से बडे परिवर्तन लाए जा सकेंगे ।

बुधवार, 24 मार्च 2010

अदालती फ़ैसलों के निहितार्थ : लिव इन रिलेशनशिप , बलात्कार आदि के परिप्रेक्ष्य में



मैंने बहुत बार अनुभव किया है कि जब समाचार पत्रों में किसी अदालती फ़ैसले का समाचार छपता है तो आम जन में उसको लेकर बहुत तरह के विमर्श , तर्क वितर्क और बहस होती हैं जो कि स्वस्थ समाज के लिए अनिवार्य भी है और अपेक्षित भी । मगर इन सबके बीच एक बात जो बार बार कौंधती है वो ये कि अक्सर इन अदालती फ़ैसलों के जो निहातार्थ निकाले जाते हैं , जो कि जाहिर है समाचार के ऊपर ही आधारित होते हैं क्या सचमुच ही वो ऐसे होते हैं जैसे कि अदालत का मतंव्य होता है । शायद बहुत बार ऐसा नहीं होता है ।

                      कुछ अदालती फ़ैसलों को देखते हैं जो पिछले दिनों सुनाए गए । एक चौदह पंद्रह वर्ष की बालिका के विवाह को न्यायालय ने वैध ठहराया , अभी पिछले दिनों अदालत ने कहा कि बलात्कार के बहुत से मामलों में पीडिता को बलात्कारी से विवाह की इजाजत देनी चाहिए ,बलात्कार पीडिता का बयान ही मुकदमें को साबित करने के लिए पर्याप्त है , समलैंगिकता , लिव इन रिलेशनशिप आदि और भी आए अनेक फ़ैसलों के बाद आम लोगों ने उसका जो निष्कर्ष निकाल कर जिस  बहस की शुरूआत की वो बहुत ही अधूरा सा था । सबसे पहले तो तो दो बातें इस बारे में स्पष्ट करना जरूरी है । कोई भी अदालती फ़ैसला , विशेषकर माननीय उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले , जो सभी निचली अदालतों के नज़ीर के रूप में लिए जाते हैं , वे सभी फ़ैसले उस विशेष मुकदमें के लिए होते हैं और उन्हें नज़ीर के रूप में भी सिर्फ़ उन्हीं मुकदमों में लिया जा सकता है जिनमें घटनाक्रम बिल्कुल समान हो । हालांकि इसके बावजूद भी निचली अदालतें अपने सीमित कार्यक्षेत्र और अधिकारिता के कारण उन्हें तुरत फ़ुरत में अमल में  नहीं लाती हैं ।

उदाहरण के लिए जैसा कि एक मुकदमे के फ़ैसले में अदालत ने एक नाबालिग बालिका के विवाह को भी वैध ठहराया था । उस पर प्रतिक्रिया आई कि , इस तरह से तो समाज में गलत संदेश जाएगा । मगर दरअसल मामला ये था कि अदालत ने उस विशेष मुकदमें में माना था कि एक बालिका जिसका रहन सहन उच्च स्तर का है , जो आधुनिक सोच ख्याल वाले संस्कार के साथ पली बढी है , आधुनिक कौन्वेंट स्कूल में पढी है , शारीरिक मानसिक रूप से , ग्रामीण क्षेत्र की किसी भी हमउम्र बालिका से तुलना नहीं कर सकते । अब चलते हैं के अन्य फ़ैसले की ओर , बलात्कार पीडिता का विवाह बलात्कार के आरोपी के साथ कर देना चाहिए । यदि अपराध के दृष्टिकोण से देखें तो इसकी गुंजाईश रत्ती भर भी नहीं है । होना तो ये चाहिए कि बलात्कारियों को मौत और उससे भी कोई कठोर सजा दी जानी चाहिए ।

    अब हकीकत की बात करते हैं , अपने अदालती अनुभव के दौरान मैंने खुद पाया कि बलात्कार के  मुकदमें जो चल रहे थे उनमें से बहुत से मुकदमें वो थे जो कि पीडिता के पिता ने दर्ज़ कराए थे । लडका लडकी प्रेम में पडकर घर से निकल भागे , चुपके से विवाह कर लिया, बाद में पुलिस के पकडे जाने पर , माता पिता और घरवालों के दवाब पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज़ करवा दिया जाता है । मुकदमें के दौरान ही पीडिता फ़रियाद लगाती है कि उसके होने वाले या शायद हो चुके बच्चे का पिता उसका वही प्रेमी, अब कटघरे में खडा आरोपी , और उसका पति ही है ..तो क्या फ़ैसला किया जाए । यदि कानूनी भाषा में किया जाए तो सज़ा है सिर्फ़ और सज़ा । मगर यदि मानवीय पक्षों की ओर ध्यान दिया जाए तो फ़िर ऐसे ही फ़ैसले सामने आएंगे जैसे आए ।

  ठीक इसी तरह जब फ़ैसला आया कि बलात्कार पीडिता का बयान ही काफ़ी है अपराध को साबित करने के लिए तो सबने बहस में हिस्सा लेते हुए कहना शुरू कर दिया कि तो फ़िर अन्य सबूतों की जरूरत नहीं है शायद । जबकि ऐसा कतई नहीं है । दरअसल उस खास मुकदमें में पीडिता के पास सिवाय अपने बयान के और किसी भी साक्ष्य , किसी भी गवाह को पेश न कर सकने की स्थिति थी ऐसे में अदालत ने इस आधार पर कि भारतीय समाज में अपनी इज्जत मर्यादा मान सम्मान को दांव पर लगा कर कोई भी महिला सिर्फ़ इसलिए किसी पर भी बलात्कार जैसे संगीन अपराध का आरोप नहीं लगा सकती कि उसका कोई इतर उद्देश्य है । और इसी आधार पर वो फ़ैसला दिया गया था ।

अब इस हालिया फ़ैसले को लेते हैं । अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारतीय कानून के अनुसार भी यदि दो वयस्क पुरुष महिला अपनी सहमति से बिना विवाह किए भी एक साथ एक छत के नीचे रहते हैं तो वो किसी भी लिहाज़ से गैरकानूनी नहीं होगा । अब इसका तात्पर्य ये निकाला जा रहा है कि फ़िर तो समाज में गलत संदेश जाएगा । नहीं कदापि नहीं अदालत ने कहीं भी ये नहीं कहा है भारतीय समाज में जो वैवाहिक संस्था अभी स्थापित है उसको खत्म कर दिया जाए , या कि उससे ये बेहतर है , और ये भी नहीं कि कल को यदि उनमें से कोई भी इस लिव इन रिलेशनशिप के कारण किसी विवाद में अदालत का सहारा लेता है तो वो सिर्फ़ इसलिए ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि अदालत ने इसे वैधानिक माना हुआ है । अब ये तो खुद समाज को तय करना है कि भविष्य में लिव इन रिलेशनशिप ..वाली परंपरा हावी होने जा रही है कि समाज युगों से स्थापित अपनी उन्हीं परंपराओं को मानता रहेगा । सीधी सी बात है कि जिसका पलडा भारी होगा ...वही संचालक परंपरा संस्कृति बनेगी ।

    जब कोई फ़ैसला समाचार पत्र में , या कि समाचार चैनलों में दिखाया या पढाया जाता है वो तो एक खबर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो कि उनकी मजबूरी है । और यही सबसे बडा कारण बन जाता है आम लोगों द्वारा किसी अदालती फ़ैसले में छिपे न्यायिक निहितार्थ को एक आम आदमी द्वारा समझने में। इसके फ़लस्वरूप जो बहस शुरू होती है वो फ़िर ऐसी ही बनती है जैसी दिख रही है आजकल । समाचार माध्यमों को अदालती कार्यवाहियों, मुकदमों के दौरान कहे गए कथनों , और विशेषकर अदालती फ़ैसलों को आम जनता के सामने रखने में विशेष संवेदनशीलता और जागरूकता दिखाई जानी अपेक्षित है ।

रविवार, 21 मार्च 2010

खाली कुर्सियां फ़ैसले नहीं किया करतीं .....


पिछली पोस्ट में बताया ही था कि कैसे और क्यों एक आम भारतीय को न्याय पाने के लिए सिर्फ़ 320 साल ही प्रतीक्षा करनी है । आज इन आंकडों पर नज़र डालिए , ये आंकडे फ़िर साबित कर रहे हैं कि हमारी सरकार न्याय व्यवस्था को चुस्त दुरूस्त करने के लिए सचमुच ही कितनी गंभीर है ।उससे पहले ये बताता चलूं कि सभी इस बात को लगभग मान चुके हैं कि न्याय में विलंब का सबसे बडा कारण है देश में अदालतों की कमी और रिक्त पडे पदों पर न्यायाधीशों की नियुक्ति न होना ।

राजधानी दिल्ली से शुरू करें तो यहां पर सिविल जजों के 125 पद तथा जिला जजों के 21 पद खाली हैं । बिहार में ये तो मात्र 289 पद ही खाली पडे हुए हैं ,पंजाब की निचली अदालतों में 206 पद , हरियाणा की अदालतों में भी 206 पद , छत्तीसगढ की निचली अदालतों में 170 पद, राजस्तान में 172, मध्यप्रदेश में 108, जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र 256 . पद ही खाली पडे हैं । बस बाकी पूरे बचे भारत के अन्य राज्यों का अंदाज़ा आप खुद ही लगा सकते हैं । रुकिए जरा ..चलते चलते जरा एक और तथ्य तथा आंकडे पर नज़र डालते जाईये . । अभी हाल ही में एक सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने कहा कि " किसी भी अदालत या न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए हर छोटे बडे फ़ैसले के खिलाफ़ अगर इसी तरह यहां पर विशेष अनुमति याचिका स्वीकार की जाती रही तो एक दिन इनके बोझ से ढह कर खुद सर्वोच्च न्यायालय ही ढह जाएगी । "

आंकडों के अनुसार पिछले वर्ष ही सर्वोच्च न्यायालय में कुल 70,000 विशेष अनुमति याचिकाएं दाखिल की गईं । जबकि अमेरिका की सर्वोच्च न्यायालय एक साल में सिर्फ़ 100 से 120 मुकदमों और कनाडा की अदालत तो सिर्फ़ 60 मुकदमों की सुनवाई करती है ।



तो देश की आम जनता को अब ये खुल कर पता होना चाहिए कि यदि वो अदालत पहुंच कर फ़टाफ़ट किसी न्याय की उम्मीद कर रहे हैं तो कतई ये उम्मीद न पालें क्योंकि खाली कुर्सियां फ़ैसले नहीं किया करतीं ।


नोट :- सभी आंकडे आज दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण में छपी खबर से साभार लिए गए हैं ॥


शनिवार, 13 मार्च 2010

सिर्फ़ 320 साल तक प्रतीक्षा करें ..न्याय सबको मिलेगा



अरे भाई ये मैं नहीं कह रहा हूं , ये तो कुछ दिनों पहले "न्यायपालिका में ई गवर्नेंस " के विषय पर एक व्याख्यान देते हुए ये बात आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री वी वी राव ने कहा कि देश की अदालतों में अभी लंबित कुल सवा तीन करोड मुकदमों को यदि आज से निपटाना शुरू किया जाए तो वर्तमान में न्याय प्रक्रिया की , न्यायाधीशों की उपलब्धता की और ऐसी ही सभी आधारों पर उन्हें निपटाने में कम से कम तीस सौ बीस साल लगेंगे जी हां बस इतना सा ही समय लगेगा तो तब तक धैर्य रखना चाहिए ।

     दरअसल इसके लिए  किसी एक व्यवस्था या नीति को सीधे सीधे जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता है । मोटे मोटे आंकडों के अनुसार आज देश के प्रत्येक न्यायाधीश पर लगभग ढाई हज़ार मामलों का बोझ है । भारत में अभी लंबित पडे मुकदमों के लिए , अभी 18 हज़ार पदों की व्यवस्था है मगर उनमें से भी चार हज़ार पद तो अभी भी रिक्त पडे हुए हैं ।खुद उच्चतम न्यायालय ने एक बार माना था कि भारत में कुल 10 लाख की आबादी पर कम से कम 50 न्यायाधीशों की आवश्यकता है जबकि अभी वो संख्या सिर्फ़ 10 न्यायाधीश की है । ऐसी स्थितियों में ये अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है सरकार और प्रशासन सच में आम लोगों को त्वरित और सुलभ न्याय दिलवाने के लिए कितनी गंभीर और संवेदनशील हैं ? हालांकि इस दिशा में अब थोडी बहुत शुरूआत तो हो चुकी है कई राज्यों में प्रति वर्ष नियुक्तियां भी की जा रही हैं , मगर जिस अनुपात में मुकदमे बढ रहे हैं उस अनुपात में ये प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है ।

   आज जरूरत इस बात की है कि आम आदमी को सुलभ , सस्ता और त्वरित न्याय के लिए एक साथ बहुत से क्षेत्रों पर काम किया जाए । सबसे पहली कोशिश तो ये होनी चाहिए कि जल्द से जल्द न सिर्फ़ सभी खाली पदों को भरा जाए बल्कि , अधिक से अधिक अदालतों का गठन किया जाए । अदालत पहुंचने से पहले , छोटे विवाद, घरेलू विवाद, वैवाहिक मामले, आदि गैर आपराधिक मामलों को मध्यस्थता बीचबचाव की प्राचीन व्यवस्था से निपटाने के प्रयासों में बढावा दिया जाना चाहिए । प्ली बारगेनिंग, लोक अदालतों आदि जैसी व्यवस्थाएं जिन्हें पश्चिमी देशों में सफ़लतापूर्वक प्रयोग में लाया गया है उन्हें भी भारतीय न्याय व्यवस्था में अपनाने पर बल दिया जाए । इसके अलावा अधिवक्ताओं में भी व्यावसायिक प्रतिबद्धता, अदालती कर्मचारियों में फ़ैले भ्रष्टाचार पर अंकुश , अदालत के कार्य दिवसों में वृद्धि आदि पर भी ध्यान देना आवश्यक है ॥ किंतु फ़िलहाल तो स्थिति बहुत ही शोचनीय और चिंताजनक है ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं पारिवारिक अदालतें


हाल ही में दिल्ली की कुछ अधीनस्थ न्यायालयों में पारिवारिक अदालतों की स्थापना की गई है जो अपने तरह की इस तरह की पहली अदालतें हैं । हालांकि राजधानी की प्रत्येक जिला अदालतों में पहले से ही गुजारा भत्ता, तलाक और गार्जियनशिप अदालतों का गठन किया जा चुका है जो सफ़लतापूर्वक अपना काम कर भी रही हैं । किंतु इन नई तरह की अदालतों का गठन मध्यस्थता के आधार पर और तोडो नहीं जोडो की नीति का पालन करने के लिए किया गया है ।

ज्ञात हो महानगरीय जीवन में पारिवारिक रिश्तों में आ रही खटास और शादी जैसी संस्थाओं के लगातार टूटते जाने का दर किस कदर बढ रहा है इस बात का अंदाज़ा सिर्फ़ इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में पारिवारिक मुकदमों से निपटने वाली सिर्फ़ एक अदालत में ही प्रति माह सौ से अधिक तलाक के मुकदमे निपटाए जा रहे हैं । ये आंकडा ही साबित कर रहा है कि शहरी जीवन में परिवार , विवाह जैसी संस्थाओं पर से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है जिसके बहुत से वाजिब और गैर वाजिब कारण हैं ।

पिछले कुछ वर्षों में अदालतों में बढते दबाव को कम करने के लिए , वर्षों से चली आ रही और हमारी ग्राम्य न्याय व्यवस्था की एक प्रमुख प्रणाली मध्यस्थता को भी अपनाने की शुरूआत की गई । सभी जिला अदालतों एवं उच्च न्यायालयों में पहले अस्थाई और फ़िर स्थाई मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना की गई । यहां उन मुकदमों को भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई जिनमें समझौते की गुंजाईश थी । इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि दोनों पक्षों को अदालती माहौल से अलग वातावरण लगे इसके विशेष प्रशिक्षण प्राप्त न्यायिक अधिकारियों , अधिवक्ताओं , कानूनविदों की इन मध्यस्थता केंद्रों में नियुक्ति की गई । इसका परिणाम अपेक्षा से कहीं बेहतर निकला । विशेषकर पारिवारिक वादों में तो इसकी सफ़लता देखने लायक थी ।

इन्हीं सफ़लताओं को देखते हुए दिल्ली में नई पारिवारिक अदालतों की स्थापना की गई है । इन अदालतों में विशेष रूप से बैठने के लिए आरामदायक कक्षों के अलावा , मनोरंजन के लिए टीवी कंप्यूटर युक्त एक मनोरंजन कक्ष , मनोचिकित्सकों की टीम से लैस एक काऊंसिलिग कक्ष तथा और भी कई सुविधाओं से इन्हें सज्जित किया गया है । इन पारिवारिक अदालतों में . जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि ,पारिवारिक मुकदमें, तलाक अर्जियां, गुजारे भत्ते के लिए डाले गए दावे , बच्चों की अधिकारिता (गार्जियनशिप ) के मुकदमे आदि को निपटाया जाएगा । ये पारिवारिक अदालतें इस लिए भी शुरू की गई हैं ताकि उन मामलों को विशेषज्ञों की देखरेख और सलाह से निपटाया जाए जिन्हें अदालती कार्यवाहियों में नहीं निपटाया जा पाता है या फ़िर कि सालों साल लग जाते हैं , कोशिश ये की जानी है कि परिवार टूटने की जगह दोबारा एक हो जाएं । निसंदेह ये अदालतें आने वाल समय में क्रांतिकारी साबित होंगी ॥

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

न्यायिक क्षेत्र में आई टी का उपयोग


कल परसों ही हमारे कोर्ट को पहले कोर्ट ( जिला न्यायालयों में ) शुरू करने की उपलब्धि हासिल हुई इससेपहले ऐसी ही उपलब्धि दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी अर्जित की थी पिछले एक दशक में जिस तरह से सूचनाविज्ञान का उपयोग न्यायिक क्षेत्र में बढा है वो अपने आप में एक बहुत बडी बात है अदालतों में पूर्णत: कंप्यूटरीकरण की प्रक्रिया, सभी अदालती कार्यवाहियों को प्रतिदिन इंटरनेट पर उपलब्ध कराना , इतना ही नहीं सभी अदालती आदेशों और फ़ैसलों को नियमित रूप से , बल्कि अब तो पिछले पचास वर्षों में हुए सभी फ़ैसलों कोभी उपलब्ध करने जैसे सभी काम बखूबी हो चुके हैं इनके अलावा वीडियो कांन्फ़्रेंसिग से मुकदमों की सुनवाई , और अब ये कोर्ट कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि आधुनिक युग में उपलब्ध सभी सूचना तंत्रों काउपयोग और सहायता न्यायिक स्तंभ को लैस करने के लिए किया जा रहा है
अपने कार्यकाल में मैंने ये बदलाव होते हुए देखे हैं और सच कहूं तो बखूबी इसका फ़र्क भी महसूस किया है , मगरजब पाले के दूसरी तरफ़ जाके एक आम आदमी की तरह देखता हूं तो सोचता हूं ,ये विश्लेषण करता हूं कि क्यावाकई सूचना तकनीक ने आम आदमी को उसके न्याय पाने में थोडी बहुत सहायती की है मुझे लगता है कि कुछया बहुत सीमित फ़ायदा वो भी अप्रत्यक्ष रूप से हो पाया है अन्यथा ...इन तकनीकों का मुकदमों के तीव्रनिष्पादन से कोई प्रत्यक्ष संबंध मुझे तो नहीं दिखा

जब मैंने अपनी नौकरी शुरू की थी तो अदालतों में सारा कामकाज टाईपराईटर द्वारा ही किया जाता था , औरजाहिर सी बात है कि कंप्यूटर के मुकाबले उसकी क्षमता और परिणाम बहुत ही कम था मगर कंप्यूटर आने से बेशक अदालती कर्मचारियों मतलब , रिकार्ड रखने वाले कर्मचारियों तथा अदालती कार्यवाहियों को दर्ज़ करने वालेआशुलिपिकों की रफ़्तार और गुणवत्ता में बहुत ही क्रांतिकारी परिवर्तन आया मगर एक आम आदमी जो न्यायकी तलाश में सालों साल अदालत के चक्कर काटता है उसे इन परिवर्तनों का कितना फ़ायदा पहुंचा ...इसमें खुदमुझे ही संदेह होता है हां उच्च एवम उच्चतम न्यायालयों के आदेशों की उपलब्धता ने न्यायाधीशों को मुकदमों केनिष्पादन और सामयिक न्याय करने में जरूर ही सहायता पहुंचाई होगी हालांकि अभी तो ये न्यायिक क्षेत्र कोतकनीक सबल करने की प्रक्रिया चल रही है इसलिए अभी ही इसकी सफ़लता विफ़लता का आकलन करना शायदथोडी जल्दबाजी होगी और इसे अभी समय देने की जरूरत है , लेकिन इसके बावजूद मुझे लगता है कि इन उपायोंऔर प्रयासों से बेहतर है कि नई अदालतों के गठन पर ....और उनकी बहुतायत पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाए तोज्यादा सार्थक परिणाम आएंगे इसके अलावा ...प्ली बारगेनिंग , मध्यस्थता केंद्रों , लोक अदालतों , और कानूनी जागरूकता शिविरों जैसे प्रयासों को भी बढावा दिया जाए तो बेहतर होगा

अगली कडियों में देखेंगे कि ...कुछ तकनीक जो जाने किन कारणों से विफ़ल हो रही हैं और कुछ तकनीक जिनकाउपयोग क्रांति ला सकता है
...

शनिवार, 9 जनवरी 2010

जीरो पेन्डेन्सी योजना से कम होगा अदालतों पर बोझ



देश की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या कम करने के इरादे से समूची न्याय व्यवस्था को एक नया कलेवर देने की तैयारियां शुरू हो गई हैं । ताजी जानकारी के अनुसार न्याय व्यवस्था को सुदृढ बनाने के प्रयासों के तहत एक महात्वाकांक्षी योजना जिसे ज़ीरो पेन्डेन्सी योजना कहा जा रहा है पर विचार किया जा रहा है । इस योजना के तहत सेवानिवृत न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को अस्थाई न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने के साथ ही लंबित मुकदमों क राष्ट्रीय ग्रिड बनाने का काम किया जा रहा है ॥ इसके लिए देश के सभी उच्च न्यायालयों से लंबित मुकदमों का पूरा विवरण इस ग्रिड को उपलब्ध कराने को कहा गया है ॥

गौरतलब है कि अदालतों मे सरकारी मुकदमों की अत्यधिक संख्या होने के संदर्भ में इस प्रस्ताव में कहा गय है कि केन्द्र सरकार इस साल के अंत तक अपनी राष्ट्रीय मुकदमा नीति तैयार करेगी । राज्य सरकारें भी ऐसी ही नीति अपनाएं तो परिणाम सकारात्मक निकलेंगे इसकी उम्मीद की जा रही है । प्रस्तावित योजना के तहत न्यायपालिका में रिक्त स्थानों पर नियुक्ति के लिए पहले से ही योग्य व्यक्तियों का चयन सुनिश्चित करने के इरादे से जजों की संख्या में काल्पनिक स्तर पर पच्चीस फ़ीसदी वृद्धि के प्रधान न्यायाधीश के सुझाव को ध्यान में रखने की बात कही गई है । अधीनस्थ न्यायालयों के लिए एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन पर विचार की सिफ़ारिश की गई है ॥ सेवानिवृत जजों के बारे में जानकारी एकत्र करके न्यायिक अधिकारियों का एक राष्ट्रीय पूल बनाने की सिफ़ारिश भी की गई है तकि विभिन्न उच्च न्यायालय मे न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति के लिए इसमें से चयन किया ज सके । तीन साल से कम की सजा से जुडे अपराधों के सभी लंबित मामलों के निपटारे का दायित्व विशेष जजों को देने की सिफ़ारिश की गई है ॥

इन योजनाओं पर काम शुरू हो चुका है , इनका कैसा परिणाम निकलेगा ये तो भविष्य की बात है मगर इन प्रयासों को देख कर ये उम्मीद तो की ही जा सकती है कि आने वाले समय में यदि न्यायिक व्यवस्था पर बोझ न भी कम हो पाए तो , इसे कम किया जाना है ये बात तो इनके जेहन में जरूर ही रहेगी ॥

रविवार, 6 दिसंबर 2009

दिल्ली की न्यायिक सेवाओं में भर्ती की जानकारी /सूचना

जैसा कि मैंने आपको अपनी पिछली पोस्ट में बताया था कि इन दिनों दिल्ली न्यायिक सेवा , दिल्ली न्यायिक अकादमी और दिल्ली अधीनस्थ न्यायालयों में भर्ती की प्रक्रिया शुरू हो गई है ॥ आज आपको नीचे दिए गए कुछ लिंक्स के माध्यम से बता रहा हूं कि इनके लिए इच्छुक व्यक्ति , कहां से कैसे और कब अपने आवेदन भर सकते हैं ॥ इन लिंक्स के माध्यम से आप सीधे उन साईटस पर जाकर आवेदन पत्र डाऊनलोड कर सकते हैं साथ ही इन भर्ती प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जाना जा सकता है : -

सबसे पहले बात करते हैं दिल्ली न्यायिक सेवा के लिए निकले आवेदनों की । यहां ये बताता चलूं कि दिल्ली न्यायिक सेवा के तहत दो तरह की भर्ती प्रक्रिया होती है ॥एक दिल्ली न्यायिक सेवा के लिए और दूसरी दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा ॥सीधे शब्दों में कहें तो ...प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी हेतु और ॥सत्र न्यायाधीश हेतु ....इस बारे में आपको पूरी जानकारी यहां मिल सकती है ॥ ...........तथा यहां भी ........

दूसरी तरफ़ आवेदन मंगाए हैं दिल्ली न्यायिक अकादमी नें जो अभी अस्थाई रूप से दिल्ली की कडकडकडूमा कोर्ट में चालित है ...और स्थाई रूप से दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में निर्माणाधीन है ॥ इस संस्था ने अपने कार्यालय के लिए ....उच्च स्तर के अधिकारी से लेकर ...लिपिक और अन्य चतुर्थ श्रेणी वर्ग तक के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं ......इनके बारे में ...यहां से जानकारी ली जा सकती है ......। आवेदन पत्र भी यहीं मिल जाएंगे ॥


तीसरी भर्ती निकली है दिल्ली अधीनस्थ न्यायालयों मे कनिष्ठ श्रेणी लिपिकों की ....जिनकी पदों की संख्या लगभग २५० के करीब है । इस संबंध में विस्तार से सूचना हालांकि ....५ दिसंबर के ...रोजगार समाचार में भी प्रकाशित हुआ है ॥किंतु इसकए अलावा यदि आप चाहें तो इसकी सूचना यहां भी मिल सकती है

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

दिल्ली अधीनस्थ न्यायालय में भारी भर्तियों की घोषणा

पिछले कुछ समय से जब जब अदालतों पर बोझ बढने की बात उठती रही है तब तब खुद न्यायपालिका ने भी इस बात को माना और कहा है कि देश में आज बहुत बडे पैमाने पर नये अदालत गठित किये जाने की जरूरत है ।इस बिंदु पर कई बार सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की अकर्मठता और इस मुद्दे की उपेक्षा किये जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं । राज्य सरकारों के साथ केंद्र सराकार भी इस दिशा में उतनी संजीदगी से सोच और कर नहीं रही है जितनी कि जरूरत है ॥ मगर दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों में इस दिशा में जरूर ही बहुत तेजी से काम हो रहा है ॥

पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति वर्ष , न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति , एक के बाद एक नई नई जिला अदालतों और विशेष अदालतों का गठन, कर्मचारियों की भर्ती, नयी नयी योजनाएं आदि सफ़लतपूर्वक चल रहा है । इसी क्रम में प्राप्त सूचना के अनुसार ॥इस समय दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों मे न्यायिक अधिकारियों के लिए रिक्तियां , दिल्ली न्यायिक अकादमी के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों की रिक्तियां और संभवत: अगले सप्ताह लगभग पांच सौ कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए रिक्तियां घोषित की गई हैं । इन पदों , इनकी योग्यताओं, आवेदन भरने का सारा विवरण और भर्ती परीक्षा का सारा विवरण आदि अगली पोस्टों के माध्यम से बताने का प्रयास करूंगा ॥

तो ये खबर अदालत के साथ साथ रोजगार की तलाश और उसके प्रयास में लगे सभी लोगों के लिये काम की होगी ऐसा मेरा विश्वास है ....यदि कोई त्वरित जानकारी या सहायता चाहिये तो आप बेशक और बेझिझक मुझे फ़ोनिया सकते हैं जी .....

शनिवार, 7 नवंबर 2009

यदि तलाक लेना है तो ( दैनिक ट्रिब्यून के स्तंभ कानून कचहरी मे प्रकाशित आलेख )















चित्र को बडा करने के लिए उस पर चटका लगाएं


तलाक लेने से पहले और तलाक के लिए सोच रहे लोगों के लिए कानूनी सलाह के रूप में लिखा गया एक आलेख जिसे कानून कचहरी , स्तंभ , दैनिक ट्रिब्यून में स्थान मिला ।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

बुरे फ़ंसे वकील साहेब....ऐसा भी होता है ।

कहते हैं कि कभी कभी चालें उलटी भी पड जाया करती हैं ...या यूं कहें कि शिकारी अपने जाल में खुद ही फ़ंस जाते हैं ...या ये कि किसी एक जगह से बचने के अनजाने में किया गया कोई काम उसे दूसरी जगह फ़ंसा देता है और ऐसी स्थिति जब बनती है तो क्या हाल होता है , आप खुद देखिये ।

मामला दिल्ली उच्च न्यायालय का है ,दरअसल हुआ ये कि एक व्यक्ति ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर एक मुकदमे में एक अर्जी दाखिल कर के कोर्ट के एक आदेश को वापस लेने या स्थगन देने का अनुरोध किया । उसने अपनी दलील में कारण ये दिया कि सुनवाई वाले दिन, वो और उसका वकील किसी कारण से शहर से बाहर थे सो अदालत मे उपस्थित नहीं हो सके । इसी के अनुरूप हलफ़नामे के साथ प्रार्थना पत्र दायर किया गया । और इस कारण अदालत ने उनके खिलाफ़ एक पक्षीय फ़ैसला सुना दिया था । मामला यहां तक तो ठीक था , और इस बाबत सूचनार्थ दूसरे पक्ष को भी नोटिस भेजा गया ।


अब दूसरे पक्ष की जानिये , दूसरे पक्ष ने सूचना का अधिकर के तहत उच्च न्यायालय रजिस्ट्रार कार्यालय से जानकारी मांगी कि क्या उस दिन उस व्यक्ति और उनके वकील क्या किसी भी मुकदमे में दूसरी किसी अदालत में उपस्थित हुए थे । बस जो जवाब मिला उसने दूसरे पक्ष के लिये मुसीबतें बढा दी। दूसरे पक्ष ने मय सबूत ये साबित कर दिया कि हलफ़नामा झूठा दायर किया गया है और वो व्यक्ति और उनके वकील साहब उस दिन न सिर्फ़ अदालत में उपस्थित थे बल्कि अदालत में किसी अन्य मुकदमे में उनकी हाजिरी भी दर्ज है ।

अदालत ने महापंजीयक उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि दोनों ( मुवक्किल और उनके अधिवक्ता ) के खिलाफ़ सी आर पी सी की धारा 195 के तहत शिकायत दाखिल की जाए । इतना ही नहीं अधिवक्ता द्वारा झूठे हलफ़नामे दिये जाने को गंभीरता से लेते हुए ..बार काउंसिल से उनके लाईसेंस को रद्द किये जाने की सिफ़ारिश की और साथ साथ 25 हजार का जुर्माना भी ठोंक दिया...।

हम क्या कहते ..बस यही निकला ..ओह बुरे फ़ंसे वकील साहब ।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

सडक दुर्घटनाओं पर गंभीर होती अदालतें...

राजधानी दिल्ली में दिनोंदिन बढती सडक दुर्घटनाओं पर अदालतों ने बहुत ही गंभीर रुख अख्तियार कर लिया है। अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राजधानी में बढ रही दुर्घटनाओं के मद्देनज़र . निचली अदालतों, पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों , न्यायिक प्रक्रियाओं को एक साथ ही बहुत से निर्देश दिये हैं। अब तक चली आ रही व्यवस्था के तहत , दुर्घटना के बाद पुलिस सिर्फ़ एक ही तरह का मुकदमा दर्ज़ करती है ।और प्राथमिकी , चोटिल या म्रत व्यक्ति की चिकित्सकीय रिपोर्ट आदि की प्रति मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम पंचाट में जमा कर दी जाती है। जहां से इच्छित व्यक्ति , जो भी क्लेम करना चाहता है तो उस प्रति को प्राप्त कर मुकदमा दायर करता है।

इस वर्तमान व्यवस्था में दो बहुत ही बडी खामियां थी । पहली तो ये कि जानकारी के अभाव में आम लोगों को पता ही नहीं चल पाता है कि उनके क्लेम के लिये सबसे जरूरी कागजात पंचाट में जमा हैं । दूसरा ये कि यदि किसी तरह से उन्हें पता चल भी जाता है तो उसे प्राप्त करने की जद्दोजहद पीडित के लिये बहुत ही कठिन होता है। न्यायालय ने इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए नयी व्यवस्था शुरू की है। नए निर्देशों मे से जो प्रमुख हैं वे इस प्रकार हैं।

अब किसी भी दुर्घटना के बाद मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम के धारा १५८ (६) के तहत पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि संबंधित कागजातों को जमा करने के बाद , पंचाट न्यायालय उन्हें एक निश्चित तारीख देते हैं जिस तारीख पर उन्हें संबंधित सभी पक्षों,,यानि दावाकार, चोटिल या म्रत व्यक्ति, ..दूसरे पक्ष के चालक, वाहन के मालिक और इंश्योरेंस कंपनी की उपस्थिति सुनिश्चित करे। इसका अर्थ ये हुआ कि अब सारी जिम्मेदारी पुलिस पर डाली गयी है ताकि कोई भी पीडित मुआवजे से वंचित न रहे । इसका दूसरा लाभ ये हो रहा है कि जैसे ही सभी पक्ष उपस्थित हो जाते हैं , पंचाट अपनी पहल करते हुए उन्हीं जांच प्रक्रियाओं को दावा याचिका के रूप में परिवर्तित करके उन्हें मुआवजा दिलवा देती हैं। इससे जहां त्वरित न्याय का उद्देश्य पूरा हो रहा है वहीं , वकील, मुकदमे आदि के खर्च से भी पीडित को छुटकारा मिल जाता है ।

राजधानी में हो रही दुर्घटनाओं मे सबसे अधिक ,दुर्घटनाओं के लिये कुख्यात हो चुकी ्दिल्ली की ब्लू लाईन बसों के परिचालन, से संबंधित कई दिशा निर्देशों और समय समय पर कई कानूनों के बावजूद स्थिति में बहुत ज्यादा फ़र्क नहीं पडता देख..न्यायालय ने नए आदेशों के तहत ये आज्ञा दी कि अब किसी भी ऐसी दुर्घटना में जिसमें कोई गंभीर रूप से कोई घायल होगा उसमें पचास हजार की राशि....और यदि किसी की दुर्घटना में ही मौत हो जाती है तो उसमें एक लाख रुपए की रकम ..संबंधित बस के मालिक को अदालत में जमा करवानी होगी ..इस राशि के जमा किये बगैर ..वाहन को पुलिस के जब्तीकरण से नहीं छोडा जाएगा । सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस राशि को बिना विलंब के ..पीडित को दिये जाने की व्यवस्था की जाएगी।

इसके अलावा सभी दुर्घटना वादों, दावा याचिकाओं, न्यायिक व्यवस्थाओ,प्रक्रियाओं और इससे जुडे तमाम पहलुओं पर उच्च न्यायालय निरंतर निगाह रखे हुए है। सबसे अच्छी बात ये है कि इन नयी व्यवस्थाओं के सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं॥

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

मीडिया ट्रायल पर नकेल कसने की तैयारी

पिछले कुछ समय से , जब से मीडिया में तेज से तेज खबर दिखाने-सुनाने की होड की परंपरा की शुरूआत हुई है तब से मीडिया ,रिपोर्टिंग करने में, समाचारों को प्रस्तुत करने में , और घटना दुर्घटना के कारणों-परिणामों तक पहुंच जाने में ज्यादा ही गैर जिम्मेदार और लापरवाह हो गयी है। अन्य सभी जगहों पर तो फ़िर भी जानबूझ कर की गई इन गल्तियों, भूलों को एक हद तक क्षम्य माना जा सकता है किंतु अदालती मुकदमों में ये बहुत ही निर्णायक और कम से कम दिशा भटकाने वाले तो हो ही जाते हैं । अदालतों के बार बार आगाह किये जाने के बाद और कई बार कठोर चेतावनी दिये जाने के बाद, शायद व्यावसायिक लाभ के लोभ में मीडिया खुद को संयमित और नियंत्रित नहीं कर पा रही है ।किंतु अब ऐसा नहीं होगा।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस तथाकथित मीडिया ट्रायल पर नकेल कसने हेतु पहल कदम बढा दिया है । दरअसल अभी हाल ही में उच्च न्यायालय में विवादित पुलिस एनकाउंटर बटाला हाउस प्रकरण में मीडिया के पास कुछ अपराधियों के बयान की की पूरी सूचना लीक होने की बात पर विरोध जताते हुए न्यायालय से अनुरोध किया गया था कि , मीडिया द्वारा संवेदनशील मामलों में ऐसी लापरवाही दिखाने को प्रतिबंधित किया जाए। इसके साथ ही इस याचिक में पुलिस अधिकारियों द्वारा घटनाओं, अपराधों, के बाद प्रेस कांफ़्रेस बुला कर सभी बातों के खुलासे और विशेषकर अपराध और अपराधी के बारे में निर्णायक बयान जारी किये जाने को लेकर भी आपत्ति उठाई गयी थी। ज्ञात हो कि आरुषी मर्डर केस में ऐसी ही एक प्रेस कांफ़्रेंस में उत्तर प्रदेश पुलिस के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी तक द्वारा इतन बचकाना बयान और कहानी सुनाई गयी कि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने उन अधिकारी को वहां से हटा कर उसकी भरपाई की। और पुलिस के उस तथाकथित जांच का क्या परिणाम निकला , यह किसी से छुपा नहीं है।

माननीय उच्च न्यायालय ने प्रेस कांउसिल औफ़ इंडिया से आग्रह किया है कि ,इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए, अपने पत्रकारों को इस हेतु पर्याप्त प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करे ताकि जो भी लोग न्यायालय से जुडी कार्यवाही की रिपोर्टिंग करते हैं, आपराधिक घटनाओं की सूचना एकत्र करते हैं, उन्हें प्रस्तुत करते हैं। उन तमाम लोगों को इस बात का पूरा इल्म होना चाहिये कि इसका परिणाम क्या हो सकता है। इसके साथ ही पुलिस प्रशाशन को भी ये निर्देश दिये गये हैं कि वे भी अपने अधिकारियों को सिखायें कि .प्रेस को बुलाते समय और उन्हें सूचनी देते समय किन किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिये।कुल मिला कर न्यायालय चाहता है कि मीडिया ऐसी रिपोर्टों को कवर करते समय अपने लिये कुछ हद तय कर ले। अब देखना ये है अदालत के इन नये प्रयासों से देश के निरंतर भटक रहे मीडिया की आंखे कितनी खुल पाती हैं.....?


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

देश भर की न्यायिक कार्य प्रणालियों का किया जा रहा है अध्य्यन


मैं इस ब्लोग की अपनी पिछली कई पोस्टों से इस बात का ज़िक्र कर हूं.....कि देर से ही सही अब सरकार न्यायिक ढांचे को नये सिरे से चुस्त दुरुस्त करने में संजीदा दिख रही है.....रह रह कर नये उपाय , नयी घोषणा , और बहुत सी योजनयें....सामने आ रही हैं....ये जरूर है कि फ़िलहाल अदालतों पर जो बोझ है उसे कम करने में फ़ौरी तौर पर शायद ये इतनी प्रभावी न लगें....मगर खुद न्यायालय में कार्यरत रहने के कारण अपने अनुभवों से इतना तो यकीन से कह सकता हूं कि ...भविष्य में इसका अच्छा परिणाम निश्चित रूप से सामने आने की पूरी संभावना है.....

जिस तरह से खुद अदालत ने अभी हाल ही में ...सूचना के अधिकार के तहत .....अपनी स्थिति को स्पष्ट किया ...उसने एक बार फ़िर न सिर्फ़ न्याय व्यवस्था ने अपना कद बडा कर लियी बल्कि ....पिछले दिनों जो उस पर एक अविश्वास की परत बैठाने की कोशिश की जा रही थी उस पर भी विराम लग गया.....और अब शायद ये इस प्रकरण का अंत भी था.....
अभी हाल ही में ...केन्द्र सरकार द्वारा एक महत्वाकांक्षी योजना के तहत देश भर की तमाम अदालतों में प्रचलित न्यायिक कार्यप्रणाली का अध्य्यन किया जा रहा है। इस उद्देश्य से सभी अदालतों से जानकारी एवम सुझाव मांगे गये हैं । इनके अध्ययन के बाद सरकार की योजना है कि वे कार्यप्रणालियां जो सबसे अधिक कारगर और प्रायोगिक होंगी उन्हें एक साथ ही पूरे देश की अदालतों मे लागू किया जायेगा। उदाहरण के लिये अभी बहुत से राज्यों मे शरद और ग्रीष्मकाल में अदालतों के काम करने का समय बदल जाता है। इसके अलावा, गवाही, दावों को उनकी वरायता के हिसाब से उनका निपटारे का नियोजन, और भी अन्य सभी पहलुओं पर विचार एकत्र किये जा रहे हैं। इसे अमली जामा पहनाने में कितना वक्त लगेगा , ये तो अभी तय नहीं है, मगर जिस दिन भी ये संभव हो सकेगा उस दिन निसंदेह ये बहुत ही लाभदायक कदम सिद्ध हो सकेगा।


इसी कदम के साथ साथ देश के सभी क्षेत्रों के न्यायिक अधिकारियो/न्यायाधीशों को भी ,राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में एक लंबी चलने वाली कार्यशाला के तहत आपस में मिल बैठ कर विचारों का आदान प्रदान, न्यायिक चुनौतियों पर विमर्श, नये पुराने कानूनों की उपयोगिता एवम सार्थकता पर बहस...आदि के लिये आमंत्रित किया जा रहा है। इसमें वे सब सौ सौ के बैच के अनुसार अलग अलग राज्यों से चुन कर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में पहुंच रहे हैं तथा इस कार्यशाला में भाग ले रहे हैं। इस दीर्घकालीन कार्यशाला का शुभारंभ हो चुका है। इसके परिणाम क्या और कितने प्रभावी होंगे ये तो भविष्य ही बतायेगा। मगर इतना यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि अदालतों के ऊपर तो दायित्व आज है..उसका निर्वहन करने के लिये इस तरह के कार्यक्रम और प्रतिबद्धता तो दिखानी ही होगी..





मंगलवार, 30 जून 2009

जानिए निर्वाह भत्ते से जुड़े कुछ कानून



भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ से १२८ तक उन प्रावधानों का उल्लेख किया गया जिसके आधार पर किसी भी व्यक्ति को ..उसके आश्रितों को निर्वाह खर्चा/गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य किया जा सकता है. दरअसल इस कानून के पीछे अवधारणा ये है की प्र्तात्येक व्यक्ति का ये मौलिक और नैतिक कर्त्तव्य है की वो अपनी पत्नी, बच्चों, माता-पिता, अभिभावकों की देखभाल करे..यदि वे अपनी देखभाल करने में असमर्थ हैं तो....इसके पीछे विचार ये है की कोई भी माता-पिता, पत्नी, और संतान इन हालातों में मजबूर हो कर न रहे की ..विवश होकर वो अपराध ..में ही लिप्त हो जाए..या किसी और का मोहताज बन जाए.

धारा १२५ के अनुसार कोई सक्षम व्यक्ति उनका भरण-पोषण करने में आनाकानी करता है :

१. उसकी पत्नी, जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो...
२. उस व्यक्ति की वैध/अवैध अवयस्क ...विवाहित/अविवाहित संतान ..जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो...
३. उस व्यक्ति की वैध/अवैध संतान (विवाहित पुत्री नहीं ) जो बालिग़ तो हैं ,...किन्तु किसी भी तरह की शारीरिक , मानसिक , अक्षमता से ग्रस्त हो.....
४. उसके माता -पिता, जो अपनी देखभाल करने में अक्षम हों....

तो उस स्थिति में ..प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी उस व्यक्ति को ये आदेश दे सकती है की वो एक निश्चित राशि , प्रति माह, उन्हें गुजारा भत्ते के रूप में अदा करे...

इसके तहत वर्ष २००१ में शंशोधन करके ये कानून भी बना दिया गया की अदालत धारा १२५ की याचिका की सुनवाई करते हुए ..एक निश्चित राशि को अंतरिम खर्चे /राहत के रूप में निर्धारित करके उस व्यक्ति को उसके भुगतान का आदेश दे सकती है..जब तक की उस याचिका का निपटारा नहीं हो जाता.और ये अंतिम खर्चे का निर्धारण मुदालय को याचिका प्राप्त होने के साठ दिनों इके अन्दर अन्दर कर दिया जाना चाहिए....

कल कुछ प्रमुख मुकदमों का हवाला देते हुए देखेंगे की इसमें और क्या क्या प्रावधान हैं......

(चूँकि पहले मैंने वादा किया था की निर्वाह भत्ते के बारे में जानकारी दी जायेगी..इसलिए धारा ४९८ ए यानि दहेज़ प्रतारणा के बारे में उसके बाद..और आलेख को भागों में विभाजित करने के पीछे सिर्फ इतना कारण होता है की पाठक ..बोर न हों...)

सोमवार, 29 जून 2009

जानिए विवाह से सम्बंधित कुछ अपराधों को ..

आज के अंक में जानते हैं की भारतीय कानून में विवाह से सम्बंधित भी कुछ अपराध वर्णित हैं...वो कौन कौन से हैं..किस तरह के हैं और उनमें कितनी सजा का प्रावधान है..आदि आदि...

भारतीय दंड संहिता की धारा ४९३ के अनुसार कोई भी व्यक्ति, किसी भी महिला से , जो की कानूनी रूप से उसकी पत्नी नहीं है, मगर समझती है की वो उस व्यक्ति की विवाहिता है, यदि , उस महिला के संसर्ग में (शारीरिक रिश्ते ) आता है तो वो दंड का भागी बँटा है , क्यूंकि ये कानूनन जुर्म है. इस धारा के अनुसार दो तथ्यों की अपरिहार्यता होती है..

.पहली ये की कानूनन वैध शादी का धोखा होना .
.और दूसरा इस धोखे में ही संसर्ग होना.

इस जुर्म के लिए सिद्ध ये करना होग की आरोपी व्यक्ति ने उस महिला को jaanboojh कर उसे इस धोखे में रखा की वो कानून उसकी वैध पत्नी है ...और इसी विश्वास के तहत ही उसके साथ संसर्ग स्थापित किया गया

ये अपराध .गैर संज्ञेय, गैर जमानती तथा non कम्पौंदेबल है..और कानून के अनुसार इसमें दस वर्षों की सजा और जुर्माने का प्रावधान है

बहु-विवाह :-

भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के अनुसार कोई भी व्यक्ति यदि अपने jivan साथी के जीवित होते हुए दूसरा विवाह kartaa है तो उसे बहु विवाह का दोषी माना जाएगा. इस अपराध के लिए उसे सात वर्षों की सजा हो सकती है. मगर इस कानून से जुड़े कुछ महतवपूर्ण तथ्यों का जिक्र आवश्यक हो जाता है.. ये कानून मुस्लिम धर्म के अनुयायीं(सिर्फ पुरुषों ) पर लागु नहीं होता क्यंकि शरीयत काननों के अनुसार उन्हें इसकी इजाजत मिली हुई है, is कानून के बावजूद दो स्थितियों में ये अपराध नहीं माना जाएगा.

यदि किसी न्यायालय द्वारा उस विवाह को कानूनी मान्यता दे दी है....

उस स्थिति में भी जब पहले पति या पहली पत्नी का ,,..सात वर्षों तक कोई अता -पता न चले..

सबसे महत्वपूर्ण बात ये की ,,कानून की नजर में दूसरी पत्नी और doosre पति को..भी वो सारे अधिकार प्राप्त हैं तो...बशर्ते की विवाह वैध हो .(.वैध और अवैध/अपूर्ण विवाह पर चर्चा फिर कभी )

कल बात करेंगे ..धरा ४९८ की जो इन दिनों दुरूपयोग किये जाने की शिकायत के कारण चर्चा में है.

रविवार, 28 जून 2009

ग्रीष्मकालीन अवकाश और अदालतें

इन दिनों में ज्यादातर अदालतों में ग्रीष्मकालीन अवकाश का समय है..आम तौर पर जून के महीने में अदालतें ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए छुट्टी पर होती हैं...इसके अलावा दिल्ली समेत और भी कई राज्यों में शीतकालीन अवकाश भी दिया jaataa है..

जो लोग अक्सर ख़बरों में पढ़ते हैं की अदालतों में पहले से ही इतने ढेर सारे मुकदमें लंबित हैं तो फिर इन अवकाशों को क्यूँ नहीं समाप्त कर देना चाहिए..इस आलेख के माध्यम से मेरी कोशिश होगी की कुछ बातें जो आम तौर पर लोगों को पता नहीं होती , वो आप सबके सामने राखी जाए ताकि कुछ भ्रांतियां दूर हो सकें.

सबसे पहले बातें करते हैं ..अवकाशों के औचित्य की ..वो भी ऐसे समय में जब लंबित मुकदमों की संख्या करोडों का संखा छू रही है.. मोटे तौर पर तो लगता है की ..बिलकुल ..बल्कि सारी छुट्टियां समाप्त कर दी जानी चाहिए..मगर ये बात ध्यान में रखने वाली होती है की न्यायालयों और विशेषकर न्यायाधीशों का कार्य, कार्यप्रणाली,, अन्य किसी भी कार्य से सर्वथा भिन्न है. किसी भी अन्य कार्य,व्यवसाय या और किसी उद्यम में ,,किसी को निरंतर उतना मानसिक श्रम नहीं करना पड़ता..., नहीं मेरा मतलब है उस विशिष्ट रूप में नहीं करना पड़ता..एक एक मुकदमा किसी के जीवन मरण से सम्बंधित होता है..इसलिए लगातार मानसिक श्रम से थोडा सा अवकाश देकर उन्हें फिर से खुद को नवीन और स्फूर्त करने के लिए ही अवकाश की अव्धाराना को जीवित रकाहा गया है..

और ऐसा भी नहीं है की इन अवकाशों में सभी लोग पूर्ण तालाबंदी करके आराम फरमाते हैं..बल्कि पिछले कुछ वर्षों में तो अवकाश में अदालतों में इतने अलग अलग कार्यों को उनके अंजाम तक पहुंचाया जा रहा है की अवकाश की तो सार्थकता ही बन जाती हैं..दिल्ली की अदालतों में जहां पिछले कुछ वर्षों से अवकाशों में न्यायाधीशों को विशेष रूप से अभिलेखागार में पुराने वादों के रीकोर्डों की जांच करके ..जिनकी जरूरत नहीं होती उन्हें ..वहाँ से हटा कर ख़त्म करवाने का कार्य दिया जा रहा है. इसके अलावा उन्हें विशेष आदेश दिया जाता है की , वे अपनी अदालतों में वरिष्ठ नागरिकों के ,,महिलाओं के,, तथा बहुत पुराने मुकदमों
आदि को निपटाने का काम दिया जाता है..दरअसल ग्रीष्म कालीन अवकाश में सभी न्यायाधीश एवं कर्म्चारीगन बीच के अनुसार अवकाश पर जाते हैं....इसके अलावा विभागीय जांच , तथा और भी कई जिम्मेदारियां सौंप दी जाती हैं. इनसे अलग मध्यस्थता केंद्र , लोक अदालतें ,तथा सांध्यकालीन अदालतें..भी नियमित रूप से लगाईं जाती हैं.

जहां तक ,,कर्मचारियों की बात है ..तो वे भी इन दिनों अदालतों में तेजी से चल रही कम्प्यूटरीकरण के कार्य को अपने अंतिम मुकाम देने में लगे हैं..यानि कुल मिला कर छुट्टी का उपयोग किया जा रहा है.हालांकि इस बात की भी आवाजें उठ रही हैं की छुट्टियों को पूर्णतया ख़त्म करके अदालतों को निर्बाध चलने दिया जाए..कम से कम निचली अदालतों को तो अवश्य ही ...जो एक हद तक सही भी लगता है..







शुक्रवार, 26 जून 2009

महाराष्ट्र की न्यायिक प्रशिक्षण अकादमी और प्रथम राष्ट्रीय मध्यस्थ्ता केन्द्र का उद्घाटन स्त्ताइस को


देश की न्यायिक व्यवस्था मे सुधार के कार्यक्रम के अन्तर्गत एक और बडी उप्लब्धि हासिल होने जा रही है।परसों यानि सत्ताईस तारीख को महाराष्ट्र की प्रथम न्यायिक प्रशिक्ष्ण अकादमी का उद्घाटन होने जा रह है । राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इसका उद्घाटन करने वाली हैं।ये दो मन्जिला इमारत न सिर्फ़ महाराष्ट्र के न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिये तैयार किया गया है बल्कि न्याय व्यवस्था में मध्यस्थता केन्द्रों की बढ्ती भुमिका को ध्यान मेंरखते हुए , राष्ट्रीय मध्यस्थता केन्द्र का निर्माण भी इसी में किया गया है।

इस अत्याधुनिक केन्द्र में नव नियुक्त न्याधीशों का प्रशिक्षण भी उसी दिन से शुरु हो जायेगा। इस केन्द्र में एक आधुनिक पुस्तकालय के अलावा मनोरंजन कक्ष तथा एक खेल एवम योग कक्ष भी बना हुआ है । ग्यात हो कि देश की प्रथम और राष्ट्रीय न्यायिक प्रशिक्षण अकादमी का निर्माण भोपाल में किया गया था। राज्धानी दिल्ली में भी इस तरह की एक आधुनिक अकादमी लगभग तैयार है जो अगले कुछ माह में शुरु हो सकेगी…उम्मीद की जा रही है कि इन अकादमियों में न्यायधीशों को न सिर्फ़ उनके कार्यक्षेत्र के बारे में प्रशिक्षित किया जायेगा बल्कि समाज के बहुत सारे अलग अलग क्षेत्रों …।जैसे समाजशास्त्री ॥मनोवैग्यानिक ॥आदि भी इन न्यायाधीशों को अपने अनुभव के आधार पर उन्हें प्रशिक्षित करेंगे।