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मंगलवार, 7 जनवरी 2025

जिला अदालतों में लाइब्रेरियनों की भर्ती : न्याय प्रशासन में अपेक्षित सुधारों की शुरुआत

 


अभी हाल ही में दिल्ली की जिला अदालतों में पदस्थापन हेतु जारी विज्ञपति में , पहली बार लाइब्रेरियन के पद पर भर्ती के लिए अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे गए हैं।  ज्ञात हो की , पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली की जिला अदालतों में भर्ती का सारा जिम्मा दिल्ली अवर सेवा चयन परिषद् को सौंप दिया गया है जो समय समय पर विभिन्न पदों के लिए विज्ञापन जारी कर परीक्षाएँ आयोजित करके अभ्यर्थियों का चयन करती है।  

इस बार ये विज्ञापन किसी तकनीकी पद , लाइब्रेरियन के लिए निकाला गया और इसके लिए वांछित योग्यता भी लाइब्रेरी साइंस में स्नातक आदि रखी गई है।  यहाँ ध्यान देने योग्य बात ये है कि , अब तक चली आ रही परिपाटी और प्रावधानों के अनुसार मिनिस्ट्रियल पदों पर चयनित और नियुक्त कमर्चारियों को ही लाइब्रेरी , कंप्यूटर , केयर टेकिंग एंड मेंटेनेंस आदि तमाम पदों व दायित्व सौंप दिया जाता था।  

अब इन पदों पर विशेष रूप से इन्हीं तकनीकी पदों के लिए शिक्षित और प्रशिक्षित अभ्यर्थियों के चयन से , न्याय प्रशासन के लिए इन सभी क्षेत्रों में विभागों को सर्वोच्च दक्षता की ओर ले जाने में सहायता मिलेगी।  अच्छा होता यदि संस्थान में पहले से ही कार्यरत कर्मचारियों और ऐसी ही अहर्ता योग्यता अनुभव रखने वालों को भी इनमें सहभागिता का अवसर दिया जाता।  

ज्ञात हो कि अभी पिछले ही दिनों , अधिवक्ता कल्याण के लिए कार्य कर रहे किन्हीं अधिवक्ता ने सूचना का अधिकार के तहत जिला न्याय प्रशासन से यह जानकारी माँगी थी कि , ऐसे सभी विशेष विभागों के प्रभारियों , अधीक्षकों के चयन पदस्थापन में अपेक्षित योग्यता ,पैमाना व उसके अनुसार ही उसके अनुपालन की स्थिति।  अब ये नई भर्तियां भी इस तरफ अग्रसर होने जैसा ही है।  

ऐसी सभी सुधारों और पहल का स्वागत किया जाना चाहिए और ये सारे प्रयास ही जिला अदालतों के न्याय प्रशासन को अव्वल और चूक रहित बनाने में सहायक और निर्णायक साबित होंगे।  

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

केंद्र सरकार लाएगी :समान नागरिक संहिता कानून : विधि आयोग का गठन

 


केंद्र सरकार ने जल्दी ही पूरे देश के लिए समान नागरिक संहिता यानि UCC Uniform Civil Code , को लाने की तैयारी में है । ज्ञात हो कि अभी कुछ राज्यों में होने जा रहे विधान सभा चुनावों से पहले ही भाजपा शासित राज्यों ने गुजरात , हिमाचल आदि ने बाकायदा घोषणा पत्र में इस बात का संकल्प लिया है । 

इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए कल सरकार ने नए विधि आयोग का गठन कर दिया ।विदित हो कि , विधि आयोग का गठन 4वर्षों के बाद किया गया है व कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति श्री आर आर अवस्थी को विधि आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है । 



विधि आयोग का गठन पिछले चार वर्षों से लंबित था । श्री अवस्थी को अध्यक्ष बनाए जाने के अतिरिक्त न्यायमूर्ति के टी संकरन, प्रोफेसर आनंद पालीवाल , प्रोफेसर रेखा आर्य ततहा एम करुणानिधि को सदस्य के रूप में नामित किया गया है । 


केंद्र सरकार ने विधि आयोग के गठन के लिए दायर जनहित याचिका के उत्तर में अदालत को बताया था कि जल्दी ही विधि आयोग का गठन कर , समान नागरिक संहिता का मामला विधि आयोग के पटल पर रखा जाएगा । 



गुरुवार, 19 सितंबर 2019

न्यायपालिका पर उठते सवाल


पिछले कुछ समय से न्यायपालिका से जिस तरह की खबरें निकल कर सामने आ रही हैं वो कम से कम ये तो निश्चित रूप से ईशारा कर रही हैं कि , न्यायपालिका की प्रतिबद्धता और जनता के बीच बना हुआ उनके प्रति विश्वास अब पहले जैसा नहीं रह पायेगा | रहे भी कैसे एक के बाद एक नई नई घटनाएं ,आरोप ,व जैसी जानकारियां निकल कर आम लोगों के बीच पहुँच रही हैं वो न तो न्यायपालिका के लिए स्वस्थ परम्परा साबित होगी न ही देश की व्यवस्था के लिए |

पिछले वर्ष न्यायिक इतिहास में पहली बार देश की सबसे बड़ी अदालत के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों (जिनमे से एक आज प्रधान न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं )ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर मनमाने ढंग से काम करने और यहां तक कि महत्वपूर्ण मुकदमों को वरिष्ठ न्यायाधीशों को न सौंप कर कनिष्ठ न्यायाधीश को आवंटित किये जाने और ऐसी ही बहुत सारी असहमतियों को लेकर सभी न्यायमूर्तियों ने प्रेस कांफ्रेस की | यह अपनी तरह का पहला मामला था जब शीर्ष न्यायपालिका अपने अंदरूनी प्रशासनिक कलह को इस तरह से सार्वजनिक रूप से सबके सामने ले आई थी | हालांकि इससे पहले भी समय समय पर शीर्ष न्यायालय के कुछ वरिष्ठ न्यायाधीश बहुत से अलग मामलों पर असहमति जता चुके हैं | 


अभी कुछ दिनों पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति पर अपनी ही एक कर्मचारी के शोषण का मामला (जिस तरह से आनन फानन में बिना किसी ठोस न्यायिक प्रक्रिया के इस मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया वो भी खुद न्यायपालिका द्वारा ही वो न्यायपलिका के ऊपर सवाल उठाने के लिए काफी है ) ठंढा भी नहीं हुआ था कि अब फिर हाल ही में पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश कुमार ने न्याय प्रशासन और उच्च न्यायपालिका में चल रही विसंगतियों की ओर खुले आम आरोप लगाए  हैं | 

जैसा कि पहले भी होता रहा है न्यायपालिका खुद अपनी साख स्वतंत्रता पर इसे किसी तरह का आघात मानते हुए तुरंत प्रभाव से पहले मामला उठाने वाले विद्वान न्यायाधीशों को ही किनारे लगा देती रही है (जस्टिस कर्णन व इस तरह के और भी बहुत सारे मामले देखे जा सकते हैं ) , तो इस मामले में भी सबसे पहला जो काम किया गया वो ये कि न्यायाधीश महोदय के काम काज का अधिकार ही उनसे वापस ले लिया गया | 

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि , ऐसे तमाम मामलों में प्रश्न उठाने वाले या आरोप लगाने वाले न्यायाधीशों पर तो कार्यवाही हो जाती है मगर इन आरोपों पर , इन विसंगतियों पर कभी भी न्यायपालिका खुद कोई ज़हमत उठाने की कोशिश नहीं करती | आज आम जनमानस में न्यायपालिका को लेकर जिस तरह का अविश्वास पैदा हुआ और बढ़ रहा है उसके लिए बहुत हद तक खुद न्यायपालिका जिम्मेदार  है | 








आखिर वो कौन से कारण हैं कि आज़ादी के बाद से अब तक लगातार मुकदमों में भी इज़ाफ़ा हो रहा है और उसी अनुपात में अपराधों में भी ??

इन मुकदमों को समाप्त किए  जाने व भविष्य में इनकी संख्या को नियंत्रित किए जाने को लेकर न्याय प्रशासन ने अब तक क्या और कितना ठोस काम किया है ये खुद न्यायपालिका को बताना चाहिए

देश में खुद को ईमानदारी ,कर्तव्यपरायणता , प्रतिबद्धता का पर्याय कहने बताने वाली न्यायपालिका देश में एक भी ऐसी अदालत नहीं बना पाई जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो

न्यायपालिका में भी भाई -भतीजावाद ,भ्रष्टाचार , लालच ,कदाचार देश की किसी भी संस्था से रत्ती भर भी कम नहीं है और ये दिनों दिन बढ़ रहा है

अदालतें अब किसी तरह फैसला तो सूना रही हैं मगर न्याय करने व न्याय होने से वे कोसों दूर होती जा रही हैं

ऐसे बहुत सारे सवाल और मसले हैं जो सालों से न्यायपालिका के सामने उत्तर की बाट जोह रहे हैं

रविवार, 25 दिसंबर 2011

वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं : बेहतर शुरूआत







देश के सामने भविष्य में जो कुछ चुनौतियां विकराल रूप में आने वाली हैं , उन्हीं में से एक निश्चित रूप से मुकदमों की बोझ से जूझती न्यायपालिका भी होगी । देश की मौजूदा न्यायिक व्यवस्था के आकलन के लिए सिर्फ़ एक ही तथ्य काफ़ी है , वो ये कि वर्तमान में देश की अदालतों में लगभग साढे तीन करोड मुकदमे लंबित पडे हैं । भविष्य में स्थिति के बिल्कुल नारकीय होने की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है और इसके लिए पुख्ता कारण भी हैं । प्रति वर्ष बनने बनाए जाने वाले नए ने कानून , उनके उपयोग से ज्यादा दुरूपयोग किए जाने की आशंका और कम पडते न्यायिक संसाधन , यानि देश में अदालतों ,न्यायाधीशोंण आदि की कमी , देश की न्याय व्यवस्था को बेहद धीमा कर देंगे ।


पिछले एक दशक में समाज में अपराध की दर में तीव्र वृद्धि , जीवन व विकास के लिए बढती महात्वाकांक्षा के कारण पैदा हुई गला काट प्रतिस्पर्धा , कानून के उपयोग-दुरूपयोग से अदालतों में मुकदमों की संख्या लगातार द्विगुणित हो रही है । सरकार व प्रशासन तो मौजूदा लंबित मुकदमों के निस्तारण व्यवस्था में ही खुद को पस्त मान चुकी है । हालांकि पिछले एक दशक में भारतीय न्यायिक व्यवस्था ,पश्चिमी देशों की न्यायिक प्रक्रियाओं या जिन्हें वास्तविक अर्थों में वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं कहा जाए तो बेहतर होगा , को प्रयोग में लाकर बहुत महत्वपूर्ण उपाय तलाशा है ।

भारत की पुरातन प्रणाली से लेकर आज की आधुनिक प्रणाली तक न्याय व्यवस्था बहुस्तरीय रही है और ऐसा इसलिए है ताकि न्याय की पूर्ण स्थापना हो सके । राज्य का अपने नागरिकों के प्रति जो अहम कर्तव्य होता है उसमें से एक प्रमुख होता है आम नागरिकों सस्ता व सुलभ तथा त्वरि न्याय उपलबध कराए , किंतु अभी भी प्रति व्यक्ति न्यायाधीश या अदालतों की उपलब्धता वैश्विक न्याय व्यवस्ता के मापदंडों से बहुत पीछे है । हालांकि सरकार अपनी ओर से अदालतों पर बढ रहे मुकदमों को कम करने के लिए कई नई योजनाओं पर कार्य कर रही है जिसके तहत अभी हाल ही में मिशन मोड परियोजना को भी शुरू किया गया है ।


इसके अलावा पिछले कुछ सालों में परंपरागत व्यवस्था के अतिरिक्त मध्यस्थता केंद्र , लोक अदालत , सांध्यकालीन अदालत , ई कोर्ट ,प्ली बारगेनिंग , गरीबों के लिए मुफ़्त कानूनी सहायता दिलाने हेतु विधिक सेवा प्राधिकरण की स्थापना , कारागारों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण ,न सिर्फ़ कानूनी अधिकारों का बल्कि जीविकोपार्जन के उद्देश्य से भी , समय समय पर चलाए जाने वाले कानूनी साक्षतरा अभियान आदि जैसे कई वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाओं से भविष्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारी हो रही है । इनके अलावा कागज़रहित अदालतें , ग्राम अदालतों की स्थापना आदि पर भी तेज़ी से कार्य चल रहा है ।


भारतीय ग्राम्य समाज के न्यायिक इतिहास में किसी भी विवाद के निपटारे में एक प्रधान भूमिका आपसी समझौते या मध्यस्थता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहती आई है । ग्राम पंचायतों द्वारा पूरे समाज के गंभीर से गंभीर विवादों व अपराधों तक की सुनवाई का चलन रहा है । शहरी समाज में बढते दांपत्य विवाद ,पैसे के लेन देन, ऋण कर्ज़ विवाद तथा दुर्घटना मुआवजा वाद एवं श्रमिक प्रबंधन विवाद जैसे कानूनी निर्णय वाले विवादों के निपटारे के लिए आधुनिक न्यायिक व्यवस्था में भी वैकल्पिक ,न्यायिक प्रकिया के रूप में स्थापित हुआ -मध्यस्थता केंद्र । आज देश की बहुत सारी अदालतों में मध्यस्थता केंद्रों द्वारा न्यायाधीशों व परामर्श एवं विधिक प्रक्रियाओं के ज्ञाता अधिवक्ताओं की दक्ष व प्रशिक्षित टीम की सहायता से अदालती बोझ को कम करने की कोशिश एक बेहतर रंग ला रही है । महानगरीय जीवन के बढते वैवाहिक पारिवारिक विवादों के लिए ये चमत्कारिक साबित होती है हैं । सरकार व प्रशासन इनकी सफ़लता से इतना उत्साहित हुई कि अदालती वादों केल इए मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना के अतिरिक्त सभी क्षेत्रों के विशेष कार्यकारी दंडाधिकारी के कार्यालयों के पास भी मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना की गई है । इन केंद्रों में अदालत पूर्व विवादों समस्याओं को सुना व निपटाया जा रहा है ।


सुलह समझौते की प्रक्रिया को तरज़ीह देती दूसरी शुरूआत रही लोक अदालतों की स्थापना । प्रारंभे में विशेष संस्थाओं ,नगर निगम , ट्रैफ़िक , टेलिफ़ोन , बिजली , पानी आदि के संबंधित वादों को लिया गया । इसके पश्चात इन लोक अदालतों ने देश की अदालतों में तेजी से बढे १३८ निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के तहत लाखों में दायर किए गए मुकदमों को निपटाने में बढी भूमिका निभाई । इन लोक अदालतों को व्यापक व प्रभावी बनवाने के लिए विशेष मेगा लोग अदालतों का अयोजन तथा स्थाई लोक अदालतों की स्थापना की गई । इसका परिणाम ये रहा कि मुकदमों के निस्तारण के रफ़्तार में एक गति महसूस की गई । दिल्ली ,कोलकाता , मुंबई आदि नगरों महानगरों में इनकी उपलब्धि व महत्व उल्लेखनीय रही हैं ।


 अदालतों में कामकाज के घंटों में कमी को महसूस करते हुए विशेष रूप से सांध्यकालीन अदालतों की संकल्पना की गई । आज अहमदाबाद एवं दिल्ली में विशेष सांध्यकालीन अदालतों का परिचालन सफ़लतापूर्वख किया जा रहा है । आज ई-तकनीक का युग है ऐसे में बहुत आवश्यक था कि विधि व तकनीक के सामंअज्स्य को न्याय क्षेत्र के लिए सकारात्मक दिशा देते हुए उसे न सिर्फ़ अपनाया जाए बल्कि प्रोत्साहित किया जाए । देश की सभी अदालतों को कंप्यूटरीकृत करने का कार्य चल रहा है । पिछले कुछ वर्षों में देश में बहुत सी कागज़ रहित ई अदालतों की स्थापना ने इस ओर के महत्वपूर्ण परिवर्तन के संकेत दे दिए हैं ।


न्यायिक प्रक्रियाओं में प्ली बारगेनिंग व्यवस्था की शुरूआत ने कहीं न कहीं चली आ रही दंडीय विधान व्यवस्था को नया विकल्प दे दिया । पीडितों को न्याय के मानवीय पहलू से परिचय कराते हुए दंड राशि को मुआवजे के रूप में दिए जाने की पहल की गई । बेशक इन शुरूआती चरणों में ये तमाम वैकल्पिक न्यायिक प्रक्रियाएं नाकाफ़ी और बहुत छोटी लग रही हों , किंतु आने वाले समय में ये प्रयास नि: संदेह क्रांतिकारी परिणाम देने वाले साबित होंगे ।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

मिशन मोड योजना शुरू : अदालती द्स्तावेज़ होंगे डिज़िटलाइज़्ड








इन दिनों , न्यायपालिका पर बढते बोझ और भविष्य में उनके आगे आने वाली बडी चुनौतियों से निपटने के लिए , सरकार , प्रशासन और खुद न्यायपालिका के द्वारा बहुत सी महात्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं । पिछले कुछ वर्षों में प्रयोग के तौर पर , लोक अदालत , सांध्य कालीन अदालत, प्ली बारगेनिंग , मध्यस्थता केंद्र जैसे प्रयोगों को न सिर्फ़ शुरू किया गया बल्कि सफ़लतापूर्वक उनका संचालन किया जा रहा है । सबसे सुखद बात ये है कि सभी योजनाओं में सफ़लता का दर अपेक्षा से कहीं अधिक निकला । यही कारण है कि इस उपलब्धि से प्रोत्साहित होकर मिशन मोड जैसी भगीरथी योजना क्प शुरू किया गया है । 

इसके पहले चरण में सभी अदालती दस्तावेज़ों को डिज़िटलाईज़्ड करने की कवायद शुरू की जा चुकी है । अभी हाल ही में दिल्ली की समस्त अदालतों से इस बाबत सूचना मांगी गई , कि वे प्रतिदिन आदेश के लिए ,अंतिम निर्णय के लिए , अन्य कार्यवाहियों के लिए औसतन कितना कागज़ खपत करती है । इन सूचनाओं के आधार पर ही अदालत  के सभी दस्तावेज़ों को ई दुनिया में सहेज़ दिया जाएगा । ज्ञात हो कि देश की बहुत सी अदालतों पहले ही कागज़ रहित ई अदालतों की शुरूआत हो चुकी है , जहां पूरी तरह से अदालती कार्यवाही को कंप्यूटरों द्वारा ही किया जा रहा है और कदियों की पेशी तथा सुनवाई वीडियो कांफ़्रेंसिंग के ज़रिए की जा रही है । 



माना जा रहा है कि अदालतों के सभी कागज़ातों व दस्तावेज़ों के डिजिटलाइजेशन की , प्रक्रिया एक एतिहासिक पहल साबित होगी । अदालतों को ई दस्तावेज़ के रूप में सहेजे जाने से बहुत सारी बातों में सहायता मिल सकेगी । वर्तमान में अदालती दस्तावेज़ो को सुरक्षित रख पाना वो भी लंबे अरसों तक , यही एक बडी समस्या है । दीवानी , फ़ौज़दारी व अन्य वादों के मुकदमे से संबंधित द्स्तावेज़ों को अदालती अभिलेखागार में सहेज़े जाने की मियाद भी अलग अलग है । कई दस्तावेज़ों को बहुत लंबे समय तक तो कईयों को हमेशा के लिए सुरक्षित रखना होता है । भारत में न्यायव्यवस्था के बहुस्तरीय होने के कारण , अपील और अपील के निस्तारण में लगने वाला लंबा समय , आदि के कारण मुकदमों से जुडे दस्तावेज़ों को सहेजा जाना जरूरी होता है । 

एक बार स्कैन करके अंतर्ज़ाल पर उन दस्तावेज़ों को डाल देने से ,न सिर्फ़ पारदर्शिता , न्यायिक प्रकिया व कार्यवाहियों तक आम जन की सीधे व त्वरित पहुंच हो सकेगी । सूचनाओं का ये भंडार न सिर्फ़ न्यायिक प्रक्रिया को गतिमान करने में सहायक होगा बल्कि  भविष्य में ई सुलभता के कारण लोगों को सुलभ भी हो सकेगा । देखना ये है कि भविष्य में अदालतों को तकनीक से लैस करने का उनकी लक्ष्य प्राप्ति में कितना कारगर साबित होता है । 

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

सडक दुर्घटनाओं पर गंभीर होती अदालतें...

राजधानी दिल्ली में दिनोंदिन बढती सडक दुर्घटनाओं पर अदालतों ने बहुत ही गंभीर रुख अख्तियार कर लिया है। अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राजधानी में बढ रही दुर्घटनाओं के मद्देनज़र . निचली अदालतों, पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों , न्यायिक प्रक्रियाओं को एक साथ ही बहुत से निर्देश दिये हैं। अब तक चली आ रही व्यवस्था के तहत , दुर्घटना के बाद पुलिस सिर्फ़ एक ही तरह का मुकदमा दर्ज़ करती है ।और प्राथमिकी , चोटिल या म्रत व्यक्ति की चिकित्सकीय रिपोर्ट आदि की प्रति मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम पंचाट में जमा कर दी जाती है। जहां से इच्छित व्यक्ति , जो भी क्लेम करना चाहता है तो उस प्रति को प्राप्त कर मुकदमा दायर करता है।

इस वर्तमान व्यवस्था में दो बहुत ही बडी खामियां थी । पहली तो ये कि जानकारी के अभाव में आम लोगों को पता ही नहीं चल पाता है कि उनके क्लेम के लिये सबसे जरूरी कागजात पंचाट में जमा हैं । दूसरा ये कि यदि किसी तरह से उन्हें पता चल भी जाता है तो उसे प्राप्त करने की जद्दोजहद पीडित के लिये बहुत ही कठिन होता है। न्यायालय ने इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए नयी व्यवस्था शुरू की है। नए निर्देशों मे से जो प्रमुख हैं वे इस प्रकार हैं।

अब किसी भी दुर्घटना के बाद मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम के धारा १५८ (६) के तहत पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि संबंधित कागजातों को जमा करने के बाद , पंचाट न्यायालय उन्हें एक निश्चित तारीख देते हैं जिस तारीख पर उन्हें संबंधित सभी पक्षों,,यानि दावाकार, चोटिल या म्रत व्यक्ति, ..दूसरे पक्ष के चालक, वाहन के मालिक और इंश्योरेंस कंपनी की उपस्थिति सुनिश्चित करे। इसका अर्थ ये हुआ कि अब सारी जिम्मेदारी पुलिस पर डाली गयी है ताकि कोई भी पीडित मुआवजे से वंचित न रहे । इसका दूसरा लाभ ये हो रहा है कि जैसे ही सभी पक्ष उपस्थित हो जाते हैं , पंचाट अपनी पहल करते हुए उन्हीं जांच प्रक्रियाओं को दावा याचिका के रूप में परिवर्तित करके उन्हें मुआवजा दिलवा देती हैं। इससे जहां त्वरित न्याय का उद्देश्य पूरा हो रहा है वहीं , वकील, मुकदमे आदि के खर्च से भी पीडित को छुटकारा मिल जाता है ।

राजधानी में हो रही दुर्घटनाओं मे सबसे अधिक ,दुर्घटनाओं के लिये कुख्यात हो चुकी ्दिल्ली की ब्लू लाईन बसों के परिचालन, से संबंधित कई दिशा निर्देशों और समय समय पर कई कानूनों के बावजूद स्थिति में बहुत ज्यादा फ़र्क नहीं पडता देख..न्यायालय ने नए आदेशों के तहत ये आज्ञा दी कि अब किसी भी ऐसी दुर्घटना में जिसमें कोई गंभीर रूप से कोई घायल होगा उसमें पचास हजार की राशि....और यदि किसी की दुर्घटना में ही मौत हो जाती है तो उसमें एक लाख रुपए की रकम ..संबंधित बस के मालिक को अदालत में जमा करवानी होगी ..इस राशि के जमा किये बगैर ..वाहन को पुलिस के जब्तीकरण से नहीं छोडा जाएगा । सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस राशि को बिना विलंब के ..पीडित को दिये जाने की व्यवस्था की जाएगी।

इसके अलावा सभी दुर्घटना वादों, दावा याचिकाओं, न्यायिक व्यवस्थाओ,प्रक्रियाओं और इससे जुडे तमाम पहलुओं पर उच्च न्यायालय निरंतर निगाह रखे हुए है। सबसे अच्छी बात ये है कि इन नयी व्यवस्थाओं के सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं॥