गुरुवार, 26 मार्च 2009

कोर्ट कर्मचारियों के लिए नए दिशा निर्देश जारी - भाग दो

जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में जिक्र किया था कि, अदालतों को मौजूदा हालातों और बढ़ते कार्यबोझ सहित भविष्य की जिम्मेदारियों से निपटने के लिए कई सारी उपायों पर एक साथ काम चल रहा है इन्ही में से एक है अदालत में कार्यरत कर्मचारियों को चुस्त दुरुस्त करने के लिए हाल ही में जारी हुए कई सरे दिशा निर्देश मैं पहले ही बता चुका हूँ कि अदालतों के कर्मचारियों को वर्दी, उनके नाम बैच, के साथ उनके कार्यकलाप और कार्यशैली को बेहतर करने के लिए कई कदम उठाये गए हैं, आज उस से आगे:-


अभी तक की मौजूदा प्रणाली के तहत चयन के बाद सभी कर्मचारियों को बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के सीधे उनकी नियुक्ति अदालतों में कर दी जाती थी चूँकि अदालती काम काज की तकनीकी प्रवृत्ति होती थी सो स्वाभाविक तौर पर जहाँ उन कर्मचारिओं को दिक्कत आती थी वहीं इस कारण सिर्फ़ अदालत के काम काज पर फर्क पड़ता था बल्कि आम लोगन को भी खासी मुश्किल आती थी नए दिसा निर्देश के मुताबिक अब ये सुनिश्चित किया गया है कि सभी कर्मचारियों को अदालतों में नियुक्त किए जाने से पहले कुछ अवधी के लिए प्रकशन दिया जायेगा इससे भी महत्वपूर्ण ये कि सभी को इस बात के लिए भी प्रशिक्षित किया जायेगा कि उन्हें अदालत में आए लोगों से , गवाहों से, एवं वकीलों से किस तरह का शिष्ट व्यावहार करना है


वर्तमान में सभी जिला अदालतों में कार्यरत कर्मचारियों की एक आम शिकायत है कि उन पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है, जो एक हद तक सही भी है इस समस्या से निपटने के लिए भी कई सारे ठोस कदम उठाये गए हैं सबसा पहला तो ये है कि सभी अदालतों में कम से कम एक निश्चित संख्या तक कर्मचारियों की उपस्थिति अनिवार्य कर दी गयी है फिलहाल ये संख्या आठ राखी गयी है इसके साथी ही ये भी आदेश दिया गया है इस बात का पूरा प्रयास किया जाए कि किसी भी कर्मचारी के पास पाँच सौ फाईलों से ज्यादा का बोझ रहे हलाँकि इसे मूर्त रूप दे पाना अभी सम्भव नहीं है हालत का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि अभीa दिल्ली की कुछ अदालतों में कर्मचारियों के पास pआस प्रति कर्मचारी लगभग पाँच से दस हजार तक फाईलों का भार है और भैविश्य में इस बोझ के कम होने का कोई उपाय होता नहीं दिख रहा है

अभी कर्मचारियों को अपने दैनिक कार्यों के अलावा डाक पहुंचाना, जुर्माने की रकम को जमा करवाना, तथा और भी अन्य कई तरह के कार्य साथ साथ करने पड़ते हैं, किंतु नए दिशा निर्देशों के मुताबिक अब सभी अदालतों में इन कार्यों के लिए अलग कर्मचारियों की नियुक्ति की जाना तय हुआ है ताकि उनका नियमित काम बाधित हो सके

एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए पहली बार ओवर टाईम की बात कही गयी है दरअसल अभी अधिक कार्यबोझ के कारण बहुत से कर्मचारियों को अपने निर्धारित कार्य घंटों से ज्यादा काम करना पड़ता है और कई बार तो छुट्टी के दिन भीआना पड़ता है, किंतु अब यदि उन्हें ऐसा करना पडा तो उन्हें इस बात के लिए ओवर टाईम दिए जाने का प्रावधान क्या जा रहा है ताकि उन्हें उनकी म्हणत का प्रतिफल मिल सके फिलहाल ये नियम सिर्फ़ उच्च न्यायालयों में ही लागू है किंतु इसे जल्दी ही अधीनस्थ न्यायालयों में भे लागू किया जायेगा

एक अन्य प्रावधान ये भी किया गया अहै की सभी विभागीय कार्यवाहियों के लिए विशेष रूप से सेवानिवृत न्यायाधीसों की नियुक्ति की जाए ताकि बरसों तक उनके फैसले की प्रतीक्षा करनी पड़े दरअसल अभी किसी भी विभागीय कारवाही की सारी सुनवायी और फैसला कार्यरत न्यायिक अधिकारिओं के जिम्मे ही रहता है इस वजह से उनके निपटारे में बहुत लंबा समय लग जाता है.


अब देखना ये है की इन सुधारों का आम जनता और न्यायिक प्रक्रिया को क्या और कितना फायदा मिलता है

सोमवार, 23 मार्च 2009

कर्मचारियों के लिए कई दिशा निर्देश जारी

अदालतों में सुधार के कई आमूल चूल परिवर्तनों पर कार्य द्रुत गति से चल रहा है। इन दिशा निर्देशों में न सिर्फ़ अदालती क्रियाकलापों, कार्यवाहियों, न्यायिक अधिकार्यिओं बल्कि अदालत में कार्यरत कर्मचारियों के लिए भी कई कड़े नियम कायदे क़ानून बनाए जा रहे हैं। ऐसा भी नहीं है की सिर्फ़ सख्त क़ानून और उपाय ही किए जा रहे हैं बल्कि उनकी सभी समस्याओं और दैनिक कठिनाईयों को ध्यान में रखते हुए, बाकायदा उनका अध्ययन करके कुछ विस्तृत उपायों को अपनाने हेतु नए कदम उठाये गए हैं।

पिछले वर्ष सम्पन्न हुए सम्मलेन में न्यायिक अधिकारिओं की अनुशंषा को ध्यान में रख कर माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल में अध्नास्थ न्यायालयों के कर्मचारियों के लिए कई सारे दिशा निर्देश जारी किए हैं। इनमें से कुछ बेहद ही महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी माने जा रहे हैं।

१। ज्ञात हो की अभी दिल्ली की सभी ९ जिला अदलातें , वर्तमान में मौजूद पाँचों अदालतों में चल रही हैं। काफी पहले से चली आ रही किसी निश्चित नीती की अभाव में अब तक किसी भी कर्मचारी का तबादला कहीं भी कर दिया जाता था। इस प्रव्रत्ति से न्यायिक अधिकारी भी वंचित नहीं थे, किंतु अब ऐसा नहीं हो सकेगा। नए दिशा निर्देशों के अनुसार ये आदेश दिया गया है की ये सुनिश्चित किया जाए की सभी कर्मचारियों और यथा सम्भव न्यायिक अधिकारियों को भी उनके निवास स्थान के नजदीक पड़ने वाली अदालतों के निकट ही नियुक्त किया जाए ताकि आने जाने में नष्ट हुए समय के कारण उनकी कार्यक्षमता पर दुष्प्रभाव न पड़े।

२। नए आदेश के मुताबिक प्रति पाँच अदालत पर एक प्राश्निक अधिकारी और एक जन संपर्क अधिकारी की नियुक्ति की जाए। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्यूंकि वर्तमान में इन उच्च स्तर के अधिकारिओं की कमी के कारण बेहतर प्राश्निक प्रणाली और अनुशाशन , आपसी तालमेल , सूचनाओं का आदान प्रदान आदि में काफी कठिनाई होती है। अधिक अधिकारियों की नियुक्ती से कर्मचारियों की प्रोंनात्ति की संभावनाएं बढ़ने से ये उनके लिए एक सकारात्मक कदम साबित होगा।

३ एक और बेहद महत्वपूर्ण आदेश के मुताबिक अब तक चल रही प्रणाली के बिल्कुल अलग जाकर पहली बार उच्च न्यायालय की तरह अधीनस्थ न्यायालय के प्राश्निक कार्यों के लिए अलग से रजिस्ट्रार और उप रजिस्ट्रार के पद की अनुशंषा की गयी है। हलाँकि अभी ये तय नहीं हुआ है की इस पद पर नियुक्ति किसकी और कहाँ से की जायेगी, वैसे सूत्रों की माने तो विभागीय परीक्षा के आधा पर विधि स्नातक की योग्यता वाले कर्मचारियों के बीच से ही इन पदों को भरा जायेगा।

४। नए दिशा निर्देशों के मुताबिक सभी न्यायिक अधिकारियों को निर्देशित किया गया है की वे उन कर्मचारियों का विशेष ध्यान रखें जो अकर्मठ है, अपने काम के प्रति इमानदार नहीं हैं तथा जिन्हें अपने काम का ;पूर्ण ज्ञान नहीं है। इस नए आदेश के मुताबिक ऐसे कर्मचारियों पर न सिर्फ़ नजर रखने को कहा गया है बल्कि उन्हें पूरी सख्ती से नौकरी से बाहर निकालने की बात कही गयी है।



आगे कल जारी .................................

गुरुवार, 19 मार्च 2009

मिलने लगा है अदालतों में हिन्दी को महत्व

ऐसा लगता है की पिछले कुछ समय से विभिन्न सरकारी विभागों और अदालतों में भी हिन्दी भाषा को प्रोत्साहित करने की मुहिम का सकारात्मक परिणाम अब दिखने लगा है. जैसा की मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया था की राजधानी की जिला अदालतों में जहाँ बरसों से सिर्फ़ अंगरेजी भाषा में ही काम काज चल रहा है वहां, पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली सरकार के राज भाषा विभाग द्वारा लगातार कई सारे प्रयास किए जा रहे हैं ताकि हिन्दी को काम काज की भाषा बनाया जा सके। इस योजना को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन का नाम दिया गया है। इसके तहत कर्मचारियों के लिए लगातार हिन्दी प्रशिक्षण कार्यक्रम और कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। ऐसी ही एक पाँच दिवसीय कार्यशा का आयोजन अभी हाल ही में संपन्न हुआ था।

किंतु बहुत सी तकनीकी और प्रायोगिक कमियों के कारण इतने अथक प्रयासों के बावजूद हिन्दी अपना वो स्थान नहीं बना पा रही थी । किंतु लगता है की अब हिन्दी को सभी के द्वारा अपनाने और आत्मसात करने के लिए सख्त रुख अपनाने की बारी आ गयी है। आज ही माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश की तरफ़ से जारी दो परिपत्रों से तो ऐसा ही लगता है।

पहले परिपत्र के अनुसार कहा गया है की राजभाषा अधिनियम के अनुसार सभी परिपत्र/ सूचनाएं इत्यादि अंगरेजी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में एक साथ जारी किए जाने चाहिए इस लिए सभी को आदेश दिया जाता है की भविष्य में जिला न्यायालय दिल्ली के अंतर्गत आने वाले विव्हिन्न कारायालय/अनुभाग/इकाईयों द्वारा जारी परिपत्र एवं सूचनाएं अंगरेजी के साथ आवश्यक तौर पर हिन्दी भाषा में भी जारी किए जायेंगे। सभी को ये सुनिश्चित करने को कहा गया है की इस आदेश के पालन में कहीं किसी भी तरह की ढील नहीं बरती जाए। ज्ञात हो की इसी तरह कुछ समय पहले एक परिपत्र जारी करके सभी को आदेशित किया गया था की जो भी सूचनाएं, जानकारी, प्रश्न आदि हिन्दी में पूछी जाते हैं उनका उत्तर भी अनिवार्य रूप से हिन्दी में ही दिया जाए।

दूसरे और बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे परिपत्र में कहा गया है की जिला न्यायालय के सभी न्यायिक अधिकारिओं ,प्राश्निक अधिकारियों एवं अधीक्षकों को निर्देश दिया जाता है की वे अपने अंतर्गत कार्यरत कार्मचारियों की वार्षिक गोपनीय सूचना (जिसे आम तौर पर सी आर कहा जाता है ) भरते समय हिन्दी भाषा के ज्ञान व प्रयोग के कॉलम को निश्चित तौर पर भरें। इसके अतिरिक्त वे अपने अन्तर्गर कार्यरत सभी कर्मचारियों को सूचित करें की जो भी कर्मचारी सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा का अधिक प्रयोग करेगा उसके कार्य को वार्षिक गोपनीय सूचना में विशेष योग्यता का दर्जा दिया जायेगा।

ये दोनों परिपत्र अपने आप में अदालतों में हिन्दी को बढावा दिए जाने के प्रयासों में मील का पत्थर साबित होंगे। इससे प्रोत्साहित होकर बहुत से कर्मचारियों ने हिन्दी में काम करने में अपनी खुशी और प्रतिबधित्ता दिखाई है और मुझे सहित कई लोगों ने तो अपने कंप्युटर में हिन्दी फॉण्ट उपलब्ध करवानी की गुजारिश भी कर दी है.

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

बदलेगा अदालतों का चेहरा

अदालतों में कभी नहीं आने वाले के मन में अदालतों का वही स्वरुप होता है जो वे आम तौर पर सिनेमा या टी वी में देखते हैं और कमोबेश दिखने में अदालतें होती भी वैसी ही हैं। लेकिन अब शायद ऐसा नहीं होगा कम से कम राजधानी की जिला अदालतों में तो नहीं ही होगा.

माननीय उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही मैं लागू किए गए दिशा निर्देश के अनुसार जल्दी ही अदालतों का मौजूदा चेहरा बदलने जा रहा है, इसकी कवायद शुरू हो चुकी है और राजधानी की सभी पाँचों अद्लातों में नयी अदालतों के बनने का काम पुरे जोश खरोश के साथ शुरू हो चुका है।

१ इसके तहत पहला काम है, मौजूदा बड़े डायसन को हटा कर छोटे और बिल्कुल नीचे और छोटे डायसन का निर्माण । दरअसल होता या है अभी जो डायस बने हुए हैं वे अदालती कमरे का लगभग ३० से ४० प्रतिशित भाग घेर हुए हैं और वे काफी ऊँचे हैं। इस वजह से वकीलों, गवाहों तक के लिए ये देख पाना मुश्किल होता है की न्यायाधीशों के साथ बैठे पह्स्कार (रीडर ) , तथा आशुलिपिक (स्टेनो ) क्या लिख या करे रहे नहीं. बदलाव के बाद इन डायासों से अदालत के कमरे का सिर्फ़ १० प्रतिशत भाग ही उपयोग ,में आयेगा जिससे बांकी बचे ९० प्रतिशत भाग को वकीलों, गवाहों एवं अन्य सम्बंधित लोगों के लिए उपयोग में लाया जा सकेगा। इसके साथ ही न्यायाधीशों के बैठने के लिए ज्यादा आरामदायक कुर्सियों एवं मेज का काम भी किया जा रहा है।

२। दूसरा आदेश है की अदालतों को वृद्धों और विकलांगों के अनुकूल बनाया जाए। मसलन अदालत भवन जमें इस तरह के बदलाव किए जाएँ की वृद्धों और विकलांगों को उन तक पहुँचने में आसानी हो सके । इसके लिए ढलान वाली सीढियों का काम भी शुरू हो चुका है। नए निर्देश के मुताबिक दुर्घटना क्लेम वाली अदालतें (ऍम ए सी टी ) भूतल पर ही लगाई जाएँ।

३। तीसरा और बेहद प्रमुख निर्देश ये है की सभी अदालतों में एक बड़ी सूचना पट्टिका लगाई जाएइस सूचना पट्टिका में आम लोगों के लिए, गवाहों के लिए ,मुलजिमों के लिए हिन्दी एवं अंगरेजी दोनों भाषाओं में उनसे सम्बंधित उपयोगी बातें और निर्देश लिखी होंगीउदाहरण के लिए, अभी अधिकाँश गवाहों को नहीं पता होता की गवाही देने के लिए आने पर सरकार यात्रा भत्ता देती हैसूचना पट्टिका पर लिखे होने से सबको आसानी से इस बात का पता चल सकेगा और वे लाभान्वित हो सकेंगे

४। उन अदालतों में जहाँ बलात्कार पीड़ित युवती/महिला की गवाही होनी है वहां इस तरह की स्क्रीन लगाए जाने का निर्देश दिया गया है की गवाही के दौरान पीडिता का चेहरा मुलजिम न देखने पाए ताकि उसके किसी भी तरह से भयभीत होने की गुंजाइश न रहे।

५। गवाहों के लिए अलग से बेहद आरामदायक और सुरक्षित कमरे बनाये जाने के भी निर्देश दिए गए हैं। मौजूदा समय में जबकि गवाहों पर हमले की वारदातें बेहद तेजी से बढ़ गयी हैं ऐसे में ये निर्देश काफी महतवपूर्ण माने जा रहे हैं।

सभी अदालतों में एक शिकायत , सुझाव, और प्रार्थना पत्र बक्सा रखे जाने के निर्देश भी दिए गए हैंइस बक्से में उस अदालत में विचाराधीन मुकदमें से सम्बंधित कोई भी शिकायत और प्रार्थना पत्र को डाला जा सकेगा जिसे एक निश्चित समय पर प्रतिदिन निकाल कर न्यायाधीश के सामने रखा जायेगा

७। पूरे अदालत परिसर में एक ही तरह की इलेक्ट्रोनिक घड़ियों को लगाने का निर्देश भी जारी किया गया है, ताकि सभी अदालती कार्यवाहियों में समय का तालमेल बिल्कुल ठीक बना रहे।

इनके अलावा आधुनिक तकनीक से युक्त सी सी टी वी कैमरे, सभी अदालतों के सामने और पूरे अदालत परिसर में वाद स्थिति सूचना पट्टिका ( जो ये बताएगी की अमुक अदालत में इस समय अमुक मुकदमें की सुनवाई की जा रही है ) बायो मेट्रिक मशीनें, आधुनिक माईक्रोफोन एवं स्पीकर और भी बहुत कुछ लगाने के निर्देश दिए गए हैंइन सब पर karkardoomaa कोर्ट सहित अन्य सभी जिला अदालतों में काम शुरू हो चुका है

कल बात करेंगे की कर्मचारियों के लिए क्या नया हो रहा है........................

गुरुवार, 12 मार्च 2009

दिल्ली की जिला अदालतों में हिन्दी भाषा की कार्यशाला का आयोजन

ऐसा लगता है की पिछले दिनों सरकारी काम काज में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ाने के प्रयासों के फलस्वरूप अदालतों में भी हिन्दी को प्रोत्शाहित करने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं। हाल में ऐसे कई नए उपायों पर काम शुरू हुआ जिससे की अदालतों में हिन्दी को बध्वा दिया जा सकेगा। पिछले दिनों जिला अदालत में स्थापित हिन्दी क्रियान्वयन समिति, दिल्ली की जिला अदालतों की हिन्दी वेब साईट, तथा लगातार जारी परिपत्रों में कर्मचारियों को हिन्दी में काम काज करने के निर्देश कुछ ऐसे ही कदम हैं।

इसी के tahat आज से दिल्ली की सभी पाँचों जिला अदालतों में पाँच दिनों की हिन्दी कार्यशाला का शुभारम्भ किया जा रहा है। जिला न्यायाधीश द्वारा जारी परिपत्र के अनुसार सभी को सूचित किया गया है की दिल्ली सरकार का कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग १२ मार्च से १७ मार्च तक सभी जिला अदालतों में बारी बारी से दो दो घंटे की कार्यशाला का आयोजन करने जा रहा है। सभी न्यायिक एवं प्राशाश्निक अधिकारियों से अनुरोध किया गया है की अपने अधीन सभी कर्म्स्चारियों को इस कार्यशाला के बारे में सूचित करें एवं भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें।

यहाँ गौर तलब है की , चूँकि कई कारणों से जिला अदालतों ,कम से कम दिल्ली की जिला अदालतों में तो पूर्णतया हिन्दी में काम काज करना तो अव्यवहारिक सा है। किंतु इन प्रयासों से प्रोत्साहित होकर कुछ उत्साही कर्मचारियों ने जरूर ही अपने दैनिक लेखन कार्यों , प्रार्थना पत्र आदि मिएँ हिन्दी भाषा का प्रयोग शुरू कर दिया है। देखना ये है की आख़िर कब तक राष्ट्र भाषा क़ानून की जुबान बन पाती है। वैसे यदि मुझ जैसे कर्मचारी से पूछें तो मैंने तो अपने कंप्युटर में हिन्दी सॉफ्ट वयेर डालने के प्रार्थना पत्र भेजा था मगर पता चला की लाईनेक्स पर हिन्दी का विकल्प नहीं है। हालाँकि जितने दिनों से मैं हिन्दी में काम कर रहा हूँ इतना तो पता चल गया है की हिन्दी में काम करना न तो कठिन है न ही असंभव बस थोड़ी सी कोशिश और इच्छा शक्ति होनी चाहिए।

कल से अदालतों में सुधार श्रृंख्ला की अगली कड़ियों पर लिखूंगा.

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

अदालतों में लागू होगा डोकेट सिस्टम

मैं अपने पिछले दो आलेखों में बता चुका हूँ की अदालतें, कम से कम दिल्ली की अदालतें तो जरूर ही, बहुत से ऐसे उपाय करने की कोशिस कर रही हैं, जो न सिर्फ़ अदालतों का बोझ कम करने में सहायक होंगी बल्कि यदि पूरी तरह से लागू की गयी तो एक क्रांतिकारी परिवर्तन साबित होंगी। पिछले वर्ष नवम्बर में संपन्न न्यायाधीशों के सम्मलेन में कई नए सुझाव और उपायों पर खुल कर चर्चा हुई । जिसके निष्कर्ष स्वरुप कुल १६९ उपायों पर काम करना तय हुआ। इसी महत्वाकांक्षी परियोजना को अमली जमा पहनाने हेतु राजधानी की सभी जिला अदालतों में एक विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए गए । इस दिशा निर्देश में एक अदने से कर्मचारी से लेकर वरिष्ठ न्यायाधीश तक के लिए कोई न कोई आदेश निर्देश जारी किए गए। सकारात्मक बात ये है की इस बार ये भी तय किया गया कि ये परियोजना सिर्फ़ कागजों पर न रह कर जितनी जल्दी हो सके मूर्त रूप ले सके।

ऐसा ही एक निर्देश था अदालतों में डोकेट सिस्टम लागू करने का। इस सिस्टम को समझने से पहले कुछ बातों के बारे में जानते हैं। आज जो हालत हैं उनमें किसी भी अदालत पर मुकदमों का इतना ज्यादा बोझ रहता है कि न्यायिक अधिकारी चाह कर भी एक एक मुकदमें को ख़ास तवज्जो नहीं दे पते। हालत ऐसी होती है कि आधे घंटे बाद ये नहीं पता होता कि अमुक व्यक्ति का कौन सा मुकदमा था और उमें आज क्या हुआ। ऐसे में सभी की एक आम शिकायत होती है कि उनकी बात नहीं सूनी जा रही है। कई बार इसीलिए अन्तिम समय में आदेश या फैसला तक टल जाता है । ये तो सच है कि मुकदमों का बोझ बहुत ज्यादा होने के कारण ही ऐसा होता है, किंतु पाया ये गया कि कई बार या कहें कि बहुत बार सिर्फ़ मुकदमों के सही तरीके के नियोजन के अभाव के कारण भी ऐसा होता है। किसी दिन किसी अदालत में ढेरों मुकदमें सिर्फ़ गवाही में ही लग जाते हैं। नतीजा वही कि बहुत से गवाहों को वापस जाना पड़ता है। अब इस नए डोकेट सिस्टम के लागू होने के बाद ऐसा नहीं होगा। दरअसल इस सिस्टम से अदालत में लंबित मुकदमों को , वरीयता, उनकी गंभीरता, उनमें गवाहों की कुल संख्या, मुकदमें की उम्र के हिसाब से बेहद संतुलित तरीके से अनुपातित करके उन्हें तारीख दी जायेगी। इस बात की पूरी कोशिश की जायेगी कि कोई भी मुकदमा सिर्फ़ तारीख देने के लिए, या औपचारिकता भर के लिए न रह सके।

दरअसल इस बात की परिकल्पना , कुछ वर्ष पहले न्याय दिवस पर बोलते हुए मुख्या न्यायाधीश ने की थी। उन्होंने तो तो इस कार्य के लिए बाकायदा कोर्ट मैनेजर के पद की अनुशंषा भी की थी , जिस पर फिलहाल कोई भी कार्ययोजना अभी लागू नहीं की गयी है । इस सिस्टम के लिए अभी अदालतों में कार्यरत पेशकार और अहलमद मिल कर पूरी योजना को अमली जामा पहनाएंगे। न्यायिक अधिकारियों को इस बात से मुक्त रखा जायेगा कि अमुक दिन कौन सा मुकदमा किस उद्देश्य के लिए रखा जायेगा, अलबता सब कुछ उनके ही दिशा निर्देश के अनुसार किया जायेगा.यदि ये डोकेट सिस्टम सफल हो गया तो न सिर्फ़ अदालतें बिल्कुल व्यवस्थित होकर कायर करेंगी बल्कि एक आम आदमी को भी ये डर नहीं रहेगा कि कहीं उसका काम आज न हो और उसे सिर्फ़ तारीख मिले। किंतु विश्लेषक ये मान रहे हैं कि उन स्थितियों में जहाँ मुकदमों की संख्या बहुत ज्यादा है वहां ये सिस्टम ज्यादा कारगर नहीं साबित होगा, क्योंकि किसी भी हालत में प्रतिदिन लगने वाले मुकदमों की संख्या को कम नहीं किया जा सकेगा। देखना ये है कि ये सिस्टम कितना सफल या असफल हो पायेगा.

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

रंग बिरंगी फाईलें बतायेंगी की मुकदमा कितना पुराना है

देरी से मिलने वाला न्याय , अन्याय के समान है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था अवेम धीमी न्यायिक प्रक्रिया के सम्बन्ध में ये एक प्रचलित वाक्य है। एक आंकडे के मुताबिक देश की अदालतों में इस वक्त तीन करोड़ से अधिक मुकदमें लंबित हैं। मुकदमों की अधिकता के अलावा लम्बी न्यायिक प्रक्रिया, लोगों की अज्ञानता आदि कई कारणों से मुकदमों को फैसले तक पहुँचने में देर हो ही जाती है। ऐसा नहीं है की इस स्थति से निपटने के लिए प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।

अभी कुछ वर्षों पूर्व ही काफी पहले से लंबित मुकदमों को जल्दी निपटाने के लिए विशेष त्वरित अदालतों या फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया था। इनमें वरीयता के आधार पर सात वर्ष पुराने मुकदमों को त्वरित न्याय अदालतों में स्थानांतरित कर दिया जाता है। जहाँ प्रतिदिन सुनवाई के आधार पर जल्दी से जल्दी मुकदमों का निपटारा किया जाता है। इसके अलावा उच्च न्यायालय और उच्चत्तम न्यायालय से भी समय समय पर पुराने मुकदमों को जल्द निपटाने के लिए दिशा निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। अभी कुछ समय पूर्व ही ऐसा एक आदेश आया था जिसमें कहा गया था की अदालतों को अन्तिम बहस सुनने के बाद पन्द्रह दिनों के भीतर ही अपना फैसला सुना देना होगा।

अभी कुछ दिनों पूर्व ही राजधानी की अदालतों में सुधारों के प्रयासों में एक और कदम बढाते हुए अन्य बहुत से उपायों के साथ पुराने मुकदमों से निपटने के लिए कई नए क्रांतिकारी उपाय किए जाने की योजना बने है।
न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं की वे सुनिश्चित करें की जिन मुकदमें जिनमें आरूपी कारागार में हैं उन्हें एक वर्ष के भीतर तथा जिनमें जमानत पर ह्जैं उन्हें दो वर्ष के अन्दर निपटा दिया जाए।

पुराने मुकदमों की तरफ़ विशेष ध्यान आकृष्ट करने के लिए पहली बार रंग-बिरंगी फाईलों का प्रयोग किया जा रहा है ताकि वे आसानी से पहचानी जा सकें एवं उन पर ध्यान केंद्रित रह सकेइस आदेश के तहत, १० वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों की फाईल लाल रंग की, वर्ष से पुराने मुकदमों की फाईल नीले रंग की, वे मुकदमें जिनमें उपरी अदालतों द्वारा कोई विशेष निर्देश दिया गया है, उनका रंग हरा होगा तथा वरिस्थ नागरिकों से सम्बंधित फाईलें पीले रंग की होंगी

इसके साथ ही ये निर्देश भी दिया गया है की सभी न्यायिक अधिकारी अपने डायस पर अपनी अदालत में लंबित पुराने मुकदमों की सूची चिपका कर रखेंगे ताकि उनके ध्यान में वे मुकदमें रहे। इसके अलावा उन्हें वर्ष २००९ के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित करने को भी कहा गया है और वर्ष की समाप्ति पर पुराने मुकदमों संबन्धी विस्तृत रिपोर्ट भेजने के लिए भी कहा गया है।

शीघ्र और सुलभ न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका अपनी और से कई तरह के उपाय कर रही है। सरकार और प्रशाशन को भी चाहिए की इन उपायों के अमलीकरण में यथासम्भव सहयोग दें ताकि न्यायपालिका को अत्यधिक कार्यबोझ से मुक्त किया जा सके.

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

अब अदालत कर्मचारी भी होंगे वर्दीधारी

न्यायपालिका को चुस्त दुरुस्त करने और नया आधुनिक रूप देने की कवायद मैं राजधानी की जिला अदालतों में एक और नयी पहल की गयी है। दिल्ली उच्च न्यायालय के बाद अब राजधानी की सभी नौ जिला अदालतों के कर्मचारियों को वर्दी पहनाने का काम शुरू हो चुका है। ज्ञात हो की अब तक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों एवं nयायिक अधिकारियों पर ही ड्रेस कोड लागू था, मगर अब बहुत से अलग अलग कारणों से सबको वर्दी पहनाई जा रही है। पुरूष एवं महिला कर्मचारियों के लिए अलग अलग रंग तय करने के बाद उनकी सिलाई हेतु नाम लिया जा चुका है और जल्दी ही उन्हें पहना भी दिया जायेगा।

जहाँ तक इसकी पीछे के कारणों की बात है तो उसमें निसंदेह पहला कारण तो भ्रष्टाचारपर अंकुश लगना ही है। वर्दी पहने कर्मचारी कहीं भी आसानी से पहचाने जा सकेंगे। दूसरा ये की इससे अदालतों को दिया जा रहा नया चेहरा शायद ज्यादा आकर्षक बन पायेगा। ऐसा भी सोचा जा रहा है की वर्दी पहनने के बाद शायद कर्मचारियों में एक स्वाभाविक जिम्मेदारी का एहसास हो सके।

ये तो आने वाला समय ही बतायेगा, की पहनावे का ये परिवर्तन कर्मचारियों के विचार और व्यवहार को कितना बदल सकेगा। अलबत्ता इतना तो तय है की राजधानी में शुरू की गयी इस पहल से अदालतों का स्वरुप कुछ आकर्षक जरूर बनेगा। इसे और कहाँ कहाँ अपनाया जाता है ये भी देखने वाली बात होगी। फिलहाल मेरी सोच वाले सभी अधिकारी/कर्मचारी अपनी नयी वर्दीधारी लुक के बारे में सोच कर बेहद रोमांचित हैं.