जैसा की मैंने कल कहा था की यदि किसी प्रार्थी को लगता है की अदालत ने जमानत के लिए जो राशिः तय की है , वो उसके बूते की बाहर है तो सी आर पी सी की धारा ४४० के तहत वो अदालत में उस जमानत राशिः को कम करने की प्रार्थना कर सकता है। किसी परिस्थितिवश यदि वह जमानती बदलना चाहता है तो इसके लिए भी वह प्रार्थना पत्र दे सकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है की जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन, गवाहों या साक्ष्यों को प्रभावित करने का प्रयास तथा नियत तिथि पर अदालत के समक्ष उपस्थित न होने पर किस भी समय उसकी जमानत रद्द की जा सकती है। कुछ विशेष परिस्थिति में प्रार्थी के अत्यधिक गरीब होने आदि की स्थिति में अदालत उसे व्यक्तिक जमानत पर भी छोड़ सकती है।
जमानत देने वाले व्यक्ति के लिए ध्यान रखने योग्य बातों का उल्लेख भी करते चलें। वह अच्छी तरह तय कर ले की वह किसी की जमानत देने जा रहा है भ्वावेश में या अनजाने में ऐसा करना अहितकर हो सकता है। अपनी पहचान तथा स्तिथि के सन्दर्भ में सभी कागजातों की मूल प्रति अवश्य साथ ले जाएँ। और हां, जमा किए जा रहे सभी कागजातों की एक फोटो प्रति अपने पास सुरक्षित रख लें। वाद संख्या, प्राथमिकी संख्या, थाना धारा, तहत जमानत की तारीख आदि भी अच्छी तरह नोट कर लें। केस की समाप्ति पर पुनः अर्जी लगाकर जमानत बंधपत्र के साथ जमा अपने कागजातों को वापस प्राप्त कर लें।
अगले आलेखों में, तलाक लेने से पहले
कैसे लें मुआवजा,
जाने गिरफ्तारी कानूनको
बुधवार, 18 जून 2008
मंगलवार, 17 जून 2008
कोर्ट में जमानत प्रक्रिया को जाने - 2
गंभीर अपराधों के लिए जमानत की अर्जी अदालत में ही देनी होती है। हत्या, dakaitee,बलात्कार, अपहरण,आदि जैसे गंभीर अपराधों के लिए। उच्च न्यायाय्लय द्वारा जमानत के आदेश तथा सत्र न्यायाय्लय द्वारा अग्रिम जमानत अर्जी पर दिया गया आदेश संबंधित न्यायालयों तथा थानों में , प्रतिलिपि के रूप में भेजा जाता है। हालांकि जमानत के लिए कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है। ये अपराध की प्रवृत्ति , प्रार्थी की स्तिथि तथा जमानत के लिए उसका आधार पर निर्भर करता है। किंतु सभी अध्नास्थ न्यायालय , समय समय पर उच्च न्यायाय्लय द्वारा जारी दिशा निर्देह्सों को अनुकरणीय रूप में लेते हैं। जमानत आदेश के अनुसार , एक या दों व्यक्तियों को जमानती के रूप में प्रस्तुत करना होता है। जमानती के रूप में परिवार, पड़ोस समाज, रिश्तेदारी आदि में से कोई भी व्यक्ति प्रस्तुत हो सकता है। जमानत हेतु प्रस्तुत किए जाने वाले बंद पत्र यानि बेल बोंड में जमानती का विस्तृत वर्णन दिया जाना अनिवार्य होता है। स्मरण रहे की इन दिनों जमानती की पासपोर्ट फोटो को बेल बोंड पर चिपकाना भी अनिवार्य कर दिया गया है।
जमानत राशी के बारे में , अपनी उस वस्तु या कोई कागजातों के बारे में , जिसे की जमानत के तौर पर प्रस्तुत किया जाना है, उसकी फोटो प्रति भी बेल बोंड के साथ लगानी होती है। न्यायादीश के पूछने पर सब कुछ सही सही बताना आवश्यक है, उसके बाद भी अदालत चाहे तो, अपनी तसल्ली के लिए पुलिस वेरेफीकैसन करवा सकती है, यदि अदालत ऐसा आदेश करती है तो जमानाते को इस बात के लिए तैयार हो जाना चाहिए की कुछ पुलिस वाले उसके घर और पड़ोस में आकर उसके बारे में पूरी पूछताछ कर सकते हैं। इस वेरेफिकासन रिपोर्ट के सही पाए जाने पर उस व्यक्ति को जमानती के रूप में अदालत स्वीकार कर लेती है।
जमानत के सन्दर्भ में कुछ विस्शेष बातों का उल्लेख आवश्यक हो जाता है। यदि प्रार्थी को जमानत राशी ज्यादा लगती है , इतनी की वह जमानती प्रस्तुत नहीं कर सकता तो वह जमानत राशी कम किए जाने की prarthnaa कर सकता है।
kramash :
जमानत राशी के बारे में , अपनी उस वस्तु या कोई कागजातों के बारे में , जिसे की जमानत के तौर पर प्रस्तुत किया जाना है, उसकी फोटो प्रति भी बेल बोंड के साथ लगानी होती है। न्यायादीश के पूछने पर सब कुछ सही सही बताना आवश्यक है, उसके बाद भी अदालत चाहे तो, अपनी तसल्ली के लिए पुलिस वेरेफीकैसन करवा सकती है, यदि अदालत ऐसा आदेश करती है तो जमानाते को इस बात के लिए तैयार हो जाना चाहिए की कुछ पुलिस वाले उसके घर और पड़ोस में आकर उसके बारे में पूरी पूछताछ कर सकते हैं। इस वेरेफिकासन रिपोर्ट के सही पाए जाने पर उस व्यक्ति को जमानती के रूप में अदालत स्वीकार कर लेती है।
जमानत के सन्दर्भ में कुछ विस्शेष बातों का उल्लेख आवश्यक हो जाता है। यदि प्रार्थी को जमानत राशी ज्यादा लगती है , इतनी की वह जमानती प्रस्तुत नहीं कर सकता तो वह जमानत राशी कम किए जाने की prarthnaa कर सकता है।
kramash :
बुधवार, 30 अप्रैल 2008
जमानत प्रक्रिया को जाने
पुलिस , क़ानून, कचहरी, के सन्दर्भ में जो शब्द सबसे ज्यादा चर्चा के दायरे में रहता है वो है जमानत। दीवानी एवं फौजदारी मुकदमों के विभिन्न चरणों में कभी किसी को ख़ुद की जमानत लेनी होती है तो कभी किसी का जमानती बनना पड़ता है। जमानत वो ढाल है जो किसी को सजा मिलने तक या कहें की अपराध का दोषी करार दिए जाने तक जेल की काल-कोठारी में जाने से बचाता है। जमानत की पूरी प्रक्रिया को जानने समझने से पहले जानते हैं की आख़िर जमानत होती क्या है , एवं ये कितने प्रकार की होती है आदि आदि।
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ४३६ से शुरू होकर कई धाराओं में पूरी जमानत प्रक्रिया, जमानत के आदेश का स्वारूप, जमानती के लिए शर्तें आदि का वर्णन है, हालांकि आम लोगों की समझ और जानकारी में जमानत मुख्यतया दो प्रकार की होती है। एक पुलिस बेल और दूसरी कोर्ट बेल, जिसमें अग्रिम जमानत यानि जिसे anticipatory बेल कहते हैं या फ़िर स्थाई जमानत। सीधे सरल शब्दों में कहा जाए तो छोटे-मोटे या कम गंभी अपराध में जब पुलिस को ये विश्वास हो जाता है की वांछित व्यक्ति समय पड़ने पर और बुलाये जाने पर उपस्थित हो जायेगा तो वह एक छोटी राशी के बंधपत्र पर उसकी जमानत ले लेता है। इसके लिए व्यक्तिक जमानत यानि स्वयं की जमानत या फ़िर किसी पड़ोसी, रिश्तेदार या जाने वाले की जमानत दी जा सकती है।
क्रमशः ..............
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ४३६ से शुरू होकर कई धाराओं में पूरी जमानत प्रक्रिया, जमानत के आदेश का स्वारूप, जमानती के लिए शर्तें आदि का वर्णन है, हालांकि आम लोगों की समझ और जानकारी में जमानत मुख्यतया दो प्रकार की होती है। एक पुलिस बेल और दूसरी कोर्ट बेल, जिसमें अग्रिम जमानत यानि जिसे anticipatory बेल कहते हैं या फ़िर स्थाई जमानत। सीधे सरल शब्दों में कहा जाए तो छोटे-मोटे या कम गंभी अपराध में जब पुलिस को ये विश्वास हो जाता है की वांछित व्यक्ति समय पड़ने पर और बुलाये जाने पर उपस्थित हो जायेगा तो वह एक छोटी राशी के बंधपत्र पर उसकी जमानत ले लेता है। इसके लिए व्यक्तिक जमानत यानि स्वयं की जमानत या फ़िर किसी पड़ोसी, रिश्तेदार या जाने वाले की जमानत दी जा सकती है।
क्रमशः ..............
गुरुवार, 13 मार्च 2008
कैसे चुने अपना वकील (कल से आगे )
जैसा की कल मैंने आप से कहा था की पहली दो बातें जो किसी को भी ध्यान में रखनी चाहिए वो ये की छोटे मोटे काम के लिए उसी के अनुरूप वकील और दूसरा ये की जो वकील जिस क्षेत्र में माहिर हो उसे उसी क्षेत्र के काम के लिए लिया जाया तो परिणाम निसंदेह बेहतर होता है , और ये फर्क मुक़दमे की पेशी के दौरान ही हो जाता है, आज बात करते हैं , वकीलों के फीस की और कुछ और भी बातें जो किसी को भी वकील करते समय ध्यान में रखनी चाहिए।
कहते है की डॉक्टर , मकेनिक, और वकील की फीस अनिश्चित और आस्मां होती है। सच तो ये है की इन सबका काम ही इनकी फीस तय करता है। लेकिन वकालत के पेशे में इन दिनों फीस लें की तीन तरह की प्रवृत्ति प्रचलित है। पहली लम्षम में, यानि पूरे काम के या मुक़दमे की फीस एक साथ, एक निश्चित रकम के रूप में। दूसरी मुक़दमे की तारीख के हिसाब से यानि जितने दिन वकील आपके मुक़दमे में पेश होगा उन दिनों के पैसे आपसे लेगा, तीसरा और अन्तिम होता है कमीसन के रूप में , और ये तीसरी तरह की फीस सिर्फ़ मुआवजे या फ़िर अनुदान भत्ते आदि के मुक़दमे में ही ली जाती है, यानि की जितनी रकम मुक़दमे की जीत के बाद मिलेगी उसका कुछ प्रतिशत वकील अपनी फीस के रूप में लेगा। सबसे जरूरी बात ये होती है की फीस की बात बिल्कुल स्पष्ट कर लेनी चाहिए और एक बार बात तय हो जाने के बाद आनाकानी से आप ख़ुद मुसीबत में पड़ सकते हैं।
यहाँ ये बता दूँ की गरीबों और लाचार लोगों के लिए अदालत और सरका की तरफ़ से निशुल्क वकील की भी व्यवस्था होती है, इसके लिए सभी अदालात में मौजूद विधिक सेवा सहायता केन्द्र के दफ्तर में अर्जी देकर वकील प्राप्त किया जा सकता है।
यदि किस कारंवाश वकील बदलना पड़ जाया तो नए वकील से पुराने वकील की बुराई कभी ना करें , क्योंकि आप नहीं जानते की कौन सा वकील किस वकील का मित्र कौन उसके ख़िलाफ़।
यदि किसी वकील के काम से आप खुश नहीं हैं या फ़िर आपको उससे कोई गंभीर शिकायत है तो सभी अदालतों में बने बार असोसिएशन के दफ्तर में जाकर वहाँ के पदाधिकारियों से अपनी बात कह सकते हैं।
एक सबसे जरूरी बात वकील कोई भी अच्छा या ख़राब नहीं होता और हरेक वकील सिर्फ़ जीतने के लिए लड़ता है , फर्क होता है तो सिर्फ़ ज्ञान और कुव्वत का ।
यदि आप में से कोई भी कोई प्रश्न करना चाहे तो भी मुझे लिख सकते हैं मैं अपने ज्ञान के अनुरूप शंका समाधान की कोशिश करूंगा।
आज इतना ही....
कहते है की डॉक्टर , मकेनिक, और वकील की फीस अनिश्चित और आस्मां होती है। सच तो ये है की इन सबका काम ही इनकी फीस तय करता है। लेकिन वकालत के पेशे में इन दिनों फीस लें की तीन तरह की प्रवृत्ति प्रचलित है। पहली लम्षम में, यानि पूरे काम के या मुक़दमे की फीस एक साथ, एक निश्चित रकम के रूप में। दूसरी मुक़दमे की तारीख के हिसाब से यानि जितने दिन वकील आपके मुक़दमे में पेश होगा उन दिनों के पैसे आपसे लेगा, तीसरा और अन्तिम होता है कमीसन के रूप में , और ये तीसरी तरह की फीस सिर्फ़ मुआवजे या फ़िर अनुदान भत्ते आदि के मुक़दमे में ही ली जाती है, यानि की जितनी रकम मुक़दमे की जीत के बाद मिलेगी उसका कुछ प्रतिशत वकील अपनी फीस के रूप में लेगा। सबसे जरूरी बात ये होती है की फीस की बात बिल्कुल स्पष्ट कर लेनी चाहिए और एक बार बात तय हो जाने के बाद आनाकानी से आप ख़ुद मुसीबत में पड़ सकते हैं।
यहाँ ये बता दूँ की गरीबों और लाचार लोगों के लिए अदालत और सरका की तरफ़ से निशुल्क वकील की भी व्यवस्था होती है, इसके लिए सभी अदालात में मौजूद विधिक सेवा सहायता केन्द्र के दफ्तर में अर्जी देकर वकील प्राप्त किया जा सकता है।
यदि किस कारंवाश वकील बदलना पड़ जाया तो नए वकील से पुराने वकील की बुराई कभी ना करें , क्योंकि आप नहीं जानते की कौन सा वकील किस वकील का मित्र कौन उसके ख़िलाफ़।
यदि किसी वकील के काम से आप खुश नहीं हैं या फ़िर आपको उससे कोई गंभीर शिकायत है तो सभी अदालतों में बने बार असोसिएशन के दफ्तर में जाकर वहाँ के पदाधिकारियों से अपनी बात कह सकते हैं।
एक सबसे जरूरी बात वकील कोई भी अच्छा या ख़राब नहीं होता और हरेक वकील सिर्फ़ जीतने के लिए लड़ता है , फर्क होता है तो सिर्फ़ ज्ञान और कुव्वत का ।
यदि आप में से कोई भी कोई प्रश्न करना चाहे तो भी मुझे लिख सकते हैं मैं अपने ज्ञान के अनुरूप शंका समाधान की कोशिश करूंगा।
आज इतना ही....
बुधवार, 12 मार्च 2008
कैसे चुने अपना वकील ?
आज एक छोटी सी जानकारी आपसे बाँट रहा हूँ। कभी भी कोई आम आदमी जब भी किसी तरह के कानूनी पचड़े में पड़ता है तो जो पहली बात उसके जेहन में आती है वो होती है कि, कोई जानकार व्यक्ति को सम्पर्क किया जाए जो की इस झंझट से मुक्ति दिलवाए ऐसे में उसके दिमाग में सिर्फ़ एक ही व्यक्ति का ध्यान आता है वो है वकील । हालांकि वकीलों के बारे में कुछ भी कहना या बताना बिल्कुल उसी तरह से है जैसे की किसी क्रिकेट मैच के परिणाम के बारे में कोई घोषणा करना। लेकिन यदि कुछ मोटी मोटी बातें याद राखी जाएँ तो इतना तो जरूर हो सकता है की उसे बाद में जाकर ये अफ़सोस नहीं होगा की यदि इस तरह का वकील किया होता , या की अमुक आदमी को वकील के रूप में रखा होता तो शायद मुक़दमे का फैसला कुछ अलग होता॥
अदालत में जाने से पहले आपको ये तय करना है की आपका काम किस तरह का है और उसी के अनुरूप वकील भी आपको करना चाहिए । मसलन उदाहरण दे कर मैं समझाता हूँ, यदि किसी को सिर्फ़ चल्लान का, उसे भुगतने का, या फ़िर जमानत की अर्जी का, या फ़िर गवाही के लिए, अपनी वसीयत के लिए , या इसे तरह के और दूसरे कामों के लिए अदालत में जाना पड़ रहा है तो अच्छा होता है की उन वकीलों से सम्पर्क किया जाए जो इसे तरह के छोटे काम को अपने हाथों में लेते हैं। इसका पहला लाभ तो ये होगा की आप को बहुत ज्यादा पैसे खर्च नहीं करने पड़ेंगे कम से कम उस तुलना में तो कम ही जो की कोई भी बड़ा वकील उसी काम के लिए लेगा। दूसरा ये की उसके पास आपके लिए समय का अभाव नहीं होगा।
यदि आपको पूरे मुक़दमे के लिए , उसकी एक एक कार्यवाही के लिए किसी वकील की जरूरत है तो फ़िर किसी भी तरह से अच्छा वकील ही करने की कोशिश करें। इसमें ध्यान रखने की बात सिर्फ़ ये है की सभी वकीलों का अपना अपना कार्यक्षेत्र होता है अपनी अपनी खासियत होती है कोई दीवानी मुक़दमे का स्पेसिअलिस्ट होता है तो कोई फौजदारी मुक़दमे का , कोई मुआवजे की मुकदमों का, तो अच्छा ये होता है की यदि किसी वकील के अनुरूप ही उसे कार्य दिया जाए तो उसका परिणाम अपेक्षित है की जयादा बेहतर आए।
क्रमशः ..........
अदालत में जाने से पहले आपको ये तय करना है की आपका काम किस तरह का है और उसी के अनुरूप वकील भी आपको करना चाहिए । मसलन उदाहरण दे कर मैं समझाता हूँ, यदि किसी को सिर्फ़ चल्लान का, उसे भुगतने का, या फ़िर जमानत की अर्जी का, या फ़िर गवाही के लिए, अपनी वसीयत के लिए , या इसे तरह के और दूसरे कामों के लिए अदालत में जाना पड़ रहा है तो अच्छा होता है की उन वकीलों से सम्पर्क किया जाए जो इसे तरह के छोटे काम को अपने हाथों में लेते हैं। इसका पहला लाभ तो ये होगा की आप को बहुत ज्यादा पैसे खर्च नहीं करने पड़ेंगे कम से कम उस तुलना में तो कम ही जो की कोई भी बड़ा वकील उसी काम के लिए लेगा। दूसरा ये की उसके पास आपके लिए समय का अभाव नहीं होगा।
यदि आपको पूरे मुक़दमे के लिए , उसकी एक एक कार्यवाही के लिए किसी वकील की जरूरत है तो फ़िर किसी भी तरह से अच्छा वकील ही करने की कोशिश करें। इसमें ध्यान रखने की बात सिर्फ़ ये है की सभी वकीलों का अपना अपना कार्यक्षेत्र होता है अपनी अपनी खासियत होती है कोई दीवानी मुक़दमे का स्पेसिअलिस्ट होता है तो कोई फौजदारी मुक़दमे का , कोई मुआवजे की मुकदमों का, तो अच्छा ये होता है की यदि किसी वकील के अनुरूप ही उसे कार्य दिया जाए तो उसका परिणाम अपेक्षित है की जयादा बेहतर आए।
क्रमशः ..........
गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008
कोर्ट कचहरी की कुछ और बातें.
इस ब्लॉग की पहली पोस्ट में मैंने आपको बताया था की मैं इस ब्लॉग पर क्या सब करने और लिखने वाला हूँ। आज उसी बात को जारी रखते हुए आगे बता रहा हूँ। एक आम आदमी को अदालत , कोर्ट कचहरी थाना, पुलिस आदि सभी कुछ खामखा के झंझट लगते हैं , सच पूछिए तो होते भी यही हैं । मगर दूसरी तरफ़ ये भी एक कटु सत्य है की चाहे अनचाहे आज अदालत उसकी खबरें , कानूनी जानकारी भी एक आदमी की जरूरत बन चुकी है। चाहे अपनी वसीयत बनवाने हो या अफ्फिदावित या कहें की शपथ पत्र, या फिर कोई और काम मगर कभी ना कभी सबको इनकी जरूरत पड़ रही है।
एक और बात जो मैंने महसूस की है वो ये की ग्रामीण क्षेत्रों में तो अभी भी अदालती चक्कर का खेल उतना प्रचलित नहीं हुआ है मगर शहरी और विशेषकर महानगरों में तो ये एक अति आवश्यक काम हो गया है। मैं इस ब्लॉग पर सिलसिले से पहले विभिन्न अदालतों से उनके कार्य , उनके कार्यक्षेत्र के अनुरूप आपका परिचय कराऊंगा। इसके बाद अलग अलग भागों में जरूरी "कानूनी जानकारी " देने की कोशिश करूंगा, इसके साथ साथ आपके प्रश्नों , आपकी दुविधाओं का जवाब देने की कोशिश भी रहेगी, और हाँ निसंदेह अदालतों में फैले भ्रष्टाचार और रोचक घटनाओं का जिक्र भी करूंगा।
उम्मीद है की आपको मेरा ये प्रयास भी सार्थक और आपके लिए उपयोगी लगेगा.
एक और बात जो मैंने महसूस की है वो ये की ग्रामीण क्षेत्रों में तो अभी भी अदालती चक्कर का खेल उतना प्रचलित नहीं हुआ है मगर शहरी और विशेषकर महानगरों में तो ये एक अति आवश्यक काम हो गया है। मैं इस ब्लॉग पर सिलसिले से पहले विभिन्न अदालतों से उनके कार्य , उनके कार्यक्षेत्र के अनुरूप आपका परिचय कराऊंगा। इसके बाद अलग अलग भागों में जरूरी "कानूनी जानकारी " देने की कोशिश करूंगा, इसके साथ साथ आपके प्रश्नों , आपकी दुविधाओं का जवाब देने की कोशिश भी रहेगी, और हाँ निसंदेह अदालतों में फैले भ्रष्टाचार और रोचक घटनाओं का जिक्र भी करूंगा।
उम्मीद है की आपको मेरा ये प्रयास भी सार्थक और आपके लिए उपयोगी लगेगा.
बुधवार, 27 फ़रवरी 2008
इस ब्लॉग का परिचय
जैसा की पिछले वर्ष के अंत में आप सबसे वादा किया था की भविष्य में आप लोगों के लिए दो नए ब्लॉग लेकर उपस्थित हूउँगा, जिसमें से पहला होगा कोर्ट-कचहरी और दूसरा एक उपन्यास "मंदाकिनी " । अपने वादे के अनुरूप ही आपके सामने पहला और मेरा चौथा ब्लॉग लेकर हाजिर हूँ।
कचहरी या अदालत बहुत पहले से एक ऐसी जगह रही है जहाँ के बारे में बहुत सारी बातें कही और सूनी जाती रही हैं। कोई इसे न्याय का मन्दिर कहता है , कोई इसे लोकतंत्र का प्रहरी कहता है । कुछ लोग कहते हैं की भगवान् दुश्मन को भी अदालत के चौखट पर ना ले जाए। कहने का मतलब की जितने लोग उतने ही अलग अलग अनुभव और उनके विचार। ब्लॉग जगत पर पहले से ही कुछ ब्लोग्स अदालत या इससे संबंधित विषयों पर चल रहे हैं । मगर मैं उनसे अलग आपसे बहुत सी बातें करने सुनने वाला हूँ । पिछले दस वर्षों में अपने कार्य के दौरान मेरे अनुभव , मेरी जानकारी, मेरा ज्ञान और मेरी सहायता जो भी जितना भी मेरे पास है वो मैं आपसे बांटने वाला हूँ। मसलन एक आदमी के लिए अदालत कोर्ट कचहरी का मतलब , उसकी दिक्कत, उसके अनुभव , उसके सवाल और उनका जवाब ॥
यदि थोडा संछेप में बताऊँ टू ये कुछ ऐसा होगा, की एक आम आदमी को अपना वकील चुनने से पहला किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, गवाही देते समय क्या कैसे होना चाहिए, विवाह और तलाक, गुजारा बता, जमानत , क्लेम आदि सब कुछ धीरे धीरे आपके सामने लाने की कोशिश रहेगी, इसके साथ साथ अदालातों में घटने वाली दिलचस्प घटनाएं, फैसले , और भी बहुत कुछ।
अंत में सिर्फ़ इतना ही की मेरे अन्य ब्लोग्स की तरह आप जब इसे भी पढेंगे टू मुझे यकीन है की आपको ऐसा नहीं लगेगा की समय नष्ट हुआ.
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