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शनिवार, 31 अगस्त 2019
शुक्रवार, 14 नवंबर 2014
बदलती न्यायिक व्यवस्थाएं - एक विमर्श
देश की प्रशासनिक संरचना को तय करते समय जिस बात का ध्यान सबसे अधिक रखा गया था वह बात थी शासन व्यवस्था के तीनों अंगों के बीच कार्य व शक्ति का पृथ्क्करण व सबसे ज्यादा इनके बीच समान संतुलन । चाहे अनचाहे, गाहे-बेगाहे ये तीनों ही राज्य के प्रशासनिक ढांगे को स्थाई व दुरूस्त रखने के लिए आमने-सामने आते ही रहते हैं । पिछले कुछ वर्षों में विधायिका द्वारा लिए गए अहितकर निर्णय या कानूनों के निर्माण में व्याप्त खामियां , राजनीति, व राजनीतिज्ञों का गिरता स्तर , अपराध व भ्रष्टाचार में संलिप्तता आदि ने न्यायपालिका को अधिक मुखर या कहें कि अति सक्रियता का अवसर दे दिया ।
इसका एक दुष्परिणाम ये निकला कि न्यायपालिका जिस पर विवादों के निपटान की अहम जिम्मेदारी थी उसने राज्य संचालकों के लिये दिशा निर्देशन की भूमिका भी विवशत: अपने कंधों पर उठा ली । और शायद यही सबसे बडी वजह रही कि पिछले सिर्फ़ एक दशक में न्यायपालिका में शीर्ष स्तर से लेकर निचले स्तर तक समाज में व्याप्त हर कुरीति व बुराई का समावेश देखने को मिल गया ॥
शीर्ष न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार में संलिप्तता से लेकर यौन अपराध किए जाने तक के आरोप लगे । मामला सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि विख्यात व प्रतिष्ठित न्यायविदों की आपसी छींटाकशी ने आम लोगों के सामने बहुत सी अप्रिय बातें ला दीं । न्यायपालिका में बुरी तरह पैठ बना चुका भाई भतीजावाद , लॉबिंग, अवकाश प्राप्ति के पश्चात किसी पद पर पदारुढ होने/किए जाने की संभावना के मद्देनज़र सरकार के प्रति नरम दृष्टिकोण आदि ने यह जता दिया था कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता व निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए वहां भी सुधार की आवश्यकता है , विशेषकर न्यायपालिका के प्रशासन क्षेत्र में ॥
हालांकि ऐसा नहीं था कि विधायिका या सरकार इस ओर कोई कदम नहीं उठा रही थी । पूर्व की सरकारों ने जहां " अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग" तथा "judges accountability bill" ज़ज़ेस अकाउंटिबिलिटी बिल पर कार्य व प्रस्ताव किया था । वहीं नवगठित सरकार भी इस दिशा में कई नई संकल्पनाओं व विकल्पों पर कार्य शुरू कर चुकी है । वर्तमान सरकार ने सबसे पहले उन कानूनों की छंटाई का काम अपने जिम्मे लिया जो बरसों पुराने होने के साथ साथ आउटडेटेड यानि औचित्यहीन हो गए थे ॥
ऐसे लगभग छ : सौ से अधिक छोटे बडे कानूनों का अध्ययन करके उन्हें परिवर्तित या समाप्त/निरस्त करने की योजना प्रस्तावित है । यहां यह उल्लेख करना दिलचस्प होगा कि अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई एक याचिका पर न्यायालय ने ऐसे ही पूर्व में निरस्त किए जा चुके एक कानून के प्रयोग पर हैरानी जताते हुए सरकार से स्थिति स्पष्ट करने के को कहा है ॥
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति व पदोन्नति की प्रचलित कोलेजियम प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन की ओर भी वर्तमान सरकार कदम बढा चुकी है । पिछले कुछ समय से इस कोलेजियम व्यवस्था पर येन केन कारणों से प्रश्नचिन्ह लग रहे थे । कई पूर्व न्यायाधीशों ने भी समय समय पर इस व्यवस्था पर टीका टिप्पणी करके अपना असंतोष व्यक्त किया है । नई व्यवस्था में न्यायाधीशों के एकाधिकार की स्थिति को बदलने का प्रयास किया गया है ।
इसके अलावा नई सरकार ने देश भर में बहुत सारी अदालतों के गठन की योजना, विवाद निपटान की गैर न्यायिक व्यवस्थाओं के विकल्प व संभावनाओं पर कार्य योजना, अदालतों को पूरी तरह डिजिटलाइज़्ड करके पारदर्शी बनाना, गरीबों व निशक्तों को न्याय सुलभ कराने के लिए कई नई व्यवस्थाओं व योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है ॥
विधायिका द्वारा न्यायिक व्यवस्थाओं में ऐसे परिवर्तनों के प्रयास पर न्यायपालिका ने चेताया है कि न्यायपालिका की शक्तियों में किसी भी तरह के अंकुश लगाने या उसमें कमी करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा , किंतु यहां न्यायपालिका को भी खुद ये आत्ममंथन करना होगा कि आखिर क्यों नहीं वो सुधार / विकल्प अपनाए जाएं जो अंतत: न्यायपालिका को ही चुस्त दुरूस्त करेंगे । न्यायपालिका यूं भी अपने न्यायिक कार्यों के बोझ से पहले ही ग्रस्त है ऐसे में यदि न्यायपालिका के प्रशासनिक क्षेत्र में सुधार और कसाव के लिए विधायिका अच्छे उद्देश्य से कोई परिवर्तन करती है तो बिना जांचे परखे उसे नकारना या समय से पहले ही उसकी आलोचना/विश्लेषण करना ठीक नहीं होगा ॥ इन परिवर्तनों का क्या और कितना प्रभाव पडेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा किंतु फ़िलहाल तो सकारात्मक परिणामों की ओर ही आशान्वित रहा जाना चाहिए ॥
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शुक्रवार, 6 मई 2011
न्यायपालिका में भाई भतीजावाद :एक गंभीर प्रवृत्ति
यूं तो जब भी न्यायपालिका में छिपे भ्रष्टाचार की बहस छिडती है तो बात घूमफ़िर कर इस मुद्दे पर जरूर आकर अटक जाती है कि न्यायपालिका में भाई भतीजावाद की प्रवृत्ति जम कर चलन में है । न सिर्फ़ न्यायिक नियुक्तियों में ही इस भाई भतीजावाद के चलन ने स्थिति को नारकीय बनाया हुआ है बल्कि एक ही न्यायालय में न्यायाधीशों के रिश्तेदारों , भाई , भतीजों द्वारा वकालत किए जाने के कारण भी इस बात की आशंका हमेशा बनी रहती है कि वे अपने संबंधों का लाभ अपने मुकदमों में जरूर उठाते हैं ।
सबसे हैरानी की बात ये है कि बार बार विभिन्न बार एसोसिएशनों द्वारा इस बात को उठाए जाने के बावजूद भी न तो सरकार द्वारा न ही खुद न्यायपालिका द्वारा इस संबंध में कोई ठोस कदम उठाया जाता है । उलटे ऐसी बातों को अपने प्रभाव से दबाने की कोशिश की जाती है । पिछले वर्षों में कई प्रदेश के न्यायालयों में ये बात सूचना के अधिकार के सहारे सामने लाई गई है जिसके बाद अपेक्षित रूप से खूब विवाद हुआ । किंतु उसे भी येन केन प्रकारेण दबा दिया गया । अब एक बार फ़िर से ये मामला सुर्खियों में है ।
सरकार को भी इस समस्या का पूरा भान है और शायद इसीलिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन करने की तैयारी की जा रही है । इससे जहां न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी वहीं केंद्रीय लोक सेवा आयोग की तरह काडर प्रणाली तथा स्थानांतरण की व्यवस्था से काफ़ी हद तक इस भ्रष्टाचार से निपटा जा सकेगा । सरकार को और खुद न्यायपालिका को भी चाहिए कि लोकतंत्र के एकमात्र बचे हुए थोडे से मजबूत स्तंभ को संबल देने के लिए इस व्यवस्था को जल्द से जल्द अमल में लाने का प्रयास किया जाए ।
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