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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बदलती न्यायिक व्यवस्थाएं - एक विमर्श



देश की प्रशासनिक संरचना को तय करते समय जिस बात का ध्यान सबसे अधिक रखा गया था वह बात थी शासन व्यवस्था के तीनों अंगों के बीच कार्य व शक्ति का पृथ्क्करण व सबसे ज्यादा इनके बीच समान संतुलन । चाहे अनचाहे, गाहे-बेगाहे ये तीनों ही राज्य के प्रशासनिक ढांगे को स्थाई व दुरूस्त रखने के लिए आमने-सामने आते ही रहते हैं । पिछले कुछ वर्षों में विधायिका द्वारा लिए गए अहितकर निर्णय या कानूनों के निर्माण में व्याप्त खामियां , राजनीति, व राजनीतिज्ञों का गिरता स्तर , अपराध व भ्रष्टाचार में संलिप्तता आदि ने न्यायपालिका को अधिक मुखर या कहें कि अति सक्रियता का अवसर दे दिया ।


इसका एक दुष्परिणाम ये निकला कि न्यायपालिका जिस पर विवादों के निपटान की अहम जिम्मेदारी थी उसने राज्य संचालकों के लिये दिशा निर्देशन की भूमिका भी विवशत: अपने कंधों पर उठा ली । और शायद यही सबसे बडी वजह रही कि पिछले सिर्फ़ एक दशक में न्यायपालिका में शीर्ष स्तर से लेकर निचले स्तर तक समाज में व्याप्त हर कुरीति व बुराई का समावेश देखने को मिल गया ॥

शीर्ष न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार में संलिप्तता से लेकर यौन अपराध किए जाने तक के आरोप लगे । मामला सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि विख्यात व प्रतिष्ठित न्यायविदों की आपसी छींटाकशी ने आम लोगों के सामने बहुत सी अप्रिय बातें ला दीं । न्यायपालिका में बुरी तरह पैठ बना चुका भाई भतीजावाद , लॉबिंग, अवकाश प्राप्ति के पश्चात किसी पद पर पदारुढ होने/किए जाने की संभावना के मद्देनज़र सरकार के प्रति नरम दृष्टिकोण आदि ने यह जता दिया था कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता व निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए वहां भी सुधार की आवश्यकता है , विशेषकर न्यायपालिका के प्रशासन क्षेत्र में ॥


हालांकि ऐसा नहीं था कि विधायिका या सरकार इस ओर कोई कदम नहीं उठा रही थी । पूर्व की सरकारों ने जहां " अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग" तथा "judges accountability bill"  ज़ज़ेस अकाउंटिबिलिटी बिल  पर कार्य व प्रस्ताव किया था । वहीं नवगठित सरकार भी इस दिशा में कई नई संकल्पनाओं व विकल्पों पर कार्य शुरू कर चुकी है । वर्तमान सरकार ने सबसे पहले उन कानूनों की छंटाई का काम अपने जिम्मे लिया जो बरसों पुराने होने के साथ साथ आउटडेटेड यानि औचित्यहीन हो गए थे ॥

ऐसे लगभग छ : सौ से अधिक छोटे बडे कानूनों का अध्ययन करके उन्हें परिवर्तित या समाप्त/निरस्त करने की योजना प्रस्तावित है । यहां यह उल्लेख करना दिलचस्प होगा कि अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई एक याचिका पर न्यायालय ने ऐसे ही पूर्व में निरस्त किए जा चुके एक कानून के प्रयोग पर हैरानी जताते हुए सरकार से स्थिति स्पष्ट करने के को कहा है ॥


सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति व पदोन्नति की प्रचलित कोलेजियम प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन की ओर भी वर्तमान सरकार कदम बढा चुकी है । पिछले कुछ समय से इस कोलेजियम व्यवस्था पर येन केन कारणों से प्रश्नचिन्ह लग रहे थे । कई पूर्व न्यायाधीशों ने भी समय समय पर इस व्यवस्था पर टीका टिप्पणी करके अपना असंतोष व्यक्त किया है । नई व्यवस्था में न्यायाधीशों के एकाधिकार की स्थिति को बदलने का प्रयास किया गया है ।


इसके अलावा नई सरकार ने देश भर में बहुत सारी अदालतों के गठन की योजना, विवाद निपटान की गैर न्यायिक व्यवस्थाओं के विकल्प व संभावनाओं पर कार्य योजना, अदालतों को पूरी तरह डिजिटलाइज़्ड करके पारदर्शी बनाना, गरीबों व निशक्तों को न्याय सुलभ कराने के लिए कई नई व्यवस्थाओं व योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है ॥

विधायिका द्वारा न्यायिक व्यवस्थाओं में ऐसे परिवर्तनों के प्रयास पर न्यायपालिका ने चेताया है कि न्यायपालिका की शक्तियों में किसी भी तरह के अंकुश लगाने या उसमें कमी करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा , किंतु यहां न्यायपालिका को भी खुद ये आत्ममंथन करना होगा कि आखिर क्यों नहीं वो सुधार / विकल्प अपनाए जाएं जो अंतत: न्यायपालिका को ही चुस्त दुरूस्त करेंगे । न्यायपालिका यूं भी अपने न्यायिक कार्यों के बोझ से पहले ही ग्रस्त है ऐसे में यदि न्यायपालिका के प्रशासनिक क्षेत्र में सुधार और कसाव के लिए विधायिका अच्छे उद्देश्य से कोई परिवर्तन करती है तो बिना जांचे परखे उसे नकारना या समय से पहले ही उसकी आलोचना/विश्लेषण करना ठीक नहीं होगा ॥ इन परिवर्तनों का क्या और कितना प्रभाव पडेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा किंतु फ़िलहाल तो सकारात्मक परिणामों की ओर ही आशान्वित रहा जाना चाहिए ॥

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

उम्र और अपराध पर न्यायिक विमर्श



http://thecalibre.in/wp-content/uploads/2013/02/juvenile-justice.jpg



मेरे इस प्रश्न पर         विधिक शास्त्रार्थ की प्रक्रिया माननीय उच्चतम न्यायालय में प्रारंभ हो चुकी है । हालांकि सुनवाई में न्यायालय ने ये तो फ़िलहाल स्पष्ट कर ही दिया है कि इस मामले में वसंत विहार बलात्कार कांड में सज़ा भुगत रहे किशोर की सज़ा और मुकदमे पर विचार नहीं किया जाएगा ।


वास्तव में विधि को विभिन्न आयामों में परिभषित करने का गौरवपूर्ण कार्य सिर्फ़ सर्वोच्च न्यायालय के जिम्मे होता है । समाज के परिवर्तित हो रहे रूप से निकलने वाले बदलावों को सभ्यता के लिए उचित अनुचित की कसौटी पर कसकर उन्हें अपनाए जाने या ठुकराए जाने का विधिक प्रमाणपत्र जारी करता है सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला । अभी हाल ही में ऐसे दो बडे सामाजिक बदलावों की मान्यता के लिए उसे न्यायपालिका की कसौटी पर कसने का प्रयास किया गया था । जहां लिव-इन-रिलेशनशिप को वैधानिक दर्ज़ा मिल गया वहीं समलैंगिकता प्रतिबंधित ही रही । 


कानून के छात्र के रूप में जब भारतीय दंड संहिता , अपराधशास्त्र एवं दंड प्रशासन को पढते हुए "किशोर और अपराध" को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है ।कानून में "किशोर अपराध" को पढते हुए एक सबसे अहम बात ये समझ आई कि जहां उसके किशोर वय को  परिभाषित करने के लिए उसकी आयुमात्र को आधार माना गया है वहीं जब उसके अपराध निर्धारण का निर्णय किया जाता है तो उसमें आधार बनता है किए गए अपराध और उसके फ़लस्वरूप घटने वाले परिणाम के बारे में अपराध करने वाले किशोर की समझ । 

वर्तमान कानूनी स्थिति ऐसी है कि सात वर्ष से कम आयु के शिशु द्वारा किया गया अपराध उस शिशु के लिए दंडनीय नहीं नाना जाता है क्योंकि उस आयु तक शिशु की समझ सामान्यतया अपराध के रूप में अपने कृत्य की समझने , लायक मानसिक परिपक्वता नहीं होती है । सात से बारह वर्ष की आयु के किशोरों द्वारा कारित कृत्य भी अपराध नहीं माना जाएगा । यदि कारित कृत्य के प्रति उस किशोर की समझ मानसिक अपरिपक्वता प्रमाणित हो जाए । 7 से 12 वर्ष के बीच के केवल उन बालकों को संरक्षण के योग्य माना जाना चाहिए जिनका बौद्धिक स्तर अपवाद स्वरूप रूप से अपरिपक्व है । 

वर्ष 2000 के नए व वर्तमान में लागू नवीन किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण ) अधिनियम के पारित हो जाने के परिणाम स्वरूप बालक और बालिकाएं दोनों ही किशोर माने जाने की आयु 18 वर्ष कर दी गई जबकि इसके पूर्व यह आयु बालकों के लिए 16 वर्ष तथा बालिकाओं के लिए 18 वर्ष थी । इसका एक त्वरित परिणाम ये निकला कि वर्ष 2001-2002 में किशोर अपराध के आंकडे में अचानक ही 14 % की वृद्धि दर्ज़ की गई । यानि स्पष्ट था कि उम्र सीमा बढाने अपराध और अपराधियों की संख्या में ईज़ाफ़ा देखने को मिला था ।

जहां तक न्यायपालिका द्वारा इस उम्र और अपराध पर न्यायिक दृष्टिकोण स्पष्ट करने की बात है तो ये कोई पहला अवसर नहीं है जब न्यायपालिका के समक्ष ऐसी परिस्थितियां आई हैं कि जब उसे उम्र और अपराध या उम्र के साथ जुडे किसी सामाजिक प्रश्न को स्थापित और मानक विधिक नियमों कानूनों की कसौटी पर कसना होता है वो भी बिना उसके मानवीय पहलू और न्याय के प्रथम सिद्धांत कि "न्याय सिर्फ़ होना नहीं  चाहिए बल्कि न्याय होते हुए स्पष्टत: महसूस भी होना चाहिए । " की अनदेखी किए बगैर ।

तीन वर्ष पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दिल्ली के एक स्कूली छात्र और छात्रा का ऐसा युगल सामने आया जिन्होंने आपसी सहमति से प्रेम विवाह कर लिया था , जबकि पुत्री के पिता द्वारा पुलिस में अपनी पुत्री के अपहरण आदि का मुकदमा दायर कर दिया था । इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में दिए तर्कों के आधार पर उन दोनों अवयस्क युगल के विवाह को पूरी तरह कानूनी करार दिया । वास्तव में न्यायालय ने किशोरी की उम्र , मानसिक परिपक्वता , शारीरिक विकास और समझ आदि के आधार पर ये माना था कि चूंकि बालिका दिल्ली जैसे महानगर में पल बढ व शिक्षा पा रही है एवं ग्रामीण परिवेश की हम उम्र किसी बालिका से ज्यादा सजग व सचेत दिखाई जान पडती है । इस फ़ैसले पर उस समय कई सामाजिक संगठनों ने  असहमति भी जताई थी ।

अब देखना ये है कि वर्ष 2000 से लागू इस कानून पर न्यायपालिका का क्या रुख रहेगा , हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि दामिनी बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में से एक और बहुत ही अहम , जस्टिस वर्मा कमेटी का गठन , उसकी अनुशंसा और उसमें किशोरों की उम्र सीमा में किसी भी तरह के फ़ेरबदल से इंकार का नज़रिया । बहरहाल जो भी हो , आंकडे बताते हैं कि किशोर अपराध के मामले में पश्चिमी देशों की स्थिति ज्यादा बुरी है ।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

दंडव्यवस्था पर एक बहस









दिल्ली बलात्कार कांड की अंतिम परिणति या कहा जाए कि भारतीय न्याय व्यवस्था जो कम से कम त्रिस्तरीय तो है ही , उसके पहले चरण का अंतिम फ़ैसला अब आने को है । इस वक्त देश और पूरे समाज की निगाहें इस फ़ैसले की ओर लगी हुई हैं । आरोपियों को सभी धाराओं में दोषी ठहराए जाने के बाद अब जबकि उनको दी जाने वाली सज़ा पर भी बहस हो चुकी है तो अगले कुछ घंटों के भीतर ही माननीय अदालत द्वारा ये भी तय कर दिया जाएगा कि उन्हें अभी मौजूद दो अधिकतम सज़ाओं के विकल्प "उम्रकैद या फ़ांसी" में से कौन सी सज़ा दी जाएगी । चूंकि ये वो अपराध था जिसने पूरे देश को न सिर्फ़ उद्वेलित किया बल्कि महिलाओं के विरूद्द होने वाले अपराध और उनके शोषण को रोकने के लिए  प्रस्तावित और बरसों से लंबित कानून को पारित करने में अहम भूमिका निभाई । सरकार ने आनन फ़ानन में दिवंगत न्यायाधीश जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का भी गठन किया जिसने पूरे देश से इस मामले पर सुझाव और विचार मांग कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की । इसी के मद्देनज़र कानूनों में बदलाव करके न सिर्फ़ दंड व्यवस्था को कठोर किया गया बल्कि बलात्कार जैसे अपराध की परिभाषा को और विस्तृत करके " यौन शोषण " कर दिया गया ।



इस विशेष मुकदमे से इतर इससे पहले भी ऐसे मौके आते रहे हैं जब फ़ांसी और उम्रकैद की सज़ा पर न सिर्फ़ बहस उठ खडी हुई बल्कि पिछले दिनों तो दिल्ली की एक अदालत ने एक सप्ताह में ही पांच मुजरिमों को सीधे फ़ांसी की सज़ा सुनाई है । ज्ञात हो कि बलात्कार के मुजरिमों को फ़ांसी की सज़ा , धनंजय चटर्जी के  मुकदमे और उसे मिली फ़ांसी की सज़ा के समय से शुरू हुई थी , खासकर ये बात कि किसी सज़ा को सुनाए जाने से उसे परिणति तक पहुंचने में यानि उसे फ़ांसी मिलने में 13 वर्षों का लंबा समय लगा था । उस समय के बाद अनेक मुकदमों में जब जब भी किसी को फ़ांसी की सज़ा सुनाई गई हर बार इस अधिकतम सज़ा पर एक बहस उठ खडी होती रही है ।


दंड : विधिशास्त्र के अनुसार यदि निचोड में कहा जाए तो सामाजिक व्यवस्था के लिए जो कानून निर्मित किए जाते हैं उनके उल्लंघन को रोकने के लिए भय के रूप में जो शारीरिक , मानसिक , आर्थिक, या सामाजिक कष्ट पहुंचाया जाता है , वह दंड कहलाता है । दंड के विभिन्न सिद्धान्तों में मुख्यत: चार सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया है , जो प्रतिरोधात्मक , प्रतिशोधात्मक , निरोधात्मक , या सुधारात्मक सिद्धान्त कहलाते हैं । आधुनिक युग में एक नए सिद्धान्त उपचारत्मक सिद्धान्त को भी मान्यता दी गई है । विश्व के सभी देशों ने इन्हीं दंड सिद्धातों में से कोई न कोई सिद्धांत अपनाया व लागू किया हुआ है । किंतु इन सिद्धान्तों के प्रयोग और उनके अनुसार दी गई सज़ाओं से अपराध में कितनी कमी आई या कि सज़ा का अपराधियों में कितना भय बैठा इसका आकलन करने का शायद ही कभी प्रयास किया गया हो ।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो प्राचीन काल में भारत में मुख्यत: चार प्रकार की दंड व्यवस्थाएं प्रचलित थीं

वाकदंड या चेतावनी
प्रायश्चित
अर्थदंड
कारावास, मृत्युदंड , बध-दंड या अंग विच्छेद ।



कालांतर में अमानवीय दंड प्रथाओं के स्थान पर सुधारात्मक दंड व्यवस्था की ओर भारतीय विधि का झुकाव हुआ । किंतु इसके बावजूद भी चूंकि भारतीय विधि एक लिखित और इस कारण सीमित विधि की श्रेणी में आती थी इसलिए तय अपराधों के लिए एक नियत तय सज़ा को देने की  व्यवस्था ही बहाल रखी गई ।   हालांकि पिछले दो दशकों में भारतीय विधिक व्यवस्थाओं में तेज़ी से बदलाव देखने को मिले हैं और प्रयोग के तौर पर ही सही किंतु उन नई दंड प्रणालियों , जैसे सामाजिक संस्थानों में सेवा देना , आरोपियों पर अर्थदंड लगाकर उस राशि से पीडितों को सहायता देने आदि को भी आज़माया जाने लगा है ।

अब इस मुकदमे के संदर्भ में यदि इस क्रूरतम अपराध के लिए भारतीय कानून में उपलब्ध दो अधिकतम विकल्पों - आजीवन कारावास और मृत्युदंड के बीच विमर्श किया जाए तो बेशक एक आम नागरिक और देश के समाज की भावना के अनुरूप मैं सोचूं तो यकीनन मुझे भी यही लगेगा कि फ़ांसी से कम कोई सज़ा इस जघन्य अपराध के लिए नाकाफ़ी साबित होगी । किंतु जब लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं और पहले से ही फ़ांसी की सज़ा पाए अभियुक्तों की लंबी कतार देखता हूं तो मेरा संदेह और भी पुख्ता हो जाता है कि काश भारत भी उन अन्य पश्चिमी और कुछ और देशों की तरह "अपराध आधारित सज़ा " की व्यवस्था को अपना पाता तो ही ऐसे मामलों में न्याय पाने जैसा लग सकता है । ज्ञात हो कि एक उदाहरण से इसे ऐसा समझा जा सकता है कि श्रीलंका में एक व्यक्ति जिसने अपनी 67 वर्षीय मां के साथ बलात्कार किया था उसे अदालत ने 260 वर्षों की सज़ा सुनाई थी , ऐसी ही अकल्पनीय सज़ाएं पश्चिमी देशों में भी सुनाई जाती रही हैं । अभी हाल ही में किसी अभियुक्त की जेल में मौत हुई जिसे नौ सौ वर्षों की सज़ा सुनाई गई थी । इसका मंतव्य सिर्फ़ इतना संदेश देना होता है कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसकी सज़ा इतनी अधिक बनती है बेशक अपरधी की उम्र उससे बहुत कम ही क्यों न हो ।

कल इस समय तक इस मुकदमे का फ़ैसला आ चुका होगा , फ़िर इस बहस को आगे बढाएंगे ..जो आजीवन कारावास और  मृत्युदंड ..के बीच आगे बढेगी ..................