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सोमवार, 24 नवंबर 2014

मुकदमेबाज़ी बनाम मध्यस्थता(व्यावसायिक वाद संदर्भ) : एक टिप्पणी



मध्यस्थता को स्वीकारने की युक्तियुक्तता 




मध्यस्थता, व्यावसायिक विवादों के निपटान की तीव्र गति से विकसित होती विवाद निस्तारण तकनीक है क्योंकि यह विवाद निपटान प्रक्रिया को गति देता है । यह विवादित पक्षों को विवाद निपटाने के लिए अपने व्यावसायिक सलाहकारों की सहायता लेने को सशक्त सलाहकारों की सहायता लेने को सशक्त करता है ताकि वे स्वेच्छा से परस्पर स्वीकृत निदान या समझौते पर स्वयं पहुंच सकें । 

मध्यस्थता हेतु ल्कोई विवाद उपयुक्त है अथवा नहीं , इस निर्णय पर पहुंचने के लिए निम्नलिखित तत्वों की सहायता ली जा सकती है । अधिकांश मामलों में प्राथमिक कारण यह है कि विवादित पक्ष , त्वरित समाधान द्वारा आपसी हितों को साझा करते हुए एक दूसरे से वाणिज्यिक संबंध कायम रखना चाहते हैं । मुकदमेबाज़ी के व्ययसाध्य , लंबा खिंचने वाला था अनिश्चिति होने के कारण दोनों पक्ष मध्यस्थता को प्राथमिकता/वरीयता देते हैं । और न ही दोनों पक्ष ऐसे किसी विवाद से उत्पन्न मुकदमेबाज़ी से जुडी प्रख्याति में पडना चाहते हैं ।


मध्यस्थता एक मंच प्रदान करता है , पक्षों को प्रोत्साहित कर स्वयं निर्णयन का , उनकी आवश्यकताओं व हितों की पहचान करने का , सभी पक्षों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के  विकल्प उत्पन्न करता है , हितों की पूर्ति को विस्तृत करके , अपने स्वयं के नतीज़ों का निर्माण करने का । मध्यस्थता दोनों पक्षों के संबंधों /रिश्तों को लक्ष्य बनाता है । दोनों पक्षों को , मान्यता व सशक्तता की एक प्रक्रिया द्वारा ,साथ ही उस रूप में , जिसमें ,  वे एक दूसरे से संबंधित हों , स्वीकृति व सहमति की सुविधा प्रदान करता है । दूसरे शब्दों में दोनों पक्षों के बीच संवाद का विकास करना ही उद्देश्य है । 

जो भी हो , मध्यस्थता का चुनाव पक्षों की सोच को बदलने में सहायता करता है । यह दोनों पक्षों के लिए एक दूसरे के साथ आकर विवाद के विषय में एक दूसरे का मत जानने व संभाव्य रूप से उन्हें परस्पर स्वीकार्य निर्णय बिंदु तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करता है ॥

बुधवार, 5 नवंबर 2008

तलक लेने से पहले -भाग १

कहते हैं की वैवाहिक जोड़ी का निर्णय स्वर्ग में होता है और ये गठबंधन एक या दो नहीं बल्कि सात जन्मों का होता है, लेकिन बदलते सामजिक परिवेश में पारिवारिक और नैतिक मूल्यों के पतन न परिस्थिति को बहुत बदल दिया है। अब जहाँ विवाह भी विज्ञापन आधारित प्रस्तावों में से मनोनुकूल चयन बनकर रह गया है तो वहीं तलक उस तथाकथित सात जन्मों के गठबंधन से पलभर में मुक्ति का माध्यम बनकर रह गया है। आज हालत ऐसे हो गए हैं की कभी पश्चिमी सभ्यता के सामाजिक जीवन की साधारण प्रक्रिया समझा जाने वाला तलाक अब भारितीय समाज विशेषकर शहरी समाज में भी बहुत बढ़ रहा है.देश भर में तलाक की बढ़ती घटनाओं के कारण अदालतों में इतने मुकदमें लंबित हो गए हैं की इनके लिए विशेष पारिवारिक अदालतों का घतःन किया गया है। ज्ञात हो की जहाँ ऐसी अदालतें नहीं हैं वहां जिला एवं सत्र न्यायालय की अदालत ही ऐसे मुकदमें देखती है। एक आम व्यक्ति , पुरूष या महिला , ,यदि तलाक लेने का निर्णय ले ही चुके हैं तो उसे किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, किन किन बातों के लिए तैयार रहना चाहिए इस अंक में बताने का प्रयास करूंगा।

सबसे पहले आपको ये बता दें की पारिवारिक अदालतें मुख्यतया किन मुकदमों को देखती सुनती हैं। हिंदू , मुस्लिम तथा अन्य सभी धर्मों के व्यक्तियों के तलाक संबन्धी मामले, द्द्म्पत्य आधिकारों की पुनर्स्थापना, तथा तलाक की याचिका के साथ लगे भरण-पोषण या निर्वाह संबन्धी दावे का निपटारा । इसके अलावा अन्य विवाद जैसे संतानों की अधिकारिता, संपत्ति पर हक़, आदि हेतु अन्य दीवानी अदालतों ,में अर्जी दाखिल की जाती है। एक सबसे महतवपूर्ण बात ये की भार्तिये समाज में परिवार के टूटते- बंधन तथा तलाक की बढ़ती घटनाओं से चिंतित अदालतों ने भी इस परिप्रेक्ष्य में एक अनिवार्य नियम अपना लिया है। किसी भी तलाक अर्जी की सुनवाई से पहले अदालतें अपनी और से दोनों पक्षों में सुलह की कोशिश करती हैं। राजधानी समेत कई स्थानों पर तो इसके लिए बाकायदा मध्यस्थता केन्द्र बनाये गए हैं।

यदि सुलह सफाई के सारे प्रयासों के बाद भी स्थिति वही की वही रहती है तो बेहतर तो यही होता है की हिंदू विवाह अधिनियम १९५५ के प्रावधानों के तहत दोनों पक्ष आपसी सहमती से तलाक अर्जी के माध्यम से ही तलाक लेने का प्रयास करें। हालाँकि ये सच है की पारिवारिक जीवन में दाम्पत्य रिश्तों के अन्दर जब दूरियां और कड़वाहट बढ़ जाती है तो फ़िर किसी भी संयक्त प्रयास की गुंजाईश कम रहती है किंतु समय और पैसे की बचत के दृष्टिकोण से आपसी सहमती से तलाक अर्जी के माध्यम से ही तलाक लेना जरूरी रहता है। इसके लिए सबसे पहली जरूरी बात ये की दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का निवास स्थान वहां होना चाहिए जहाँ अदालत की अधिकारिती होती है। आपसी सहमती तलाक अर्जी के लिए दोनों पक्षों को एक साथ बैठ कर संयुक्त याचिका तैयार करनी चाहिए। इसमें दोनों का सम्पूर्ण विवरण, वैवाहिक जानकारी , यदि बच्चे है तो उनके बाबत सारे बातें, भरण-पोषण की बाबत खर्चे की रकम का ब्योरा, एकमुश्त या किस्तों में आदि सब कुछ सिलसिलेवार ढंग से लिहना होता है। सामान्यतया हिंदू विवाह अधिनियम के धारा १३ (१) (अ) एवं १३ (१) (बी) के तहत दो याचिकाएं दाखिल की जाती हैं किंतु दोनों याचिकाओं के बीच कम से कम छ माह का अन्तर होना आवश्यक है।

क्रमश..........