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शनिवार, 21 मई 2011

राजधानी दिल्ली में बनी हरित अदालत



पर्यावरण संरक्षण हेतु किए जा रहे प्रयासों में न्यायपालिका ने भी अपनी सहभागिता देने की योजना बनाई है । हाल ही में राजधानी दिल्ली में , पूर्वी और उत्तर पूर्वी जिलों की अधीनस्थ अदालत , कडकडडूमा कोर्ट की पर्यावरण समिति के नोडल ऑफ़िसर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री गुरदीप सिंह ने  कडकडूमा कोर्ट को "हरित न्यायालय " घोषित करते हुए,
एक परिपत्र जारी करते हुए निर्देश दिया है कि न्यायालय परिसर में अनावश्यक रूप से जलाई जा रही लाइटें पंखे इत्यादि को बंद रखा जाए , विशेष रूप से वहां जहां पर्याप्त धूप व रोशनी पहुंचती हो । 


इसके साथ ही निर्देश जारी किया गया है कि जब न्यायाधीश न्यायालय में बैठे हों तो उनके चैंबरों की लाईटें , पंखें व एसी को बंद रखा जाए । अनावश्यक खर हो रही बिजली को बचा कर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने को कहा गया है । ज्ञात हो कि अभी हाल ही में कडकडडूमा न्यायालय परिसर में स्थित सरकारी आवास परिसर में भी पौधा रोपण की एक बडी योजना का शुभारंभ किया गया है । कडकडडूमा न्यायालय परिसर में भी बडे वृक्षों , और पौधों की भरमार के कारण भी इसे "हरित अदालत " का दर्ज़ा दिया गया है । दिल्ली पी डब्ल्यू डी की एक नर्सरी अदालत परिसर के भीतर ही इस हरित अदालत के स्वपन को बखूबी साकार कर रही है । ये कदम न सिर्फ़ मानवीय बल्कि पर्यावरण सचेतता के पक्ष में एक मील का पत्थर साबित होगा ।  




कोर्ट परिसर में फ़ैली हुई हरियाली .....




















बुधवार, 18 मई 2011

मध्यस्थता .........यानि चुटकियों में मुकदमों का निपटारा



मध्यस्थता : एक बेहतर उपाय 





इन दिनों भारतीय न्यायप्रणाली बहुत से नए प्रयोगों और प्रकियाओ के दौर से गुजर रही है । न्यायालयों पर बढते बोझ के कारण खुद अदालतें इनसे निपटने के लिए पश्चिमी देशों और अन्य विकसित देशों द्वारा प्रचलन में लाई जा रही न्यायिक प्रणालियों को प्रयोग के तौर पर अपना रही है और सुख्द बत ये है कि इनका परिणाम भी अब दिखने लगा है । लोक अदालते , मध्यस्थता केंद्र तथा प्ली बार्गेंनिंग जैसी नई व्यवस्थाएं इसी का उदाहरण हैं । आज जानते हैं कि मध्यस्थता केंद्र क्या होता है , ये कैसे कार्य करता है , और आम लोगों के लिए ये कैसे फ़ायदेमंद साबित हो सकता है , या कहें कि हो रहा है ।


मध्यस्थता क्या है ?

मध्यस्था विवादों को निपटाने की सरल एवम निष्पक्ष आधुनिक प्रक्रिया है । इसके द्वारा मध्यस्थ अधिकारी दवाबरहित वातावरण में विभिन्न पक्षों के विवादों का निपटारा करते है । सभी पक्ष अपनी इच्छा से सद्भावपूर्ण वातावरण में विवाद का समाधान निकालते हैं तथा उसे स्वेच्छा से अपनाते है । मध्यस्थता के द्वारा विभिन्न पक्ष अपने विवाद को सभी दृष्टिकोण से मापते हैं और वह समझौता जो सभी पक्षों को मान्य होता है , उसे अपनाते हैं । इस पद्धति के द्वारा विवादों का जल्द से जल्द निपटारा होता है जो खर्चरहित है । यह मुकदमों के झंझटों से मुक्त है । साथ ही साथ न्यायलयों पर बढते मुकदमों का बोझ भी कम होता है ।

मध्यस्थता में क्या होता है ?


मध्यस्थ अधिकारी निष्पक्ष मध्यस्थता के लिए पूर्णत: प्रशिक्षित होता है ।

सभी पक्षों को उनके विवादों का हल निकालने में मदम करता है । मध्यस्थता ढांचागर प्रक्रिया है इसकी कार्यप्रणाली निम्न चरणों में काम करती है ।

१. परिचय : मध्यस्थ अधिकारी , मध्यस्थता की प्रक्रिया से सभी पक्षों को अवगत करवाता है । उन्हें प्रकिया के नियमों एवं गोपनीयता के बारे में भी बताया जाता है ।

२. संयुक्त सत्र :- मध्यस्थ अधिकारी , पक्षों से उनके विवाद के प्रति जानकारी प्राप्त करता है तथा विवाद के निपटारे के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है ।

३. पृथक सत्र :- संयुक्त के अलावा यदि जरूरत हो तो मध्यस्थ अधिकारी हर पक्ष से अलग अलग बात करते हैं । इस सत्र मे सभी पक्ष अपने हर मुद्दे को मध्यस्थ अधिकारी के समक्ष रख सकते हैं जिसे गोपनीय रखा जाता है । इस सत्र में मध्यस्थ विवाद की जड तक पहुंचता है ।

४. समझौता : - विवाद के निवारण के उपरांत मध्यस्थ अधिकारी सभी पक्षों से समझौते की पुष्टि करवाता है । इस समझौते को लिखित रूप में अंकित किया जाता है । जिस पर सभी पक्ष हस्ताक्षर करते हैं ।

अब देखते हैं कि एक मध्यस्थ अधिकारी की भूमिका क्या होती है और उसके कार्य क्या होते हैं :-


मध्यस्थता अधिकारी विवादित पक्षों के बीच समझौते की आधारभूमि तैयार करता है ।

पक्षों के बीच आपसी बातचीत और विचारों का माध्यम बनता है ।

समझौते के दौरान आने वाली बाधाओं का पता लगाता है ।

बातचीत से उत्पन्न विभिन्न समीकरणों को पक्षों के समक्ष रखता है ।

सभी पक्षों के हितों की पहचान करवाता है ।

समझौते की शर्तें स्पष्ट करवाता है तथा ऐसी व्यवस्था करता है कि सभी पक्ष स्वेच्छा से समझौते को अपना सकें ।
अब जानते हैं कि मध्यस्थता प्रक्रिया के क्या लाभ होते हैं


विवाद का अविलम्ब व शीघ्र समापन

समय तथा खर्चे की किफ़ायत

न्यायालयों में चक्कर लगाने से राहत

अत्यधिक सरल व सुविधाजनक

विवाद का हमेशा के लिए प्रभावी एवं सर्वमान्य समाधान

समाधान में पक्षों की सहमति को महत्व

अनौपचारिक , निजी तथा पूर्णत: गोपनीय प्रक्रिया

सामाजिक सदभाव कायम करने में सहायक

मध्यस्थता में विवाद निपटाने पर , वादी ( Court Fees Act -1870 )कोर्ट फ़ीस एक्ट -1870 की धारा 16  तहत पूरा न्यायालय शुल्क वापिस लेने का हकदार होता है ।



अब कुछ और जरूरी बातें । इन मध्यस्थता केंद्रों में सभी फ़ौजदारी विवादों और आपराधिक विवादों का निपटारा नहीं किया जाता है । इनमें मुख्य रूप से पारिवारिक वाद , मोटर वाहन दुर्घटना वाद , और चेक बाऊंसिंग तह्त अन्य आर्थिक वादों को निपटाया जाता है । उम्मीद है कि ये नया प्रयोग भविष्य में क्रांतिकारी कदम साबित होगा । 

मंगलवार, 17 मई 2011

मोटर वाहन दुर्घटना में फ़ंस जाएं तो








जिस तरह तेज़ी से शहरों में वाहनों की संख्या बढती जा रही है अफ़सोस और दुख की बात है कि उसी तेज़ी से मोटर वाहन दुर्घटनाएं बढ रही हैं । महानगरों में तो स्थिति नारकीय सी बन गई है और इसके कई कारणों में एक सबसे बडा कारण है खुद लोगों की लापरवाही । आज आपको बताते हैं कि एक मोटर वाहन दुर्घटना की चपेट में यदि आप कभी आ जाते हैं ( यहां दोनों पक्षों की तरफ़ की बात की जा रही है , यानि कि चाहे पीडित हों या आरोपी ) तो आपको किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि आप खुद की , समाज की और कानून की भी सहायता कर सकें ।

पहले जानते हैं उन बातों को , जिनका ध्यान रखने से मोटर वाहन दुर्घटना की चपेट में आने से खुद को बचाया जा सकता है

१.     वाहन को तभी लेकर मुख्य सडक पर आएं जब आप उसे पूरी तरह चलाना सीख चुके हों । इससे पहले दक्षता के लिए चाहे आपको कुछ दिन ज्यादा प्रतीक्षा करनी पडे , किंतु     मुख्य  सडकों पर पहुंचकर दुर्घटनाग्रस्त होने /करने से तो ये बेहतर ही है ।अगर सीख रहे हैं तो साथ में किसी ऐसे व्यक्ति का होना जरूरी है जिसके पास वैध ड्राइविंग लाईसेंस हो

२.    अपना लाइसेंस हमेशा साथ रखें और हमेशा उसी वाहन को चलाएं जिसके लिए आप लाइसेंस धारक हैं ।

३.    वाहन के सभी कागजात , बिल्कुल वैध , एवं दुरूस्त रखें । बीमा , प्रदूषण प्रमाण पत्र , पंजीकरण प्रमाण पत्र आदि सब कुछ गाडी में ही रखें । यदि आप शहर में ही हैं और शहर     से बाहर नहीं जा रहे हैं तो आप अपने मूल प्रमाण पत्रों के स्थान पर उनकी छायाप्रति ( जो कि किसी राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित हो ) भी रख सकते हैं , लेकिन शहर से बाहर जाने की स्थिति में सभी मूल कागजात साथ रखना बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए ।

४.    दुर्घटना हो जाने की स्थिति में यदि पीडित पक्ष की ओर हैं तो जहां तक हो सके धीरज बनाए रखें , और सबसे पहले खुद की या चोटिल की सुरक्षा का ध्यान रखें । अगर दुर्घटना     आपसे हो गई है तो किसी भी स्थिति में वहां से भागने का प्रयास न करें । सिर्फ़ एक मिनट भर को ये याद करें कि , चोटिल व्यक्ति की जगह पर कोई आपका अपना हो या आप कभी खुद हों तो , इसलिए कोशिश यही करनी चाहिए कि चोटिल की सहायता सबसे पहले की जानी चाहिए । स्मरण रहे कि , भारत में दुर्घटना में चोटिल व्यक्तियों में से     साठ प्रतिशत की मृत्यु समय पर चिकित्सकीय सहायता न मिलने के कारण ही हो जाती है ।

५.    कभी भी विपरीत परिस्थितियों में , यानि कि , किसी भी तरह का नशे का सेवन करने के बाद , बेहद खराब मौसम में , या फ़िर जल्दी पहुंचने के लिए जबरन बने बनाए रास्तों     को चुनने , आदि जैसे हमेशा ही दुर्घटनाओं को आमंत्रित करने जैसा होता है । इसलिए प्रयास ये करना चाहिए कि यथा संभव ऐसी स्थितियों से बचा जा सके ।

६.    आजकल एक प्रवृत्ति , महानगरो और शहरों में बहुत तेज़ी से पनपती दिख रही है , वो है , अपने नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति देना । ये कितना घातक कदम     साबित हो रहा है आज इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन नाबालिग चालकों ने पिछले कुछ वर्षों मे मोटर वाहन दुर्घटना की दर में उन्नीस प्रतिशत तक की     वृद्धि कर दी है और इससे भी बढकर इन दुर्घटनाओं में चोटिल व्यक्तियों के मरने का प्रतिशत चौहत्तर प्रतिशत तक है ।विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी बच्चों को वाहन     चलाने के अनुमति नहीं दी जानी चाहिए । किंतु यदि फ़िर भी ऐसी स्थिति आ ही जाती है तो उसके पीछे किसी न किसी वयस्क को जरूर बैठा होना चाहिए ।

इन सब स्थितियों के बावजूद भी अगर , आप मोटर वाहन दुर्घटना में फ़ंस जाते हैं तो आपको ये निम्न बातें ध्यान में रखनी चाहिए

१.     पीडित पक्ष को चोटिल व्यक्ति की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता देने के साथ साथ अन्य वैधानिक बातों का ध्यान भी रखना चाहिए । ये ठीक है कि दुर्घटना पीडित पक्ष के लिए     उस समय कुछ भी सोचने का वक्त नहीं होता है , किंतु फ़िर भी दुर्घटना में लिप्त गाडी का नंबर , उसका मेक , आदि कम से कम उस समय अवश्य ही जेहन में रहना चाहिए जब     वो पुलिस को बयान दे रहे हों । चाहे इसके लिए पीडित कितना ही समय ले ले । यदि दुर्घटना आपसे हुई है तो आपको अपना लाइसेंस , वाहन से संबंधित सभी कागजात , आदि     सब कुछ जांच कर रहे पुलिस अधिकारी को सौंपनी चाहिए , ताकि पुलिस सभी कागजातों की वैधता की जांच करके बीमा कंपनियों को मुआवजे की राशि देने के लिए सौंप सके ।

२.     अगर आप चोटिल पक्ष की तरफ़ हैं तो एक बात का विशेष ध्यान रखें कि आजकल मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम ,के वाद दायर करने करवाने के लिए अस्पतालों के आसपास दलाल     और कई बार तो खुद पुलिस वाले भी अस्पताल में ही किसी वकील आदि कर लेने की सलाह देते हैं जो कि सर्वथा गलत प्रवृत्ति है । अस्पताल से छुट्टी लेने के बाद आराम से     सोच विचार कर मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम याचिका तैयार करने के लिए अधिवक्ता किया जाना चाहिए ।ईलाज के दौरान के सभी कागजात , दवाईयों के बिल , डॉक्टर के     प्रेसक्रिप्शन आदि को सहेज़ कर रखें । यहां तक कि उस दौरान ईलाज़ के लिए घर से अस्पताल तक आने जाने के किए गए खर्च की पर्ची , विशेष पौष्टिक आहार लेने की पर्ची ,     यदि कोई निजि सहायक रखा गया है तो उसके वेतन आदि के बाबत सब कुछ संभाल के रखा जाना चाहिए ।

३.     पीडित अथवा चोटिल व्यक्ति ( दुर्घटना में मृत्यु हो जाने की स्थिति में मृतक के विधिक उत्तराधिकारी ) को मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम के लिए अपनी आय का ( दुर्घटना में मृत्यु     हो जाने की स्थिति में मृतक की ), और व्यय का ब्यौरा , वेतन , व्यवसाय आदि का प्रमाण , भी जरूर पेश किया जाना चाहिए । अन्यथा अदालत न्यूनतम वेतन राशि को     आधार मानकर ही बीमा कंपनियों को मुआवजा देने का फ़ैसला सुनाती हैं ।

४.     पीडित  अगर वाहन दुर्घटना के समय वाहन का नंबर नोट नहीं कर पाया हो और पुलिस भी किसी तरह से उस वाहन को तलाश न पाई हो तो फ़िर उस स्थिति में स्थानीय     एसडीएम कार्यालय में आवेदन करके दुर्घटना में राज्य सरकार की तरफ़ से मिलने वाले राज्य सरकार के मुआवजे के प्रयास करना चाहिए ।

५.    दुर्घटना के आरोपी को ,सबसे पहले तो वाहन से संबंधित सभी कागजात पुलिस को अदालत को सौंप देने चाहिए ताकि बीमा कंपनी मुआवजे के लिए तैयार हो सके । अगर किसी     भी तरह से कागज़ों में कोई कमी है तो अविलंब ही पीडित पक्ष के साथ समझौते का प्रयास करना चाहिए । कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि दोनों पक्ष समझौता चाहते हुए     भी खुलकर आपस में बात नहीं कर पाते , कई बार अधिवक्ताओं की तरफ़ से मनाही होती है , किंतु जहां पर कागज़ ठीक नहीं है यानि बीमा कंपनी ने अपने ऊपर से जिम्मेदारी     बचा ली है तो उस स्थिति में तो समझौता करना ही श्रेयस्कर होता है , ऐसी स्थिति में अदालतों में स्थापित मध्यस्थता केंद्रों में बैठ कर बातचीत की जानी चाहिए । ऐसा इसलिए     क्योंकि यदि अदालत बाद में मुआवजे की राशि का आदेश भी सुनाती है तो वाहन चालक /मालिक द्वारा उस राशि को देने से बचने के लिए घरबार तक छोड के निकल भागने की     संभावना ज्यादा होती है ।

‍६.    यदि आरोपी को लगता है कि कहीं न कहीं चोटिल व्यक्ति की भी गलती थी ,दुर्घटना के लिए वो भी कहीं न कहीं जिम्मेदार था तो वो अदालत से पीडित की आंशिक असावधानी     को भी ध्यान में रखने का आग्रह कर सकता है । ऐसा अक्सर उन मुकदमों में किया जाता है जहां , चोटिल व्यक्ति के चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान अल्कोहल यानि शराब के     सेवन किए हुए की बात सामने आती है ।


यदि इन बातों को ध्यान में रखा जाए तो कम से कम मोटर वाहन दुर्घटना में पीडितों के दर्द को कुछ हद तक अवश्य ही कम किया जा सकता है ।

शुक्रवार, 6 मई 2011

न्यायपालिका में भाई भतीजावाद :एक गंभीर प्रवृत्ति





यूं तो जब भी न्यायपालिका में छिपे भ्रष्टाचार की बहस छिडती है तो बात घूमफ़िर कर इस मुद्दे पर जरूर आकर अटक जाती है कि न्यायपालिका में भाई भतीजावाद की प्रवृत्ति जम कर चलन में है । न सिर्फ़ न्यायिक नियुक्तियों में ही इस भाई भतीजावाद के चलन ने स्थिति को नारकीय बनाया हुआ है बल्कि एक ही न्यायालय में न्यायाधीशों के रिश्तेदारों , भाई , भतीजों द्वारा वकालत किए जाने के कारण भी इस बात की आशंका हमेशा बनी रहती है कि वे अपने संबंधों का लाभ अपने मुकदमों में जरूर उठाते हैं । 

सबसे हैरानी की बात ये है कि बार बार विभिन्न बार एसोसिएशनों द्वारा इस बात को उठाए जाने के बावजूद भी न तो सरकार द्वारा न ही खुद न्यायपालिका द्वारा इस संबंध में कोई ठोस कदम उठाया जाता है । उलटे ऐसी बातों को अपने प्रभाव से दबाने की कोशिश की जाती है । पिछले वर्षों में कई प्रदेश के न्यायालयों में ये बात सूचना के अधिकार के सहारे सामने लाई गई है जिसके बाद अपेक्षित रूप से खूब विवाद हुआ । किंतु उसे भी येन केन प्रकारेण दबा दिया गया । अब एक बार फ़िर से ये मामला सुर्खियों में है । 

सरकार को भी इस समस्या का पूरा भान है और शायद इसीलिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन करने की तैयारी की जा रही है । इससे जहां न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी वहीं केंद्रीय लोक सेवा आयोग की तरह काडर प्रणाली तथा स्थानांतरण की व्यवस्था से काफ़ी हद तक इस भ्रष्टाचार से निपटा जा सकेगा । सरकार को और खुद न्यायपालिका को भी चाहिए कि लोकतंत्र के एकमात्र बचे हुए थोडे से मजबूत स्तंभ को संबल देने के लिए इस व्यवस्था को जल्द से जल्द अमल में लाने का प्रयास किया जाए ।

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