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मंगलवार, 24 नवंबर 2009

दिल्ली अधीनस्थ न्यायालय में भारी भर्तियों की घोषणा

पिछले कुछ समय से जब जब अदालतों पर बोझ बढने की बात उठती रही है तब तब खुद न्यायपालिका ने भी इस बात को माना और कहा है कि देश में आज बहुत बडे पैमाने पर नये अदालत गठित किये जाने की जरूरत है ।इस बिंदु पर कई बार सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की अकर्मठता और इस मुद्दे की उपेक्षा किये जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं । राज्य सरकारों के साथ केंद्र सराकार भी इस दिशा में उतनी संजीदगी से सोच और कर नहीं रही है जितनी कि जरूरत है ॥ मगर दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों में इस दिशा में जरूर ही बहुत तेजी से काम हो रहा है ॥

पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति वर्ष , न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति , एक के बाद एक नई नई जिला अदालतों और विशेष अदालतों का गठन, कर्मचारियों की भर्ती, नयी नयी योजनाएं आदि सफ़लतपूर्वक चल रहा है । इसी क्रम में प्राप्त सूचना के अनुसार ॥इस समय दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों मे न्यायिक अधिकारियों के लिए रिक्तियां , दिल्ली न्यायिक अकादमी के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों की रिक्तियां और संभवत: अगले सप्ताह लगभग पांच सौ कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए रिक्तियां घोषित की गई हैं । इन पदों , इनकी योग्यताओं, आवेदन भरने का सारा विवरण और भर्ती परीक्षा का सारा विवरण आदि अगली पोस्टों के माध्यम से बताने का प्रयास करूंगा ॥

तो ये खबर अदालत के साथ साथ रोजगार की तलाश और उसके प्रयास में लगे सभी लोगों के लिये काम की होगी ऐसा मेरा विश्वास है ....यदि कोई त्वरित जानकारी या सहायता चाहिये तो आप बेशक और बेझिझक मुझे फ़ोनिया सकते हैं जी .....

शनिवार, 7 नवंबर 2009

यदि तलाक लेना है तो ( दैनिक ट्रिब्यून के स्तंभ कानून कचहरी मे प्रकाशित आलेख )















चित्र को बडा करने के लिए उस पर चटका लगाएं


तलाक लेने से पहले और तलाक के लिए सोच रहे लोगों के लिए कानूनी सलाह के रूप में लिखा गया एक आलेख जिसे कानून कचहरी , स्तंभ , दैनिक ट्रिब्यून में स्थान मिला ।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

बुरे फ़ंसे वकील साहेब....ऐसा भी होता है ।

कहते हैं कि कभी कभी चालें उलटी भी पड जाया करती हैं ...या यूं कहें कि शिकारी अपने जाल में खुद ही फ़ंस जाते हैं ...या ये कि किसी एक जगह से बचने के अनजाने में किया गया कोई काम उसे दूसरी जगह फ़ंसा देता है और ऐसी स्थिति जब बनती है तो क्या हाल होता है , आप खुद देखिये ।

मामला दिल्ली उच्च न्यायालय का है ,दरअसल हुआ ये कि एक व्यक्ति ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर एक मुकदमे में एक अर्जी दाखिल कर के कोर्ट के एक आदेश को वापस लेने या स्थगन देने का अनुरोध किया । उसने अपनी दलील में कारण ये दिया कि सुनवाई वाले दिन, वो और उसका वकील किसी कारण से शहर से बाहर थे सो अदालत मे उपस्थित नहीं हो सके । इसी के अनुरूप हलफ़नामे के साथ प्रार्थना पत्र दायर किया गया । और इस कारण अदालत ने उनके खिलाफ़ एक पक्षीय फ़ैसला सुना दिया था । मामला यहां तक तो ठीक था , और इस बाबत सूचनार्थ दूसरे पक्ष को भी नोटिस भेजा गया ।


अब दूसरे पक्ष की जानिये , दूसरे पक्ष ने सूचना का अधिकर के तहत उच्च न्यायालय रजिस्ट्रार कार्यालय से जानकारी मांगी कि क्या उस दिन उस व्यक्ति और उनके वकील क्या किसी भी मुकदमे में दूसरी किसी अदालत में उपस्थित हुए थे । बस जो जवाब मिला उसने दूसरे पक्ष के लिये मुसीबतें बढा दी। दूसरे पक्ष ने मय सबूत ये साबित कर दिया कि हलफ़नामा झूठा दायर किया गया है और वो व्यक्ति और उनके वकील साहब उस दिन न सिर्फ़ अदालत में उपस्थित थे बल्कि अदालत में किसी अन्य मुकदमे में उनकी हाजिरी भी दर्ज है ।

अदालत ने महापंजीयक उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि दोनों ( मुवक्किल और उनके अधिवक्ता ) के खिलाफ़ सी आर पी सी की धारा 195 के तहत शिकायत दाखिल की जाए । इतना ही नहीं अधिवक्ता द्वारा झूठे हलफ़नामे दिये जाने को गंभीरता से लेते हुए ..बार काउंसिल से उनके लाईसेंस को रद्द किये जाने की सिफ़ारिश की और साथ साथ 25 हजार का जुर्माना भी ठोंक दिया...।

हम क्या कहते ..बस यही निकला ..ओह बुरे फ़ंसे वकील साहब ।

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