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मंगलवार, 30 जून 2009

जानिए निर्वाह भत्ते से जुड़े कुछ कानून



भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ से १२८ तक उन प्रावधानों का उल्लेख किया गया जिसके आधार पर किसी भी व्यक्ति को ..उसके आश्रितों को निर्वाह खर्चा/गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य किया जा सकता है. दरअसल इस कानून के पीछे अवधारणा ये है की प्र्तात्येक व्यक्ति का ये मौलिक और नैतिक कर्त्तव्य है की वो अपनी पत्नी, बच्चों, माता-पिता, अभिभावकों की देखभाल करे..यदि वे अपनी देखभाल करने में असमर्थ हैं तो....इसके पीछे विचार ये है की कोई भी माता-पिता, पत्नी, और संतान इन हालातों में मजबूर हो कर न रहे की ..विवश होकर वो अपराध ..में ही लिप्त हो जाए..या किसी और का मोहताज बन जाए.

धारा १२५ के अनुसार कोई सक्षम व्यक्ति उनका भरण-पोषण करने में आनाकानी करता है :

१. उसकी पत्नी, जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो...
२. उस व्यक्ति की वैध/अवैध अवयस्क ...विवाहित/अविवाहित संतान ..जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो...
३. उस व्यक्ति की वैध/अवैध संतान (विवाहित पुत्री नहीं ) जो बालिग़ तो हैं ,...किन्तु किसी भी तरह की शारीरिक , मानसिक , अक्षमता से ग्रस्त हो.....
४. उसके माता -पिता, जो अपनी देखभाल करने में अक्षम हों....

तो उस स्थिति में ..प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी उस व्यक्ति को ये आदेश दे सकती है की वो एक निश्चित राशि , प्रति माह, उन्हें गुजारा भत्ते के रूप में अदा करे...

इसके तहत वर्ष २००१ में शंशोधन करके ये कानून भी बना दिया गया की अदालत धारा १२५ की याचिका की सुनवाई करते हुए ..एक निश्चित राशि को अंतरिम खर्चे /राहत के रूप में निर्धारित करके उस व्यक्ति को उसके भुगतान का आदेश दे सकती है..जब तक की उस याचिका का निपटारा नहीं हो जाता.और ये अंतिम खर्चे का निर्धारण मुदालय को याचिका प्राप्त होने के साठ दिनों इके अन्दर अन्दर कर दिया जाना चाहिए....

कल कुछ प्रमुख मुकदमों का हवाला देते हुए देखेंगे की इसमें और क्या क्या प्रावधान हैं......

(चूँकि पहले मैंने वादा किया था की निर्वाह भत्ते के बारे में जानकारी दी जायेगी..इसलिए धारा ४९८ ए यानि दहेज़ प्रतारणा के बारे में उसके बाद..और आलेख को भागों में विभाजित करने के पीछे सिर्फ इतना कारण होता है की पाठक ..बोर न हों...)

सोमवार, 29 जून 2009

जानिए विवाह से सम्बंधित कुछ अपराधों को ..

आज के अंक में जानते हैं की भारतीय कानून में विवाह से सम्बंधित भी कुछ अपराध वर्णित हैं...वो कौन कौन से हैं..किस तरह के हैं और उनमें कितनी सजा का प्रावधान है..आदि आदि...

भारतीय दंड संहिता की धारा ४९३ के अनुसार कोई भी व्यक्ति, किसी भी महिला से , जो की कानूनी रूप से उसकी पत्नी नहीं है, मगर समझती है की वो उस व्यक्ति की विवाहिता है, यदि , उस महिला के संसर्ग में (शारीरिक रिश्ते ) आता है तो वो दंड का भागी बँटा है , क्यूंकि ये कानूनन जुर्म है. इस धारा के अनुसार दो तथ्यों की अपरिहार्यता होती है..

.पहली ये की कानूनन वैध शादी का धोखा होना .
.और दूसरा इस धोखे में ही संसर्ग होना.

इस जुर्म के लिए सिद्ध ये करना होग की आरोपी व्यक्ति ने उस महिला को jaanboojh कर उसे इस धोखे में रखा की वो कानून उसकी वैध पत्नी है ...और इसी विश्वास के तहत ही उसके साथ संसर्ग स्थापित किया गया

ये अपराध .गैर संज्ञेय, गैर जमानती तथा non कम्पौंदेबल है..और कानून के अनुसार इसमें दस वर्षों की सजा और जुर्माने का प्रावधान है

बहु-विवाह :-

भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के अनुसार कोई भी व्यक्ति यदि अपने jivan साथी के जीवित होते हुए दूसरा विवाह kartaa है तो उसे बहु विवाह का दोषी माना जाएगा. इस अपराध के लिए उसे सात वर्षों की सजा हो सकती है. मगर इस कानून से जुड़े कुछ महतवपूर्ण तथ्यों का जिक्र आवश्यक हो जाता है.. ये कानून मुस्लिम धर्म के अनुयायीं(सिर्फ पुरुषों ) पर लागु नहीं होता क्यंकि शरीयत काननों के अनुसार उन्हें इसकी इजाजत मिली हुई है, is कानून के बावजूद दो स्थितियों में ये अपराध नहीं माना जाएगा.

यदि किसी न्यायालय द्वारा उस विवाह को कानूनी मान्यता दे दी है....

उस स्थिति में भी जब पहले पति या पहली पत्नी का ,,..सात वर्षों तक कोई अता -पता न चले..

सबसे महत्वपूर्ण बात ये की ,,कानून की नजर में दूसरी पत्नी और doosre पति को..भी वो सारे अधिकार प्राप्त हैं तो...बशर्ते की विवाह वैध हो .(.वैध और अवैध/अपूर्ण विवाह पर चर्चा फिर कभी )

कल बात करेंगे ..धरा ४९८ की जो इन दिनों दुरूपयोग किये जाने की शिकायत के कारण चर्चा में है.

रविवार, 28 जून 2009

ग्रीष्मकालीन अवकाश और अदालतें

इन दिनों में ज्यादातर अदालतों में ग्रीष्मकालीन अवकाश का समय है..आम तौर पर जून के महीने में अदालतें ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए छुट्टी पर होती हैं...इसके अलावा दिल्ली समेत और भी कई राज्यों में शीतकालीन अवकाश भी दिया jaataa है..

जो लोग अक्सर ख़बरों में पढ़ते हैं की अदालतों में पहले से ही इतने ढेर सारे मुकदमें लंबित हैं तो फिर इन अवकाशों को क्यूँ नहीं समाप्त कर देना चाहिए..इस आलेख के माध्यम से मेरी कोशिश होगी की कुछ बातें जो आम तौर पर लोगों को पता नहीं होती , वो आप सबके सामने राखी जाए ताकि कुछ भ्रांतियां दूर हो सकें.

सबसे पहले बातें करते हैं ..अवकाशों के औचित्य की ..वो भी ऐसे समय में जब लंबित मुकदमों की संख्या करोडों का संखा छू रही है.. मोटे तौर पर तो लगता है की ..बिलकुल ..बल्कि सारी छुट्टियां समाप्त कर दी जानी चाहिए..मगर ये बात ध्यान में रखने वाली होती है की न्यायालयों और विशेषकर न्यायाधीशों का कार्य, कार्यप्रणाली,, अन्य किसी भी कार्य से सर्वथा भिन्न है. किसी भी अन्य कार्य,व्यवसाय या और किसी उद्यम में ,,किसी को निरंतर उतना मानसिक श्रम नहीं करना पड़ता..., नहीं मेरा मतलब है उस विशिष्ट रूप में नहीं करना पड़ता..एक एक मुकदमा किसी के जीवन मरण से सम्बंधित होता है..इसलिए लगातार मानसिक श्रम से थोडा सा अवकाश देकर उन्हें फिर से खुद को नवीन और स्फूर्त करने के लिए ही अवकाश की अव्धाराना को जीवित रकाहा गया है..

और ऐसा भी नहीं है की इन अवकाशों में सभी लोग पूर्ण तालाबंदी करके आराम फरमाते हैं..बल्कि पिछले कुछ वर्षों में तो अवकाश में अदालतों में इतने अलग अलग कार्यों को उनके अंजाम तक पहुंचाया जा रहा है की अवकाश की तो सार्थकता ही बन जाती हैं..दिल्ली की अदालतों में जहां पिछले कुछ वर्षों से अवकाशों में न्यायाधीशों को विशेष रूप से अभिलेखागार में पुराने वादों के रीकोर्डों की जांच करके ..जिनकी जरूरत नहीं होती उन्हें ..वहाँ से हटा कर ख़त्म करवाने का कार्य दिया जा रहा है. इसके अलावा उन्हें विशेष आदेश दिया जाता है की , वे अपनी अदालतों में वरिष्ठ नागरिकों के ,,महिलाओं के,, तथा बहुत पुराने मुकदमों
आदि को निपटाने का काम दिया जाता है..दरअसल ग्रीष्म कालीन अवकाश में सभी न्यायाधीश एवं कर्म्चारीगन बीच के अनुसार अवकाश पर जाते हैं....इसके अलावा विभागीय जांच , तथा और भी कई जिम्मेदारियां सौंप दी जाती हैं. इनसे अलग मध्यस्थता केंद्र , लोक अदालतें ,तथा सांध्यकालीन अदालतें..भी नियमित रूप से लगाईं जाती हैं.

जहां तक ,,कर्मचारियों की बात है ..तो वे भी इन दिनों अदालतों में तेजी से चल रही कम्प्यूटरीकरण के कार्य को अपने अंतिम मुकाम देने में लगे हैं..यानि कुल मिला कर छुट्टी का उपयोग किया जा रहा है.हालांकि इस बात की भी आवाजें उठ रही हैं की छुट्टियों को पूर्णतया ख़त्म करके अदालतों को निर्बाध चलने दिया जाए..कम से कम निचली अदालतों को तो अवश्य ही ...जो एक हद तक सही भी लगता है..







शुक्रवार, 26 जून 2009

महाराष्ट्र की न्यायिक प्रशिक्षण अकादमी और प्रथम राष्ट्रीय मध्यस्थ्ता केन्द्र का उद्घाटन स्त्ताइस को


देश की न्यायिक व्यवस्था मे सुधार के कार्यक्रम के अन्तर्गत एक और बडी उप्लब्धि हासिल होने जा रही है।परसों यानि सत्ताईस तारीख को महाराष्ट्र की प्रथम न्यायिक प्रशिक्ष्ण अकादमी का उद्घाटन होने जा रह है । राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इसका उद्घाटन करने वाली हैं।ये दो मन्जिला इमारत न सिर्फ़ महाराष्ट्र के न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिये तैयार किया गया है बल्कि न्याय व्यवस्था में मध्यस्थता केन्द्रों की बढ्ती भुमिका को ध्यान मेंरखते हुए , राष्ट्रीय मध्यस्थता केन्द्र का निर्माण भी इसी में किया गया है।

इस अत्याधुनिक केन्द्र में नव नियुक्त न्याधीशों का प्रशिक्षण भी उसी दिन से शुरु हो जायेगा। इस केन्द्र में एक आधुनिक पुस्तकालय के अलावा मनोरंजन कक्ष तथा एक खेल एवम योग कक्ष भी बना हुआ है । ग्यात हो कि देश की प्रथम और राष्ट्रीय न्यायिक प्रशिक्षण अकादमी का निर्माण भोपाल में किया गया था। राज्धानी दिल्ली में भी इस तरह की एक आधुनिक अकादमी लगभग तैयार है जो अगले कुछ माह में शुरु हो सकेगी…उम्मीद की जा रही है कि इन अकादमियों में न्यायधीशों को न सिर्फ़ उनके कार्यक्षेत्र के बारे में प्रशिक्षित किया जायेगा बल्कि समाज के बहुत सारे अलग अलग क्षेत्रों …।जैसे समाजशास्त्री ॥मनोवैग्यानिक ॥आदि भी इन न्यायाधीशों को अपने अनुभव के आधार पर उन्हें प्रशिक्षित करेंगे।

जानिए अपने कुछ कानूनी अधिकार .....


आज इस पोस्ट के जरिये कुछ छोटे छोटे..मगर बहुत महतवपूर्ण अधिकारों का उल्लेख किया जा रहा है...जो समय असमय किसी के भी काम आ सकती हैं...कम से कम उनकी जानकारी होने से ..बहुत सी कठिनाइयों को समझा जा सकता है...आप खुद ही देखें.

गिरफ्तारी से सम्बंधित :-
किसी भी व्यक्ति को बेडी और हथकरियों..में तब तक नहीं रखा जा सकता जब तक अदालत द्वारा पुलिस को इस बात का लिखित अधिकार न दिया गया हो .

जो भी पुलिस अधिकारी आपको गिरफ्तार कर रहा है/हैं ,उनकी नाम पट्टिका स्पष्ट रूप से लगी होनी चाहिए, जिसमें उनका नाम पढा जा सके,, यानि उसकी पहचान गिरफ्तार हो रहे व्यक्ति को होनी चाहिए.

गिरफ्तार किये जा रहे व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय ये बताना जरूरी है की उसे किस जुर्म के कारण गिरफ्तार किया जा रहा है और ये भी की गिरफ्तार हो रहा व्यक्ति अपने बचाव में वकील कर सकता है.

गिरफ्तारी का प्रपत्र (गिरफ्तारी मेमो ) तिथि ..एवं .समय के साथ ..गिरफ्तारी के समय ही तैयार की जानी चाहिए...उसके ऊपर घर के किसी सदस्य / पडोसी , या अन्य किसी उपस्थित व्यक्ति के हस्ताक्षर होने चाहिए...ये इसलिए ताकि उसकी गिरफ्तारी गुपचुप न रह सके....

पुलिस के लिए अनिवार्य है की गिरफ्तारी की सूचना ..उसे दे ..जिसे ग्फिराफ्तार होने वाला व्यक्ति अपना शुभचिंतक और मददगार समझता हो..तथा ये भी की गिरफ्तार व्यक्ति को कहाँ रखा या ले जाया जा रहा है....

गिरफ्तार होते समय..मुलजिम और गावः को दिखाते हुए..गिरफ्तार हो रहे व्यक्ति से जब्त की गयी सभी वस्तुओं की एक स्पष्ट सूची बनायी जानी चाहिए.

कानूनी सहायता :-
यदि कोई गरीब वकील नहीं कर सकता ..तो वो सरकारी खर्चे पर अपने बचाव के लिए वकील मांग सकता है.

यदि आपका वकील ,,आपको लगता है की ..आपके लिए ठीक से मुकदमा नहीं लड़ पा रहा है..तो आप वकील बदल सकते हैं...

आपको पूरा अधिकार है की अपने वकील से कोई भी बात..कोई भी सलाह ..गुप्त रूप से भी कर सकते हैं..

तलाशी (जांच ) से सम्बंधित :-
जब भी किसी के घर..दफ्तर..प्रांगन..अदि की तलाशी ली जाए तो ये जरूरी है तो स्वतंत्र गवाह...यानी आम लोगों में से कोई दो ,
वहाँ तलाशी के समय उपस्थित हों..

तलाशी लेने से पहले ..उस पुलिस पार्टी की तलाशी भी उस गवाह /गवाहों के सामने ..भी लेनी चाहिए...

चलिए फिलहाल इतना ही...कल एक आलेख ..कैसे लें निर्वाह भत्ता ........?

गुरुवार, 25 जून 2009

कल के अमर उजाला में "कोर्ट कचहरी "की चर्चा



अभी अभी अपने आलसी भाई साहब (श्री गिरिजेश राव ) का फोन आया था .कल के अमर उजाला के नियमित स्तम्भ ब्लॉग कोना में कोर्ट-कचहरी के हालिया पोस्ट की चर्चा की गयी है...गिरिजेश भाई को धन्यवाद...

बुधवार, 24 जून 2009

दुर्घटना क्लेम करना हो तो -भाग दो

कल से आगे.....

दावाकार या वादी स्वयं पीड़ित व्यक्ति ही होता है तो पंचाट उसी की गवाही , उसी के द्वारा उपलब्ध साक्ष्य एवं कागजातों को आधार मानकर दावे का निपटारा करता है. ऐसे दावों में पंचाट पीड़ित व्यक्ति को चार विभिन्न मदों में भुगतान करने का आदेश प्रतिवादी को देती है. इलाज, यात्रा भत्ता, पोषाहार देतु तथा प्रभावित दिवसों में हुए आय का नुकसान .इसलिए पीड़ित व्यक्ति को चाहिए वो इलाज से सम्बंधित प्रत्येक कागज़ .दवाइयों की रसीद,अस्पताल आने जाने,रहने में लगे खर्चे की रसीदें तथा तथा पोषाहार हेतु लिए गए विशेष भोज्य पदार्थों पर हुए खर्च का सारा ब्यौरा संभाल कर रखे एवं गवाही के समय अदालत में उपस्थित करे.

दूसरी स्थिति में जब दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके वैध आश्रित/उत्तराधिकारी द्वारा दुर्घटना क्लेम करने में पंचाट कुछ विशेष बातों का ध्यान रखती है. सबसे पहली तो ये की दावा करने वाला मृतक का वैध आश्रित/उत्तराधिकारी है. ये दोनों बातें यानि मृतक से दवाकार का सम्बन्ध तथा वैध उत्तराधिकारी/आश्रित होने का प्रमाण , दोनों ही दावा करने वाले व्यक्ति को पंचाट में saabit karnee hotee है. यानि पंचाट को संतुष्ट करना होता है. मृत व्यक्ति वाले दावों में भी पंचाट कुछ विशेष मदों में मुआवजा राशिः भुगतान का आदेश देती है. मृतक के अंतिम संस्कार पर किये गए खर्च जो की सामान्यतया दो हजार रुपया दिया जाता है. मृतक के परिवारवालों को हुई मानसिक परेशानी एवं आघात के मद में जो की सामान्यतया पच्चीस हजार रुपये होता है. तथा तीसरा एवं सबसे अहम् मृतक के परिवार को उस मृतक के चले जाने से हुई आर्थिक हानि.
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यहाँ ये बता दें की आर्थिक हानि हेतु पीड़ित या मृत व्यक्ति की आयु, uskee मासिक आय, रहन सहन पर किया जा रहा खर्च आदि सभी तथ्यों का गणितीय विश्लेषण करने के उपरांत ही मुआवजा राशिः तय की जाती है. एक अहम् बात मृतक से सम्बंधित दावे में पंचाट अंतरिम मुआवजा का आदेश भी देती है. ऐसा ही अंतरिम मुआवजा उस दुर्घटना क्लेम में भी दिया जाता है jismein पीड़ित व्यक्ति को मान्यताप्राप्त मेडिकल बोर्ड द्वारा स्थाई अपंगता का प्रमाणपत्र दिया गया है. हाँ , इसमें मुआवजे की राशि इसमें आम तौर पर पच्चीस हज़ार ही होती है.

पंचाट द्वारा मुआवजे राशि का भुगतान का आदेश भी एक विशेष व्यवस्था द्वारा किया जाता है. सामान्यतया कुल देय राशिः का अधिकतम बीस से पच्चीस प्रतिशत ही आदेश के तुंरत बाद भुगतान किया जाता है . शेष राशिः को पंचाट के आदेशानुसार नामित व्यक्तियों के नाम से बैंक में फिक्स दीपोजित करा दिया जाता है जो परिपक्वता के बाद उन्हें मिलता है. किसी अनिवार्य परिस्थिति में उक्त राशि को जारी करने हेतु प्रार्थनापत्र पंचाट में लगाया जा सकता है.

इसके अलावा कुछ और बातें भी ध्यान देने योग्य हैं. यदि दुर्घटना के समय चालाक के पास उक्त वाहन को चलाने का वैध लाईसेंस नहीं है तो मुआवजे के भुगतान का सारा jimma वाहन के मालिक के ऊपर पड़ जाता है . ऐसा इसलिए क्योंकि इससे इंश्योरेंस की शर्तों का उल्लंघन होता है. ऐसी दुर्घटनाएं जिनमें चश्मदीद गवाह नहीं होते उनमें १६३ (क ) के तहत कार्यवाई आगे बधाई जाती है. यानि कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है की एक विशेष कार्य पधात्ति के बावजूद मुआवजे की राशि बहुत कुछ वादी की स्थिति, आयु, और आय पर निर्भर करती है....

नोट :- मेरा ये आलेख दैनिक ट्रिब्यून के स्तम्भ कानून -कचहरी में प्रकाशित हो चूका है..एवं ये वादी के हितों को ध्यान में रख कर जानकारी हेतु लिखा गया था......किसी प्रश्न या शंका हेतु ..आप यहाँ पूछ सकते हैं......

मंगलवार, 23 जून 2009

दुर्घटना क्लेम करना हो तो .....



इस तेज़ गति से आधुनिक होते युग में अन्य सुविधाभोगी साधनों की तरह अपने वाहनों का उपयोग भी अनिवार्य सा हो गया है. और ये भी सच है की जितने अधिक वाहन बढ़ रहे हैं, दुखद रूप से दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं. छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरों तक में सड़क दुर्घटनाओं की दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. विशेषकर दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में तो इन सड़क दुर्घटनाओं ने एक बड़ी समस्या का रूप ले लिया है. यही वजह है की दृघतना में आहात लोगों एवं उनके आश्रितों के लिए मुआवजे हेतु ,विशेष मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम पंचाट का गठन किया गया है,जिसमें न्यायादेहीश दुर्घटना क्लेम संबन्धी दावों का निपटारा करते हैं. यहाँ ये स्पष्ट कर दें की किसी दुर्घटना के बाद पुलिस एक आपराधिक मुकदमा तो दर्ज करती ही है जो चालाक या सम्बंधित चालकों के विरुद्ध दर्ज किया जाता है. दूसरा मुकदमा पीड़ित पक्ष को या उसके आश्रित को डालना होता है. रेलवे दुर्घटना से सम्बंधित दावों और वादों के लिए ऐसे ही विशेष पंचाट अलग से बनाये गए हैं.

आइये उन बातों को जानते हैं जो किसी को भी दुर्घटना क्लेम का दावा डालते समय ध्यान में रखनी चाहिए . यहाँ ये बता दें की दुर्घटना क्लेम वाद में एक पक्ष या तो पीड़ित स्वयं होता है या दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो जाने पर उसके वैध आश्रित होते हैं और दुसरे पक्ष में वाहन का चालाक , वाहन का मालिक तथा वाहन का इन्सुरेंस होने की स्थिति में इन्सुरेंस कंपनी होती है. दुर्घटना होते ही पुलिस अपना कार्य शुरू कर देती है,. आपराधिक मुकदमा दर्ज करना, गवाहों के बयान कलमबंद करना आदि. यूँ तो प्राथमिक सूचना रिपोर्ट तथा सम्बंधित कागजातों की एक प्रति पुलिस द्वारा सम्बंधित पक्षों एवं पीडितों को उपलब्ध कराई जाती है, किन्तु स्वयं उसे हासिल करके संभाल कर रखना चाहिए. दुर्घटना के पश्चात् पीड़ित व्यक्ति तथा सम्बंधित लोग मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक रूप से परेशान होते हैं...आजकल एक प्रवृत्ति जो विवादित होने के बावजूद चलन में है वो है की दुर्घटना के कुछ समय या दिनों के पश्चात् ही कोई वकील या उसकी तरफ से कोई व्यक्ति पिसित परिवार से मिलता है और भरी भरकम मुआवजा राशि दिलवाने का आश्वासन देकर आनन-फानन में मुकदमा डालने को प्रेरित करता है. जो अधिकांशतः गलत साबित होता है. इसलिए अच्छा ये होता है की जल्दबाजी में कोई कदम न उठाया जाए.

दुर्घटना क्लेम पंचाट किसी विवाद या दावे का निपटारा कैसे करता है , क्या मापदंड अपनाया जाता है , इसकी कार्यशैली क्या होती है .इसकी चर्चा से कोई भी ये आसानी से समझ सकता है की उसको क्या और कैसे करना है..और ये भी कितनी राशि का दावा करना चाहिए.. दरअसल पंचाट दो मुख्या क्षेत्रों पर सुनवाई करता है, वैसे दुर्घटना दावे जिनमें पीड़ित व्यक्ति जीवित होता है तथा अपने दावे का अहम् गवाह और लाभार्थी भी वही होता है. दुसरे वे दावे , जिनमें दुर्घटना के समय किसी की मृत्यु हो जाती है और मुकदमा उसके आश्रितों एवं वैध उत्तराधिकारियों द्वारा डाला जाता है. हलाँकि दोनों तरह के वादों का निपटारा लगभग एक जैसे ही किया जाता है मगर कुछ विशेष बातों का अंतर तो होता ही है...

क्रमशः .............................

सोमवार, 15 जून 2009

न्यायाधीशों की स्व-संपत्ति घोषणा : पक्ष-विपक्ष


पिछले कुछ वर्षो में न्यायपालिका और कार्यपालिका कई बार बहुत सारे मुद्दों पर आमने सामने आये हैं...और बहुत से ...बल्कि अधिकाँश में ..न्यायपालिका ने स्वाभाविक रूप से कार्यपालिका ..सरकार..समाज ..को अपने फैसलों ..अपने विचारों ..और अपनी सहमती -असहमति से एक नई दिशा दी...लेकिन पिछले कुछ समय से एक मुद्दा जो कुछ ज्यादा ही उलझता जा रहा है ..वो है की न्यायाधीशों को भी अपनी संपत्ति-परिसंपत्तियों का खुलासा करना चाहिए...उपरी तौर पर ये बात बिलकुल
सीधी और स्पष्ट सी लगती है..किन्तु जिस तरह से एक के बाद एक बयान दोनों ही तरफ से आ रहे हैं उससे आम लोगों में एक भ्रम की स्थति बन गयी है..

दरअसल ये मुद्दा उतना भी सरल नहीं है ..की जैसा दीखता है..सभी न्यायाधीश अपनी अपनी संपत्तियों का खु़लासा करें और बात यही पर ख़त्म हो जाए..यदि न्यायपालिका की बात माने तो न्यायपालिका का कहना ये है की....ये ठीक है की अपने ही निर्णयों में वे ये कई बार ये घोषित कर चुके हैं की न्यायाधीश भी किसी आम जनसेवक की तरह जनता के प्रति उतना ही जवाबदेह है जितना कोई अन्य ...और मौजूदा प्रणाली (वर्तमान में जो प्रणाली है उसके अनुसार..सभी अधीनस्थ न्यायाधीश अपनी संपत्ति का ब्योरा लिखित रूप में एक दस्तावेज की तरह उच्च न्यायालय में प्रतिवर्ष जमा करवाते हैं..और सभी उच्च न्यायलय के न्यायाधीश ..सर्वोच्च न्यायलय में..सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश वही इसी तरह करते हैं..) में जबकि सभी से लिखित रूप से ये रिपोर्ट पहले ही ले ली जाती है है तो उसे सार्वजनिक करने के पीछे कोई उचित कारण नज़र नहीं आता..
न्यायपालिका का कहना है की उन्हें इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है की उन्हें अपनी संपत्तियों की घोषणा सार्वजनिक करनी होगी..बल्कि उन्हें दिक्कत ये है की सरकार या प्रशाशन कैसे ये सुनिश्चित करेगा की इन जानकारियों का गलत उपयोग नहीं किया जाएगा..उनका कहना है की चूँकि उनका कार्यक्षेत्र और कार्यप्रणाली विशिष्ट तरह की है..जिसके कारण उन्हें..समाज में रहते हुए भी समाज से अलग थलग रूप से रहना होता है...ज्ञात हो की वे किसी भी सार्वजनिक समारोह .में नहीं आ जा सकते....वे कहीं भी सार्वजनिक रूप से भाषण नहीं दे सकते..अदि से गुजरना होता है..इसलिए इसकी क्या गारंटी है की कल को निजी स्वार्थों के कारण कोई भी उन्हें किसी तरह से इन जानकारियों के लेकर उल्झायेगा नहीं. मौजूदा व्यवस्था में अभी इस मुद्दे पर किसी तरह का कोई नियम नहीं बनाया गया है .

अब दुसरे पहलु पर गौर करें. पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मामले सामने आये हैं ..उन्होंने न सिर्फ न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है ..बल्कि आम लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है की जिस न्यापालिका को अभेद और अविश्वसनीय मान रहे थे..उसमें भी समाज में आ रही कुरीतियों .बदलावों और पतनात्मक प्रवृत्तियों का समावेश हो रहा है..यहाँ ये उल्लेखनीय है की पिछले एक वर्ष में ही पूरे देश में निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक लगभग पचास न्यायाधीशों पर अलग अलग तरह के मगर आर्थिक अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप ही लगे हैं...इलाहाबाद और चंडीगढ़ न्यायालयों में जो कुछ हुआ उसकी तो कार्यवाही अब तक चल रही है..हालांकि इलाहाबाद प्रकरण में जैसी भूमिका न्यायपालिका ने निभायी ..की उसे भी एक बारगी कटघरे में खडा किया गया..जब सर्वोच्च न्यायलय की उस बेंच को ये कहा गया की उन पर लगे (मतलब न्यायाधीशों पर ) आरोपों की जांच वे खुद ही कैसे कर सकते हैं..और ये भी की सारी अदालती कार्यवाही बंद कमरे में क्यूँ की जाती है ..इससे खिन्न होकर .न्यायाधीशों की बेंच ने उस मुक़दमे को दूसरी बेंच को स्थानांतरित करते हुए खुले कमरे में उसकी सुनवाई का आदेश दिया और साथ ही ये भी कहा की अभी न्यायपालिका में इतनी सक्षमता है की वो अपनी कमियों को खुद ही ढूंढ कर दूर कर सके.

जहां तक एक आम आदमी का प्रश्न है तो वो यही सोच रहा है की आखिर सही कौन है और गलत कौन है....मामले को जिस तरह से पेश किया जा रहा है ..उससे आम जनता के सामने न्यायपालिका को कटघरे में खडा किया जा रहा है..जो की फिलहाल तो उचित नहीं जान पड़ता है..मुझे लगता है की न्यापल्की को चाहिए की वो सरकार से स्पष्ट कहे की वो इस स्मबंद में कोई ठोस नीती बनाए ..और जब तक नीति नहीं बनती तब तक इस प्रकरण पर कहीं कोई बहस या सार्वजनिक रूप से किसी तरह की कोई बयानबाजी नहीं होनी चाहिए....

शनिवार, 6 जून 2009

जल्द ही सभी थाने सीधे जुडेंगे अदालतों से .



जैसा कि मैं अपनी पिछली पोस्टों में बता चुका हूँ कि अदालती सुधारों की जारी प्रक्रिया में अदालतों को पुर्णतः कम्प्युटरीकृत करने की योजना पर पिछले कुछ वर्षों से काम चल रह है. राजधानी की जिला अदालतों में तो इसका सकारात्मक परिणाम दिखने भी लगा है..इसके तहत सभी पुराने मुकदमों के रेकोर्ड को कंप्यूटर पर दर्ज किया जा चुका है और ये प्रक्रिया नियमित रूप से अभी भी चल रही है.
ग्रीष्म कालीन अवकाश में इस कार्य के लिए विशेष रूप से कमचारियों की dyuti लगाई जा रही है. इसका परिणाम ये निकला है कि पहले जिस जानकारी के लिए आम लोगों को घंटों चक्कर लगाने पड़ते थे... कर्मचारिओं की चिरौरी करनी पड़ती थी..वो अब चंद मिनटों में पूछताछ कार्यालय में कंप्यूटर की मदद से पता चल जाती है....

इसी क्रम को आगे बढाते हुए एक और महत्वाकांक्षी योजना को अमली जामा पहनाने का काम शुरू हो चुका है. सूत्रों की माने तो जल्दी ही राजधानी के सभी थानों के कम्प्यूटरों को अदालत के कम्प्यूटरों से सीधे जोड़ने की योजना का कार्यरूप तैयार किया जा रहा है. दरअसल इसकेपीछे उद्देश्य ये है कि जब भी कोई प्राथमिकी दर्ज होती है तो उसकी सूचना अदालत तक आते आते काफी देर हो जाते है, जबकि जमानत के आवेदन के लिए, तथा दुर्घटना क्लेम के मुकदमों के लिए प्राथमिकी की प्रति का होना अनिवार्य जैसा होता है. मौजूदा कानून के अनुसार प्राथमिकी की प्रति या तो थाने में होती है या फिर एक प्रति शिकायतकर्ता के पास होती है. कई बार तो किसी को अग्रिम जमानत का आवेदन करते समय ये भी पता नहीं होता कि प्राथमिकी में उसे नामजद किया गया है या नहीं.
हलाँकि अभी इस योजना की तकनीकी पक्षों और वैधानिक पहलुओं पर अध्यन चल रहा है, और दिल्ली पुलिस अन्य बहुत सी बातों पर काम कर रही है. मगर सूत्र बताते हैं कि यदि सब कुछ ठीक रहा याने योजना के अनुरूप हुआ तो जल्दी ही प्राथमिकी की प्रति के लिए थाने के चक्कर काटने का मोहताज नहीं रहेगा.

मंगलवार, 2 जून 2009

हाँ ये , अदालत है.

हाँ ये , अदालत है.

हर किसी की, ,
किसी न किसी से,
यहाँ पर अदावत है,
हाँ,ये अदालत है.....

चप्पे चप्पे पर, है कानून यहाँ,
मगर उसी kaanoon से,
सबको यहाँ शिकायत है,
हाँ ये, अदालत है...

चारों तरफ सन्नाटा है,
सब और खामोशी है,
जो सुनाई देता है,
नोटों की सरसराहट है,
हाँ ये अदालत है.....

दीवारों पर पंजे हैं,
फर्श पर हैं कांटे निकले,
बबूल के पेड़ की,
गुलाब सी सजावट है,
हाँ ये अदालत है..

नकली रिश्ते, नकली नाते,
नकली हंसी, नकली खुशी,
पर नकली पर रंग है ऐसा,
इस असली से दिखावट है,
हाँ, ये अदालत है........


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